Cover Image for Gaban (गबन) by Munshi Premchand - Novel
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उपन्यास•1931•53 अध्याय•12h 21m

गबन

Gaban

प्रेमचंद का उपन्यास 'गबन' रमानाथ की कहानी है जो अपनी पत्नी जालपा के गहनों के शौक को पूरा करने के लिए गबन कर बैठता है।

पात्र:रमानाथ, जालपा, देवीदीन, रतन, वकील साहब
सेटिंग:20वीं सदी के प्रारंभ में शहरी भारत, इलाहाबाद

अध्याय 2 / 53

4 मिनट पठन • 532 शब्द

अध्याय 2: गबन

महाशय दीनदयाल प्रयाग के एक छोटे से गाँव में रहते थे। वह किसान न थे; पर खेती करते थे। वह जमींदार न थे; पर जमींदारी करते थे। थानेदार न थे; पर थानेदारी करते थे। वह थे जमींदार के मुख्तार। गाँव पर उन्हीं की धाक थी। उनके पास चार चपरासी थे, एक घोड़ा, कई गायें-भैंसे। वेतन कुल पाँच रुपये पाते थे, जो उनके तम्बाकू के खर्च को भी काफी न होता था। उनकी आय के और कौन से मार्ग थे, यह कौन जानता है। जालपा उन्हीं की लड़की थी। पहले उसके तीन भाई और थे; पर इस समय वह अकेली थी। उससे कोई पूछता–तेरे भाई क्या हुए, तो वह बड़ी सरलता से कहती–‘बड़ी दूर खेलने गये हैं।’ कहते हैं मुख्तार साहब ने एक गरीब आदमी को इतना पिटवाया था कि वह मर गया था। उसके तीन वर्ष के अन्दर तीनों लड़के जाते रहे। तब से बेचारे बहुत सँभलकर चलते थे। फूँक-फूँककर पाँव रखते; दूध के जले थे, छाछ भी फूँक-फूँककर पीते थे। माता और पिता के जीवन में और क्या अवलम्ब !

दीनदयाल जब कभी प्रयाग जाते, तो जालपा के लिए कोई-न-कोई आभूषण जरूर लाते। उनकी व्यावहारिक बुद्धि में यह विचार ही न आता था कि जालपा किसी और चीज से अधिक प्रसन्न हो सकती है। गुड़ियाँ और खिलौने वह व्यर्थ समझते थे; इसलिए जालपा आभूषणों से ही खेलती थी। यही उसके खिलौने थे। वह बिल्लौर का हार, जो उसने बिसाती से लिया था, अब उसका सबसे प्यारा खिलौना था। असली हार की अभिलाषा अभी उसके मन में उदय ही नहीं हुई थी। गाँव में कोई उत्सव होता, या कोई त्योहार पड़ता, तो वह उसी हार को पहनती। कोई दूसरा गहना उसकी आँखों में जँचता ही न था।

एक दिन दीनदयाल लौटे, तो मानकी के लिए एक चन्द्रहार लाये। मानकी को यह साध बहुत दिनों से थी। यह हार पाकर वह मुग्ध हो गयी।

जालपा को अब अपना हार अच्छा न लगता, पिता से बोली–बाबूजी, मुझे भी ऐसी ही हार ला दीजिए।

दीनदयाल ने मुस्कराकर कहा–ला दूँगा, बेटी।

‘कब ला दीजियेगा?’

‘बहुत जल्द !’

बाप के शब्दों से जालपा का मन न भरा। उसने माता से जाकर कहा–अम्माजी, मुझे भी अपना–सा हार बनवा दो।

माँ–वह तो बहुत रुपयों में बनेगा बेटी।

जालपा–तुमने अपने लिए बनवाया है, मेरे लिए क्यों नहीं बनवातीं?

माँ ने मुस्कराकर कहा–तेरे लिए तेरी ससुराल से आयेगा।

यह हार छः सौ में बना था। इतने रुपये जमा कर लेना, दीनदयाल के लिए आसान न था। ऐसे कौन बड़े ओहदेदार थे। बरसों में कहीं यह हार बनने की नौबत आयी थी। जीवन में फिर कभी इतने रुपये आयेंगे, इसमें उन्हें सन्देह था।

जालपा लजाकर भाग गयी; पर यह शब्द उसके हृदय में अंकित हो गये। ससुराल उसके लिए अब उतनी भयंकर न थी। ससुराल से चन्द्रहार आयेगा, वहाँ के लोग उसे माता-पिता से अधिक प्यार करेंगे। तभी तो जो चीज ये लोग नहीं बनवा सकते, वह वहाँ से आयेगी।

लेकिन ससुराल से न आये तो !–उसके सामने तीन लड़कियों के विवाह हो चुके थे, किसी की ससुराल से चन्द्रहार न आया था। कहीं उसकी ससुराल से भी न आया तो? उसने सोचा–तो क्या माताजी अपना हार मुझे दे देंगी? अवश्य दे देंगी।

इस तरह हँसते-खेलते सात वर्ष कट गये। और वह दिन भी आ गया, जब उसकी चिर-संचित अभिलाषा पूरी होगी।

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शोध एवं शोध-पत्रों के लिए अकादमिक संदर्भ

Premchand, Munshi. "गबन." *Munshi Premchand Digital Archive*, 1931, https://munshipremchand.com/works/novels/gaban. Accessed 22 Sep. 2026.