Cover Image for Gaban (गबन) by Munshi Premchand - Novel
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उपन्यास•1931•53 अध्याय•12h 21m

गबन

Gaban

प्रेमचंद का उपन्यास 'गबन' रमानाथ की कहानी है जो अपनी पत्नी जालपा के गहनों के शौक को पूरा करने के लिए गबन कर बैठता है।

पात्र:रमानाथ, जालपा, देवीदीन, रतन, वकील साहब
सेटिंग:20वीं सदी के प्रारंभ में शहरी भारत, इलाहाबाद

अध्याय 19 / 53

17 मिनट पठन • 2,458 शब्द

अध्याय 19: गबन

प्रातःकाल रमा ने रतन के पास अपना आदमी भेजा। खत में लिखा, मुझे बड़ा खेद है कि कल जालपा ने आपने के साथ ऐसा व्यवहार किया, जो उसे न करना चाहिए था। मेरा विचार यह कदापि न था कि रुपये आपको लौटा दूँ, मैंने सराफ की ताकीद करने के लिए उससे रुपये ले लिये थे। कंगन दो-चार रोज़ में अवश्य मिल जायेंगे। आप रुपये भेज दें। उसी थैली में दो सौ मेरे भी थे। वह भी भेजियेगा। अपने सम्मान की रक्षा करते हुए जिनती विनम्रता उससे हो सकती थी, उसमें कोई कसर न रक्खी। जब तक आदमी लौटकर न आया वह बड़ी व्यग्रता से उसकी राह देखता रहा। कभी सोचता, कहीं बहाना न कर दे, या घर पर मिले ही नहीं, या दो चार दिन के बाद का वादा करे। सारा दामोमदर रतन के रुपये पर, था। अगर रतन ने साफ जवाब दे दिया, तो फिर सर्वनाश ! उसकी कल्पना से ही रमा के प्राण सूखे जा रहे थे। आखिर नौ बजे आदमी लौटा। रतन ने दो सौ रुपये तो दे दिये थे; मगर खत का कोई जवाब न दिया था।

रमा ने निराश आँखों से आकाश की ओर देखा। सोचने लगा, रतन ने खत का जवाब क्यों नहीं दिया? मामूली शिष्टाचार भी नहीं जानती? कितनी मक्कार औरत है ! रात को ऐसा मालूम होता था कि साधुता और सज्जनता की प्रतिमा ही है, पर दिल में यह गुबार भरा हुआ था ! शेष रुपयों की चिन्ता में रमा को नहाने-धोने की भी सुध न रही।

कहार अन्दर गया तो जालपा ने पूछा–तुम्हें कुछ काम धन्धे की भी खबर है कि मटरगश्ती ही करते रहोगे ! दस बज रहे हैं, और अभी तक तरकारी-भाजी का कहीं पता नहीं?

कहार ने त्योरियाँ बदलकर कहा–तो का चार हाथ गोड़ कर लेई ! कामें से तो गवा रहिन। बाबू मेम साहब के तीर रुपैया लेबे का भेजिन रहा।

जालपा–कौन मेम साहब?

कहार–जौन मोटर पर चढ़कर आवत हैं।

जालपा–तो लाये रुपये?

कहार–लाये काहे नाहीं। पिरथी के छोर तो रहत हैं, दौरत-दौरत गोड़ पिराय लाग !

जालपा–अच्छा चटपट जाकर तरकारी लाओ। कहार तो उधर गया, रमा रुपये लिये हुए अन्दर पहुँचा तो जालपा ने कहा–तुमने अपने रुपये रतन के पास से मँगवा लिये न? अब तो मुझसे न लोगे?

रमा ने उदासीन भाव से कहा–मत दो !

जालपा–मैंने तो कह दिया था रुपया दे दूँगी। तुम्हें इतनी जल्द माँगने की क्यों सूझी?

समझी होगी इन्हें मेरा इतना विश्वास भी नहीं।

रमा ने हताश होकर कहा–मैंने रुपये नहीं माँगे थे। केवल इतना लिख दिया था कि थैली में दो सौ रुपये ज्यादे हैं। उसने आप ही आप भेज दिये।

जालपा ने हँसकर कहा–मेरे रुपये बड़े भाग्यवान हैं दिखाऊँ? चुन-चुन कर नये रुपये रक्खे हैं। सब इसी साल के हैं चमाचम ! देखो तो आँखें ठण्ठी हो जायें।

इतने में किसी ने नीचे से आवाज दी–बाबूजी सेठ ने रुपये के लिए भेजा है।

दयानाथ स्नान करने अन्दर आ रहे थे, सेठ जी के प्यादे को देखकर पूछा–कौन सेठ, कैसे रुपये? मेरे यहाँ किसी के रुपये नहीं आते !

प्यादा–छोटे बाबू ने कुछ माल लिया था। साल भर हो गये, अभी तक एक पैसा नहीं दिया। सेठजी ने कहा है, बात बिगड़ने पर रुपये दिये तो क्या दिये। आज कुछ ज़रुर दिलवा दीजिए।

दयानाथ ने रमा को पुकारा और बोले–देखो, किस सेठ का आदमी आया है। उसका, कुछ हिसाब बाकी है साफ क्यों नहीं कर देते? कितना बाकी है इसका?

रमा कुछ जवाब न देने पाया था कि प्यादा बोल उठा–पूरे सात सौ ! हैं बाबूजी।

दयानाथ की आँखें फैलकर मस्तक तक पहुँच गयीं–सात सौ ! क्यों जी यह तो सात सौ कहता है।

रमा ने टालने के इरादे से कहा–मुझे ठीक मालूम नहीं।

प्यादा–मालूम क्यों नहीं। पुरजा तो मेरे पास है। तब से कुछ दिया ही नहीं, कम कहाँ से हो गये।

रमा ने प्यादे को पुकारकर कहा–चलो तुम दूकान पर, मैं खुद आता हूँ।

प्यादा–हम बिना कुछ लियें न जायेंगे साहब। आप यों ही टाल दिया करते हैं, और बातें हमको सुननी पड़ती है।

रमा सारी दुनिया के सामने ज़लील बन सकता था; किन्तु पिता के सामने जलील बनना उसके लिए मौत से कम न था। जिस आदमी ने अपने जीवन में कभी हराम का एक पैसा न छुआ हो, जिसे किसी से उधार लेकर भोजन करने के बदले भूखों सो रहना मंजूर हो, उसका लड़का इतना बेशर्म और बेगैरत हो ! रमा पिता की आत्मा का यह घोर अपमान न कर सकता था। वह इन पर यह बात प्रकट न होने देना चाहता था कि उनका पुत्र उनके नाम को बट्टा लगा रहा है। कर्कश स्वर में प्यादे से बोला–तुम अभी यहीं खड़े हो? हट जाओ, नहीं धक्के देकर निकाल दिये जाओगे।

प्यादा–हमारे रुपये दिलवाइये, हम चले जायँ। हमें क्या आपके द्वार पर मिठाई मिलती है।

रमानाथ–तुम न जाओगे ! जाओ लाला से कह देना नालिश कर दें।

दयानाथ ने डाँटकर कहा–क्यों बेशर्मी की बातें करते हो जी। जब गिरह में रुपये न थे, तो चीज़ लाये ही क्यों? और जब लाये, तो जैसे बने वैसे रुपये अदा करो। कह दिया नालिश कर दो। नालिश कर देगा, तो कितनी आबरू रह जायेगी? इसका भी कुछ खयाल है ! सारे शहर में उँगलियाँ उठेंगी; मगर तुम्हें इसकी क्या परवा। तुमको यह सूझी क्या कि एक बारगी इतनी बड़ी गठरी सिर पर लाद ली? कोई शादी-ब्याह का अवसर होता, तो एक बात भी थी। और वह औरत कैसी है जो पति को ऐसी बेहूदगी करते देखती है और मना नहीं करती। आखिर तुमने क्या सोचकर यह कर्ज लिया? तुम्हारी ऐसी कुछ बड़ी आमदनी तो नहीं है !

रमा को पिता की यह डाँट बहुत ही बुरी लग रही थी। उसके विचार में पिता को इस विषय में कुछ बोलने का अधिकार ही न था। निःसंकोच होकर बोला–आप नाहक इतना बिगड़ रहे हैं, आपसे रुपये माँगने जाऊँ तो कहिएगा। मैं अपने वेतन से थोड़ा-थोड़ा करके सब चुका दूँगा।

अपने मन में उसने कहा–यह तो आप ही की करनी का फल है। आप ही के पाप का प्रायश्चित कर रहा हूँ।

प्यादे ने पिता और पुत्र में वाद-विवाद होते देखा तो चुपके से अपनी राह ली। मुंशीजी भुनभुनाते हुए स्नान करने चले गये। रमा ऊपर गया तो उसके मुँह पर लज्जा और ग्लानि की फटकार बरस रही थी। जिस अपमान से बचने के लिए वह डाल-डाल पात-पात भागता फिरता था, वह हो ही गया। इस अपमान के सामने सरकारी रुपयों की फिक्र भी गायब हो गयी। कर्ज लेने वाले बला के हिम्मती होते हैं। साधारण बुद्धि का मनुष्य ऐसी परिस्थियों में पड़कर घबड़ा उठता है; पर बेठकबाजों के माथे पर बल तक नहीं पड़ता। रमा अभी इस कला में दक्ष नहीं हुआ था। इस समय यदि यमदूत उसके प्राण हरने आता, तो वह आँखों से दौड़कर उसका स्वागत करता। कैसे क्या होगा, यह शब्द उसके एक-एक रोम से निकल रहा था। कैसे क्या होगा ! इससे अधिक वह इस समस्या की और व्याख्या न कर सकता था। यही प्रश्न एक सर्वव्यापी पिशाच की भाँति उसे घूमता दिखायी देता था। कैसे क्या होगा ! यही शब्द अगणित बगूलों की भाँति चारो ओर उठते नजर आते थे। वह इस पर विचार न कर सकता था। केवल उसकी ओर से आँखें बन्द कर सकता था। उसका चित्त इतना खिन्न हुआ कि आँखें सजल हो गयीं।

जालपा ने पूछा–तुमने तो कहा था, उसके अब थोड़े ही रुपये बाकी हैं।

रमानाथ ने सिर झुकाकर कहा–यह दुष्ट झूठ बोल रह था, मैंने कुछ रुपये दिये हैं।

जालपा–दिये होते, तो कोई रुपयों का तकाजा क्यों करता? जब तुम्हारी आमदनी इतनी कम थी तो गहने लिये ही क्यों? मैंने तो कभी जिद्द न की थी। और मान लो, मैं दो-चार बार कहती भी, तो तुम्हें समझ-बूझकर काम करना चाहिए था। अपने साथ मुझे भी चार बातें सुनवा दीं। आदमी सारी दुनिया से परदा रखता है, लेकिन अपनी स्त्री से परदा नहीं रखता। तुम मुझसे भी परदा रखते हो। अगर मैं जानती, तुम्हारी आमदनी इतनी थोड़ी है तो मुझे क्या ऐसा शौक चर्राया था कि मुहल्ले भर की स्त्रियों को ताँगे पर बैठा-बैठाकर सैर कराने ले जाती।

अधिक-से-अधिक यही तो होता, कि कभी-कभी चित्त दुःखी हो जाता, पर यह तकाजे तो न सहने पड़ते। कहीं नालिश कर दे, तो सात सौ के एक हजार हो जायँ। मैं क्या जानती थी कि तुम मुझसे यह छल कर रहे हो। कोई वेश्या तो थी नहीं कि तुम्हें नोच-घसोटकर अपना घर भरना मेरा काम होता। मैं तो भले-बुरे दोनों ही की साथिन हूँ। भले में तुम चाहे मेरी बात मत पूछो; बुरे में तो मैं तुम्हारे गले पड़ूँगी ही।

रमा के मुख से एक शब्द न निकला। दफ्तर का समय आ गया था। भोजन का अवकाश न था। रमा ने कपड़े पहने, और दफ्तर चला। जागेश्वरी ने कहा–क्या बिना भोजन किये ही चलो जाओगे?

रमा ने इसका कोई जवाब न दिया, और घर से निकलना ही चाहता था, कि जालपा झपटकर नीचे आयी और पुकारकर बोली–मेरे पास जो दो सौ रुपये हैं, उन्हें क्यों नहीं सर्राफ़ को दो देते?

रमा ने चलते वक्त जान-बूझकर जालपा से रुपये न माँगे थे। वह जानता था, जालपा माँगते ही दे देगी; लेकिन इतनी बातें सुनने के बाद अब रुपये के लिए उसके सामने हाथ फैलाते उसे संकोच ही नहीं, भय होता था। कहीं वह फिर न उपदेश देने बैठ जाये–इसकी अपेक्षा आने वाली विपत्तियाँ कहीं हलकी थीं। मगर जालपा ने उसे पुकारा, तो कुछ आशा बँधी। ठिठक गया और बोला–अच्छी बात है, लाओ दे दो।

वह बाहर के कमरे में बैठ गया। जालपा दौड़कर ऊपर से रुपये लायी और गिन-गिनकर उसकी थैली में डाल दिये। उसने समझा था, रमा रुपये पाकर फूला न समायेगा; पर उसकी आशा पूरी न हुई। अभी तीन सौ रुपये की फिक्र करनी थी। वह कहाँ से आयेंगे? भूखा आदमी इच्छापूर्ण भोजन चाहता है, दो-चार फुलकों से उसकी तुष्टि नहीं होती।

सड़क पर आकर रमा ने एक ताँगा लिया और उससे जार्जटाउन चलने को कहा–शायद रतन से भेंट हो जाये। वह चाहे तो तीन सौ रुपये का बड़ी आसानी से प्रबन्ध कर सकती है। रास्ते में वह सोचता जाता था, आज बिल्कुल संकोच न करूँगा। ज़रा देर में जार्जटाउन आ गया। रतन का बँगला भी आया। वह बरामदे में बैठी थी। रमा ने उसे देखकर हाथ उठाया, उसने भी हाथ उठाया; पर वहाँ उसका सारा संयम टूट गया। वह बँगले में न जा सका। ताँगा सामने से निकल गया। रतन बुलाती तो वह चला जाता। वह बरामदे में न बैठी होती शायद वह अन्दर जाता; पर उसे सामने बैठे देखकर संकोच में डूब गया।

जब ताँगा गवर्नमेंट हाउस के पास पहुँचा, तो रमा ने चौंककर कहा–चुंगी के दफ्तर चलो। ताँगेवाले ने घोड़ा फेर दिया।

ग्यारह बजते-बजते रमा दफ़्तर पहुँचा। उसका चेहरा उतरा हुआ था। छाती धड़क रही थी। बड़े बाबू ने ज़रूर पूछा होगा। जाते ही बुलायेंगे। दफ़्तर में ज़रा भी रियायत नहीं करते। ताँगे से उतरते ही उसने पहले कमरे की तरफ़ निगाह डाली। देखा, कई आदमी खड़े उसकी राह देख रहे हैं। वह उधर न जाकर रमेश बाबू के कमरे की ओर गया।

रमेश बाबू ने पूछा–तुम अब तक कहाँ थे जी, खजांची साहब तुम्हें खोजते फिरते हैं? चपरासी मिला था?

रमा ने अटकते हुए कहा–मैं घर पर न था। जरा वकील साहब की तरफ़ चला गया था। एक बड़ी मुसीबत में फँस गया हूँ।

रमेश–कैसी मुसीबत, घर पर तो कुशल है?

रमानाथ–जी हाँ, घर पर तो कुशल है। कल शाम को यहाँ काम बहुत था, मैं उसमें ऐसा फँसा कि वक्त की कुछ खबर ही न रही। जब काम खत्म करके उठा, तो खजांची साहब चले गये थे। मेरे पास आमदनी के आठ सौ रुपये थे। सोचने लगा इसे कहाँ रखूँ। मेरे कमरे में कोई सन्दूक ही नहीं। यही निश्चय किया कि साथ लेता जाऊँ। पाँच सौ रुपये नकद थे वह तो मैंने थैली में रक्खे, तीन सौ रुपये के नोट जेब में रख लिये और घर चला। चौंक में दो एक चीजें लेनी थीं। उधर से होता हुआ घर पहुँचा तो नोट गायब थे।

रमेश बाबू ने आँखें फाड़कर कहा–तीन सौ के नोट गायब हो गये?

रमानाथ–जी हाँ, कोट के ऊपर जेब में थे। किसी ने निकाल लिये।

रमेश–और तुमको मारकर थैली नहीं छीन ली?

रमानाथ–क्या बताऊँ बाबूजी, तब से चित्त में जो दशा हो रही है, वह बयान नहीं कर सकता। तब से अब तक इसी में दौड़ रहा हूँ। कोई बन्दोबस्त न हो सका।

रमेश–अपने पिता से तो तुमने कहा ही न होगा?

रमानाथ–उनका स्वभाव तो आप जानते ही हैं। रुपये तो न देते, उलटी डाँट सुनाते।

रमेश–तो फिर क्या फिक्र करोगे?

रमानाथ–आज शाम तक कोई-न-कोई फिक्र करूँगा ही।

रमेश ने कठोर भाव धारण करके कहा–तो फिर करो न ! इतनी लापरवाही तुमसे हुई कैसे ! यह मेरी समझ में नही आता। मेरी जेब से तो आज तक एक पैसा न गिरा। आँखें बन्द करके रास्ता चलते हो या नशे में थे? मुझे तुम्हारी बात पर विश्वास नहीं आता। सच-सच बलता दो, कहीं अनाप-शनाप तो नहीं खर्च कर डाले? उस दिन मुझसे क्यों रुपये माँगे थे?

रमा का चेहरा पीला पड़ गया। कहीं कलई तो न खुल जायेगी। बात बनाकर बोला–क्या सरकारी रुपया खर्च कर डाँलूगा? उस दिन तो आपसे रुपये इसलिए माँगे थे कि बाबूजी को एक ज़रूरत आ पड़ी थी। घर में रुपये न थे। आपका खत मैंने उन्हें सुना दिया था। बहुत हँसे, दूसरा इन्तजाम कर लिया। इन नोटों के गायब होने का तो मुझे खुद आश्चर्य है।

रमेश–तुम्हें अपने पिता जी से माँगते संकोच होता तो, तो मैं खत लिखकर मँगवा लूँ।

रमा ने कानों पर हाथ रखकर कहा–नहीं बाबूजी, ईश्वर के लिए ऐसा न कीजिएगा। ऐसी ही इच्छा हो, तो मुझे गोली मार दीजिए।

रमेश ने एक क्षण तक कुछ सोचकर कहा–तुम्हें विश्वास है, शाम तक रुपये मिल जायेंगे?

रमानाथ–हाँ आशा तो है।

रमेश–तो इस थैली के रुपये जमा कर दो, मगर देखो भाई, मैं साफ-साफ कहे देता हूँ, अगर कल दस बजे रुपये न लाये तो मेरा दोष नहीं। कायदा तो यही कहता है कि मैं इसी वक्त तुम्हें पुलिस के हवाले करूँ; मगर तुम अभी लड़के हो, इसलिए क्षमा करता हूँ। वरना तुम्हें मालूम है, मैं सरकारी काम में किसी प्रकार की मुरव्वत नहीं करता। अगर तुम्हारी जगह मेरा भाई या बेटा होता, तो मैं उसके साथ भी यही सुलूक करता, बल्कि शायद इससे सख़्त। तुम्हारे साथ तो फिर भी बड़ी नर्मी कर रहा हूँ। मेरे पास रुपये होते तो तुम्हें दे देता, लेकिन मेरी हालत तुम जानते हो। हाँ, किसी का कर्ज नहीं रखता। न किसी को कर्ज़ देता हूँ, न किसी से लेता हूँ। कल रुपये न आये तो बुरा होगा। मेरी दोस्ती भी तुम्हें पुलिस के पंजे से न बचा सकेगी। मेरी दोस्ती ने आज अपना हक अदा कर दिया, वरना इस वक्त तुम्हारे हाथों में हथकड़ियाँ होती।

हथकड़ियाँ ! यह शब्द तीर की भाँति रमा की छाती में लगा। वह सिर से पाँव तक काँप उठा। उस विपत्ति की कल्पना करके उसकी आँखें डबडबा आयी। वह धीरे-धीरे सिर झुकाये, सज़ा पाये हुए कैदी की भाँति जाकर अपनी कुरसी पर बैठ गया; पर यह भयंकर शब्द बीच-बीच में उसके हृदय में गूँज जाता था।

आकाश की काली घटाएँ छायी थीं। सूर्य का कहीं पता न था, क्या वह भी उस घटारूपी कारागार में बन्द है, क्या उसके हाथों में भी हथकड़ियाँ हैं?

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शोध एवं शोध-पत्रों के लिए अकादमिक संदर्भ

Premchand, Munshi. "गबन." *Munshi Premchand Digital Archive*, 1931, https://munshipremchand.com/works/novels/gaban. Accessed 22 Sep. 2026.