Cover Image for Kayakalp (कायाकल्प) by Munshi Premchand - Novel
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उपन्यास•1926•57 अध्याय•17h 56m

कायाकल्प

Kayakalp

प्रेमचंद का उपन्यास 'कायाकल्प' सामाजिक और राजनीतिक संघर्ष, हिंदू-मुस्लिम संबंधों, प्रेम, सत्ता, पुनर्जन्म और नैतिक परिवर्तन के प्रश्नों को एक साथ प्रस्तुत करता है।

पात्र:चक्रधर, मनोरमा, अहिल्या, राजा विशालसिंह, देवप्रिया, शंखधर, यशोदानंदन, ख्वाजा महमूद, मुंशी वज्रधर, लोंगी
सेटिंग:20वीं सदी के प्रारंभ में उत्तर भारत, विशेष रूप से आगरा और जगदीशपुर का रियासती राज्य

अध्याय 9 / 57

41 मिनट पठन • 6,038 शब्द

अध्याय 9: कायाकल्प

रानी देवप्रिया का सिर राजकुमार के पैरों पर था और आँखों से आँसू बह रहे थे। उनकी ओर ताकते हुए विचित्र भय हो रहा था। उसे कुछ-कुछ सन्देह हो रहा था कि मैं सो तो नहीं रही हूँ। कोई मनुष्य माया के दुर्भेद्य अंधकार को चीर सकता है? जीवन और मृत्यु के मध्यवर्ती अपार विस्मृत सागर को पार कर सकता है? जिसमें यह समर्थ्य हो, वह मनुष्य नहीं, प्रेत योनि का जीव है। यह विचार आते ही रानी का सारा शरीर काँप उठा, पर इस भय के साथ ही उसके मन में उत्कण्ठा हो रही थी कि उन्हीं चरणों से लिपटी हुई इसी क्षण प्राण त्याग दूँ। राजकुमार उसके पति हैं। इसमें तो सन्देह न था, सन्देह केवल यह था कि मेरे साथ यह कोई प्रेत-लीला तो नहीं कर रहे हैं। वह रह-रहकर छिपी हुई निग़ाहों से उनके मुख की ओर ताकती थीं, मानों निश्चय कर रही हों कि पति ही हैं या मुझे भ्रम हो रहा है।

सहसा राजकुमार ने उठाकर बैठा दिया और उसके मनोभावों को शान्त करते हुए बोले–हाँ प्रिये, मैं तुम्हारा वही चिरसंगी हूँ, जो अपनी प्रेमाभिलाशाओं को लिये हुए कुछ दिनों से तुमसे जुदा हो गया था। मुझे तो ऐसा मालूम हो रहा है कि कोई यात्रा करके लौट रहा हूँ। जिसे हम मृत्यु कहते हैं, और जिसके भय से संसार काँपता है, वह केवल एक यात्रा है। उस यात्रा में भी मुझे तुम्हारी याद आती रहती थी। विकल होकर आकाश में इधर-उधर दौड़ा करता था। प्रायः सभी प्राणियों की यही दशा थी। कोई अपने संचित धन का अपव्यय देख-देखकर कुढ़ता था, कोई अपने बाल-बच्चों को ठोकरें खाते देख-देखकर रोता था। वे दृश्य इस मृत्युलोक के दृश्यों से कहीं करुणाजनक, कहीं दुःखमय थे। कितने ही ऐसे जीव दिखाई दिए, जिनके सामने यहाँ सम्मान से मस्तक झुकता था, वहाँ उनका नग्न रूप देखकर उनसे घृणा होती थी। यह कर्मलोक है, वहाँ भोगलोक; और कर्म का दण्ड कर्म से कहीं भयंकर होता है। मैं भी उन्हीं अभागों में था। देखता था कि मेरे प्रेम सिंचित उद्यान को भाँति-भाँति के पशु कुचल रहे हैं, प्रणव के पवित्र सागर में हिंसक जल-जन्तु दौड़ रहे हैं, और देख-देखकर क्रोध से मन विह्वल हो जाता था। अगर मुझमें वज्र गिराने की सामर्थ्य होती, तो गिरकर उन पशुओं का अन्त कर देता। मुझे यही जलन थी। कितने दिनों मेरी यह अवस्था रही, इसका कुछ निश्चय नहीं कर सकता, क्योंकि वहाँ समय का बोध कराने वाली मात्राएँ न थीं; पर मुझे तो ऐसा जान पड़ता था कि इस दशा में पड़े हुए मुझे कई युग बीत गए। रोज़ नई-नई सूरतें आतीं और पुरानी सूरतें लुप्त होती रहती थीं। सहसा एक दिन मैं लुप्त हो गया। कैसे लुप्त हुआ, यह याद नहीं; होश आया, तो मैंने अपने को बालक के रूप में पाया। मैंने राजा हर्षपुर के घर में जन्म लिया था।

इस नए घर में मेरा लालन-पालन होने लगा। ज्यों-ज्यों बढ़ता था, स्मृति पर परदा-सा पड़ता जाता था, पिछली बातें भूलता जाता था, यहाँ तक कि जब बोलने की सामर्थ्य हुई, तो माया अपना काम पूरा कर चुकी थी। बहुत दिनों तक अध्यापकों से पढ़ता रहा। मुझे विज्ञान में विशेष रुचि थी। भारतवर्ष में विज्ञान की कोई अच्छी प्रयोगशाला न होने के कारण मुझे यूरोप जाना पड़ा। वहाँ मैं वैज्ञानिक परीक्षाएँ करता रहा। जितना ही रहस्यों का ज्ञान बढ़ता था, उतना ही ज्ञान-पिपासा भी बढ़ती थी; किन्तु इन परीक्षाओं का फल मुझे लक्ष्य से दूर लिए जाता था। मैंने सोचा था, विज्ञान द्वारा जीव का तत्त्व निकाल लूँगा; पर सात वर्षों तक अनवरत करने पर भी मनोरथ न पूरा हुआ।

एक दिन मैं बर्लिन की प्रधान प्रयोगशाला में बैठा हुआ सोच रहा था कि एक तिब्बती भिक्षु आ निकला। मुझे चिन्तित देखकर वह एक क्षण मेरी ओर ताकता रहा, फिर बोला–बालू से मोती नहीं निकालते, भौतिक ज्ञान से आत्मा का ज्ञान नहीं प्राप्त होता।

मैंने चकित होकर पूछा–आपको मेरे मन की बात कैसे मालूम हुई?

भिक्षु ने हँसकर कहा–आपके मन की इच्छा तो आपके मुख पर लिखी हुई है। जड़ से चेतन का ज्ञान नहीं होता। यह क्रिया ही उल्टी है। उन महात्माओं के पास जाओ, जिन्होंने आत्म-ज्ञान प्राप्त किया है। वही तुम्हें वह मार्ग दिखाएँगे।

मैंने पूछा–ऐसे महात्माओं के दर्शन कहाँ होंगे? मेरा तो अनुमान है कि वह विद्या ही लोप हो गई और उसके जानने का जो दावा करते हैं, वह बने हुए महात्मा हैं।

भिक्षु–यथार्थ कहते हो; लेकिन अब भी खोजने से ऐसे महात्मा मिल जाएँगे। तिब्बत की तपोभूमि में आज भी ऐसी महान् आत्माएँ हैं, जो माया का रहस्य खोल सकती हैं। हाँ, जिज्ञासा को सच्ची लगन चाहिए।

मेरे मन में बात बैठ गई। तिब्बत की चर्चा बहुत दिनों से सुनता आता था। भिक्षु से वहाँ की कितनी ही बातें पूछता रहा। अन्त में उसी के साथ तिब्बत चलने की ठहरी। मेरे मित्रों को यह बात मालूम हुई, तो वे भी मेरे साथ चलने पर तैयार हो गए। हमारी एक समिति बनाई गई, जिसमें दो अंग्रेज़, दो फ्रेंच और तीन जर्मन थे। अपने साथ नाना प्रकार के यन्त्र लेकर हम लोग अपने मिशन पर पहुँचे, विहारों में क्या-क्या दृश्य देखे, इसकी चर्चा करने लगूँ तो कई दिन लग जाएँगे। कई बार तो हम लोग मरते-मरते बचे; लेकिन वहाँ चित्त को जो शान्ति मिली, उसके लिए हम मर भी जाते, तो दुःख न होता। अंग्रेज़ों को तो सफलता न हुई क्योंकि वे तिब्बत की सैनिक स्थिति का निरीक्षण करने आये थे और भिक्षुओं ने उनकी नीयत भाँप ली थी। लेकिन शेष पाँचों मित्रों ने तो पाली और संस्कृत के ऐसे-ऐसे ग्रन्थ-रत्न खोज निकाले कि उन्हें यहाँ से ले जाना कठिन हो गया। जर्मन तो ऐसे प्रसन्न थे, मानों उन्हें कोई प्रदेश हाथ आ गया हो।

शरद् ऋतु थी, जलाशय हिम से ढक गए थे। चारों ओर बर्फ़-ही-बर्फ़ दिखाई देती थी। मेरे मित्र लोग तो पहले ही चले गए थे। अकेला मैं ही रह गया था। एक दिन सन्ध्या समय मैं इधर-उधर विचरता हुआ एक शिला पर जाकर खड़ा हो गया। सामने का यह दृश्य अत्यन्त मनोरम था, मानों स्वर्ग का द्वार खुला हुआ है। उनका बखान करना उसका अपमान करना है। मनुष्य की वाणी में न इतनी शक्ति है, न शब्दों में इतना चित्र्य! इतना ही कह देना काफी है कि दृश्य अलौकिक था, स्वर्गोपम था। विशाल दृश्यों के सामने हम मंत्रमुग्ध से हो जाते हैं, अवाक् होकर ताकते हैं, कुछ कह नहीं सकते। मौन आश्चर्य की दशा में खड़ा ताक ही रहा था कि सहसा मैंने एक वृद्ध पुरुष को सामने की गुफा से निकलकर पर्वत शिखर की ओर जाते देखा। जिन शिलाओं पर कल्पना के भी पाँव डगमगा जाएँ, उन पर इतनी सुगमता से चले जाते थे कि विस्मय होता था। बड़े-बड़े दर्रों को इस भाँति फाँद जाते थे, मानों छोटी-छोटी नालियाँ हैं। मनुष्य की यह शक्ति कि वह, उस हिम से ढके हुए दुर्गम श्रृंग पर इतनी चपलता से चला जाए। और मनुष्य ही वह, जिसके सिर के बाल सन की भाँति सफ़ेद हो गए थे!

मुझे ख्याल आया कि इतना पुरुषार्थ प्राप्त करना किसी सिद्ध ही का काम है। मेरे मन में उनके दर्शन की तीव्र उत्कण्ठा हुई, पर मेरे लिए ऊपर चढ़ना असाध्य था। वह न जाने फिर कब तक उतरें, कब तक वह खड़ा रहना पड़े। उधर अँधेरा बढ़ता जाता था। आखिर मैंने निश्चय किया कि आज चलूँ, कल से रोज़ दिन भर यहीं बैठा रहूँगा। कभी-न-कभी तो दर्शन होंगे ही। मेरा मन कह रहा था कि इन्हीं से तुझे आत्मज्ञान प्राप्त होगा। दूसरे दिन मैं प्रातःकाल मैं वहाँ आकर बैठ गया और सारे दिन शिखर की ओर टकटकी लगाए देखता रहा; पर चिड़िया का पूत भी न दिखाई दिया।

एक महीने तक यही मेरा नित्य का नियम रहा। रात भर विहार में पड़ा रहता; दिन भर शिला पर बैठा रहता; पर महात्माजी न जाने कहाँ ग़ायब हो गए थे। उनकी झलक तक न दिखाई देती थी। मैंने कई बार ऊपर चढ़ने का प्रयत्न किया, पर सौ गज से आगे न जा सका। कील काँटे ठोंकते, शिलाओं पर रास्ता बनाते कई महीने में शिखर पर पहुँचना सम्भव था; पर यह अकेले आदमी का काम न था, अन्य भिक्षुओं से पूछता। तो हँसकर कहते, उनके दर्शन हमें दुर्लभ हैं, तुम्हें क्या होंगे? बरसों में कभी एक बार दिखाई दे जाते हैं। कहाँ रहते हैं, कोई नहीं जानता; किन्तु अधीर न होना। वह यदि तुम्हारी तपस्या से प्रसन्न हो गये तो तुम्हारी मनोकामना पूरी हो जायेगी। यह भी सुनने में आया कि कई भिक्षु उनके दर्शनों की चेष्टा में प्राणों से हाथ धो बैठे हैं। उनमें इतना विद्युत-तेज है कि साधारण मनुष्य उसके सम्मुख खड़ा ही नहीं हो सकता। उनकी नेत्र-ज्योति बिजली की तरह हृत्स्थल में लगती है। जिसने यह आघात सह लिया, उसकी तो कुशल है; जो नहीं सह सकता, वह वहीं खड़ा-खड़ा भस्म हो जाता है। कोई योगी ही उनसे साक्षात् कर सकता है।

यह बातें सुन-सुनकर मेरी भक्ति और भी दृढ़ हो जाती थी। मरूँ या जीऊँ; पर उनके दर्शन अवश्य करूँगा, यह धारणा मन में जम गई। योग की क्रियाएँ तो पहले ही करने लगा था, इसलिए मुझे विश्वास था कि मैं उनके तेज़ का सामना कर सकता हूँ। दिव्य-ज्ञान प्राप्त करने के प्रयत्न में मर जाना भी श्रेय की बात होगी। क्या था? क्या हूँगा? कहाँ जाऊँगा? इन प्रश्नों का उत्तर किसी ने आज तक न दिया और न दे सकते हैं, किसी को बता नहीं सकते। इस महान् उद्योग में मर जाना भी मनुष्य के लिए गौरव की बात है।

एक वर्ष गुज़र गया और महात्माजी के दर्शन न हुए। न जाने कहाँ जाकर अन्तर्ध्यान हो गए। वहाँ से न किसी को पत्र लिख सकता था, न संसार की कुछ ख़बर मिलती थी। कभी-कभी जी ऐसा घबराता था कि चलकर सांसारिक प्राणियों की भाँति जीवन का सुख भोगूँ। इसमें रखा ही क्या है कि मैं क्या था और क्या हूँगा? पहले तो यह निश्चित नहीं कि मुझे यह ज्ञान प्राप्त भी होगा, और हो भी गया तो उससे या संसार का क्या उपकार होगा? बिना इन रहस्यों को जाने भी जीवन को उच्च और पवित्र बनाया जा सकता है। वहाँ की सुरम्यता अजीर्ण हो गई, वह कमनीय प्रकृति छटा आँखों में खटकने लगी। विवश होकर स्वर्ग में भी रहना पड़े तो वह नरकतुल्य हो जाये।

अन्त में एक दिन मैंने निश्चय किया कि अब जो होना हो, सो हो; इस पर्वत श्रृंग पर अवश्य चढ़ूँगा। यह निश्चय करके मैंने चढ़ना शुरू किया; लेकिन दिन गुज़र गया और मैं सौ गज से आने न जा सका। मेरी चढ़ाई उन विज्ञान के खोजियों की-सी थी, जो सभी साधनों से लैस होते हैं। मैं अकेला था; न कोई यन्त्र, न मन्त्र, न रक्षक, न प्रदर्शक; भोजन का भी ठिकाना नहीं, प्राणों पर खेलना था। करता क्या! ज्ञान के मार्ग में यन्त्रों का जिक्र ही क्या! आत्मसमर्पण तो उसकी पहली क्रिया है। जानता था कि मर जाऊँगा; किन्तु पड़े-पड़े मरने से उद्योग करते हुए मरना अच्छा था।

पहली रात मैंने एक चट्टान पर बैठकर काटी। बार-बार झपकियाँ आती थीं; चौंक-चौंक पड़ता था। ज़रा चूका और रसातल पहुँचा। इतनी कुशल थी कि गर्मी के दिन आ गए थे। हिम का गिरना बन्द हो गया; पर जहाँ इतना आराम था, वहाँ पिघली हुई हिमशिलाओं के गिरने से क्षणमात्र में जीवन से हाथ धोने की शंका भी थी। वह भयंकर जन्तुओं की गरज़ और तड़प याद करता हूँ, तो आज भी रोमांच हो जाता है। बार-बार पूर्व दिशा की ओर ताकता था। खैर, किसी तरह रात कटी, सवेरे फिर चला। आज की चढ़ाई इतनी सीधी न थी, फिर भी इतनी सीधी न थी, फिर भी ५० गज से आगे न जा सका। रास्ते में एक दर्रा पड़ गया जिसे पार करना असंभव था। इधर-उधर बहुत निगाहें दौड़ाईं; पर ऐसा कोई उतार न दिखाई दिया, जहाँ से उतर कर दर्रे को पार कर सकता। इधर भी सीधी दीवार थी, उधर भी। संयोग से एक जगह दोनों ओर दो छोटे-छोटे वृक्ष दिखाई दिए।

मेरी जेब में पतली रस्सी का एक टुकड़ा पड़ा हुआ था। अगर किसी तरह इस रसी को दोनों वृक्षों में बाँध सकूँ तो समस्या हल हो जाये, लेकिन उस पर रस्सी को पेड़ में कौन बाँधे? आखिर मैंने रस्सी के एक सिरे में पत्थर का एक भारी टुकड़ा खूब कसकर बाँधा और उसको लंगर की भाँति उस पारवाले वृक्ष पर फेंकने लगा कि किसी डाल में फँस जाये, तो पार हो जाऊँ। बार-बार पूरा जोर लगाकर लंगर फेंकता था; पर लंगर वहाँ तक न पहुँचता था। सारा दिन इसी लंगरबाज़ी में कट गया, रात हो गई। शिलाओं पर सोना जान जोखिम था। इसलिए वह रात मैंने वृक्ष ही पर काटने की ठानी। मैं ऊपर चढ़ गया और दो डालों में रस्सी फँसा-फँसाकर एक छोटी-सी खाट बना ली। आधी रात गुजरी थी कि बड़े ज़ोर का धमाका हुआ। उस अथाह खोह में कई मिनट तक उसकी आवाज़ गूँजती रही। सवेरे देखा तो बर्फ की एक बड़ी शिला ऊपर से पिघलकर गिर पड़ी थी और उस दर्रे पर उसका एक पुल-सा बन गया था। मैं खुशी के मारे फूला न समाया। जो मेरे से कभी न हो सकता था, वह प्रकृति ने अपने आप ही कर दिया। यद्यपि उस पुल पर से दर्रे को पार करना प्राणों से खेलना था। मैंने ईश्वर को स्मरण किया और सँभल-सँभलकर उस हिम राशि पर पाँव रखता हुआ खाईं पार कर गया। इस असाध्य साधना में सफल होने से मेरे मन में यह धारणा होने लगी कि मर नहीं सकता। कोई अज्ञात शक्ति मेरी रक्षा कर रही है। किसी कठिन कार्य में सफल हो जाना आत्मविश्वास के लिए संजीवनी के समान है। मुझे पक्का विश्वास हो गया कि मेरा मनोरथ अवश्य पूरा होगा।

उस पर पहुँचते ही सीधी चट्टान मिली। दर्रे के किनारे और चट्टान में केवल एक बालिश्त, और कहीं-कहीं एक हाथ का अन्तर था। उस पतले रास्ते पर चलना तलवार की धार पर पैर रखना था। चट्टान से चिमट-चिमटकर चलता हुआ, दो तीन घण्टों के बाद मैं एक ऐसे स्थान पर जा पहुँचा, जहाँ चट्टान की तेजी बहुत कम हो गई थे। मैं लेटकर ऊपर को रंगने लगा। सम्भव था, मैं संध्या तक इस तरह रेंगता रहता, पर संयोग से एक समतल शिला मिल गई और उसे देखते ही मुझे ज़ोर की थकान मालूम होने लगती। जानता था कि यहाँ सोकर फिर उठने की नौबत न आएगी, पर ज़रा से लेट लेने के लोभ को मैं किसी तरह संवरण न कर सका। नींद को दूर रखने के लिए एक गीत गाने लगा। लेकिन न जाने कब आँखें झपक गईं।

कह नहीं सकता कि कितनी देर तक सोया, जब नींद खुली और चाहा कि उठूँ, तो ऐसा मालूम हुआ कि ऊपर मानों बोझ रखा हुआ है। सब अंग जकड़े हुए थे। कितना ही ज़ोर मारता था, पर अपनी जगह से हिल न सकता था, चेतना किसी डूबते हुए नक्षत्र की भाँति डूबती जाती थी। समझ गया कि जीवन से इतने दिनों तक का साथ था। पूर्व स्मृतियाँ चेतना की अन्तिम जागृति की भाँति जागृत हो गईं। अपनी मूर्खता पर पछताने लगा। व्यर्थ प्राण खोए। इतना जानने ही से उद्धार न होगा कि पूर्व-जन्म में क्या था। यह ज्ञान रखते हुए भी संसार में एक-से-एक ज्ञानी, एक-से-एक प्रणवीर, एक-से-एक धर्मात्मा हो गए। क्या उनका जीवन सार्थक हुआ? यही सोचते-सोचते न जाने कब मेरी चेतना का अपहरण हो गया। जब मेरी आँखें खुली तो देखा कि एक छोटी-सी कुटी में मृगचर्म पर कम्बल ओढ़े पड़ा हुआ हूँ और एक पुरुष बैठा मेरे मुख की ओर वात्सल्य-दृष्टि से देख रहा है। मैंने इन्हें पहचान लिया। यह वही महात्मा थे, जिनके दर्शन के लिए मैं लालायित था। मुझे आँखें खोलते देखकर वह सदय भाव से मुस्कुराए और बोले–हिम-शैय्या कितनी प्रिय वस्तु है। पुष्प-शैय्या पर तुम्हें कभी इतना सुख मिला था?

मैं उठ बैठा और महात्मा के चरणों पर सिर रखकर बोला–आपके दर्शनों से जीवन सफल हो गया। आपकी दया न होती, तो शायद वहीं मेरा अन्त हो जाता।

महात्मा–अन्त कभी किसी का नहीं होता। जीवन अनन्त है। हाँ, अज्ञानवश हम ऐसा समझ लेते हैं।

मैं–मुझे आपके दर्शनों की बड़ी इच्छा थी। आप में अलौकिक शक्ति है।

महात्मा–इसीलिए ऐसा समझते हो कि तुमने मुझे शिला पर चढ़ते देखा है? यह तो अलौकिक शक्ति नहीं है। यह तो साधारण मनुष्य भी अभ्यास से कर सकता है।

मैं–आपने योग द्वारा ही यह बल प्राप्त किया होगा?

महात्मा–नहीं, मैं योंगी नहीं प्रयोगी हूँ। आपने डार्विन का नाम सुना होगा? पूर्व जन्म में मेरा ही नाम डार्विन था।

मैंने विस्मित होकर कहा–आप ही डार्विन थे?

महात्मा–हाँ, उन दिनों मैं प्राणिशास्त्र का प्रेमी था। अब प्राणशास्त्र का खोजी हूँ।

सहसा मुझे अपनी देह में एक अद्भुत् शक्ति का संचालन होता हुआ मालूम हुआ। नाड़ी की गति तीव्र हो गई, आँखों से ज्योति की रेखाएँ-सी निकलने लगीं। वाणी में ऐसा विकास हुआ, मानो कोई कली खिल गई हो। मैं फुर्ती से उठ बैठा और महात्माजी के चरणों पर झुकने लगा; किन्तु उन्होंने मुझे रोककर कहा–तुम मुझे शिलाओं पर देखकर विस्मित हो गए, पर वह समय आ रहा है, जब आनेवाली जाति जल, स्थल और आकाश में समान रीति से चल सकेगी। यह मेरा विश्वास है। पृथ्वी का क्षेत्र उन्हें छोटा मालूम होगा। वह पृथ्वी से अन्य पिण्डों में उतनी ही सुगमता से आ-जा सकेंगे, जैसे एक देश से दूसरे देश में।

मैं–आपको अपने पूर्व जन्म का ज्ञान योग द्वारा ही हुआ होगा?

महात्मा–नहीं, मैं पहले ही कह चुका हूँ कि मैं योगी नहीं, प्रयोगी हूँ। तुमने तो विज्ञान पढ़ा है, क्या तुम्हें मालूम नहीं कि सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड विद्युत का अपार सागर है। जब हम विज्ञान द्वारा मन के गुप्त रहस्य जान सकते हैं, तो क्या अपने पूर्व-संस्कार न जान सकेंगे? केवल स्मृति को जगा देने से ही पूर्व जन्म का ज्ञान हो जाता है।

मैं–मुझे भी वह ज्ञान प्राप्त हो सकता है?

महात्मा–मुझे हो सकता है, तो आपको क्यों न हो सकेगा! अभी तो आप थके हुए हैं। कुछ भोजन करके स्वस्थ हो जाइए, तो मैं आपको अपनी प्रयोगशाला की सैर कराऊँ।

मैं–क्या आपकी प्रयोगशाला भी यहीं है?

महात्मा–हाँ, इसी कमरे से मिली हुई है। आप क्या भोजन करना चाहते हैं?

मैं–उसके लिए आप कोई चिन्ता न करें। आपकी जूठन मैं भी खा लूँगा।

महात्मा–(हँसकर) अभी नहीं खा सकते। अभी तुम्हारी पाचन-शक्ति इतनी बलवान नहीं है। तुम जिन पदार्थों को खाद्य समझते हो, उन्हें मैंने बरसों से नहीं खाया। मेरे लिए उदर को स्थूल वस्तुओं से भरना वैसा ही अवैज्ञानिक है, जैसे इस वायुयान के दिनों में बैलगाड़ी पर चलना। भोजन का उद्देश्य केवल संचालन शक्ति को उत्पन्न करना है। जब वह शक्ति हमें भोजन करने के लिए अपेक्षा कहीं आसानी से मिल सकती है, तो उदर को क्यों अनावश्यक वस्तुओं में भरें? वास्तव में आनेवाली जाति उदरविहीन होगी।

यह कहकर उन्होंने मुझे थोड़े से फल खिलाए, जिनका स्वाद आज तक याद करता हूँ। भोजन करते ही मेरी आँखें खुल-सी गईं। ऐसे फल न जाने किस बाग़ में पैदा होते होंगे। यहाँ की विद्युत्मय वायु ने पहले ही आश्चर्यजनक स्फूर्ति उत्पन्न कर दी थी। यह भोजन करके तो मुझे ऐसा मालूम होने लगा कि मैं आकाश में उड़ सकता हूँ। वह चढ़ाई, जिसे मैं असाध्य समझ रहा था, अब तुच्छ मालूम होती है।

अब महात्माजी मुझे अपनी प्रयोगशाला की सैर कराने चले। यह एक विशाल गुफा थी, जिसके विस्तार का अनुमान करना कठिन था। उसकी चौड़ाई ५०० हाथ से कम रही होगी। लम्बाई उसकी चौगुनी थी। ऊँची इतनी कि हमारे ऊँचे-ऊँचे मीनार भी उसके पेट में समा सकते थे। बौद्ध मूर्तिकार की अद्भुत् चित्रकला यहाँ भी विद्यमान थी। यह पुराने समय का कोई विहार था। महात्माजी ने उसे प्रयोगशाला बना लिया था।

प्रयोगशाला में कदम रखते ही मैं एक दूसरी ही दुनिया में पहुँच गया। जेनेवा नगर आँखों के सामने था और एक भवन में राष्ट्रों के मंत्री बैठे हुए किसी राजनीतिक विषय पर बहस कर रहे थे। उनकी आँखों के इशारे, ओठों का हिलना और हाथों का उठना साफ़ दिखाई देता था। उनके मुख से निकला हुआ एक-एक शब्द साफ़-साफ़ कानों में आता था। एक क्षण के लिए मैं धोखे में आ गया कि जेनेवा ही में बैठा हूँ। ज़रा और आगे बढ़ा तो संगीत की ध्वनि कानों में आयी। मैंने यूरोप में यह आवाज सुनी थी। पहचान गया, पड्रोस्की की आवाज थी। मेरे आश्चर्य की सीमा न थी। जिन आविष्कारों का बड़े-बड़े विद्वानों को अभ्यास मात्र था, वे सब यहाँ अपने समुन्नत, पूर्ण रूप से दिखाई दे रहे थे। इसे निर्जन स्थान में, आबादी से कोसों दूर, इतनी ऊँचाई पर कैसे इन प्रयोगों में सफलता हुई, ईश्वर ही जान सकते है। महात्मा लोग तो योग की क्रियाओं ही में कुशल होते हैं। अध्यात्म उनका क्षेत्र है। विज्ञान पर उन्होंने कैसे आधिपत्य जमाया।

महात्माजी मेरी ओर देखकर मुस्कुराएँ और बोले– विज्ञान अन्तःकरण को भी गुप्त नहीं छोड़ता। तुम्हं इन बातों से आश्चर्य होता है। पर यथार्थ यह है कि विज्ञान ने योग को बहुत सरल कर दिया है। वह बहिर्जगत् से अब धीरे-धीरे अन्तर्जगत् में प्रवेश कर रहा है। मनोयोग की जटिल क्रियाओं द्वारा जो सिद्धि वर्षों में प्राप्त होती थी, वह अब क्षणों में हो जाती है। कदाचित् वह समय दूर नहीं कि हम विज्ञान द्वार मोक्ष भी प्राप्त कर सकेंगे।

मैंने पूछा–क्या पूर्व समय का ज्ञान भी किसी प्रयोग द्वारा हो सकता है?

महात्मा–हो सकता है है; लेकिन उससे किसी उपकार की आशा नहीं। विज्ञान अगर प्राणियों का उपकार न करे, तो उसका मिट जाना ही अच्छा। केवल जिज्ञासा को शान्त करने, विलास में योग देने या यथार्थ की सहायता करने के लिए प्रयोग करना उसका दुरुप्रयोग करना है। मैं चाहूँ तो अभी एक क्षण में यूरोप के बड़े-से-बड़े नगर को नष्ट-भ्रष्ट कर दूँ, लेकिन विज्ञान प्राणरक्षा के लिए है, वध करने के लिए नहीं।

मुझे निराशा तो हुई, पर आग्रह न कर सका। शाम तक प्रयोगशाला के यन्त्रों को देखता रहा। किन्तु उनमें अब मन न लगता था। यही धुन सवार थी कि क्योंकर यह दुस्तर कार्य सिद्ध करूँ। आखिर उन्हें किसी तरह पसीजते न देखकर मैंने उसी हिकमत से काम लिया, जो निरुपायों का आधार है। बोला–भगवन्, आपने वह सब कर दिखाया; जिसका संसार के विज्ञानवेत्ता अभी केवल स्वप्न देख रहे हैं।

महात्माजी पर इन शब्दों का वही असर पड़ा, जो मैं चाहता था। यद्यपि मैंने यथार्थ ही कहा था, लेकिन कभी-कभी यथार्थ भी खुशामद का काम कर जाता है। प्रसन्न होकर बोले–मैं गर्व तो नहीं करता; पर ऐसी प्रयोगशाला संसार में दूसरी नहीं है।

मैं–यूरोपवालों को ख़बर मिल जाए तो आपको आराम से बैठना मुश्किल हो जाये।

महात्मा–मैंने कितनी ही नई-नई बातें खोज निकालीं, पर उनका गौरव आज दूसरों को प्राप्त है। लेकिन इसकी क्या चिंता! मैं विज्ञान का उपासक हूँ, अपनी ख्याति और गौरव का नहीं।

मैं–आपने इस देश का मुख उज्जवल कर दिया।

महात्मा–मेरा यान आकाश में जितनी ऊँचाई तक पहुँच सकता है, उसकी यूरोपवाले कल्पना भी नहीं कर सकते। मुझे विश्वास है कि शीघ्र ही मेरी चन्द्रलोक की यात्रा सफल होगी। यूरोप के वैज्ञानिकों की तैयारियाँ देख-देखकर मुझे हँसी आती है। जब तक हमको वहाँ की प्राकृतिक स्थिति का ज्ञान न हो, हमारी यात्रा सफल नहीं हो सकती। सबसे पहले विचारधाराओं को वहाँ ले जाना होगा। विद्वान् लोग भी कभी-कभी बालकों की-सी कल्पनाएँ करने लगते हैं।

मैं–वह दिन हमारे लिए सौभाग्य और गर्व का होगा।

महात्मा–प्राचीन काल में ऋषिगण योग-बल से त्रिकाल-दृष्टि प्राप्त किया करते थे। पर उसमें बहुध भ्रम हो जाता था। उसकी सहायता का कोई प्रत्यक्ष प्रमाण न होता था। मैंने वैज्ञानिक परीक्षाओं से उस कार्य को सिद्ध किया है। प्रण तो मैंने यही किया था कि किसी को यह रहस्य न बताऊँगा, लेकिन तुम्हारी तपस्या देखकर दया आ रही है! मेरे साथ आओ।

मैं महात्माजी के पीछे-पीछे एक ऐसी गुफा में पहुँचा, जहाँ केवल एक छोटी-सी चौकी रखी हुई थी। महात्माजी ने गम्भीर मुख से कहा–तुम्हें यह बात गुप्त रखनी होगी।

मैंने कहा–जैसी आज्ञा।

महात्मा–तुम इसका वचन देते हो?

मैं–आप इसकी किंचित्मात्र भी चिन्ता न करें।

महात्मा–अगर किसी यश और धन के इच्छुक को यह खबर मिल गई, तो वह संसार में एक महान् क्रांति उपस्थित कर देगा और कदाचित् मुझे प्राणों से हाथ धोना पड़े। मैं मर जाऊँगा, किन्तु इस गुप्त ज्ञान का प्रचार न करूँगा। तुम इस चौकी पर लेट जाओ और आँखें बन्द कर लो।

चौकी पर लेटते ही मेरी आँखें झपक गईं और पूर्व जन्म का दृश्य आँखों के सामने आ गए। हाँ प्रिये, मेरी अतीत जीवित हो गया। यही भवन था; यही माता-पिता थे; जिनकी तस्वीर दीवानखाने में लगी हुई है। मैं लड़कों के साथ बाग़ में गेंद खेल रहा था। फिर दूसरा दृश्य सामने आया। मैं गुरु की सेवा में बैठा हुआ पढ़ रहा था। यही वह गुरुजी थे, जिनकी तस्वीर तुम्हारे कमरे में है, एक तिल का भी अन्तर नहीं है। इसके बाद युवावस्था का दृश्य आया। मैं तुम्हारे साथ एक नौका पर बैठा हुआ नदी में जल-क्रीड़ा कर रहा था। यह है वह दृश्य, जब हवा वेग से चलने लगी थी और तुम डरकर मेरे हृदय से चिपक गई थीं।

देवप्रिया–खूब याद है, प्राणेश! खूब याद है।

राजकुमार–वह दृश्य याद है, जब मैं लता-कुंज में घास पर बैठा हुआ तुम्हें पुष्पाभूषणों से अलंकृत कर रहा था?

देवप्रिया–हाँ प्राणनाथ, खूब याद है। यही तो स्थान है।

राजकुमार–पाँचवाँ दृश्य वह था, जब मैं मृत्यु शैय्या पर पड़ा हुआ था। माता-पिता सिरहाने खड़े थे और तुम मेरे पैरों पर सिर रखे रो रही थीं। याद है?

देवप्रिया–हाय प्राणनाथ! वह दिन भूल सकती हूँ?

राजकुमार–एक क्षण में मेरी आँखें खुल गईं। पर जो कुछ देखा था, वह सब आँखों में फिर रहा था, मानों बचपन की बातें हों। मैंने महात्मा से पूछा–मेरे माता-पिता जीवित हैं? उन्होंने एक क्षण आँखें बन्द करके सोचने के बाद कहा–उनका देहावसान हो गया है। तुम्हारे शोक में दोनों घुल-घुलकर मर गए।

मैं–और मेरी स्त्री?

महात्मा–वह अभी जीवित है।

मैं–किस नगर में है?

महात्मा–काशी के समीप जगदीशपुर में। किन्तु तुम्हारा वहाँ जाना उचित नहीं, यह ईश्वरीय इच्छा के विरुद्ध होगा और संस्कारों के क्रम को पलटना अनिष्ट का मूल है।

मैंने उस समय तो कुछ न कहा, पर उसी क्षण तुमसे मिलने का दृढ़ संकल्प कर लिया। मुझे अब वहाँ एक-एक क्षण एक-एक युग हो गया। दो दिन तो मैं किसी तरह रहा, तीसरे दिन मैंने महात्माजी से विदा लेकर प्रस्थान कर दिया। महात्माजी बड़े प्रेम से मुझसे गले मिले और चलते-चलते ऐसी क्रिया बतलायी, जिसके द्वारा हम अपनी आयु और बल को इच्छानुसार बढ़ा सकते हैं। तब मुझे गले से लगाकर एक यान पर बैठा दिया। यान मुझे हरिद्वार पहुँचाकर आप-ही-आप लौट गया। यह उनके यानों की विशेषता है। हरिद्वार में मैं सीधा हर्षपुर पहुँचा और एक सप्ताह तक माता-पिता की सेवा में रहकर यहाँ आ पहुँचा। तुमसे मिलने के पहले मैं कई बार इधर निकला। यहाँ की हर एक वस्तु मेरी जानी-पहचानी मालूम होती थी। दो-चार पुराने दोस्त भी दिखलाई दिए; पर उनसे मैं बोला नहीं। एक दिन जगदीशपुर की सैर भी कर आया। ऐसा मालूम होता था कि मेरी बाल्यावस्था वहीं गुज़री हो। तुमसे मिलने के पहले कई दिन गहरी चिन्ता में पड़ा रहा। एक विचित्न शंका होती थी। अकस्मात् तुमसे पार्क में मुलाकात हो गई। कह नहीं सकता, तुम्हें देखकर मेरे चित्त की क्या दशा हुई। ऐसा जी चाहता था, दौड़कर हृदय से लगा लूँ। महात्मा के अन्तिम शब्द भूल गए और वहाँ तुमसे मिल गया।

देवप्रिया ने रोते हुए कहा–प्राणनाथ, आपके दर्शन पाते ही मेरा हृदय गद्गद हो गया। ऐसा मालूम हुआ, मानों आपसे मेरा पुराना परिचय है, मानो मैं ने आपको कहीं देखा है। आपने एक दृष्टि से मेरे मन के उन भावों को जागृत कर दिया जिन्हें मेरी विलासिता ने कुचल-कुचलकर शिथिल कर दिया था। स्वामी! मैं आपके चरणों को स्पर्श करने योग्य नहीं हूँ; लेकिन जबतक जीऊँगी, तब तक आपकी स्मृति को हृदय से संचित रखूँगी।

राजकुमार–प्रिये, तुम्हें मालूम है, विवाह का सम्बन्ध देह से नहीं, आत्मा से है। क्या आत्मा अनंत और अमर नहीं?

देवप्रिया ने इसका कोई उत्तर न दिया। प्रश्नसूचक नेत्रों से राजकुमार की ओर ताकने लगी।

राजकुमार–तो अब तुम्हें मेरे साथ चलने में कोई आपत्ति नहीं है?

देवप्रिया ने रुँधे हुए कण्ठ से कहा–प्राणनाथ, आप मुझसे यह प्रश्न क्यों करते हैं? आप मेरा उद्धार कर रहे हैं, आपको छोड़कर और किसकी शरण जाऊँगी? अब तो मुझे आप मार-मारकर भी भगाएँ, तो आपका दामन न छोड़ूँगी, आह स्वामी! यह शुभ अवसर जीते-जी मिलेगा, इसकी तो स्वप्न में भी आशा न थी। मेरा सौभाग्य-सूर्य इतने दिनों के बाद फिर उदय होगा, यह तो कदाचित् मेरे देवताओं को भी मालूम न होगा। न जाने किसके पुण्य प्रताप से मुझे यह दिन देखना नसीब हुआ है। कौन स्त्री इतनी सौभाग्यवती हुई है? आपको पाकर मैं सब कुछ पा गई। अब मुझे किसी बात की अभिलाषा नहीं रही। आपकी चेली हूँ–वही चेली, जो एक बार आपके ऊपर अपना सर्वस्व अर्पण कर चुकी है।

राजकुमार ने रानी को कण्ठ से लगाकर कहा–यह हमारा पुर्नसंयोग है!

देवप्रिया–नहीं प्राणनाथ, मैं इसे प्रेम-मिलन समझती हूँ।

यह कहते-कहते रानी चुप हो गई। उसे याद आ गया कि मुझ जैसी वृद्धा ऐसे देवरूप पुरुष के योग्य नहीं है। अभी दया के वशीभूत होकर यह मेरा उद्धार कर देंगे, पर दया कब तक प्रेम का पार्ट खेलेगी? सम्भव है, इनकी दया–दृष्टि मुझ पर सदैव बनी रहे, लेकिन मैं रनिवास की युवतियों को कौन मुँह दिखाऊँगी, जनता के सामने कैसे निकलूँगी? उस दशा में तो दया मेरी रक्षा न कर सकेगी। वह अवस्था तो असह्य हो जाएगी।

राजकुमार ने उसके मनोभवों को ताड़कर कहा–प्रिये, तुम्हारे मन में शंकाओं का उठना स्वाभाविक है, लेकिन उन्हें निकाल डालो। मैं विलास का दास होता, तो तुम्हारे पास आता ही नहीं! मेरे चित्त की वृत्ति वासना की ओर नहीं है। मैं रूप-सौन्दर्य का मूल्य जानता हूँ और उनका मुझ पर कोई आकर्षण नहीं हो सकता। मेरे लिए तो तुम इस रूप में भी उतनी ही प्रिय हो। हाँ, तुम्हारे संतोष के लिए मुझे वह क्रियाएँ करनी पड़ेंगी, जो महात्माजी ने चलते-चलते बताई थीं, जिसके द्वारा मैंने मायान्धकार पर विजय पायी, उसके द्वार काल की गति को भी पलट सकूँगा। मुझे विश्वास है कि मुर्झाया हुआ फूल एक बार फिर हरा हो जाएगा–वही छवि, वही सौरभ, वही कोमलता फिर इसकी बलाएँ लेंगी। लेकिन तुम्हें भी मेरे लिए बड़े-बड़े त्याग करने पडेंगे। संभव है, तुम्हें राजभवन के बदले किसी वन में वृक्षों के नीचे रहना पड़े, रत्न-जड़ित आभूषणों के बदले वन्य पुष्पों पर ही संतोष करना पड़े। क्या तुम उन कष्टों को सह सकोगी?

देवप्रिया–आपको पाकर अब मुझे किसी भी वस्तु की इच्छा नहीं रही। विलास सच्चे सुख की छाया मात्र है। जिसे सच्चा सुख मयस्सर हो, वह विलास की तृष्णा क्यों करें?

रानी मुँह से तो ये बातें कह रहीं थीं, किन्तु इस विचार से उनका चित्त प्रफुल्लित हो रहा था कि मेरा यौवन-पुष्प फिर खिलेगा, और सौन्दर्य-दीपक फिर जलेगा।

राजकुमार–तो अब मैं जाता हूँ। कल संध्या समय फिर आऊँगा। इसी बीच में तुम यात्रा की तैयारी कर लेना।

देवप्रिया ने राजकुमार का हाथ पकड़कर कहा–मैं आपके साथ चलूँगी! मुझे न जाने कैसी शंकाएँ हो रही हैं। मैं अब एक क्षण के लिए भी आपको न छोडूँगी।

राजकुमार–यों चलने से लोगों के प्रति भाँति-भाँति की शंकाएँ होंगी। मेरे पुनर्जन्म का किसी को विश्वास न आएगा; समझेंगे कि ऐब को छिपाने के लिए यह कथा गढ़ ली गई है, केवल कुत्सित प्रेम को छिपाने के लिए कौशल किया गया है। इसलिए तुम किसी तीर्थयात्रा...

रानी ने बात काटकर कहा–मुझे अब लोकनिन्दा का भय नहीं है। मैं यह कहने को तैयार हूँ कि अपने प्राणपति के साथ जा रही हूँ।

राजकुमार ने मुस्कुराकर कहा–अगर मैं तुमसे दग़ा करूँ तो?

रानी ने भयातुर होकर कहा–प्राणनाथ, ऐसी बातें न करो। मैं अपने को तुम्हारे चरणों पर अर्पण कर चुकी, लेकिन कुसंस्कारों से मुक्त नहीं हूँ। यदि कोई आदमी अभी आकर मुझसे कहे कि इन्द्रजाल का खेल कर रहे हैं, तो मैं नहीं कह सकती कि मेरी क्या दशा होगी। अलौकिक बातों को समझने के लिए अलौकिक बुद्धि चाहिए और मैं इससे वंचित हूँ। तवे हनर्षपठ भाव से अपने मन की दुर्बलताएँ प्रकट कर रही हूँ। मुझे क्षमा कीजिएगा। अभी बहुत दिन गुज़रेंगे, जब मैं इस स्वप्न को यथार्थ समझूँगी। उस स्वप्न को भंग न कीजिए। इस वक़्त यहीं आराम कीजिए, रात बहुत बीत गई है। मैं तब तक कुँवर विशालसिंह को सूचना दे दूँ कि वह आकर अपना राज्य सँभाले। कल मैं प्रातःकाल आपके साथ चलने को तैयार हो जाऊँगी।

यह कहकर रानी ने राजकुमार के लिए भोजन लाने की आज्ञा दी। जब वह भोजन करने लगे, तो आप ही खड़ी होकर उन्हें पंखा झलने लगी। ऐसा स्वर्गीय आनन्द उसे कभी प्राप्त न हुआ था। उसके मर्मस्थल में प्रेम और उल्लास की तरंगे उठ रही थीं, जी चाहता था कि इसी क्षण इनके चरणों पर गिरकर प्राण त्याग दूँ।

कुँवर साहब लेटने गए, तो रानी ने विशालसिंह के नाम पर पत्रा लिखा–

‘कुँवर विशालसिंहजी, इतने दिनों तक मायाजाल में फँसे रहने के बाद अब मेरा चित्त संसार से विरक्त हो गया है। मैं तीर्थयात्रा करने जा रही हूँ और शायद फिर न लौटूँगी। किसी तीर्थस्थान में ही अपने जीवन के शेष दिन काटूँगी। आपको उचित है कि आकर अपने राज्य का भार सँभालें। मुझे खेद है कि मेरे कारण आपको बड़े-बड़े कष्ट भोगने पड़े। आपने मेरे साथ जो अनीति की, उसे भी मैं क्षमा करती हूँ। मायान्ध होकर हम सभी ऐसा करते हैं। मेरी आपसे इतनी ही प्रार्थना है कि मेरी लौंडियों और सेवकों पर दया कीजिएगा। मैं अपने साथ कोई चीज़ नहीं ले जा रही हूँ। मेरी ईश्वर से यही प्रार्थना है कि वह आपको सद्बुद्धि दे और आपकी कीर्ति देश-देशान्तरों में फैलाएं! मैं आपको विश्वास दिलाती हूँ कि मेरे इससे बढ़कर आनन्द की और कोई बात न होगी।

आपकी–देवप्रिया’

यह पत्र लिखकर रानी ने मेज़ पर रखा ही था कि उन्हें ख्याल आया, मैं अपना राज्य क्यों छोडूँ? मैं हर्षपुर से भी तो इसकी देखभाल कर सकती हूँ। साल में महीने, दो महीने के लिए यहाँ आना कौन मुश्किल है? चलकर प्राणनाथ से पूछूँ, उन्हें इसमें कोई आपत्ति तो न होगी! वह राजकुमार के कमरे के द्वार तक गयी, पर अन्दर कदम न रख सकीं। ख्याल आया, समझेंगे अभी तक इसकी तृष्णा बनी हुई है। उल्टे पाँव लौट आयीं।

रात के दो बज गए थे। देवप्रिया यात्रा की तैयारियाँ कर रही थी। उसके मन में प्रश्न हो रहा था, कौन-सी चीज़ें साथ ले ऊँ? पहले वह अपने वस्त्रागार में गयी। शीशे की अलमारियों में एक-से-एक अपूर्ण वस्त्र चुने हुए थे। इस समूह में से उसने खोजकर अपनी सुहाग की साड़ी निकाल ली, जिसे पहने आज २४ वर्ष हो गए। आज उसकी शोभा और सभी साड़ियों में बढ़ी हुई थी। उसके सामने सभी कपड़े फीके लगते थे।

फिर वह अपने आभूषणों की कोठरी में गयी। इन आभूषणों पर वह जान जेती थी। ये उसे अपने से भी प्रिय थे। लेकिन इस समय इनको छूते हुए उसे ऐसा भय हो रहा था, मानो चोरी कर रही है। उसने बहुत साहस करके रत्नों का वह सन्दूकचा निकाला, जिस पर इन २४ वर्षों में उसने लाखों रुपये खर्च किए थे और उसे अंचल में छिपाए हुए बाहर निकली। इस लोभ को वह संवरण न कर सकी।

वह अपने कमरे में आकर बैठी ही थी कि गुजराती आकर खड़ी हो गई। देवप्रिय ने पूछा–सोयी नहीं?

गुजराती–सरकार नहीं सोयीं, तो मैं कैसे सोती?

‘मैं तो कल तीर्थयात्रा करने जा रही हूँ।’

‘मुझे भी साथ ले चलिएगा?’

‘नहीं, मैं अकेली जाऊँगी।’

‘सरकार, लौटेंगी कब तक?’

‘कह नहीं सकती। बहुत दिन लगेंगे। बता, तुझे क्या उपहार दूँ?’

‘मैं तो एक बार माँग चुकी। लूँगी, तो वही लूँगी।’

‘मैं तुझे नौलखा हार दूँगी।’

‘उसकी मुझे इच्छा नहीं?’

‘जड़ाऊँ कंगन लेगी?’

‘जी नहीं! ’

‘वह रत्न लेगी, जो बड़ी-बड़ी रानियों को भी मयस्सर नहीं?’

‘जी नहीं, वह आप की को शोभा देगा।’

‘पागल है क्या! एक रत्न के दाम एक लाख से कम न होंगे! ’

‘आप ही को मुबारक हो! ’

रानी ने रत्नों का सन्दूकचा खोलकर गुजराती के सामने रख दिया और बोली–इनमें से जो चाहे, निकाल ले।

गुजराती ने सन्दूकचा बन्द करके कहा–मुझे इनमें से कोई न चाहिए।

रानी ने एक क्षण सोचने के बाद कहा–अच्छा, जा वही मूर्ति ले ले।

‘आप खुशी से दे रही हैं ना?’

‘हाँ, खुशी से! ’

‘भगवान आपका भला करें।’

यह कहकर गुजराती खुश-खुश वहाँ से चली गयी। थोड़ी ही देर के बाद रानी भी रत्नों का सन्दूकचा लिए हुए उठीं और तोशखाने में जाकर उसे उस स्थान पर रख दिया, जहाँ से निकाला था। उनका मन एक क्षण के लिए चंचल हो गया लेकिन उसे धिक्कारती हुई वह जल्दी से अपने कमरे में चली आयीं।

सहसा कोयल की कूक सुनाई दी। रानी ने चौंककर द्वार का परदा हटा दिया। ऊषा की स्निग्ध, मधुर, संगीतमय आभा किवाड़ों के शीशे द्वारा कमरे में प्रवेश कर रही थी मानो किसी नवयौवना के हृदय में प्रेम का उदय हो रहा हो। उसी नवयौवन की भाँति देवप्रिया उस अरुण छटा को देखकर सशंक हो उठी। उसी समय राजकुमार द्वार पर आकर खड़े हो गए।

रानी ने कहा–मैं तैयार हूँ।’

राजकुमार–और मेरा जी चाहता है कि यहीं तुम्हारी उपासना में अपना जीवन व्यतीत करूँ। मुझे अपने उद्देश्य में जितनी सफलता हुई, उतनी मुझे आशा न थी। इस देश के सिवा ऐसी देवियाँ और कहाँ, जो इस भाँति अपने को आदर्श पर बलिदान कर दें?

आधे घंटे के बाद राजकुमार भी सन्ध्योपासना करके निकले। मोटर तैयार थी। दोनों आदमी उस पर आ बैठे। जब मोटर चली, तब रानी ने उस भवन को करुण नेत्रों से देखा और एक ठण्डी साँस ली। उसके हृदय की वही दशा हो रही थी, जो किसी नव-वधू की पति के जाते समय होती है। शोक और हर्ष, आशा और दुराशास ममत्व और विराग का एक विचित्र समावेश हो गया था।

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शोध एवं शोध-पत्रों के लिए अकादमिक संदर्भ

Premchand, Munshi. "कायाकल्प." *Munshi Premchand Digital Archive*, 1926, https://munshipremchand.com/works/novels/kayakalp. Accessed 22 Sep. 2026.