रात के दस बज गये थे। जालपा खुली हुई छत पर लेटी हुई थी। जेठ की सुनहरी चाँदनी में सामने फैले हुए नगर के कलश, गुम्बद और वृक्ष स्वप्न-चित्रों से लगते थे। जालपा की आँखें चन्द्रमा की ओर लगी हुई थीं। उसे ऐसा मालूम हो रहा था, मैं चन्द्रमा की ओर उड़ी जा रही हूँ। उसे अपनी नाक में खुश्की, आँखों में जलन और सिर में चक्कर मालूम हो रहा था। कोई बात ध्यान में आते ही भूल जाती, और बहुत याद करने पर भी याद न आती थी। एक बार घर की याद आ गयी, रोने लगी। एक ही क्षण में सहेलियों की याद आ गयी। हँसने लगी। सहसा रमानाथ हाथ में एक पोटली लिये, मुस्कराता हुआ आया और चारपाई पर बैठ गया।
जालपा ने उठकर पूछा–पोटली में क्या है?
रमानाथ–बूझ जाओ तो जानूँ।
जालपा–हँसी का गोलगप्पा है ! (यह कहकर हँसने लगी।)
रमानाथ–गलत।
जालपा–नींद की गठरी होगी !
रमानाथ–गलत।
जालपा–तो प्रेम की पिटारी होगी !
रमानाथ–ठीक। आज मैं तुम्हें फूलों की देवी बनाऊँगा।
जालपा खिल उठी। रमा ने बड़े अनुराग से उसे फूलों के गहने पहनाने शुरू किये, फूलों के शीतल कोमल स्पर्श से जालपा के कोमल शरीर में गुदगुदी सी होने लगी। उन्हीं फूलों की भाँति उसका एक-एक रोम प्रफुल्लित हो गया।
रमा ने मुस्कराकर कहा–कुछ उपहार?
जालपा ने कुछ उत्तर न दिया। इस वेश में पति की ओर ताकते हुए भी उसे संकोच हुआ। उसकी बड़ी इच्छा हुई कि जरा आइने में अपनी छवि देखे। सामने कमरे में लैम्प जल रहा था, वह उठकर कमरे में गयी और आइने के सामने खड़ी हो गयी। नशे की तरंग में उसे ऐसा मालूम हुआ कि मैं सचमुच फूलों की देवी हूँ। उसने पानदान उठा लिया और बाहर आकर पान बनाने लगी।
रमा को इस समय अपने कपट-व्यवहार पर बड़ी ग्लानि हो रही थी। जालपा ने कमरे से लौटकर प्रेमोल्लसित नेत्रों से उसकी ओर देखा, तो उसने मुँह फेर लिया। उस सरल विश्वास से भरी हुई आंखों के सामने वह ताक न सका। उसने सोचा–मैं कितना बड़ा कायर हूँ। क्या मैं बाबूजी को साफ़-साफ़ जवाब न दे सकता था? मैंने हामी ही क्यों भरी? क्या जालपा से घर की दशा साफ-साफ कह देना मेरा कर्तव्य न था? उसकी आँखें भर आयीं। जाकर मुँडेर के पास खड़ा हो गया। प्रणय के उस निर्मल प्रकाश में उसका मनोविकार किसी भयंकर जन्तु की भाँति घूरता हुआ जान पड़ता था। उसे अपने ऊपर इतनी घृणा हुई कि एक बार जी में आया, सारा कपट-व्यापार खोल दूँ; लेकिन सँभल गया। कितना भयंकर परिणाम होगा। जालपा की नजरों से गिर जाने की कल्पना ही उसके लिए असह्य थी।
जालपा ने प्रेम-सरस नेत्रों से देखकर कहा–मेरे दादाजी तुम्हें देखकर गये और अम्माजी से तुम्हारा बखान करने लगे, तो मैं सोचती थी, कि तुम कैसे होगे। मेरे मन में तरह-तरह के चित्र आते थे।
रमानाथ ने एक लम्बी साँस खींची। कुछ जवाब न दिया।
जालपा ने फिर कहा–मेरी सखियाँ तुम्हें देखकर मुग्ध हो गयीं। शहजा़दी तो खिड़की के सामने से हटती ही न थी। तुमसे बातें करने की बड़ी इच्छा थी। जब तुम अन्दर गये थे तो उसी ने तुम्हें पान के बीड़े दिये थे, याद है?
रमा ने कोई जवाब न दिया।
जालपा–अजी, वही जो रंग-रूप में सबसे अच्छी थी, जिसके गाल पर एक तिल था, तुमने उसकी ओर बड़े प्रेम से देखा था, बेचारी लाज के मारे गड़ गयी थी। मुझसे कहने लगी, जीजा तो बड़े रसिक जान पड़ते हैं। सखियों ने उसे खूब चिढ़ाया, बेचारी रुआँसी हो गयी। याद है?
रमा ने मानो नदी में डूबते हुए कहा–मुझे तो याद नहीं आता।
जालपा–अच्छा, अबकी चलोगे तो दिखा दूँगी। आज तुम बाजार की तरफ गये थे कि नहीं?
रमा ने सिर झुकाकर कहा–आज तो फुरसत नहीं मिली।
जालपा–जाओ मैं तुमसे न बोलूँगी। रोज हीले-हवाले करते हो। अच्छा, कल ला दोगे न?
रमानाथ का कलेजा मसोस उठा। यह चन्द्रहार के लिये इतनी विकल हो रही है। इसे क्या मालूम कि दुर्भाग्य इसका सर्वस्व लूटने का सामान कर रहा है। जिस सरल बालिका पर उसे अपने प्राणों को न्योछावर करना चाहिए था, उसी का सर्वस्व अपहरण करने पर वह तुला हुआ है। वह इतना व्यग्र हुआ, कि जी में आया, कोठे से कूदकर प्राणों का अंत कर दे।
आधी रात बीत चुकी थी। चन्द्रमा चोर की भाँति एक वृक्ष की आड़ से झाँक रहा था। जालपा पति के गले में हाथ डाले हुए निद्रा में मग्न थी। रमा मन में विकट संकल्प करके धीरे से उठा; पर निद्रा की गोद में सोये हुए पुष्पप्रदीप ने उसे अस्थिर कर दिया। वह एक क्षण खड़ा मुग्ध नेत्रों से जालपा के निद्रा-विहसित मुख की ओर देखता रहा। कमरे में जाने का साहस न हुआ। फिर लेट गया।
जालपा ने चौंककर पूछा–कहाँ जाते हो, क्या सवेरा हो गया?
रमानाथ–अभी तो बड़ी रात है।
जालपा–तो तुम बैठे क्यों हो?
रमानाथ–कुछ नहीं ज़रा पानी पीने उठा था।
जालपा ने प्रेमातुर होकर रमा के गले में बाँहे डाल दीं और उसे सुलाकर कहा–तुम इस तरह मुझ पर टोना करोगे, तो मैं भाग जाऊँगी। न जाने किस तरह ताकते हो, क्या करते हो क्या मंत्र पढ़ते हो कि मेरा मन चंचल हो जाता है। बासंती सच कहती थी, पुरुषों की आँख में टोना होता है।
रमा ने फूटे हुए स्वर में कहा–टोना नहीं कर रहा हूँ, आँखों की प्यास बुझा रहा हूँ।
दोनों फिर सोये, एक उल्लास में डूबी हुई, दूसरा चिन्ता में मग्न।
तीन घंटे और गुज़र गये। द्वादशी के चाँद ने अपना विश्व-दीपक बुझा दिया। प्रभात की शीतल-समीर प्रकृति को मद के प्याले पिलाती फिरती थी। आधी रात तक जागने वाला बाजार भी सो गया। केवल रमा अभी तक जाग रहा था। मन में भाँति-भाँति के तर्क-वितर्क उठने के कारण वह बार-बार उठता था और फिर लेट जाता था। आखिर जब चार बजने की आवाज कान में आयी, तो घबराकर उठ बैठा और कमरे में जा पहुँचा। गहनों का सन्दूकचा आलमारी में रक्खा हुआ था, रमा ने उठा लिया, और थरथर काँपता हुआ नीचे उतर गया। इस घबड़ाहट में उसे इतना अवकाश न मिला कि वह कुछ गहने छाँटकर निकाल लेता।
दयानाथ नीचे बरामदे में सो रहे थे। रमा ने उन्हें धीरे से जगाया, उन्होंने हकबकाकर पूछा–कौन?
रमा ने ओंठ पर उँगली रखकर कहा–मैं हूँ। यह सन्दूकची लाया हूँ। रख लीजिए।
दयानाथ सावधान होकर बैठ गये। अभी तक केवल उनकी आँखें जागी थीं, अब चेतना भी जाग्रत हो गयी। रमा ने जिस वक्त उनसे गहने उठा लाने की बात कही थी, उन्होंने समझा था कि यह आवेश में ऐसा कह रहा है। उन्हें इसका विश्वास न आया था कि रमा जो कुछ कह रहा है, उसे पूरा भी कर दिखायेगा। इन कमीनी चालों से वह अलग ही रहना चाहते थे। ऐसे कुत्सित कार्य में पुत्र से साँठ-गाँठ करना उनकी अन्तरात्मा को किसी तरह स्वीकार न था। पूछा–इसे क्यों उठा लाये?
रमा ने धृष्ठता से कहा–आप ही का तो हुक्म था।
दयानाथ–झूठ कहते हो।
रमानाथ–तो क्या फिर रख आऊँ?
रमा के इस प्रश्न ने दयानाथ को घोर संकट में डाल दिया। झेंपते हुए बोले–अब क्या रख आओगे, कहीं देख ले, तो ग़ज़ब ही हो जाये। वही काम करोगे, जिसमें जगहँसाई हो। खड़े क्या हो, सन्दूक़ची मेरे बड़े सन्दूक में रख आओ और जाकर लेट रहो। कहीं जाग पड़े तो बस !
बरामदे के पीछे दयानाथ का कमरा था। उसमें एक देवदार का पुराना सन्दूक रखा था। रमा ने सन्दूकची उसके अन्दर रख दी और बड़ी फुर्ती से ऊपर चला गया। छत पर पहुँच कर उसने आहट ली, जालपा पिछले पहर की सुखद निद्रा में मग्न थी।
रमा ज्योंही चारपाई पर बैठा, जालपा चौंक पड़ी और उससे चिपट गयी। रमा ने पूछा–क्या है, तुम चौंक क्यों पड़ी?
जालपा ने इधर-उधर प्रसन्न नेत्रों से ताककर कहा–कुछ नहीं, एक स्वप्न देख रही थी। तुम बैठे क्यों हो, कितनी रात है अभी?
रमा ने लेटते हुए कहा–सवेरा हो रहा है, क्या स्वप्न देखती थी?
जालपा–जैसे कोई चोर मेरे गहनों की सन्दूक़ची उठाये लिये जाता हो।
रमा का हृदय इतने जोर से धक्-धक् करने लगा, मानों उस पर हथौड़े पड़ रहे हैं। खू़न सर्द हो गया। परन्तु सन्देह हुआ, कहीं इसने मुझे देख तो नहीं लिया। वह जो़र से चिल्ला पड़ा–चोर ! चोर?
नीचे बरामदे में दयानाथ भी चिल्ला उठे–चोर ! चोर !
जालपा घबड़ाकर उठी। दौड़ी हुई कमरे में गयी, झटके से आलमारी खोली। सन्दूकची वहाँ न थी। मूर्च्छित होकर गिर पड़ी।
