सराफे में गंगू की दुकान मशहूर थी। गंगू था तो ब्राह्मण, पर बड़ा ही व्यापार कुशल। उसकी दूकान पर नित्य ग्राहकों का मेला लगा रहता था। उसकी कर्मनिष्ठा ग्राहकों में विश्वास पैदा करती थी। और दूकानों पर ठगे जाने का भय था। यहाँ किसी तरह का धोखा न था। गंगू ने रमा को देखते ही मुसकराकर कहा–आइए बाबूजी ऊपर आइए। बड़ी दया की। मुनीमजी। आपके वास्ते पाने मँगवाओ। क्या हुक्म है बाबूजी, आप तो जैसे मुझसे नाराज हैं। कभी आते ही नहीं, गरीबों पर भी कभी-कभी दया किया कीजिए।
गंगू की शिष्टता ने रमा की हिम्मत खोल दी। अगर उसने इतने आग्रह से न बुलाया होता तो शायद रमा को दूकान पर जाने का साहस न होता। अपनी साख का अभी तक अनुभव न हुआ था। दुकान पर जाकर बोला–यहाँ हम ऐसे मजदूरों का कहाँ गुज़र है महाराज। गाँठ में कुछ हो भी तो।
गंगू–यह आप क्या कहते हैं सरकार, आपकी दुकान है, जो चीज चाहिए ले जाइए, दाम आगे-पीछे मिलते रहेंगे। हम लोग आदमी पहचानते हैं बाबू साहब, ऐसी बात नहीं है। धन्य भाग कि आप हमारी दूकान पर आये तो। दिखाऊँ कोई जड़ाऊ चीज? कोई कंगन, कोई हार? अभी हाल ही में दिल्ली का माल आया है।
रमानाथ–कोई हलके दामों का हार दिखाइए।
गंगू–यही कोई सात-आठ सौ तक?
रमानाथ–अजी नहीं, हद चार सौ तक।
गंगू–मैं आपको दोनों दिखाये देता हूँ। जो पसन्द आवे ले लीजियेगा। हमारे यहाँ किसी तरह का दगल-फसल नहीं बाबू साहब। इसकी आप जरा भी चिन्ता न करें। पाँच बरस का लड़का हो या सौ बरस का बूढ़ा, सबके साथ एक बात रखते हैं। मालिक को भी एक दिन मुँह दिखाना है बाबूजी।
सन्दूक सामने आया, गंगू ने हार निकाल-निकालकर दिखाने शुरू किये। रमा की आँखें खुल गयी, जी लोट पोट हो गया। क्या सफाई थी ! नगीनों की कितनी सुन्दर सजावट ! कैसी आब़-ताब ! उनकी चमक दीपक को मात करती थी। रमा ने सोच रखा था सौ रुपये से ज्यादा उधार न लगाऊँगा, लेकिन चार सौ वाला हार आँखों से कुछ जँचता न था। और जेब में कुल तीन सौ रुपये थे। सोचा अगर यह हार ले गया और जालपा ने पसन्द न किया, तो फायदा ही क्या। ऐसी चीज ले जाऊँ। कि वह देखते ही फड़क उठे। यह जड़ाऊ हार उसकी गरदन में कितनी शोभा देगा। वह हार एक सहस्त्र मणि- रंजित नेत्रों से उसके मन को खींचने लगा। वह अभिभूत होकर उसकी ओर ताक रहा था; पर मुँह से कुछ कहने का साहस न होता था। कहीं गंगू ने तीन सौ रुपये उधार लगाने से इनकार कर दिया, तो उसे कितना लज्जित होना पड़ेगा। गंगू ने उसके मन का संशय ताड़कर कहा–आपके लायक तो बाबूजी यही चीज है, अँधेरे घर में रख दीजिए, तो उजाला हो जाय।
रमानाथ–पसन्द तो मुझे भी यही है; लेकिन मेरे पास तीन सौ रुपये हैं यह समझ लीजिए।
शर्म से रमा के मुँह पर लाली छा गयी। वह धड़कते हुए हृदय से गंगू का मुँह देखने लगा।
गंगू ने निष्कपट भाव से कहा–बाबू साहब, रुपये का तो जिक्र ही न कीजिए। कहिए दस हाजर का माल साथ भेज दूँ। दुकान आपकी है, भला कोई बात है। हुक्म हो तो एक-आध चीज़ और दिखाऊँ। एक शीशफूल अभी बनकर आया है, बस यही मालूम होता है गुलाब का फूल खिला हुआ है। देखकर जी खुश हो जायेगा। मुनीमजी, ज़रा वह शीशफूल दिखाना तो। और दाम का भी कुछ ऐसा भारी नहीं; आपको ढाई सौ में दे दूँगा।
रमा ने मुस्कराकर कहा–महाराज, बहुत बातें बनाकर कहीं उलटे छुरे से न मूँड़ लेना। गहनों के मामले में बिल्कुल अनाड़ी हूँ।
गंगू–ऐसा न कहो बाबूजी, आप चीज ले जाइए, बजार में दिखा लीजिए, अगर कोई ढाई सौ कौड़ी से कम दे दे, तो मैं मुफ्त में दे दूँगा।
शीशफूल आया, सचमुच गुलाब का फूल था, जिस पर हीरे की कलियाँ ओस की बूँदों के समान चमक रही थीं। रमा की टकटकी बँध गयी मानो कोई अलौकिक वस्तु सामने आ गयी हो।
गंगू–बाबूजी, ढाई सौ रुपये तो कारीगर की सफाई के इनाम हैं। यह एक चीज है।
रमानाथ–हाँ, है तो बहुत सुन्दर; मगर भाई ऐसा न हो, कि कल ही से दाम का तकाजा करने लगो। मैं खुद ही जहाँ तक हो सकेगा, जल्दी दे दूँगा।
गंगू ने दोनों चीजें दो सुन्दर मखमली केसों में रखकर रमा को दे दीं। फिर मुनीमजी से नाम टँकवाया और पान खिलाकर बिदा किया।
रमा के मनोल्लास की इस समय सीमा न थी, किन्तु यह विशुद्ध उल्लास न था, इसमें एक शंका का भी समावेश था। यह उस बालक का आनंद न था जिसने माता से पैसे माँगकर मिठाई ली हो; बल्कि उस बालक का, जिसने पैसे चुराकर ली हो। उसे मिठाइयाँ मीठी तो लगती हैं; पर दिल काँपता रहता है कि कहीं घर चलने पर मार न पड़ने लगे। साढ़े छः सौ रुपये चुका देने की तो उसे विशेष चिन्ता न थी, घात लग जाये, तो वह छः महीने में चुका देगा। भय यही था कि बाबूजी सुनेंगे तो ज़रूर नाराज होंगे लेकिन ज्यों-त्यों आगे बढ़ता था, जालपा को उन आभूषणों से सुशोभित देखने की उत्कण्ठा इस शंका पर विजय पाती जाती थी। घर पहुँचने की जल्दी में उसने सड़क छोड़ दी, और एक गली में घुस गया। सघन अँधेरा छाया हुआ था। बादल तो उसी वक्त छाये हुए थे, जब वह घर से चला था। गली में घुसा ही था कि पानी की बूँद सिर पर छर्रे नवा की तरह पड़ी। जब तक छतरी खोले वह लथपथ हो चुका था। उसे शंका हुई इस अंधकार में कोई आकर दोनों चीजें न छीन न ले, पानी की झरझर में कोई आवाज भी न सुने। अँधेरी गलियों में खून तक हो जाते हैं। पछताने लगा नाहक इधर से आया। दो-चार मिनट देर से ही पहुँचता, तो ऐसी कौन सी आफत आ जाती। असामयिक दृष्टि से उनकी आनन्द-कल्पनाओं में बाधा डाल दी। किसी तरह गली का अन्त हुआ और सड़क मिली। लालटेंने दिखायी दीं। प्रकाश कितनी विश्वास उत्पन्न करने वाली शक्ति है, आज इसका उसे यथार्थ अनुभव हुआ।
वह घर पहुँचा तो दयानाथ बैठे हुक्क पी रहे थे। वह उस कमरे न गया। उनकी आँख बचाकर अन्दर जाना चाहता था कि उन्होंने टोका–इस वक्त कहाँ गये थे?
रमा ने उन्हें कुछ जवाब न दिया। कहीं वह अखबार सुनाने लगे, तो घण्टों की खबर लेंगे। सीधा अन्दर जा पहुँचा। जालपा द्वार पर खड़ी उसकी राह देख रही थी, तुरन्त उसके हाथ से छतरी ले ली और बोली–तुम तो बिलकुल भीग गये। कहीं ठहर क्यों न गये।
रमानाथ–पानी का क्या ठिकाना, रात भर बरसता रहे।
यह कहता हुआ रमा ऊपर चला गया। उसने समझा था जालपा भी पीछे-पीछे आती होगी, पर वह नीचे बैठी अपने देवरों से बातें कर रही थी, मानों उसे गहनों की याद ही नहीं है। जैसे वह बिल्कुल भूल गयी है कि रमा सराफे से आया है।
रमा ने कपड़े बदले और मन में झुँझलाता हुआ नीचे चला आया। उसी समय दयानाथ भोजन करने आ गये। सब लोग भोजन करने बैठ गये। जालपा ने जब्त तो किया था, पर इस उत्कण्ठा की दशा में आज उससे कुछ खाया न गया। जब वह ऊपर पहुँची, तो रमा चारपाई पर लेटा हुआ था। उसे देखते ही कौतुक से बोला–आज सराफे का जाना तो व्यर्थ ही गया। हार कहीं तैयार ही न था। बनाने को कह आया हूँ।
जालपा की उत्साह से चमकती हुई मुख-छवि मलिन पड़ गयी, बोली-वह तो पहले ही जानती थी। बनते-बनते पाँच छः महीने तो लग ही जायेंगे।
रमानाथ–नहीं जी, बहुत जल्द बना देगा, कसम खा रहा था।
जालपा–उँह, जब चाहे दे !
उत्कंठा की चरम सीमा ही निराशा है। जालपा मुँह फेरकर लेटने जा रही थी, कि रमा ने जोर से कहकहा मारा। जालपा चौंक पड़ी। समझ गयी रमा ने शरारत की थी। मुस्कराती हुई बोली–तुम भी बड़े नटखट हो। क्या लाये?
रमानाथ–कैसा चकमा दिया?
जालपा–यह तो मरदों की आदत ही है, तुमने नयी बात क्या की?
जालपा दोनों आभूषणों को देखकर निहाल हो गयी। हृदय में आनन्द की लहरें-सी उठने लगीं। वह मनोभावों को छिपाना चाहती थी कि रमा उसे ओछी न समझे; लेकिन एक-एक अंग खिला जाता था। मुस्कराती हुई आँखें, दमकते हुए कपोल और खिले हुए अधर उसका भरम गँवाये देते थे। उसने हार गले में पहना, शीशफूल जूड़े में सजाया, और हर्ष से उन्मत्त होकर बोली–तुम्हें आशीर्वाद देती हूँ, ईश्वर तुम्हारी सारी मनोकमानाएँ पूरी करे।
आज जालपा की वह अभिलाषा पूरी हुई, जो बचपन ही से उसकी कल्पनाओं का एक स्वप्न, उसकी आशाओं का क्रीड़ास्थल बनी हुई थी। आज उसकी वह साध पूरी हो गयी। यदि मानकी यहाँ होती, तो वह सबसे पहले यह हार दिखाती और कहती–तुम्हारा हार तुम्हें मुबारक हो।
रमा पर घड़ों नशा चढ़ा हुआ था। आज उसे अपना जीवन सफल जान पड़ा। अपने जीवन में आज पहली बार उसे विजय का आनन्द प्राप्त हुआ।
जालपा ने पूछा–जाकर अम्माजी को दिखा आऊँ?
रमा ने नम्रता से कहा–अम्मा को क्या दिखाने जाओगी। ऐसी कौन सी बड़ी चीजें हैं।
जालपा–अब मैं तुमसे साल-भर तक और किसी चीज़ के लिए न कहूँगी। इसके रुपये देकर ही मेरे दिल का बोझ हलका होगा।
रमा गर्व से बोला–रुपये की क्या चिन्ता हैं ही कितने !
जालपा–ज़रा अम्मा जी को दिखा आऊँ, देखें क्या कहती हैं।
रमानाथ–मगर यह न कहना, उधार लाये हैं।
जालपा इस तरह दौड़ी हुई नीचे गयी, मानों उसे वहाँ कोई निधि मिल जायगी।
आधी रात बीत चुकी थी। रमा आनन्द की नींद सो रहा था। जालपा ने छत पर आकर एक बार आकाश की ओर देखा। निर्मल चाँदनी छिटकी हुई थी–वह कार्तिक की चाँदनी जिसमें संगीत की शान्ति है, शान्ति का मधुर्य, और माधुर्य का उन्माद। जालपा ने कमरे में आकर अपनी सन्दूकची खोली और उसमें से वह काँच का चन्द्रहार निकाला जिसे एक दिन पहनकर उसने अपने को धन्य माना था। पर अब इस नये चन्द्रहार के सामने उसकी चमक उसी भाँति मन्द पड़ गयी थी, जैसे इस निर्मल चन्द्रज्योति के सामने तारों का आलोक। उसने उस नकली हार को तोड़ डाला और उसके दानों को नीचे गली में फेंक दिया, उसी भाँति जैसे पूजन समाप्त हो जाने के बाद कोई उपासक मिट्टी की मूर्तियों को जल में विसर्जित कर देता है।
