Cover Image for Gaban (गबन) by Munshi Premchand - Novel
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उपन्यास•1931•53 अध्याय•12h 21m

गबन

Gaban

प्रेमचंद का उपन्यास 'गबन' रमानाथ की कहानी है जो अपनी पत्नी जालपा के गहनों के शौक को पूरा करने के लिए गबन कर बैठता है।

पात्र:रमानाथ, जालपा, देवीदीन, रतन, वकील साहब
सेटिंग:20वीं सदी के प्रारंभ में शहरी भारत, इलाहाबाद

अध्याय 12 / 53

17 मिनट पठन • 2,500 शब्द

अध्याय 12: गबन

दूसरे दिन सवेरे ही रमा ने रमेश बाबू के घर का रास्ता लिया। उसके यहाँ भी जनमाष्टमी में झाँकी होती थी। उन्हें स्वयं तो इससे कोई अनुराग न था; पर उनकी स्त्री उत्सव मनाती थी, उसी की यादगार में अब तक यह उत्सव मनाते जाते थे। रमा को देखकर बोले–आओ जी, रात क्यों नहीं आये? मगर यहाँ गरीबों के घर क्यों आते। सेठजी की झाँकी कैसे छोड़ देते। खूब बहार रही होगी !

रमानाथ–आपकी-सी सजावट तो न थी, हाँ और सालों से अच्छी थी। कई कत्थक और वेश्याएँ भी आयी थीं। मैं तो चला आया था; मगर सुना रात भर गाना होता रहा।

रमेश–सेठजी ने तो वचन दिया था कि वेश्याएँ न आने पावेंगी, फिर यह क्या किया। इन मूर्खों के हाथों हिन्दू-धर्म का सर्वनाश हो जायगा। एक तो वेश्याओं का नाम यों भी बुरा उस पर ठाकुरद्वारे में ! छिः छिः, न जाने इन गधों को कब अक्ल आवेगी।

रमानाथ–वेश्याएँ न हों, तो झाँकी देखने जाये ही कौन? सभी तो आपकी तरह योगी और तपस्वी नहीं हैं।

रमेश–मेरा वश चले, तो मैं कानून से यह दुराचार बन्द कर दूँ। खैर, फुरसत हो तो आओ एक-आध बाज़ी हो जाय।

रमानाथ–और आया किसलिए हूँ; मगर आज आपको मेरे साथ ज़रा सराफे तक चलना पड़ेगा। यों कई बड़ी बड़ी कोठियों से मेरा परिचय है; मगर आपके रहने से कुछ और ही बात होगी।

रमेश–चलने को चला चलूँगा; मगर इस विषय में मैं बिल्कुल कोरा हूँ। न कोई चीज़ बनवायी, न खरीदी। तुम्हें क्या कुछ लेना है?

रमानाथ–लेना देना क्या है, जरा भाव-ताव देखूँगा।

रमेश–मालूम होता है, घर में फटकार पड़ी है।

रमानाथ–जी बिलकुल नहीं। वह तो जेवरों का नाम तक नहीं लेती। मैं कभी पूछता भी हूँ, तो मना करती है; लेकिन अपना कर्तव्य भी तो कुछ है। जब से गहने चोरी चले गये हैं एक चीज़ भी नहीं बनी।

रमेश–मालूम होता है, कमाने का ढंग आ गया। क्यों न हो, कायस्थ के बच्चे हो। कितने रुपये जोड़ लिये।

रमानाथ–रुपये किसके पास हैं, वादे पर लूँगा।

रमेश–इस खब्त में न पड़ो। जब तक रुपये हाथ में न हों, बाजार की तरफ जाओ ही मत। गहनों से तो बुड्ढे नयी बीवियों का दिल खुश किया करते हैं। बेचारों के पास गहनों के सिवा होता ही क्या है। जवानों के लिए और बहुत से लटके हैं। या मैं चाहूँ, तो दो चार हज़ार का माल दिलवा सकता हूँ, मगर भई कर्ज़ की लत बुरी है।

रमानाथ–मैं दो-तीन महीने में सब रुपये चुका दूँगा। अगर मुझे इसका विश्वास न होता, तो मैं जिक्र ही न करता।

रमेश–तो दो-तीन महीने और सब्र क्यों नहीं कर जाते? कर्ज से बड़ा पाप दूसरा नहीं। न इससे बड़ी विपत्ति दूसरी है। जहाँ एक बार धड़का खुला कि तुम आये दिन सराफ की दूकान पर खड़े नजर आओगे। बुरा न मानना। में जानता हूँ, तुम्हारी आमदनी अच्छी है, पर भविष्य के भरोसे पर और चाहे जो काम करो, लेकिन कर्ज कभी मत लो। गहनों का मरज न जाने इस दरिद्र देश में कैसे फैल गया। जिन लोगों को भोजन का ठिकाना नहीं, वे भी गहनों के पीछे प्राण देते हैं। हर साल अरबों रुपये केवल सोना-चाँदी खरीदने में व्यय हो जाते हैं। संसार के और किसी देश में इन धातुओं की इतनी खपत नहीं। तो बात क्या है? उन्नत देशों में धन व्यापार में लगता है।

जिससे लोगों की परवरिश होती है, और धन बढ़ता है यहाँ धन श्रृंगार में खर्च होता है, उसमें उन्नति और उपकार की जो दो महान शक्तियाँ हैं, उन दोनों ही का अन्त हो जाता है। बस यही समझ लो कि जिस देश के लोग जितने ही मूर्ख होंगे, वहाँ जे़वरों का प्रचार भी उतना ही अधिक होगा। यहाँ तो खैर नाक कान छिदाकर ही रह जाते हैं; मगर कई ऐसे देश भी हैं, जहाँ ओठ छेदकर लोग गहने पहनते हैं।

रमा ने कौतुहल से पूछा–वह कौन-सा देश है?

रमेश–इस समय ठीक याद नहीं आता, पर शायद अफ्रीका हो। हमें यह सुनकर अचम्भा होता है; लेकिन अन्य देश वालों के लिए नाक-कान का छिदना कुछ कम अचम्भे की बात न होगी। बुरा मरज़ है, बहुत ही बुरा। वह धन जो भोजन में खर्च होना चाहिए, बाल-बच्चों का पेट काटकर गहनों की भेंट कर दिया जाता है। बच्चों को दूध न मिले, न सही। घी की गंध तक उनकी नाक में न पहुँचे, न सही। मेवों और फलों के दर्शन उन्हें न हों, कोई परवा नहीं; पर देवीजी गहनें जरूर पहनेंगी और स्वामी जी गहने ज़रूर बनवायेंगे। दस-दस, बीस-बीस रुपये पाने वाले क्लर्कों को देखता हूँ, जो सड़ी हुई कोठरियों में पशुओं की भाँति जीवन काटते हैं, जिन्हें सवेरे का जलपान तक मयस्सर नहीं होता, उन पर भी गहनों की सनक सवार रहती है, इस प्रथा से हमारा सर्वनाश होता जा रहा है। मैं तो कहता हूँ यह गुलामी पराधीनता से कहीं बढ़कर है। इसके कारण हमारा कितना आत्मिक, नैतिक, दैहिक आर्थिक और धार्मिक पतन हो रहा हैं। इसका अनुमान ब्रह्मा भी नहीं कर सकते।

रमानाथ–मैं तो समझता हूँ, ऐसा कोई भी देश नहीं, जहाँ स्त्रियाँ गहने न पहनती हों। क्या योरोप में गहनों का रिवाज नहीं है?

रमेश–तो तुम्हारा देश योरोप तो नहीं है। वहाँ के लोग धनी हैं। वह धन लुटायें उन्हें शोभा देता है। हम दरिद्र हैं, हमारी कमाई का एक पैसा भी फजूल न खर्च होना चाहिए।

रमेश बाबू इस वाद-विवाद में शतरंज भूल गये। छुट्टी का दिन था ही, दो-चार मिलने वाले आ गये, रमानाथ चुपके से खिसक आया। इस बहस में एक बात ऐसी थी, जो उसके दिल में बैठ गयी। उधार गहने लेने का विचार उसके मन से निकल गया। कहीं वह जल्दी रुपया न चुका सका, तो कितनी बड़ी बदनामी होगी। सराफे तक गया अवश्य; पर किसी दूकान में जाने का साहस न हुआ। उसने निश्चय किया, अभी तीन-चार महीने तक गहनों का नाम न लूँगा।

वह घर पहुँचा, तो नौ बज गये थे। दयानाथ ने उसे देखा तो पूछा–आज सवेरे-सवेरे कहाँ चले गये थे?

रमानाथ–जरा बड़े बाबू से मिलने गया था।

दयानाथ–घंटे आध घंटे के लिए पुस्तकालय क्यों नहीं चले जाया करते। गपशप में दिन गँवा देते हो। अभी तुम्हारी पढ़ने लिखने की उम्र है। इम्तहान न सही, अपनी योग्यता तो बढ़ा सकते हो। एक सीधा-सा खत लिखना पड़ जाता है, तो बगलें झाँकने लगते हो। असली शिक्षा स्कूल छोड़ने के बाद ही शुरू होती है, और वही हमारे जीवन में काम भी आती है। मैंने तुम्हारे विषय में कुछ ऐसी बातें सुनी हैं, जिनसे मुझे बहुत खेद हुआ है और तुम्हें समझा देना मैं अपना धर्म समझता हूँ। मैं यह हरगिज नहीं चाहता कि मेरे घर में हराम की एक कौड़ी भी आये। मुझे नौकरी करते तीस साल हो गये। चाहता तो अब तक हजारों रुपये जमा कर लेता; लेकिन मैं कसम खाता हूँ कि कभी एक पैसा भी हराम का नहीं लिया। तुममें यह आदत कहाँ से आ गयी, यह मेरी समझ में नहीं आता।

रमा ने बनावटी क्रोध दिखाकर कहा–किसने आपसे कहा है? ज़रा उसका नाम तो बताइए? मूँछें उखाड़ लूँ उसकी !

दयानाथ–किसी ने भी कहा हो, इससे तुम्हें कोई मतलब नहीं। तुम उसकी मूँछे उखाड़ लोगे, इसलिए बताऊँगा नहीं लेकिन बात सच है या झूठ मैं इतना ही पूछना चाहता हूँ।

रमानाथ–बिल्कुल झूठ !

दयानाथ–बिल्कुल झूठ?

रमानाथ–जी हाँ, बिल्कुल झूठ !

दयानाथ–तुम दस्तूरी नहीं लेते?

रमानाथ–दस्तूरी रिश्वत नहीं है, सभी लेते हैं और खुल्लमखुल्ला लेते हैं। लोग बिना माँगे आप ही आप देते हैं, मैं किसी से माँगने नहीं जाता।

दयानाथ–सभी खुल्लमखुल्ला लेते हैं और लोग बिना माँगे देते हैं, इसमें तो रिश्वत की बुराई कम नहीं हो जाती।

रमानाथ–दस्तूरी को बन्द कर देना मेरे वश की बात नहीं। मैं खुद न लूँ, लेकिन चपरासी और मुहर्रिर का हाथ तो नहीं पकड़ सकता। आठ-आठ, नौ-नौ पाने वाले नौकर अगर न लें, तो उनका काम ही नहीं चल सकता। मैं खुद न लूँ, पर उन्हें नहीं रोक सकता।

दयानाथ ने उदासीनता के भाव से कहा–मैंने समझा दिया, मानने न मानने का अख्तियार तुम्हें हैं।

यह कहते हुए दयानाथ चले गये। रमा के मन में आया, साफ कह दे, आपने निस्पृह बनकर क्या कर लिया, जो मुझे दोष दे रहे हैं। हमेशा पैसे-पैसे को मुहताज रहे। लड़को को पढ़ा तक न सके। यह डींग मारना तब शोभा देता, जबकि नीयत भी साफ रहती और जीवन भी सुख से कटता।

रमा घर में गया तो माता ने पूछा–आज कहाँ चले गये थे बेटा, तुम्हारे बाबूजी इसी पर बिगड़ रहे थे।

रमानाथ–इस पर तो नहीं बिगड़ रहे थे; उपदेश ही दे रहे थे कि दस्तूरी मत लिया करो। इससे आत्मा दुर्बल होती है और बदनामी होती है।

जागेश्वरी–तुमने कहा नहीं, आपने बड़ी ईमानदारी की तो कौन से झण्डे गाड़ दिये ! सारी जिन्दगी पेट पालते रहे।

रमानाथ–कहना तो चाहता था, पर चिढ़ जाते। जैसे आप कौड़ी-कौड़ी को मुहताज रहे वैसे मुझे भी बनाना चाहते हैं। आपको लेने का शऊर तो है नहीं। जब देखा कि यह दाल नहीं गलती, तो भगत बन गये। यहाँ ऐसे घोंघा-बसन्त नहीं है। बनियों से रुपये ऐठने के लिए अक्ल चाहिए, दिल्लगी नहीं है ! जहाँ किसी ने भगतपन किया और यह समझ गया, बुद्धू है; लेने की तमीज़ नहीं क्या करे बेचारा। किसी तरह आँसू तो पोंछे।

जागेश्वरी–बस-बस यही बात है, बेटा जिसे लेना आवेगा, वह जरूर लेगा। इन्हें तो बस घर में कानून बघारना आता है और किसी के सामने बात तक तो मुँह से निकलती नहीं। रुपये निकाल लेना तो मुश्किल है।

रमा दफ्तर जाते समय ऊपर कपड़े पहनने गया, तो जालपा ने उसे तीन लिफाफे डाक में छोड़ने के लिए दिये। इस वक्त उसने तीनों लिफाफे जेब में डाल लिये; लेकिन रास्ते में उन्हें खोलकर चिट्ठियाँ पढ़ने लगा। चिट्ठियाँ क्या थीं, विपत्ति और वेदना का करुण विलाप था, जो उसने अपनी तीनों सहेलियों को सुनाया था। तीनों का विषय एक ही था। केवल भावों का अन्तर था–‘जिन्दगी पहाड़ हो गयी है, न रात को नींद आती है, न दिन को आराम; पतिदेव को प्रसन्न करने के लिए, कभी-कभी हँस बोल लेती हूँ, पर दिल हमेशा रोया करता है। न किसी के घर जाती हूँ, न किसी को मुँह दिखाती हूँ। ऐसा जान पड़ता है कि यह शोक मेरी जान ही लेकर छोड़ेगा। मुझसे वादे तो रोज़ किये जाते हैं, रुपये जमा हो रहे हैं, सुनार ठीक किया जा रहा है, डिजाइन तय किया जा रहा है, पर यह सब धोखा है और कुछ नहीं।’

रमा ने तीनों चिट्ठियाँ जेब में रख लीं। डाकखाना सामने से निकल गया, पर उसने उन्हें छोड़ा नहीं। यह अभी तक यही समझती है कि मैं इसे धोखा दे रहा हूँ? क्या करूँ कैसे विश्वास दिलाऊँ? अगर अपना वश होता तो इसी वक्त आभूषणों के टोकरे भर-भर जालपा के सामने रख देता, उसे किसी बड़े सराफ की दूकान पर ले जाकर कहता, तुम्हें जो-जो चीजें लेनी हों ले लो। कितनी अपार वेदना है, जिसने विश्वास का भी अपहरण कर लिया है। उसको आज उस चोट का सच्चा अनुभव हुआ, जो उसने झूठी मर्यादा की रक्षा में उसे पहुँचायी थी। अगर वह जानता, उस अभिनय का यह फल होगा, तो कदाचित् अपनी डींगों का परदा खोल देता। क्या ऐसी दशा में भी जब जालपा इस शोक ताप से फुँकी जा रही थी, रमा को कर्ज लेने में संकोच करने की जगह थी? उसका हृदय कातर हो उठा। उसने पहली बार सच्चे हृदय से ईश्वर से याचना की–भगवान मुझे चाहे दंड देना; पर मेरी जालपा को मुझसे मत छीनना। इससे पहले मेरे प्राण हर लेना। उसके रोम-रोम से आत्मध्वनि सी निकलने लगी ईश्वर, ईश्वर, मेरी दीन दशा पर दया करो।

लेकिन इसके साथ ही उसे जालपा पर क्रोध भी आ रहा था। जालपा ने क्यों मुझसे यह बात नहीं कही। मुझसे क्यों परदा रक्खा और मुझसे परदा रखकर अपनी सहेलियों से यह दुःखड़ा रोया?

बरामदे में माल तौला जा रहा था। मेज पर रुपये पैसे रखे जा रहे थे और रमा चिन्ता में डूबा बैठा हुआ था। किससे सलाह ले। उसने विवाह ही क्यों किया? सारा दोष उसका अपना था। जब वह घर की दशा जानता था, तो क्यों उसने विवाह करने से इनकार नहीं किया? आज उसका मन काम में नहीं लगता था। समय से पहले उठकर चला आया।

जालपा ने उसे देखते हुए पूछा–मेरी चिट्ठियाँ छोड़ तो नहीं दीं?

रमा ने बहाना किया–अरे इनकी तो याद ही नहीं रही। जेब में पड़ी रह गयी।

जालपा–यह बहुत अच्छा हुआ। लाओ मुझे दे दो, अब न भेजूँगी।

रमा–क्यों, कल भेज दूँगा।

जालपा–नहीं अब मुझे भेजना ही नहीं है, कुछ ऐसी बातें लिख गयी थी, जो मुझे न लिखना चाहिए था। अगर तुमने छोड़ दी होती, तो मुझे दुःख होता। मैंने तुम्हारी निन्दा की थी।

यह कहकर वह मुस्करायी।

रमानाथ–जो बुरा है, दगाबाज़ है, धूर्त, उसकी निन्दा होनी ही चाहिए।

जालपा ने व्यग्र होकर पूछा–तुमने चिट्ठियाँ पढ़ लीं क्या?

रमा ने निःसंकोच भाव से कहा–हाँ, यह कोई अक्षम्य अपराध है?

जालपा कातर स्वर में बोली–तब तो तुम मुझसे बहुत नाराज होगे?

आँसुओं के आवेग से जालपा की आवाज़ रुक गयी। उसका सिर झुक गया और झुकी हुई आँखों से आँसुओं की बूँदें अंचल पर गिरने लगीं। एक क्षण में उसने स्वर को सँभालकर कहा–मुझसे बड़ा भारी अपराध हुआ है। जो चाहे सजा दो; पर मुझसे अप्रसन्न मत हो। ईश्वर जानते हैं तुम्हारे जाने के बाद मुझे कितना दुःख हुआ। मेरी कलम से न जाने कैसे ऐसी बातें निकल गयीं।

जालपा जानती थी कि रमा को आभूषणों की चिन्ता मुझसे कम नहीं है; लेकिन मित्रों से अपनी व्यथा कहते समय हम बहुधा अपना दुःख बढ़ाकर कहते हैं। जो बातें परदे की समझी जाती हैं, उनकी चर्चा करने से एक तरह का अपनापन जाहिर होता है। हमारे मित्र समझते हैं, हमसे ज़रा भी दुराव नहीं रखता और उन्हें हमसे सहानुभूति हो जाती है। अपनापन दिखाने की आदत औरतों में कुछ अधिक होती है।

रमा जालपा के आँसू पोंछते हुए बोला–मैं तुमसे अप्रसन्न नहीं हूँ प्रिये ! अप्रसन्न होने की तो कोई बात ही नहीं है। आशा का विलम्ब ही दुराशा है, क्या मैं इतना नहीं जानता। अगर तुमने मुझे मना न कर दिया होता, तो अब तक मैंने किसी न किसी तरह दो एक चीजें अवश्य ही बनवा दी होती। मुझसे भूल यही हुई कि तुमसे सलाह ली। यह तो वैसा ही है जैसे मेहमान को पूछ-पूछकर भोजन दिया जाय। उस वक्त मुझे यह ध्यान न रहा कि संकोच में आदमी इच्छा होने पर भी नहीं-नहीं करता है। ईश्वर ने चाहा तो तुम्हें बहुत दिनों इन्तजार न करना पड़ेगा।

जालपा ने सचिन्त नेत्रों से देखकर कहा–तो क्या उधार लाओगे?

रमानाथ–हाँ, उधार लाने में कोई हर्ज नहीं है। जब सूद नहीं देना है, तो जैसे नगद वैसे उधार। ऋण से दुनिया का काम चलता है। कौन ऋण नहीं लेता। हाथ में रुपया आ जाने से अलल्ले-तलल्ले खर्च हो जाते हैं। कर्ज़ सिर पर सवार रहेगा, तो उसकी चिन्ता हाथ रोके रहेगी।

जालपा–मैं तुम्हें चिन्ता में नहीं डालना चाहती। अब मैं भूलकर भी गहनों का नाम न लूँगी।

रमानाथ–नाम तो तुमने कभी नहीं लिया; लेकिन तुम्हारे नाम न लेने से मेरे कर्तव्य का अन्त तो नहीं हो जाता। तुम कर्ज से व्यर्थ इतना डरती हो। रुपये जमा होने के इन्तजार में बैठा रहूँगा, तो शायद कभी न जमा होंगे। इसी तरह लेते-देते साल में तीन चार चीजें बन जायेंगी।

जालपा–मगर पहले कोई छोटी सी चीज़ लाना।

रमानाथ–हाँ, ऐसा तो करूँगा ही।

रमा बाजार चला, तो खूब अँधेरा हो गया था। दिन रहते जाता तो सम्भव था मित्रों में से किसी की निगाह उस पर पड़ जाती। मुंशी दयानाथ ही देख लेते। वह इस मामले को गुप्त ही रखना चाहता था।

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शोध एवं शोध-पत्रों के लिए अकादमिक संदर्भ

Premchand, Munshi. "गबन." *Munshi Premchand Digital Archive*, 1931, https://munshipremchand.com/works/novels/gaban. Accessed 22 Sep. 2026.