जालपा अब वह एकान्तवासिनी रमणी न थी, जो दिन भर मुँह लपेटे उदास पड़ी रहती थी। उसे अब घर में बैठना अच्छा न लगता था। अब तक तो वह मजबूर थी, कहीं आ-जा न सकती थी। अब ईश्वर की दया से उसके पास भी गहने हो गये थे। फिर वह क्यों मन मारे घर में पड़ी रहती। वस्त्राभूषण कोई मिठाई तो नहीं जिसका स्वाद एकान्त में लिया जा सके। आभूषणों को सन्दूकची में बन्द रखने से क्या फायदा। मुहल्ले या बिरादरी में कहीं से बुलावा आता, तो वह सास के साथ अवश्य जाती। कुछ दिनों के बाद सास की ज़रूरत भी न रही। वह अकेली ही आने-जाने लगी। फिर कार्य-प्रयोजन की भी कैद नहीं रही। उसके रूप-लावण्य, वस्त्र-आभूषण और शील-विनय ने मुहल्ले की स्त्रियों में उसे जल्दी ही सम्मान के पद पर पहुँचा दिया। उसके बिना मण्डली सूनी रहती थी। उसका कंठ-स्वर इतना कोमल था, भाषण इतना मधुर, छवि इतनी अनुपम कि वह मण्डली की रानी मालूम होती थी। उसके आने से मुहल्ले के नारी-जीवन में जान-सी पड़ गयी। नित्य ही कहीं-न-कहीं जमाव हो जाता। घण्टे-दो-घण्टे गा बजाकर या गपशप करके रमणियाँ दिल बहला लिया करतीं। कभी किसी के घर, कभी किसी के घर, फागुन में पन्द्रह दिन बराबर गाना होता रहा। जालपा ने ऐसा रूप पाया था, वैसा ही उदार हृदय भी पाया था। पान-पत्ते का खर्च प्रायः उसी के मत्थे पड़ता। कभी-कभी गायनें बुलायी जाती, उनकी सेवा-सत्कार का भार उसी पर था। कभी-कभी वह स्त्रियों के साथ गंगा स्नान करने जाती, ताँगे का किराया और गंगा तट का जल-पान का खर्च भी उसी के मत्थे जाता। इस तरह उसके दो-तीन रुपये रोज़ उड़ जाते थे। रमा आदर्श पति था। जालपा अगर माँगती तो प्राण तक उसके चरणों पर रख देता। रुपये की हकीकत ही क्या थी? उसका मुँह जोहता रहता था। जालपा उससे इन जमघटों की रोज चर्चा करती। उसकी स्त्री-समाज में कितना आदर-सम्मान है, यह देखकर वह फूला न समाता था।
एक दिन इस मण्डली को सिनेमा देखने की धुन सवार हुई। वहाँ की बहार देखकर सब-की-सब मुग्ध हो गयीं। फिर तो आये दिन सिनेमा की सैर होने लगी। रमा को अब तक सिनेमा का शौक न था। शौक होता भी तो क्या करता। अब हाथ में पैसे आने लगे थे, उस पर जालपा का आग्रह, फिर भला वह क्यों न जाता? सिनेमा-गृह में ऐसी कितनी ही रमणियाँ मिलतीं, जो मुँह खोले निःसंकोच हँसती-बोलती रहती थीं। उनकी आजादी गुप्तरूप से जालपा पर भी जादू डालती जाती थी। वह घर से बाहर निकलते ही मुँह खोल लेती मगर संकोचवश परदेवाली स्त्रियों के ही स्थान पर बैठती। उसकी कितनी इच्छा होती कि रमा भी उसके साथ बैठता। आखिर वह उन फैशनेबुल औरतों से किस बात में कम है? रूपरंग में वह हेठी नहीं। सज धज में किसी से कम नहीं। बातचीत करने में कुशल। फिर वह क्यों परदेवालियों के साथ बैठे। रमा बहुत शिक्षित न होने पर भी देश और काल के प्रभाव से उदार था। पहले तो वह परदे का ऐसा अनन्त भक्त था कि माता को कभी गंगा-स्नान कराने लिवा जाता, तो पण्डों तक से न बोलने देता। कभी माता की हँसी मर्दाने में सुनायी देती, तो आकर बिगड़ता–तुमको ज़रा भी शर्म नहीं है अम्मा। बाहर लोग बैठे हुए हैं, और तुम हँस रही हो। माँ लज्जित हो जाती थीं। किन्तु अवस्था के साथ रमा का यह लिहाज गायब हो जाता था। उस पर जालपा की रूप छटा उसके साहस को और भी उत्तेजित करती थी। जालपा, रूपहीन, काली-कलूटी, फूहड़ होती तो वह जबरदस्ती उसको परदे में बैठाता। उसके साथ घूमने या बैठने में उसे शर्म आती। जालपा-जैसी अन्नय सुन्दरी के साथ सैर करने में आनन्द के साथ गौरव भी तो था। वहाँ के सभ्य समाज की कोई महिला रूप गठन, श्रृंगार में जालपा की बराबरी न करती थी। देहात की लड़की होने पर भी शहर के रंग में वह इस तरह रँग गयी थी, मानों जन्म से शहर ही में आयी है। थोड़ी सी कमी अँग्रेजी शिक्षा की थी, उसे भी रमा पूरी किये देता था।
मगर परदे का यह बन्धन टूटे, कैसे। भवन में रमा के कितने ही मित्र कितने ही जान-पहचान के लोग बैठे नज़र आते थे। वे उसे जालपा के साथ बैठे देखकर कितना हँसेंगे। आखिर एक दिन उसने समाज के सामने ताल ठोंककर खड़े हो जाने का निश्चय कर ही लिया। जालपा से बोला–आज हम-तुम सिनेमाघर में साथ बेठेंगे।
जालपा के हृदय में गुदगुदी-सी होने लगी। हार्दिक आनन्द की आभा चेहरे पर झलक उठी। बोली–सच ! नहीं भाई, साथवालियाँ जीने न देंगी।
रमानाथ–इस तरह डरने से तो फिर कुछ न होगा। यह क्या स्वाँग है कि स्त्रियाँ मुँह छिपाये चिक की आड़ में बैठी रहें।
इस तरह यह मामला भी तय हो गया। पहले दिन दोनों झेंपते रहे, लेकिन दूसरे दिन से हिम्मत खुल गयी। कई दिन के बाद वह समय भी आया कि रमा और जालपा सन्ध्या समय पार्क में साथ-साथ टहलते दिखायी दिये।
जालपा ने मुस्कराकर कहा–कहीं बाबूजी देख लें तो?
रमा–तो क्या, कुछ नहीं।
जालपा–मैं तो मारे शर्म के गड़ जाऊँ।
रमा–अभी तो मुझे भी शर्म आयेगी, मगर बाबूजी खुद ही इधर न आयेंगे।
जालपा–और जो कहीं अम्माजी देख लें।
रमा–अम्मा से कौन डरता है, दो दलीलों में ठीक कर दूँगा।
दस पाँच ही दिन में जालपा ने नये महिला-समाज में अपना रंग जमा लिया। उसने इस समाज में इस तरह प्रवेश किया, जैसे कोई कुशल वक्ता पहली बार परिषद् में मंच पर आता है। विद्वान लोग उसकी उपेक्षा करने की इच्छा होने पर भी उसकी प्रतिभा के सामने सिर झुका देते हैं। जालपा भी ‘आयी, देखा और विजय कर लिया।’ उसके सौन्दर्य में वह गरिमा, वह कठोरता, वह शान, वह तेजस्विता थी जो कुलीन महिलाओं के लक्षण हैं। पहले ही दिन एक महिला ने जालपा को चाय का निमन्त्रण दे दिया जालपा इच्छा न रहने पर भी उसे अस्वीकार न कर सकी।
जब दोनों प्राणी वहाँ से लौटे, तो रमा ने चिन्तित स्वर में कहा–तो कल इसकी चाय-पार्टी में जाना पड़ेगा?
जालपा–क्या करती? इन्कार करते भी तो न बनता था !
रमा–तो सबेरे तुम्हारे लिए एक अच्छी सी साड़ी ला दूँ?
जालपा–क्या मेरे पास साड़ी नहीं है, जरा देर के लिए पचास-साठ रुपये खर्च करने से फायदा !
रमानाथ–तुम्हारे पास अच्छी साड़ी कहाँ है। इसकी साड़ी तुमने देखी? ऐसी ही तुम्हारे लिए भी लाऊँगा।
जालपा ने विवशता के भाव से कहा–मुझे साफ कह देना चाहिए था कि फुरसत नहीं है।
रमानाथ–फिर इनकी दावत भी तो करनी पड़ेगी।
जालपा–यह तो बुरी विपत्ति गले पड़ी।
रमानाथ–विपत्ति नहीं है, सिर्फ यही खयाल है कि मेरा मकान इस काम के लायक नहीं। मेज, कुर्सियाँ, चाय के सेट रमेश के यहाँ से माँग लाऊँगा, लेकिन घर के लिए क्या करूँ !
जालपा–क्या यह ज़रूरी है कि हम लोग भी दावत करें?
रमा ने ऐसी भद्दी बात का कुछ उत्तर न दिया। उसे जालपा के लिए एक जूते ही जोड़ी और सुन्दर कलाई की घड़ी की फिक्र पैदा हो गयी। उसके पास कौड़ी भी न थी। उसका खर्च रोज़ बढ़ता जाता था। अभी तक गहनों वालों को एक पैसा देने की नौबत न आयी थी। एक बार गंगू महाराज ने इशारे से तकाजा़ भी किया था, लेकिन यह भी तो नहीं हो सकता कि जालपा फटे हालों चाय-पार्टी में जाय। नहीं, जालपा पर, इतना अन्याय नहीं कर सकता। इस अवसर पर जालपा की रूप-शोभा का सिक्का बैठ जायगा। सभी तो आज चमाचम साड़ियाँ पहने हुए थीं। जड़ाऊ कंगन और मोतियों के हारों की भी कमी न थी; पर जालपा अपने सादे आवरण में उनसे कोसों आगे थी। उसके सामने एक भी नहीं जाँचती थी। यह मेरे पूर्व कर्मों का फल हैं कि मुझे ऐसी सुन्दरी मिली। आखिर यही तो खाने-पहनने और जीवन का आनन्द उठाने के दिन हैं। जब जवानी ही में सुख न उठाया, तो बुढ़ापे में क्या कर लेंगे ! बुढ़ापे में मान लिया धन हुआ ही तो क्या। यौवन बीत जाने पर विवाह किस काम का? साड़ी और घड़ी लाने की उसे धुन सवार हो गयी। रात भर तो उसने सब्र किया। दूसरे दिन दोनों चीजें लाकर ही दम लिया।
जालपा ने झुँझलाकर कहा–मैंने तो तुमसे कहा था कि इन चीजों का काम नहीं है। डेढ़ सौ से कम की न होंगी?
रमानाथ–डेढ़ सौ ! इतना फजूल खर्ची मैं नहीं हूँ।
जालपा–डेढ़ सौ से कम की यह चीज़ें नहीं हैं।
जालपा ने घड़ी कलाई में बाँध ली और साड़ी को खोलकर मंत्रमुग्ध नेत्रों से देखा।
रमानाथ–तुम्हारी कलाई पर यह घड़ी कैसी खिल रही है ! मेरे रुपये वसूल हो गये।
जालपा–सच बताओ कितने रुपये खर्च हुए?
रमानाथ–सच बता दूँ? एक सौ पैतीस रुपये। पचहत्तर रुपये की साड़ी दस के जूते और पचास की घड़ी।
जालपा–यह डेढ़ सौ ही हुए। मैंने कुछ बढ़ाकर थोड़े कहा था; मगर यह सब रुपये अदा कैसे होंगे? उस चुडै़ल ने व्यर्थ ही मुझे निमन्त्रण दे दिया। अब मैं बाहर जाना ही छोड़ दूँगी।
रमा भी इसी चिन्ता में मग्न था, पर उसने अपने भाव को प्रकट करके जालपा के हर्ष में बाधा न डाली। बोला–सब अदा हो जायेगा।
जालपा ने तिरस्कार के भाव से कहा–कहाँ से अदा हो जायेगा जरा सुनूँ। कौड़ी तो बचती नहीं, अदा कहाँ से हो जायेगा? वह तो कहो बाबू जी घर का खर्च सँभाले हुए हैं, नहीं तो मालूम होता। क्या तुम समझते हो कि मैं गहने और साड़ियों पर मरती हूँ? इन चीजों को लौटा आओ।
रमा ने प्रेमपूर्ण नेत्रों से कहा–इन चीजों को रख लो। फिर तुमसे बिना पूछे कुछ न लाऊँगा।
सन्ध्या समय जब जालपा ने नयी साड़ी और नये जूते पहने, घड़ी कलाई पर बाँधी और आईने में अपनी सूरत देखी, तो मारे गर्व और उल्लास के उसका मुखमण्डल प्रज्वलित हो उठा। उसने उन चीजों के लौटाने के लिए सच्चे दिल से कहा हो, पर इस समय वह इतना त्याग करने को तैयार न थी। सन्ध्या समय जालपा और रमा छावनी की ओर चले। महिला साइनबोर्ड था–‘इन्दुभूषण, एडवोकेट, हाईकोर्ट।’ अब रमा को मालूम हुआ कि वह महिला पं० इन्दुभूषण की पत्नी थीं। पण्डित जी काशी के नामी वकील थे। रमा ने उन्हें कितनी ही बार देखा था, पर इतने बड़े आदमी से परिचय का सौभाग्य उसे कैसे प्राप्त होता ! छः महीने पहले वह कल्पना भी न कर सकता था, कि किसी दिन उसे उनके घर निमन्त्रित होने का गौरव प्राप्त होगा; पर जालपा की बदौलत आज वह अनहोनी बात हो गयी। वह काशी के बड़े वकील का मेहमान था।
रमा ने सोचा था कि बहुत से स्त्री-पुरुष निमन्त्रित होंगे; पर यहाँ वकील साहब और उनकी पत्नी रतन के सिवा और कोई न था। रतन इन दोनों को देखते ही बरामदे में निकल आयी और उनसे हाथ मिलाकर अन्दर ले गयी और अपने पति से उनका परिचय कराया। पंडितजी ने आरामकुर्सी पर लेटे-लेटे दोनों मेहमानों से हाथ मिलाया और मुस्कराकर कहा–क्षमा कीजियेगा बाबू साहब, मेरा स्वास्थ अच्छा नहीं है। आप यहाँ किसी आफिस में हैं?
रमा ने झेंपते हुए कहा–जी हाँ, म्युनिसिपल आफिस में हूँ। अभी हाल ही में आया हूँ। कानून की तरफ जाने का इरादा था, पर नये वकीलों की यहाँ जो हालत हो रही है, उसे देखकर हिम्मत न पड़ी।
रमा ने अपना महत्त्व बढ़ाने के लिए ज़रा-सा झूठ बोलना अनुचित न समझा। इसका असर बहुत अच्छा हुआ। अगर वह साफ कह देता, मैं पच्चीस रुपये का क्लर्क हूँ, तो शायद वकील साहब उससे बातें करने में अपना अपमान समझते। बोले–आपने बहुत अच्छा किया जो इधर नहीं आये। वहाँ दो-चार साल के बाद अच्छी जगह पर पहुँच जायेंगे, यहाँ सम्भव है दस साल तक आपको कोई मुकदमा ही न मिलता।
जालपा को अभी तक सन्देह हो रहा था कि रतन वकील साहब की बेटी है या पत्नी। वकील साहब की उम्र साठ से नीचे न थी। चिकनी चाँद आस-पास के सफेद बालों के बीच में वारनिश की हुई लकड़ी की भाँति चमक रही थी। मूँछ साफ थीं, पर माथे की शिकन और गालों की झुर्रियाँ बतला रही थीं कि यात्री संसार-यात्रा से थक गया है। आरामकुरसी पर लेटे हुए वह ऐसे मालूम होते थे, जैसे बरसों के मरीज़ हों। हाँ, रंग गोरा था जो साठ साल की गरमी-सर्दी खाने पर भी उड़ न सका था। ऊँची नाक थी, माथा और बड़ी-बड़ी आँखें, जिनमें अभिमान भरा हुआ था। उनके मुख से ऐसा भाषित होता था कि उन्हें किसी से बोलना या किसी बात का जवाब देना ही अच्छा नहीं लगता। इसके प्रतिकूल रतन साँवली सुगठित युवती थी, बड़ी मिलनसार जिसे गर्व ने छुआ तक न था। सौन्दर्य का उसके रूप में कोई लक्षण न था। नाक चिपटी हुई थी, मुख गोल आँखें छोटी, फिर भी वह रानी-सी लगती थी। जालपा उसके सामने ऐसी लगती थी, जैसे सूर्यमुखी के सामने जूही का फूल।
चाय आयी। मेवे, फल, मिठाई बर्फ की कुल्फी, सेब मेजों पर सजा दिये गये। रतन और जालपा एक मेज़ पर बैठी। दूसरे मेज़ रमा वकील साहब की थी। रमा मेज़ के सामने जा बैठा; मगर वकील साहब अभी आराम-कुर्सी पर लेटे ही हुए थे।
रमा ने मुस्कराकर वकील साहब से कहा–आप तो आयें।
वकील साहब ने लेटे-लेटे मुस्कराकर कहा–आप शुरू कीजिए, मैं भी आया जाता हूँ।
लोगों ने चाय पी, फल खाये: पर वकील साहब के सामने हँसते-बोलते रमा और जालपा दोनों ही झिझकते थे। जिन्दादिल बूढ़ों के साथ तो सोहबत का आनन्द उठाया जा सकता है, लेकिन ऐसे रूखे, निर्जीव मनुष्य जवान भी हों, तो दूसरों को मुर्दा बना देते हैं। वकील साहब ने बहुत आग्रह करने पर दो घूँट चाय पी। दूर से बैठे तमाशा देखते रहे। इसलिए जब रतन ने जालपा ने कहा–चलो, हम लोग बागीचे की सैर करें, इन दोनों महाशयों को समाज और नीति की विवेचना करने दें, तो मानों जालपा के गले का फन्दा छूट गया। रमा ने पिंजड़े में बन्द पक्षी की भाँति उन दोनों को कमरे से निकलते देखा और एक लम्बी साँस ली। यह जानता कि यहाँ विपत्ति उसके सिर पड़ जायेगी, तो आने का नाम न लेता !
वकील साहब ने मुँह सिकोड़कर पहलू बदला और बोले–मालूम नहीं, पेट में क्या हो गया है, कि कोई चीज हज़म ही नहीं होती। दूध भी हज़म नहीं होता है। चाय को लोग न जाने क्यों इतने शौक से पीते हैं, मुझे तो इसकी सूरत से भी डर लगता है। पीते ही बदन में ऐंठन होने लगती है और आँखों से चिनगारियाँ-सी निकलने लगती हैं।
रमा ने कहा–आपने हाज़मे की कोई दवा नहीं की?
वकील साहब ने अरुचि के भाव से कहा–दवाओं पर रत्ती भर भी विश्वास नहीं। इन वैद्यों और डॉक्टरों से ज्यादा बेसमझ आदमी संसार में न मिलेंगे। किसी में निदान की शक्ति नहीं। दो वैद्यों दो डॉक्टरों के निदान कभी न मिलेंगे। लक्षण वही हैं, पर एक वैद्य रक्त दोष बतलाता है, दूसरा पित्तदोष; एक डॉक्टर फेफड़े का सूजन बतलाता है, दूसरा आमाशय का विकार। बस, अनुमान से दवा की जाती है और निर्दयता से रोगियों की गरदन पर छुरी फेरी जाती है। इन डॉक्टरों ने मुझे तो अब तक जहान्नुम पहुँचा दिया होता; पर मैं उनके पंजे से निकल भागा। योगाभ्यास की बड़ी प्रशंसा सुनता हूँ, पर कोई ऐसे महात्मा नहीं मिलते, जिनसे कुछ सीख सकूँ। किताबों के आधर पर कोई क्रिया करने से लाभ के बदले हानि होने का डर रहता है।
यहाँ तो अरोग्य-शास्त्र का खंडन हो रहा था, उधर दोनों महिलाओं में प्रगाढ़ स्नेह की बातें हो रही थीं।
रतन ने मुस्कराकर कहा–मेरे पतिदेव को देखकर तुम्हें बड़ा आश्चर्य हुआ होगा।
जालपा को आश्चर्य ही नहीं, भ्रम भी हुआ था। बोली–वकील साहब का दूसरा विवाह होगा।
रतन–हाँ, अभी पाँच ही बरस तो हुए हैं। इनकी पहली स्त्री को मरे पैंतीस वर्ष हो गये। उस समय इनकी अवस्था कुल पच्चीस साल की थी। लोगों ने समझाया दूसरा विवाह कर लो, पर इनके एक लड़का हो चुका था, विवाह करने से इन्कार कर दिया और तीस साल तक अकेले रहे, मगर आज पाँच वर्ष हुए, जवान बेटे का देहान्त हो गया, तब विवाह करना आवश्यक हो गया। मेरे माँ-बाप न थे। मामा जी ने मेरा पालन किया था। कह नहीं सकती इनसे कुछ ले लिया या इनकी सज्जनता पर मुग्ध हो गये। मैं तो समझती हूँ, ईश्वर की यही इच्छा थी; लेकिन मैं जब से आयी हूँ, मोटी होती चली जाती हूँ। डॉक्टर का कहना है कि तुम्हें सन्तान नहीं हो सकती। बहन मुझे तो सन्तान की लालसा नहीं है, लेकिन मेरे पति मेरी दशा देखकर बहुत दुःखी रहते हैं। मैं ही इनके सब रोगों की जड़ हूँ। आज ईश्वर मुझे एक सन्तान दे दे, तो इनके सारे रोग भाग जायेंगे। कितना चाहती हूँ कि दुबली हो जाऊँ, गर्म पानी से टब-स्नान करती हूँ, रोज पैदल घूमने जाती हूँ घी, दूध कम खाती हूँ, भोजन आधा कर दिया है, जितना परिश्रम करते बनता है करती हूँ, फिर भी दिन-दिन मोटी ही होती जाती हूँ। कुछ समझ में नहीं आता, क्या करूँ।
जालपा–वकील साहब तुमसे चिढ़ते होंगे
रतन–नहीं बहन, बिल्कुल नहीं, भूलकर भी कभी मुझसे इसकी चर्चा नहीं की। उनके मुँह से एक शब्द भी ऐसा नहीं निकला, जिससे उनकी मनोव्यथा प्रकट होती; पर मैं जानती हूँ, चिन्ता उन्हें मारे डालती है। अपना कोई बस नहीं चलता है। क्या करूँ मैं जितना चाहूँ खर्च करूँ, जैसे चाहूँ रहूँ, कभी नहीं बोलते। जो कुछ पाते हैं, लाकर मेरे हाथ पर रख देते हैं। समझाती हूँ, अब तुम्हें वकालत करने की क्या जरूरत है, आराम क्यों नहीं करते, पर इनसे घर पर बैठे नहीं रहा जाता। केवल दो चपातियों से नाता है। बहुत जिद की तो दो-चार दाने अंगूर खा लिये। मुझे तो उन पर दया आती है, अपने से जहाँ तक हो सकता है उनकी सेवा करती हूँ। आखिर वह मेरे ही लिए तो अपनी जान खपा रहे हैं।
जालपा–ऐसे पुरुष को देवता समझना चाहिए। यहाँ तो एक स्त्री मरी नहीं कि दूसरा ब्याह रच गया। तीस साल अकेले रहना सबका काम नहीं है।
रतन–हाँ बहन, हैं तो देवता ही। अब भी कभी उस स्त्री की चर्चा आ जाती है, तो रोने लगते हैं। तुम्हें उनकी तस्वीर दिखाऊँगी। देखने में जितने कठोर मालूम होते हैं, भीतर से इनका हृदय उतना ही नर्म है। कितने ही अनाथों विधवाओं और गरीबों के महीने बाँध रक्खे हैं। तुम्हारा वह कंगन तो बड़ा सुन्दर है।
जालपा–हाँ, बड़े अच्छे कारीगर का बनाया हुआ है।
रतन–मैं तो यहाँ किसी को जानती ही नहीं। वकील साहब को गहनों के लिए कष्ट देने की इच्छा नहीं होती। मामूली सुनारों से बनवाते डर लगता है न जाने क्या मिला दें। मेरी सपत्नीजी के सब गहने रक्खे हुए हैं, लेकिन वह मुझे अच्छे नहीं लगते। तुम बाबू रमानाथ से मेरे लिए ऐसा ही जोड़ा कंगन बनवा दो।
जालपा–देखिए, पूछती हूँ।
रतन–आज तुम्हारे आने से जी बहुत खुश हुआ। दिन भर अकेली पड़ी रहती हूँ। जी घबड़ाया करता है। किसके पास जाऊँ? किसी से परिचय नहीं और न मेरा मन ही चाहता है कि उनसे मैत्री करूँ ! दो-एक महिलाओं को बुलाया, उनके घर गयी, चाहा कि उनसे बहनापा जोड़ लूँ; लेकिन उनके आचार-विचार देखकर उनसे दूर रहना ही अच्छा मालूम हुआ। दोनों ही मुझे उल्लू बनाकर जटना चाहती थीं। मुझसे रुपये उधार ले गयीं और आज तक दे रही हैं। श्रृंगार की चीजों पर मैंने उनका इतना प्रेम देखा, कि कहते लज्जा आती है। तुम घड़ी-आध-घड़ी के लिए रोज़ चली आया करो बहन।
जालपा–वाह इससे अच्छा और क्या होगा।
रतन–मैं मोटर भेज दिया करूँगी।
जालपा–क्या जरूरत हैं। तागें तो मिलते ही हैं।
रतन–न-जानें क्यों तुम्हें छोड़ने को जी नहीं चाहता। तुम्हें पाकर रमानाथजी अपना भाग्य सराहते होंगे।
जालपा ने मुस्कराकर कहा–भाग्य-वाग्य तो कहीं नहीं सराहते, घुड़कियाँ जमाया करते हैं।
रतन–सच ! मुझे तो विश्वास नहीं आता। लो वह भी तो आ गये। पूछना, ऐसा दूसरा कंगन बनवा देंगे।
जालपा–(रमा से) क्यों चरनदास से कहा जाये तो ऐसा कंगन कितने दिन में बना दे ! रतन ऐसा ही कंगन बनवाना चाहती है।
रमा ने तत्परता से कहा–हाँ, बना क्यों नहीं सकता। इससे बहुत अच्छे बना सकता है।
रतन–इस जोड़े के क्या लिये थे?
जालपा–आठ सौ के थे।
रतन–कोई हर्ज नहीं; मगर बिल्कुल ऐसा ही हो, इसी नमूने का।
रमा–हाँ-हाँ बनवा दूँगा।
रतन–मगर भाई, अभी मेरे पास रुपये नहीं हैं। रुपये के मामले में पुरुष महिलाओं के सामने कुछ नहीं कह सकता। क्या वह कह सकता है, इस वक्त मेरे पास रुपये नहीं है। वह मर जायेगा, पर यह उज्र न करेगा। वह कर्ज लेगा, दूसरों की खुशामद करेगा; पर स्त्री के सामने अपनी मजबूरी न दिखायेगा। रुपये की चर्चा को ही वह तुच्छ समझता है। जालपा पति की आर्थिक दशा अच्छी तरह जानती थी। पर यदि रमा ने इस समय कोई बहाना कर दिया होता, तो उसे बहुत बुरा मालूम होता। वह मन में डर रही थी कि कहीं यह महाशय यह न कह बैठें, सराफ से पूछकर कहूँगा। उसका दिल धड़क रहा था; पर जब रमा ने वीरता के साथ कहा–हाँ-हाँ रुपये की कोई बात नहीं जब चाहें दे दीजियेगा, तो वह खुश हो गयी।
रतन–तो कब तक आशा करूँ?
रमा–मैं आज ही सराफ से कह दूँगा, तब भी पन्द्रह दिन तो लग ही जायेंगे।
जालपा–अब की रविवार को मेरे ही घर चाय पीजियेगा।
रतन ने निमन्त्रण सहर्ष स्वीकार किया और दोनों आदमी बिदा हुए। घर पहुँचे, तो शाम हो गयी थी। रमेश बाबू बैठे हुए थे। जालपा तो ताँगे से उतरकर अन्दर चली गयी, रमा रमेश के पास जाकर बोला–क्या आपको आये देर हुई?
रमेश–नहीं अभी तो चला आ रहा हूँ। क्या वकील साहब के यहाँ गये थे?
रमानाथ–जी हाँ तीन रुपये की चपत पड़ गयी।
रमेश–कोई हर्ज नहीं, यह रुपये वसूल हो जायेंगे। बड़े आदमियों से राह-रस्म हो जाये तो बुरा नहीं है, बड़े-बड़े काम निकलते हैं। एक दिन उन लोगों को भी तो बुलाओ।
रमानाथ–अब के इतवार को चाय की दावत दे आया हूँ।
रमेश–कहो तो मैं भी आ जाऊँ। जानते हो न वकील साहब के एक भाई इंजीनियर हैं। मेरे एक साले बहुत दिनों से बेकार बैठे हैं। अगर वकील साहब उसकी सिफारिश कर दें, तो गरीब को जगह मिल जाये। तुम ज़रा मेरा इन्ट्रोडक्शन करा देना, बाकी और सब मैं कर लूँगा। पार्टी का इन्तजाम ईश्वर ने चाहा, तो ऐसा होगा कि मेम साहब खुश हो जायेंगी। चाय के सैट, शीशे के रंगीन गुलदान और फानूस मैं ला दूँगा। कुर्सियाँ मेजें फर्श सब मेरे ऊपर छोड़ दे। न कुली की जरूरत न मजूर की। उन्हीं मूसलचंद को रगेदूँगा।
रमानाथ–तब तो बड़ा मज़ा रहेगा। मैं तो बड़ी चिन्ता में पड़ा हुआ था।
रमेश–चिन्ता की कोई बात नहीं, उसी लौंडी को जोत दूँगा। कहूँगा, जगह चाहते हो तो कारगुज़ारी दिखाओ। फिर देखना, कैसी दौड़-धूप करता है।
रमानाथ–अभी दो-तीन महीने हुए आप अपने साले को कहीं नौकर रखा चुके हैं न?
रमेश–अजी, अभी छः और बाकी हैं। पूरे सात जीव हैं। ज़रा बैठ जाओ, जरूरी चीजों की सूची बना ली जाये। आज ही से दौड़-धूप होगी, तब सब चीजें जुटा सकूँगा। और कितने मेहमान होंगे?
रमानाथ–मेम साहब होंगी, और शायद वकील साहब भी आयें।
रमेश–यह बहुत अच्छा किया। बहुत से आदमी हो जाते हैं, तो भभ्भड़ हो जाता। हमें तो मेम साहब से काम है। ठलुओं की खुशामद करने से क्या फायदा?
दोनों आदमियों ने सूची तैयार की। रमेश बाबू ने दूसरे ही दिन सामान जमा करना शुरू किया। उनकी पहुँच अच्छे-अच्छे घरों में थी सजावट की अच्छी-अच्छी चीजें बटोर लाये, सारा घर जगमगा उठा। दयानाथ भी इन तैयारियों में शरीक थे। चीजों को करीने से सजाना उनका काम था। कौन गमला कहाँ रक्खा जाये, कौन तस्वीर कहाँ लटकायी जाये। कौन सा गलीचा कहाँ बिछाया जाये, इन प्रश्नों पर तीनों मनुष्यों में घंटों वाद-विवाद होता था। दफ्तर जाने के पहले और दफ्तर से आने के बाद तीनों इन्हीं कामों में जुट जाते थे। एक दिन इस बात पर बहस छिड़ गयी कि कमरे में आईना कहाँ रक्खा जाय। दयानाथ कहते थे, इस कमरे में आईने की ज़रूरत नहीं। आईना पीछे वाले कमरे में रखना चाहिए। रमेश इसका विरोध कर रहे थे। रमा दुविधे में चुपचाप खड़ा था। न इनकी-सी कह सकता था न उनकी-सी।
दयानाथ–मैंने सैकड़ों अँग्रेजों के ड्राइंग-रूम देखे हैं। कहीं आईना नहीं देखा। आईना श्रृंगार के कमरे में रहना चाहिए। यहाँ आईना रखना बेतुकी-सी बात है।
रमेश–मुझे सैकड़ों अँग्रेजों के कमरों को देखने का अवसर तो नहीं मिला है, लेकिन दो-चार जरूर देखे हैं और उनमें आईना लगा हुआ देखा। फिर क्या यह ज़रूरी बात है कि इन ज़रा-ज़रा सी बातों में भी हम अँग्रेजों की नकल करें? हम अँग्रेज नहीं हिन्दुस्तानी हैं। हिन्दुस्तानी रईसों के कमरे में बड़े-बड़े आदमकद आईने रक्खे जाते हैं। यह तो आपने हमारे बिगड़े हुए बाबुओं की-सी बात कही, जो पहनावे में, कमरे की सजावट में, बोली में, चाय और शराब में, चीनी की प्यलियों में:–गरज़ दिखावे की सभी बातों में तो अँग्रेजों का मुँह चिढ़ाते हैं, लेकिन जिन बातों ने अँग्रेजों को अँग्रेज बना दिया है, और जिनकी बदौलत वे दुनिया पर राज्य करते हैं, उनकी हवा तक नहीं छू जाती। क्या आपको भी बुढ़ापे में अँगरेज बनने का शौक चर्राया है?
दयानाथ अँग्रेजों की नकल को बहुत बुरा समझते थे। यह चाय पार्टी भी उन्हें बुरी मालूम हो रही थी। अगर कुछ सन्तोष था, तो यही कि दो-चार बड़े आदमियों से परिचय हो जायेगा। उन्होंने अपनी जिन्दगी में कभी कोट नहीं पहना था। चाय पीते थे, मगर चीनी के सेट की कैद न थी। कटोरा-कटोरी, गिलास, लोटा-तसला किसी से भी आपत्ति न थी; लेकिन इस वक्त उन्हें अपना पक्ष निभाने की पड़ी थी, बोले-हिन्दुस्तानी रईसों के कमरे मेजें कुर्सियाँ नहीं होतीं फर्श होता है। आपने कुर्सी-मेज़ लगाकर इसे अँग्रेजी ढंग पर तो बना दिया, अब आईने के लिए हिन्दुस्तानियों की मिसाल दे रहे हैं। या तो हिन्दुस्तानी रखिए या तो अँग्रेजी। यह क्या कि आधा तीतर आधा बटेर। कोट-पतलून पर चौगोशिया टोपी तो नहीं अच्छी मालूम होती !
रमेश बाबू ने समझा था कि दयानाथ की ज़बान बन्द हो जायेगी, लेकिन यह ज़वाब सुना तो चकराये। मैदान हाथ से जाता हुआ दिखायी दिया। बोले–तो आपने किसी अँग्रेज के कमरे में आईना नहीं देखा? भला ऐसे दस-पाँच अँग्रेजों के नाम तो बताइए? एक आपका वही किरंटा हेड क्लर्क है, उसके सिवा और किसी अँग्रेज के कमरे में तो शायद आपने कदम भी न रक्खा हो। उसी किरंटे को आपने अँग्रेजी रुचि का आदर्श समझ लिया है? खूब ! मानता हूँ।
दयानाथ–यह तो आपकी ज़बान है, उसे किरंटा, चमरेशियन, पिलपिली जो चाहे कहें, लेकिन रंग को छोड़कर वह किसी बात में अँगरेजों से कम नहीं और उसके पहले तो योरपियन था।
रमेश इसका कोई जवाब सोच ही रहे थे कि एक मोटरकार द्वार पर आकर रुकी, और रतनबाई उतरकर बरामदे में आयीं। तीनों आदमी चटपट बाहर निकल आये। रमा को इस वक्त रतन का आना बुरा मालूम हुआ। डर रहा था कि कहीं कमरे में भी न चली आये, नहीं तो सारी कलई खुल जाये। आगे बढ़कर हाथ मिलाता हुआ बोला–आइए यह मेरे पिता हैं, और यह मेरे दोस्त रमेश बाबू हैं, लेकिन उन दोनों सज्जनों ने न हाथ बढ़ाया और न जगह से हिले। सकपकाये से खड़े रहे। रतन ने भी उनसे हाथ मिलाने की ज़रूरत न समझी। दूर ही से उनको नमस्कार करके रमा से बोली:–नहीं, बैठूगी नहीं। इस वक्त फुरसत नहीं है। आपसे कुछ कहना था।
यह कहते हुए वह रमा के साथ मोटर तक आयी और आहिस्ता से बोली–आपने सराफ से कह तो दिया होगा?
रमा ने निःसंकोच होकर कहा–जी हाँ, बना रहा है।
रतन–उस दिन मैंने कहा था, अभी रुपये न दे सकूँगी, पर मैंने समझा शायद आपको कष्ट हो, इसलिए रुपये मँगवा लिये। आठ सौ चाहिए न?
जालपा ने कंगन के दाम आठ सौ बताये थे। रमा चाहता तो इतने रुपये ले सकता था। पर रतन की सरलता और विश्वास ने उसके हाथ पकड़ लिये। ऐसी उदार, निष्कपट रमणी के साथ वह विश्वासघात न कर सका। वह व्यापारियों से दो-दो चार-चार आने लेते ज़रा भी न झिझकता था। वह जानता था कि वे सब भी ग्राहकों को उलटे छूरे से मूँड़ते हैं। ऐसों के साथ ऐसा व्यवहार करते हुए उसकी आत्मा को लेशमात्र भी संकोच न होता था, लेकिन इस देवी के साथ यह कपट व्यवहार करने के लिए किसी पुराने की पापी की ज़रूरत थी। कुछ सकुचाता हुआ बोला:–क्या जालपा ने कंगन के दाम आठ सौ बतलाये थे? उसे शायद याद न रही होगी। उसके कंगन छः सौ के हैं। आप चाहें तो आठ सौ का बनवा दूँ !
रतन–नहीं मुझे तो वही पसन्द है। आप छः सौ का ही बनवाइए।
उसने मोटर पर से अपनी थैली उठाकर सौ सौ के छः नोट निकाले। रमा ने कहा–ऐसी जल्दी क्या थी; चीज तैयार हो जाती, तब हिसाब हो जाता।
रतन–मेरे पास रुपये खर्च हो जाते। इसलिए मैंने सोचा, आपके सिर पर लाद आऊँ। मेरी आदत है कि जो काम करती हूँ, जल्द से जल्द कर डालती हूँ। विलम्ब से मुझे उलझन होती है।
यह कहकर वह मोटर पर बैठ गयी, मोटर हवा हो गयी। रमा सन्दूक में रुपये रखने के लिए अन्दर चला गया, तो दोनों वृद्धजनों में बातें होने लगीं।
रमेश–देखा?
दयानाथ–जी हाँ, आँखें खुली हुई थीं। अब मेरे घर में भी वही हवा आ रही है। ईश्वर ही बचावे।
रमेश–बात तो ऐसी ही है, पर आजकल ऐसी ही औरतों का काम है। ज़रूरत पड़े तो कुछ मदद तो कर सकती हैं। बीमार पड़ जाओ तो डाक्टर को तो बुला ला सकती है। यहाँ तो चाहे हम मर जायें, तब भी क्या मजाल कि स्त्री घर से बाहर पाँव निकाले।
दयानाथ–हमसे तो भाई यह अंगरेज़ियत नहीं देखी जाती क्या करें सन्तान की ममता है, नहीं तो यही जी चाहता है कि रमा से साफ कह दूँ, भैया अपना घर अलग लेकर रहो। आँख फूटी पीर गयी। मुझे तो उन मर्दो पर क्रोध आता है, जो स्त्रियों को यों सिर चढ़ाते हैं देख लेना, एक दिन यह औरत वकील साहब को दगा देगी।
रमेश–महाशय, इस बात में से मैं तुमसे सहमत नहीं हूँ। यह क्यों मान लेते हो कि जो औरत बाहर आती-जाती है, वह जरूर ही बिगड़ी हुई है? मगर रमा को मानती बहुत है। रुपये न जाने किसलिए दिये?
दयानाथ–मुझे तो इसमें कुछ गोल-माल मालूम होता है। रमा कहीं उससे कोई चाल न चल रहा हो?
इसी समय रमा भीतर से निकला आ रहा था। अन्तिम वाक्य उसके कान में पड़ गया। भौंहें चढ़ाकर बोला:–जी हाँ, जरूर चाल चल रहा हूँ। उसे धोखा देकर रुपये ऐंठ रहा हूँ। यही तो मेरा पेशा है !
रमानाथ–पक्का जालिया बना दिया और क्या कहते? आपके दिल में ऐसा शुबहा क्यों आया? आपने मुझमें ऐसी कौन सी बात देखी, जिससे आपको यह खयाल पैदा हुआ? मैं ज़रा साफ-सुथरे कपड़े पहनता हूँ, ज़रा नयी प्रथा के अनुसार चलता हूँ, इसके सिवा आपने मुझमें कौन सी बुराई देखी? मैं जो कुछ खर्च करता हूँ ईमान से कमाकर खर्च करता हूँ जिस दिन धोखे और फरेब की नौबत आयेगी, ज़हर खाकर प्राण दे दूँगा। हाँ, यह बात है कि किसी को खर्च करने की तमीज़ होती है,किसी को नहीं होती। यह अपनी सुबुद्धि है; अगर इसे आप धोखे बाज़ी समझें, तो आपको आख्तियार है। जब आपकी तरफ से मेरे विषय में ऐसे संशय होने लगे, तो मेरे लिए यही अच्छा है कि मुँह में कालिख लगाकर कहीं निकल जाऊँ। रमेश बाबू यहाँ मौजूद हैं। आप इनसे मेरे विषय में जो कुछ चाहें, पूछ सकते हैं। यह मेरे खातिर झूठ न बोलेंगे।
सत्य के रंग की रँगी हुई इन बातों ने दयानाथ को आश्वस्त कर दिया। बोले–जिस दिन मुझे मालूम हो जायेगा कि तुमने यह ढंग आख्तियार किया है, उसके पहले मैं मुँह में कालिख लगाकर निकल जाऊँगा। तुम्हारा बढ़ता हुआ खर्च देखकर मेरे मन में सन्देह हुआ था, मैं इसे छिपाता नहीं हूँ, लेकिन जब तुम कह रहे हो तुम्हारी नीयत साफ है, तो मैं सन्तुष्ट हूँ। मैं केवल इतना ही चाहता हूँ कि मेरा लड़का चाहे गरीब रहे, पर नीयत न बिगाड़े। मेरी ईश्वर से यही प्रार्थना है कि वह तुम्हें सत्यपथ पर रक्खे।
रमेश ने मुस्कराकर कहा–अच्छा यह किस्सा तो हो चुका, अब बताओ, उसने तुम्हें रुपये किसलिए दिये? मैं गिन रहा था, छः नोट थे, शायद सौ-सौ के थे।
रमानाथ–ठग लाया हूँ।
रमेश–मुझसे शरारत करोगे तो मार बैठूँगा। अगर जट ही लाये हो, तो भी मैं तुम्हारी पीठ ठोकूँगा, जीते रहो। खूब जटो, लेकिन आबरू पर आँच न आने पाये। किसी को कानोंकान खबर न हो। ईश्वर से तो मैं डरता नहीं। वह जो कुछ पूछेगा, उसका जवाब मैं दे लूँगा, मगर आदमी से डरता हूँ। सच बताओ, किसलिए रुपये दिये? कुछ दलाली मिलने वाली हो तो मुझे शरीक कर लेना।
रमानाथ–जड़ाऊँ कंगन बनवाने को कह गयी हैं।
रमेश–तो चलो मैं एक अच्छे सराफ से बनवा दूँ। यह झंझट तुमने बुरा मोल ले लिया। औरत का स्वभाव तुम जानते नहीं। किसी पर विश्वास तो इन्हें आता ही नहीं। तुम चाहे दो-चार रुपये अपने पास से ही खर्च कर दो, पर वह यही समझेंगी कि मुझे लूट लिया। नेकनामी तो शायद ही मिले, हाँ बदनामी तैयार खड़ी है।
रमानाथ–आप मूर्ख स्त्रियों की बातें कर रहे हैं। शिक्षित स्त्रियाँ ऐसी नहीं होतीं। ज़रा देर बाद रमा अन्दर जाकर जालपा से बोला–अभी तुम्हारी सहेली रतन आयी थीं।
जालपा–सच ! तब तो बड़ा गड़बड़ हुआ होगा। यहाँ कुछ तैयारी तो थी ही नहीं।
रमानाथ–कुशल यही हुई कि कमरे में नहीं आयीं। कंगन के रुपये देने आयी थीं। तुमने उनसे शायद आठ सौ रुपये बताये थे मैने छः सौ ले लिये।
जालपा ने झेंपते हुए कहा:–मैंने तो दिल्लगी की थी।
जालपा ने इस तरह अपनी सफाई तो दे दी, लेकिन बहुत देर तक उसके मन में उथल-पुथल होती रही। रमा ने अगर आठ सौ रुपये ले लिये होते, तो शायद यह उथल-पुथल न होती। वह अपनी सफलता पर खुश होती; पर रमा के विवेक ने उसकी धर्म-बुद्धि को जगा दिया था। वह पछता रही थी कि मैं व्यर्थ बोली। यह मुझे अपने मन में कितनी नीच समझ रहे होंगे। रतन भी मुझे कितनी बेईमान समझ रही होगी।
