Cover Image for Kayakalp (कायाकल्प) by Munshi Premchand - Novel
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उपन्यास•1926•57 अध्याय•17h 56m

कायाकल्प

Kayakalp

प्रेमचंद का उपन्यास 'कायाकल्प' सामाजिक और राजनीतिक संघर्ष, हिंदू-मुस्लिम संबंधों, प्रेम, सत्ता, पुनर्जन्म और नैतिक परिवर्तन के प्रश्नों को एक साथ प्रस्तुत करता है।

पात्र:चक्रधर, मनोरमा, अहिल्या, राजा विशालसिंह, देवप्रिया, शंखधर, यशोदानंदन, ख्वाजा महमूद, मुंशी वज्रधर, लोंगी
सेटिंग:20वीं सदी के प्रारंभ में उत्तर भारत, विशेष रूप से आगरा और जगदीशपुर का रियासती राज्य

अध्याय 3 / 57

9 मिनट पठन • 1,225 शब्द

अध्याय 3: कायाकल्प

कई महीने बीत गए। चक्रधर महीने के अन्त में रुपये लाते और माता के हाथ पर रख देते। अपने लिए उन्हें रुपये की कोई ज़रूरत न थी। दो मोटे कुरतों पर साल काट देते थे। हाँ, पुस्तकों से उन्हें रुचि थी; पर इसके लिए कॉलेज का पुस्तकालय खुला हुआ था, सेवा-कार्य के लिए चन्दों से रुपये आ जाते थे। मुंशी वज्रधर का मुँह भी कुछ सीधा हो गया। डरे की इससे ज़्यादा दबाऊँ तो शायद यह भी हाथ से जाय। समझ गए कि जब तक विवाह की बेड़ी पाँव में न पड़ेगी, यह महाशय काबू में न आएँगे। वह बेड़ी बनवाने का विचार करने लगे।

मनोरमा की उम्र अभी तेरह वर्ष से अधिक न थी; लेकिन चक्रधर को उसे पढ़ाते हुए झेंप होती थी। वह यही प्रयत्न करते थे कि ठाकुर साहब की उपस्थिति में ही उसे पढ़ाएँ। यदि कभी ठाकुर साहब कहीं चले जाते, तो चक्रधर को महान संकट का सामना करना पड़ता था।

एक दिन चक्रधर इसी संकट में जा फँसे। ठाकुर साहब कहीं गए हुए थे। चक्रधर कुर्सी पर बैठे; पर मनोरमा की ओर न ताककर द्वार की ओर ताक रहे थे, मानो वहाँ बैठते डरते हों। मनोरमा वाल्मीकीय रामायण पढ़ रही थी। उसने दो-तीन बार चक्रधर की ओर ताका, पर उन्हें द्वार की ओर ताकते देखकर फिर किताब देखने लगी। उसके मन में सीता वनवास पर एक शंका हुई थी और वह इसका समाधान करना चाहती थी। चक्रधर ने द्वार की ओर ताकते हुए पूछा–चुप क्यों बैठी हो, आज का पाठ क्यों नहीं पढ़तीं?

मनोरमा–मैं आपसे एक बात पूछना चाहती हूं, आज्ञा हो तो पूछूँ?

चक्रधर ने कातर भाव से कहा–क्या बात है?

मनोरमा–रामचन्द्र ने सीताजी को घर से निकाला, तो वह चली क्यों गयीं?

चक्रधर–और क्या करतीं?

मनोरमा–वह जाने से इनकार कर सकती थीं। एक तो राज्य पर उनका अधिकार भी रामचन्द्र ही के समान था, दूसरे वह निर्दोष थीं। अगर वह यह अन्याय न स्वीकार करतीं, तो क्या उन पर कोई आपत्ति हो सकती थी?

चक्रधर–हमारे यहाँ पुरुषों की आज्ञा मानना स्त्रियों का परम धर्म माना गया है। यदि सीताजी पति की आज्ञा न मानतीं, तो वह भारतीय सती के आदर्श से गिर जातीं।

मनोरमा–यह तो मैं जानती हूँ कि स्त्री को पुरुष की आज्ञा माननी चाहिए। लेकिन क्या सभी दशाओं में? जब राजा से साधारण प्रजा न्याय का दावा कर सकती है, तो क्या उसकी स्त्री नहीं कर सकती? जब रामचन्द्र ने सीता की परीक्षा ले ली थी और अन्तःकरण से उन्हें पवित्र समझते थे, तो केवल झूठी निन्दा से बचने के लिए उन्हें घर से निकाल देना कहाँ का न्याय था?

चक्रधर–राजधर्म का आदर्श पालन करना था।

मनोरमा–तो क्या दोनों प्राणी जानते थे कि हम संसार के लिए आदर्श खड़ा कर रहे हैं? इससे तो यह सिद्ध होता है कि वे कोई अभिनय कर रहे थे। अगर आदर्श भी मान लें, तो यह ऐसा आदर्श है, जो सत्य की हत्या करके पाला गया है। यह आदर्श नहीं है, चरित्र की दुर्बलता है। मैं आपसे पूछती हूँ, आप रामचन्द्र की जगह होते, तो क्या आप भी सीता को घर से निकाल देते?

चक्रधर बड़े असमंजस में पड़ गए। उनके मन में स्वयं भी यही शंका और लगभग इसी उम्र में हुई थी; पर वह इसका समाधान न कर सके थे। अब साफ़-साफ़ जवाब देने की ज़रूरत पड़ी, तो बगलें झाँकने लगे।

मनोरमा ने उन्हें चुप देखकर फिर पूछा–क्या आप भी उन्हें घर से निकाल देते?

चक्रधर–नहीं, मैं तो शायद न निकालता।

मनोरमा–आप निन्दा की ज़रा भी परवाह न करते?

चक्रधर–नहीं, मैं झूठी निन्दा की परवाह न करता।

मनोरमा की आँखें खुशी से चमक उठीं, प्रफुल्लित होकर बोली–यही बात मेरे भी मन में थी। मैं दादाजी से, भाईजी से, पण्डितजी से, लौंगी अम्मा से, भाभी से, यही शंका की, पर सब लोग यही कहते थे कि रामचन्द्र तो भगवान् हैं, उनके विषय में कोई शंका हो ही नहीं सकती। आपने आज मेरे मन की बात कही। मैं जानती थी कि आप यही जवाब देंगे। इसीलिए मैंने आपसे पूछा था। अब मैं उन लोगों को खूब आडे़ हाथों लूँगी।

उस दिन से मनोरमा को चक्रधर से कुछ स्नेह हो गया। पढ़ने-लिखने से उसे विशेष रुचि हो गई। चक्रधर उसे जो काम करने को दे जाते, वह उसे अवश्य पूरा करती। पहले की भाँति अब हीले-हवाले न करती। जब उनके आने का समय होता, तो पहले से ही आकर बैठ जाती और उनका इन्तज़ार करती। अब उसे उनसे अपने मन के भाव प्रकट करते हुए संकोच न होता। वह जानती थी कि कम-से-कम यहाँ उनका निरादर न होगा, उसकी हँसी न उड़ाई जाएगी।

ठाकुर हरिसेवक सिंह की आदत थी कि पहले दो-चार महीने तक तो नौकरों को वेतन ठीक समय पर दे देते; पर ज्यों-ज्यों नौकर पुराना होता जाता था, उन्हें उसके वेतन की याद भूलती जाती थी। उनके यहाँ कई नौकर ऐसे भी पड़े थे, जिन्होंने वर्षों से अपने वेतन नहीं पाए थे, न चक्रधर संकोचवश माँगते थे। उधर घर में रोज़ तकरार होती थी। मुंशी वज्रधर बार-बार तकाज़े करते, झुँझलाते-माँगते क्यों नहीं? क्या मुँह में दही जमा हुआ है, या काम नहीं करते? लिहाज़ भले आदमी का किया जाता है। ऐसे लुच्चों का लिहाज़ नहीं किया जाता जो मुफ़्त में काम कराना चाहते हैं।

आखिर एक दिन चक्रधर ने विवश होकर ठाकुर साहब को एक पुरचा लिखकर अपना वेतन माँगा। ठाकुर साहब ने पुरजा लौटा दिया–व्यर्थ की लिखा-पढ़ी करने की उन्हें फुरसत न थी और कहा–उनको जो कुछ कहना हो, खुद आकर कहें। चक्रधर शरमाते हुए गये और कुछ शिष्टाचार के बाद रुपये माँगे। ठाकुर साहब हँसकर बोले–वाह बाबूजी, वाह! आप भी अच्छे मौज़ी जीव हैं। चार महीने से वेतन नहीं मिला और आपने एक बार भी न माँगा। अब तो आपके पूरे १२० रु. हो गए। मेरा हाथ इस वक़्त तंग है। ज़रा दस-पाँच दिन ठहरिए। आपको महीने-महीने अपना वेतन ले लेना चाहिए था। सोचिए, मुझे एक मुश्त देने में कितनी असुविधा होगी! खैर, जाइए, दस-पाँच दिन में रुपये मिल जाएँगे।

चक्रधर कुछ कह न सके। लौटे, तो मुँह पर घोर निराशा छाई हुई थी। आज दादाजी शायद जीता न छोड़ेंगे–इस ख़याल से उनका दिल काँपने लगा। मनोरमा ने उनका पुरजा अपने पिता के पास ले जाते हुए राह में पढ़ लिया था। उन्हें उदास देखकर पूछा–दादाजी ने आपसे क्या कहा?

चक्रधर उसके सामने रुपये-पैसे का ज़िक्र न करना चाहते थे। झेंपते हुए बोले–कुछ तो नहीं।

मनोरमा–आपको रुपये नहीं दिये?

चक्रधर का मुँह लाल हो गया–मिल जाएँगे।

मनोरमा–आपको १२० रु. चाहिए ना?

चक्रधर–इस वक़्त कोई ज़रूरत नहीं है।

मनोरमा–ज़रूरत न होती तो आप माँगते ही नहीं। दादाजी में बड़ा ऐब है कि किसी के रुपये देते हुए मोह लगता है। देखिए, मैं जाकर...

चक्रधर ने रोककर कहा–नहीं, नहीं, कोई ज़रूरत नहीं।

मनोरमा नहीं मानी। तुरन्त घर में गयी और एक क्षण में पूरे रुपये लाकर मेज़ पर रख दिये, मानो कहीं गिने-गिनाये रखे हुए थे।

चक्रधर–तुमने ठाकुर साहब को व्यर्थ कष्ट दिया।

मनोरमा–मैंने उन्हें कष्ट नहीं दिया! उनसे तो कहा भी नहीं। दादाजी किसी की ज़रूरत नहीं समझते। अगर अपने लिए कभी मोटर मँगवानी हो, तो तुरन्त मँगवा लेंगे; पहाड़ों पर जाना हो, तो तुरन्त चले जाएँगे, पर जिसके रुपये होते हैं, उसको न देंगे।

वह तो पढ़ने लग गई; लेकिन चक्रधर के सामने यह समस्या आ पड़ी कि रुपये लूँ या न लूँ। उन्होंने निश्चय किया कि न लेना चाहिए। पाठ हो चुकने पर वह उठ खड़े हुए और बिना रुपये लिए बाहर निकल आये। मनोरमा रुपये लिए पीछे-पीछे बरमादे तक आयी। बार-बार कहती रही–इन्हें आप लेते जाइए।

जब दादाजी दें तो मुझे लौटा दीजिएगा। पर चक्रधर ने एक न सुनी और जल्दी से बाहर निकल गए।

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शोध एवं शोध-पत्रों के लिए अकादमिक संदर्भ

Premchand, Munshi. "कायाकल्प." *Munshi Premchand Digital Archive*, 1926, https://munshipremchand.com/works/novels/kayakalp. Accessed 22 Sep. 2026.