Cover Image for Gaban (गबन) by Munshi Premchand - Novel
Cover Image for Gaban (गबन) by Munshi Premchand - Novel
उपन्यास•1931•53 अध्याय•12h 21m

गबन

Gaban

प्रेमचंद का उपन्यास 'गबन' रमानाथ की कहानी है जो अपनी पत्नी जालपा के गहनों के शौक को पूरा करने के लिए गबन कर बैठता है।

पात्र:रमानाथ, जालपा, देवीदीन, रतन, वकील साहब
सेटिंग:20वीं सदी के प्रारंभ में शहरी भारत, इलाहाबाद

अध्याय 4 / 53

4 मिनट पठन • 570 शब्द

अध्याय 4: गबन

मुंशी दीनदयाल उन आदमियों में से थे, जो सीधों के साथ सीधे होते हैं, पर टेढ़ों के साथ टेढ़ें ही नहीं, शैतान हो जाते हैं। दयानाथ बड़ा सा मुँह खोलते, हजारों की बातचीत करते तो, दीनदयाल उन्हें ऐसा चकमा देते कि वह उम्र भर याद करते। दयानाथ की सज्जनता ने उन्हें वशीभूत कर लिया। उनका विचार एक हजार देने का था; पर एक हजार टीके ही में दे आये। मानकी ने कहा–जब टीके में एक हजार दिया, तो इतना ही घर पर भी देना पड़ेगा। आयेगा कहाँ से?

दीनदयाल चिढ़कर बोले–भगवान मालिक है। जब उन लोगों ने उदारता दिखायी और लड़का मुझे सौंप दिया, तो मैं भी दिखा देना चाहता हूँ कि हम भी शरीफ हैं और शील का मूल्य पहचानते हैं। अगर उन्होंने हेकड़ी जतायी होती, तो अलबत्ता उनकी खबर लेता।

दीनदयाल एक हजार तो दे आये; पर दयानाथ का बोझ हलका करने के बदले और भारी कर दिया। वह कर्ज से कोसों भागते थे। इस शादी में उन्होंने ‘मियाँ की जूती मियाँ की चाँद’ वाली नीति निभाने की ठानी थी। पर दीनदयाल की सहृदयता ने उनका संयम तोड़ दिया। वे सारे टीम-टाम, नाच तमाशे जिनकी कल्पना का उन्होंने गला घोंट दिया था, बृहद रूप धारण करके उनके सामने आ गये। बँधा हुआ घोड़ा थान से खुल गया, उसे कौन रोक सकता है। धूमधाम से विवाह करने की ठन गयी। पहले जोड़े-गहने को उन्होंने गौण समझ रखा था, अब वही सबसे मुख्य हो गया है। ऐसा चढ़ाव हो कि मड़वे वाले देखकर फड़क उठें।

सबकी आँखें खुल जायें। कोई तीन हजार का सामान बनवा डाला। सराफ को एक हजार नगद मिल गये, एक हजार के लिए एक सप्ताह का वादा हुआ, तो उसने कोई आपत्ति न की। सोचा–दो हजार सीधे हुए जाते हैं, पाँच-सात सौ रुपये रह जायेंगे, वह कहाँ जाते हैं। व्यापारी की लागत निकल आती है, तो नफे को तत्काल पाने के लिए आग्रह नहीं करता। फिर भी चन्द्रहार की कसर रह गयी। जड़ाऊ चन्द्रहार एक हजार से नीचे अच्छा मिल नहीं सकता था। दयानाथ का जी तो लहराया कि लगे हाथ उसे भी ले लो, किसी को नाक सिकोड़ने की जगह तो न रहेगी; पर जागेश्वरी इस पर राजी न हुई।

बाजी़ पलट चुकी थी।

दयानाथ ने गर्म होकर कहा–तुम्हें क्या, तुम तो घर में बेठी रहोगी। मौत तो मेरी होगी, जब उधर के लोग नाक-भौं सिकोड़ने लगेंगे।

जागेश्वरी–दोगे कहाँ से, कुछ सोचा है?

दयानाथ–कम-से-कम एक हजार तो वहाँ मिल ही जायेंगे।

जागेश्वरी–खून मुँह लग गया क्या?

दयानाथ ने शरमाकर कहा–नहीं नहीं, मगर आखिर वहाँ भी तो कुछ मिलेगा?

जागेश्वरी–वहाँ मिलेगा, तो वहाँ खर्च भी होगा। नाम जोड़े-गहने से नहीं होता, दान-दक्षिणा से होता है।

इस तरह चन्द्रहार का प्रस्ताव रद्द हो गया।

मगर दयानाथ दिखावे और नुमाइश को चाहे अनावश्यक समझें, रमानाथ उसे परमावश्यक समझता था। बरात ऐसे धूम से जानी चाहिए कि गाँव भर में शोर मच जाये। पहले दूल्हे के लिए पालकी का विचार था। रमानाथ ने मोटर पर जोर दिया। उसके मित्रों ने इसका अनुमोदन किया, प्रस्ताव स्वीकृत हो गया। दयानाथ एकान्तप्रिय जीव थे, न किसी से मित्रता थी न किसी से मेल-जोल। रमानाथ मिलनसार युवक था, उसके मित्र ही इस समय हर एक काम में अग्रसर हो रहे थे। वे जो काम करते दिल खोलकर। आतिशबाजियाँ बनवायी तो अव्वल दर्जे की। नाच ठीक किया तो अव्वल दर्जे का; बाजे गाजे भी अव्वल दर्जे के दोयम या सोयम का वहाँ जिक्र ही न था। दयानाथ उसकी उच्छृंखलता देखकर चिन्तित तो हो जाते थे; पर कुछ कह न सकते थे। क्या कहते !

इस रचना को उद्धृत करें

शोध एवं शोध-पत्रों के लिए अकादमिक संदर्भ

Premchand, Munshi. "गबन." *Munshi Premchand Digital Archive*, 1931, https://munshipremchand.com/works/novels/gaban. Accessed 22 Sep. 2026.