Cover Image for Gaban (गबन) by Munshi Premchand - Novel
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उपन्यास•1931•53 अध्याय•12h 21m

गबन

Gaban

प्रेमचंद का उपन्यास 'गबन' रमानाथ की कहानी है जो अपनी पत्नी जालपा के गहनों के शौक को पूरा करने के लिए गबन कर बैठता है।

पात्र:रमानाथ, जालपा, देवीदीन, रतन, वकील साहब
सेटिंग:20वीं सदी के प्रारंभ में शहरी भारत, इलाहाबाद

अध्याय 14 / 53

18 मिनट पठन • 2,688 शब्द

अध्याय 14: गबन

उस दिन से जालपा के पति-स्नेह में सेवा-भाव का उदय हुआ। वह स्नान करने जाता, तो उसे अपनी धोती चुनी हुई मिलती। आले पर तेल और साबुन भी रक्खा हुआ पाता। जब दफ्तर जाने लगता, तो जालपा उसके कपड़े लाकर सामने रख देती। पहले पान माँगने पर मिलते थे, अब जबरदस्ती खिलाये जाते थे। जालपा उसका रुख देखा करती। उसे कुछ कहने की जरूरत न थी। यहाँ तक कि जब वह भोजन करने बैठता, तो वह पंखा झला करती। पहले वह बड़ी अनिच्छा से भोजन बनाने जाती थी और उस पर भी बेगार-सी टालती थी। अब बड़े प्रेम से रसोई में जाती। चीजें अब भी वही बनती थी; पर उसका स्वाद बढ़ गया था। रमा को इस मधुर स्नेह के सामने वह दो गहने बहुत ही तुच्छ जँचते थे।

उधर जिस दिन रमा ने गंगू की दूकान से गहने खरीदे उसी दिन दूसरे सराफों को भी उसके आभूषण-प्रेम की सूचना मिल गयी। रमा जब उधर से निकलता तो दोनों तरफ से दूकानदार उठ-उठकर उसे सलाम करते–आइए बाबूजी, पान तो खाते जाइए। दो एक चीजें हमारी दूकान से तो देखिए।

रमा का आत्म-संयम उसकी साख को और भी बढ़ाता था यहाँ तक की एक दिन एक दलाल रमा के घर आ पहुँचा, और उसके नहीं-नहीं करने पर भी अपनी सन्दूकची खोल ही दी।

रमा ने उससे पीछा छुड़ाने के लिए कहा–भाई इस वक्त मुझे कुछ नहीं लेना है। क्यों अपना और मेरा समय नष्ट करोगे। दलाल ने बड़े विनीत भाव से कहा–बाबूजी, देख तो लीजिए। पसन्द आये तो लीजियेगा, नहीं तो न लीजियेगा। देख लेने में तो कोई हर्ज नहीं है। आखिर रईसों के पास न जायँ, तो किसके पास जायँ। औरों ने आपसे गहरी रकमें मारीं हमारे भाग्य में भी बदा होगा; तो आपसे चार पैसा पा जायेंगे। बहूजी और माईजी को दिखा लीजिए। मेरा मन तो कहता है कि आज आप ही के हाथों से बोहनी होगी।

रमानाथ–औरतों के पसन्द की न कहो, चीजें अच्छी होंगी ही। पसन्द आते क्या देर लगती है, लेकिन भाई इस वक्त हाथ खाली है।

दलाल हँसकर बोला–बाबूजी, बस ऐसी बात कह देते हैं कि वाह ! आपका हुक्म हो जाय तो हजार-पाँच सौ आपके ऊपर निछावर कर दें। हम लोग आदमी का मिजा़ज देखते हैं बाबूजी। भगवान् ने चाहा तो आज में सौदा करके ही उठूँगा।

दलाल ने सन्दूकची से दो चीजें निकाली, एक तो नये फैशन का जड़ाऊ कंगन था और दूसरा कानों का रिंग। दोनों ही चीजें अपूर्व थीं। ऐसी चमक थी, मानों दीपक जल रहा हो। दस बजे थे, दयानाथ दफ्तर जा चुके थे, वह भी भोजन करने जा रहा था। समय बिलकुल न था, लेकिन इन दोनों चीजों को देखकर उसे किसी बात की सुध ही न रही। दोनों केस लिये हुए घर में आया। उसके हाथ में केस देखते ही दोनों स्त्रियाँ टूट पड़ी और उन चीजों को निकाल-निकालकर देखने लगी। उनकी चमक-दमक ने उन्हें ऐसा मोहित कर लिया कि गुण-दोष की विवेचना करने की उनमें शक्ति ही न रही।

जागेश्वरी–आजकल की चीजों के समाने तो पुरानी चीजें जँचती ही नहीं।

जालपा–मुझे तो उन पुरानी चीजों को देखकर कै आने लगती है। न जाने उन दिनों औरतें कैसे पहनती थीं।

रमा ने मुस्कराकर कहा–तो दोनों चीजें पसन्द हैं न?

जालपा–पसन्द क्यों नहीं है, अम्माजी तुम ले लो।

जागेश्वरी ने अपनी मनोव्यथा छिपाने के लिए सिर झुका लिया। जिसका सारा जीवन गृहस्थी की चिन्ताओं में कट गया, वह आज क्या स्वप्न में भी इन गहनों के पहनने की आशा कर सकती थी ! आह उस दुखिया के जीवन की कोई साध ही न पूरी हुई। पति की आय ही कभी इतनी न हुई, कि बाल-बच्चों के पालन-पोषण के उपरान्त कुछ बचता। जब से घर की स्वामिनी हुई, तभी से मानो उसकी तपश्चर्या का आरम्भ हुआ और सारी लालसाएँ एक-एक करके धूल में मिल गयीं। उसने उन आभूषणों की ओर से आँखें हटा लीं। उनमें इतना आकर्षण था कि उनकी ओर ताकते हुए वह डरती थी। कहीं उसकी विरक्ति का परदा न खुल जाय। बोली–मैं लेकर क्या करूँगी बेटी, मेरे पहनने-ओढ़ने के दिन तो निकल गये। कौन लाया है बेटा ! क्या दाम हैं इनके?

रमानाथ–एक सराफ दिखाने लाया है, अभी दाम-आम नहीं पूछे; मगर ऊँचे दाम होंगे। लेना तो था ही नहीं, दाम पूछकर क्या करता?

जालपा–लेना ही नहीं था, तो यहाँ लाये क्यों?

जालपा ने यह शब्द इतने आवेश में आकर कहे कि रमा खिसिया गया। उसमें इतनी उत्तेजना इतना तिरस्कार भरा हुआ था कि इन गहनों को लौटा ले जाने की उसकी हिम्मत न पड़ी। बोला–तो ले लूँ?

जालपा–अम्मा लेने ही नहीं कहतीं तो लेकर क्या करोगे? क्या मुफ्त में दे रहा है?

रमानाथ–समझ लो मुफ्त ही मिलते हैं।

जालपा–सुनती हो अम्माजी इनकी बातें। आप जाकर लौटा आइए। जब बाद में रुपये होंगे, तो बहुत गहनें मिलेंगे।

जागेश्वरी ने मोहासक्त स्वर में कहा–रुपये अभी तो नहीं माँगता?

जालपा–उधार भी देगा, तो सूद तो लगा ही लेगा?

रमानाथ–तो लौटा दूँ? एक बात चटपट तय कर डालो। लेना हो, ले लो, न लेना हो तो लौटा दो। मोह और दुविधे में न पड़ो।

जालपा को यह स्पष्ट बातचीत इस समय बहुत कठोर लगी। रमा के मुँह से उसे ऐसी आशा न थी। इन्कार करना उसका काम था, रमा को लेने के लिए आग्रह करना चाहिए था। जागेश्वरी की ओर लालायित नेत्रों से देखकर बोली–लौटा दो। रात-दिन के तकाजे कौन सहेगा।

वह केसों में बन्द करने ही वाली थी कि जागेश्वरी ने कंगन उठाकर पहन लिया, मानो एक क्षण भर पहनने से ही उसकी साध पूरी हो जायगी। फिर मन में इस ओछेपन पर लज्जित होकर वह उसे उतारना ही चाहती थी कि रमा ने कहा–अब तुमने पहन लिया है अम्मा तो पहने रहो। मैं तुम्हें भेंट करता हूँ। जागेश्वरी की आँखें सजल हो गयीं। जो लालसा आज तक पूरी न हो सकी, वह आज रमा की मातृभक्ति से पूरी हो रही थी; लेकिन क्या वह अपना प्रिय पुत्र पर ऋण का इतना भारी बोझ रख देगी? अभी वह बेचारा बालक है, उसकी सामर्थ्य ही क्या? न जाने रुपये जल्द हाथ आयें या देर में। दाम भी तो नहीं मालूम। अगर ऊँचे दामों का हुआ, तो बेचारा देगा कहाँ से? उसे कितने तकाजे़ सहने पड़ेंगे और कितना लज्जित होना पड़ेगा। कातर स्वर में बोली–नहीं बेटा, मैंने यों ही पहन लिया था। ले जाओ, लौटा दो।

माता का उदास मुख देखकर रमा का हृदय मातृप्रेम से हिल उठा। क्या ऋण के भय से वह अपनी त्यागमूर्ति माता की इतनी सेवा भी न कर सकेगा? माता के प्रति उसका कुछ कर्तव्य भी तो है? बोला–रुपये बहुत मिल जायेंगे अम्मा तुम इसकी चिन्ता मत करो।

जागेश्वरी ने बहू की ओर देखा। मानों कह रही थी कि रमा मुझ पर कितना अत्याचार कर रहा है।

जालपा उदासीन भाव से बैठी थी। कदाचित् उसे भय हो रहा था कि माता जी यह कंगन ले न लें। मेरा कंगन पहन लेना बहूँ को अच्छा नहीं लगा, इसमें जागेश्वरी को सन्देह नहीं रहा। उसने तुरंत कंगन उतार डाला, और जालपा की ओर बढ़कर बोली–मैं अपनी ओर से तुम्हें भेंट करती हूँ मुझे जो कुछ पहनना ओढ़ना था, ओढ़-पहन चुकी। अब ज़रा तुम पहनो, देखूँ।

जालपा को इसमें ज़रा भी सन्देह न था कि माताजी के पास रुपये की कमी नहीं। वह समझी शायद आज वह पसीज गयी हैं और कंगन के रुपये दे देंगी। एक क्षण पहले उसने समझा था कि रुपये रमा को देने पड़ेंगे, इसीलिए इच्छा रहने पर भी वह उसे लौटा देना चाहती थी। जब माताजी उसका दाम चुका रही थीं, तो वह क्यों इन्कार करती; मगर ऊपरी मन से बोली–रुपये न हों, तो रहने दीजिए अम्माजी, अभी कौन जल्दी है?

रमा ने कुछ चिढ़कर कहा–तो तुम यह कंगन ले रही हो?

जालपा–अम्माजी नहीं मानती तो मैं क्या करूँ?

रमा–और ये रिंग इन्हें भी क्यों नहीं रख लेतीं?

जालपा–जाकर दाम तो पूछ जाओ।

रमा ने अधीर होकर कहा–तुम इन चीजों को लेकर जाओ, तुम्हें दाम से क्या मतलब ! रमा ने बाहर आकर दलाल से दाम पूछा, तो सन्नाटे में आ गया। कंगन सात सौ के थे, और रिंग डेढ़ सौ के। उसका अनुमान था कि कंगन अधिक-से-अधिक तीन सौ के होंगे और रिंग चालीस-पचास रुपये के। पछताये कि पहले ही दाम क्यों न पूछ लिये, नहीं तो इन चीजों को घर में ले जाने की नौबत ही क्यों आती? फेरते हुए शर्म आती थी; मगर कुछ भी हो, फेरना तो पड़ेगा ही। इतना बड़ा बोझ वह सिर पर नहीं ले सकता। दलाल से बोला–बड़े दाम हैं भाई, मैंने तो तीन-चार सौ की भीतर ही आँका था। दलाल का नाम चरन दास था। बोला–दाम में एक कौड़ी फरक पड़ गया सरकार, तो मुँह न दिखाऊँ। धनीराम की कोठी का तो माल है, आप चलकर पूछ लें। दमड़ी रुपये की दलाली अलबत्ता मेरी है। आपकी मरजी हो दीजिए या न दीजिए।

रमानाथ–तो भाई, इन दामों की चीजों तो इस वक्त हमें नहीं लेनी हैं।

चरनदास–ऐसी बात न कहिए बाबूजी। आपके लिए इतने रुपये कौन सी बड़ी बात है। दो महीने भी माल चल जाय, तो इसके दूने हाथ आ जायेंगे। आपसे बढ़कर कौन शौकीन होगा। यह सब रईसों के पसन्द की चीजें हैं। गँवार लोग इनकी कद्र क्या जानें !

रमानाथ–साढ़े आठ सौ बहुत होते हैं भई।

चरन–रुपयों का मुँह न देखिए बाबूजी, जब बहूजी पहनकर बैठेंगी तो एक निगाह में सारे रुपये तर जायेंगे !

रमा को विश्वास था कि जालपा गहनों का यह मूल्य सुनकर आप ही बिचक जायगी। दलाल से और ज्यादा बातचीत न की। अन्दर जाकर बड़े जोर से हँसा और बोला–आपने इस कंगन का क्या दाम समझा था माजी?

जागेश्वरी कोई जवाब देकर बेवकूफ न बनना चाहती थी–इन जड़ाऊ चीजों में नाप-तौल का तो कुछ हिसाब रहता नहीं, जितने में तय हो जाए, वही ठीक है।

रमानाथ–अच्छा, तुम बताओ जालपा, इस कंगन का कितना दाम आँकती हो?

जालपा–छः सौ से कम का नहीं है।

रमा का सारा खेल बिगड़ गया। दाम का भय दिखाकर रमा ने जालपा को डरा देना चाहा था, मगर छः और सात में बहुत थोड़ा ही अन्तर था। और सम्भव है चरनदास इतने ही पर राजी हो जाय। कुछ झेंपकर बोला–कच्चे नगीने नहीं हैं।

जालपा–कुछ भी हो छः सौ से ज्यादा का नहीं।

रमा–और रिंग का?

जालपा–अधिक से अधिक सौ रुपये !

रमानाथ–यहाँ भी चूकीं डेढ़ सौ माँगता है।

जालपा–जट्टू है कोई हमें इन दामों लेना ही नहीं।

रमा की चाल उलटी पड़ी, जालपा को इन चीजों के मूल्य के विषय में बहुत धोखा न हुआ था। आखिर रमा की आर्थिक दशा तो उससे छिपी न थी, फिर भी वह सात सौ रुपये की चीजों के लिए मुँह खोले बैठी थी। रमा को क्या मालूम था कि जालपा कुछ और ही समझकर कंगन पर लहरायी थी। अब तो गला छूटने का एक ही उपाय था और वह यह कि दलाल छः सौ पर राजी न हो। बोला–वह साढ़े आठ सौ से कौड़ी कम न लेगा।

जालपा–तो लौटा दो।

रमानाथ–मुझे तो लौटते शर्म आती है अम्मा जरा आप ही दलान में चलकर कह दें, हमें सात सौ से ज्यादा नहीं देना है। देना हो तो दे दो, नहीं चले जाओ।

जागेश्वरी–हाँ रे, क्यों उस दलाल से मैं बातें करने जाऊँ।

जालपा–तुम्हीं क्यों नहीं कह देते, इसमें तो कोई शर्म की बात नहीं।

रमानाथ–मुझसे साफ जावब न देते बनेगा। दुनिया भर की खुशामद करेगा। चुनी चुना–आप बड़े आदमी हैं, रईस हैं, राजा हैं। आपके लिए डेढ़ सौ क्या चीज हैं। मैं उसकी बातों में आ जाऊँगा।

जालपा–अच्छा चलो मैं ही कहे देती हूँ।

रमानाथ–वाह, फिर तो सब काम ही बन गया।

रमा पीछे दबक गया। जालपा दालान में आकर बोली–जरा यहाँ आना जी, ओ सराफ ! लूटने आये हो, या माल बेचने आये हो?

चरनदास बरमदे से उठकर द्वार पर आया और बोला–क्या हुक्म है सरकार?

जालपा–माल बेचने आते हो, या लूटने आते हो? सात सौ रुपये कंगन के माँगते हो?

चरनदास–सात सौ तो उसकी कारीगरी का दाम है हुजूर !

जालपा–अच्छा तो जो उस पर सात सौ निछावर कर दे, उसके पास ले जाओ। रिंग के डेढ़ सौ कहते हो, लूट है क्या?

चरनदास–बहूजी, आप तो अन्धेर करती हैं। कहाँ साढ़े आठ सौ और कहाँ सात सौ?

जालपा–तुम्हारी खुशी अपनी चीज़ ले जाओ।

चरनदास–इतने बड़े दरबार में आकर चीज़ लौटा ले जाऊँ? आप यो ही पहने ! दस-पाँच रुपये की बात होती, तो अपनी जुबान न फेरता आपसे झूठ नहीं कहता बहूजी, इन चीजों पर पैसा रुपया नफा है। उसी एक पैसे में दूकान का भाड़ा, बट्टा-खाता, दस्तूरी, दलाली सब समझिए। एक बात ऐसी समझकर कहिए कि हमें भी चार पैसे मिल जायें। सवरे-सवेरे लौटना न पड़े।

जालपा–कह दिये, वही सात सौ।

चरन ने ऐसा मुँह बनाया, मानों वह किसी धर्म संकट में पड़ गया है। फिर बोला–सरकार है तो घाटा ही, पर आपकी बात नहीं टालते बनती। रुपये कब मिलेंगे?

जालपा–जल्दी ही मिल जायेंगे।

जालपा अन्दर जाकर बोली–आखिर दिया कि नहीं सात सौ में? डेढ़ सौ साफ उड़ाये लिये जाता था। मुझे पछतावा हो रहा है कि कुछ और कम क्यों न कहा। ये लोग इस तरह ग्राहकों को लूटते हैं।

रमा इतना भारी बोझ लेते घबरा रहा था; लेकिन परिस्थिति ने कुछ ऐसा रंग पकड़ा है कि बोझ उस पर लद ही गया।

जालपा तो खुशी की उमंग में दोनों चीज़ें लिये ऊपर चली गयी; पर रमा सिर झुकाये चिन्ता में डूबा खड़ा था। जालपा ने उसकी दशा जानकर भी इन चीजों को क्यों ठुकरा नहीं दिया, क्यों जोर देकर नहीं कहा–मैं न लूँगी, क्यों दुविधा में पड़ी रही। साढ़े पाँच सौ भी चुकाना मुश्किल था, इतने और कहाँ से आयेंगे। असल में गलती मेरी ही है। मुझे दलाल को दरवाजे से ही दुत्कार देना चाहिए था।

लेकिन उसने मन को समझाया। यह अपने ही पापों का तो प्रायश्चित है। फिर आदमी इसीलिए तो कमाता है। रोटियों के लाले थोड़े ही थे?

भोजन करके जब रमा ऊपर कपड़े पहनने गया तो जालपा आइने के सामने खड़ी कानों में रिंग पहन रही थी। उसे देखते ही बोली–आज किसी अच्छे का मुँह देखकर उठी थी। दो चीजें मुफ्त हाथ आ गयीं।

रमा ने विस्मय से पूछा–मुफ्त क्यों? रुपये न देने पड़ेंगे?

जालपा–रुपये तो अम्माजी देंगी।

रमानाथ–क्या कुछ कहती थीं?

जालपा–उन्होंने मुझे भेंट दिये हैं, तो रुपये कौन देगा?

रमा ने उसके भोलेपन पर मुसकराकर कहा–यह समझकर तुमने यह चीजें ले लीं? अम्मा को देना होता, तो उसी वक्त दे देतीं जब गहने चोरी गये थे। क्या उनके पास रुपये न थे?

जालपा असमंजस में पड़कर बोली–तो मुझे क्या मालूम था। अब भी तो लौटा सकते हो। कह देना, जिसके लिए लिया था, उसे पसन्द नहीं आया।

यह कह कर उसने तुरंत कानों से रिंग निकाल लिये। कंगन भी उतारे और दोनों चीजें केस में रखकर उसकी तरफ इस तरह बढ़ायी, जैसे कोई बिल्ली चूहे से खेल रही हो। वह चूहे को अपनी पकड़ से बाहर नहीं होने देती। उसे छोड़कर भी नहीं छोड़ती। हाथों को फैलाने का साहस नहीं होता था। क्या उसके हृदय की भी यही दशा न थी? उसके मुख पर हवाइयाँ उड़ रहीं थीं। क्यों वह रमा की ओर न देखकर भूमि की ओर देख रही थी? क्यों सिर ऊपर न उठाती थी? किसी संकट से बच जाने में जो हार्दिक आनन्द होता है, वह कहाँ था? उसकी दशा ठीक उस माता की-सी थी, जो अपने बालक को विदेश जाने की अनुमति दे रही हो। वही विवशता, वही कातरता, वही ममता इस समय जालपा के मुख पर उदय हो रही थी।

रमा उसके हाथों से केसों को ले सके, इतना कड़ा संयम उसमें न था। उसे तकाजे सहना, लज्जित होना, मुँह छिपाये फिरना, चिन्ता की आग में जलना, सब कुछ सहना मंजूर था। ऐसा काम करना नामंजूर था, जिससे जालपा का दिल टूट जाये, वह अपने को अभागिन समझने लगे। उसका सारा ज्ञान सारी चेष्टा सारा विवेक इस आघात का विरोध करने लगा। प्रेम और परिस्थितियों के संघर्ष मंे प्रेम ने विजय पायी।

उसने मुसकराकर कहा–रहने दो, अब ले लिया है, तो क्या लौटायें। अम्माजी भी हँसेंगी।

जालपा ने बनावटी काँपते हुए कण्ठ से कहा–अपनी चादर देखकर ही पाँव फैलाना चाहिए। एक नयी विपत्ति मोल लेने की क्या ज़रूरत है।

रमा ने मानों जल में डूबते हुए कहा–ईश्वर मालिक है। और तुरन्त नीचे चला गया।

हम क्षणिक मोह और संकोच में पड़कर अपने जीवन के सुख और शान्ति को कैसे होम कर देते हैं। अगर जालपा मोह के इस झोंके में अपने को स्थिर रख सकती, अगर रमा संकोच के आगे सिर न झुका देता, दोनों के हृदय में प्रेम का सच्चा प्रकाश होता, तो वे पथ-भ्रष्ट होकर सर्वनाश की ओर न जाते।

ग्यारह बज गये थे। दफ्तर के लिए देर हो रही थी, पर रमा इस तरह जा रहा था, जैसे कोई अपने प्रिय बन्धु की दाह-क्रिया करके लौट रहा हो।

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शोध एवं शोध-पत्रों के लिए अकादमिक संदर्भ

Premchand, Munshi. "गबन." *Munshi Premchand Digital Archive*, 1931, https://munshipremchand.com/works/novels/gaban. Accessed 22 Sep. 2026.