Cover Image for Kayakalp (कायाकल्प) by Munshi Premchand - Novel
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उपन्यास•1926•57 अध्याय•17h 56m

कायाकल्प

Kayakalp

प्रेमचंद का उपन्यास 'कायाकल्प' सामाजिक और राजनीतिक संघर्ष, हिंदू-मुस्लिम संबंधों, प्रेम, सत्ता, पुनर्जन्म और नैतिक परिवर्तन के प्रश्नों को एक साथ प्रस्तुत करता है।

पात्र:चक्रधर, मनोरमा, अहिल्या, राजा विशालसिंह, देवप्रिया, शंखधर, यशोदानंदन, ख्वाजा महमूद, मुंशी वज्रधर, लोंगी
सेटिंग:20वीं सदी के प्रारंभ में उत्तर भारत, विशेष रूप से आगरा और जगदीशपुर का रियासती राज्य

अध्याय 4 / 57

29 मिनट पठन • 4,349 शब्द

अध्याय 4: कायाकल्प

चक्रधर डरते हुए घर पहुँचे, तो क्या देखते हैं कि द्वार पर चारपाई पड़ी हुई है; उस पर कालीन बिछी हुई है और एक अधेड़ उम्र के महाशय उस पर बैठे हुए हैं। उनके सामने ही एक कुर्सी पर मुंशी वज्रधर बैठे फ़र्शी पी रहे थे और नाई खड़ा पंखा झल रहा था। चक्रधर के प्राण सूख गए। अनुमान से ताड़ गए कि यह महाशय वर की खोज में आये हैं। निश्चय करने के लिए घर में जाकर माता से पूछा तो अनुमान सच्चा निकला। बोले–दादाजी ने इनसे क्या कहा?

निर्मला ने मुस्कुराकर कहा–नानी क्यों मरी जाती है, क्या जन्म भर कुँवारे ही रहोगे! जाओ, बाहर बैठो, तुम्हारा तो बड़ी देर से इन्तज़ार हो रहा है। आज क्यों इतनी देर लगायी?

चक्रधर–यह है कौन?

निर्मला–आगरे के कोई वकील हैं, मुंशी यशोदानन्दन!

चक्रधर–मैं तो घूमने जाता हूँ। जब यह यमदूत चला जाएगा, तो आऊँगा।

निर्मला–वाह रे शर्मीले! तेरे जैसा लड़का तो देखा नहीं। आ, ज़रा सिर में तेल डाल दूँ, बाल न जाने कैसे बिखरे हुए हैं। साफ़ कपड़े पहनकर ज़रा देर के लिए बाहर जाकर बैठ।

चक्रधर–घर में भोजन भी है कि ब्याह ही कर देने को जी चाहता है? मैं कहे देता हूँ, विवाह न करूँगा, चाहे इधर की दुनिया उधर हो जाए।

किन्तु स्नेहमयी माता कब सुननेवाली थी? उसने उन्हें ज़बरदस्ती पकड़कर सिर में तेल डाल दिया, सन्दूक से एक धुला कुर्ता निकाल लायी और यों पहनाने लगी, जैसे कोई बच्चे को पहनाए। चक्रधर ने गर्दन फेर ली।

निर्मला–मुझसे शरारत करेगा, तो मार बैठूँगी। इधर ला सिर! क्या जन्म भर छूटे साँड बने रहने को जी चाहता है? क्या मुझसे मरते दम तक चूल्हा-चक्की कराता रहेगा? कुछ दिनों तो बहू का सुख उठा लेने दे।

चक्रधर–तुमसे कौन कहता है भोजन बनाने को? मैं कल से बना दिया करूँगा। मंगला को क्यों छोड़ रखा है?

निर्मला–अब मैं मारनेवाली ही हूँ। आज तक कभी नहीं मारा; पर आज पीटूँगी, नहीं तो जाकर चुपके से बाहर बैठ।

इतने में मुंशीजी ने पुकारा–नन्हें, क्या कर रहे हो? ज़रा यहाँ तो आओ।

चक्रधर के रहे-सहे होश भी उड़ गए। बोले–जाता तो हूँ, लेकिन कहे देता हूँ, मैं यह जुआ गले में न डालूँगा। जीवन में मनुष्य का यही काम नहीं है कि विवाह कर ले, बच्चों का बाप बन जाए और कोल्हू के बैल की तरह आँखों पर पट्टी बाँधकर गृहस्थी में जुत जाए।

निर्मला–सारी दुनिया जो करती है, वही तुम्हें भी करना पड़ेगा। मनुष्य का जन्म होता ही किस लिए है?

चक्रधर–हज़ारों काम हैं?

निर्मला–रुपये आज भी नहीं लाये क्या? कैसे आदमी हैं कि चार-चार महीने हो गए, रुपये देने का नाम नहीं लेते! जाकर अपने दादा को किसी बहाने से भेज दो। कहीं से जाकर रुपये लाएँ। कुछ दावत-आवत का सामान करना ही पड़ेगा, नहीं तो कहेंगे कि नाम बड़े दर्शन छोटे।

चक्रधर बाहर आये तो मुंशी यशोदानन्दन ने खड़े होकर उन्हें छाती से लगा लिया और कुर्सी पर बैठाते हुए बोले–अब की ‘सरस्वती’ में आपका लेख देखकर चित्त बहुत प्रसन्न हुआ। इस वैषम्य को मिटाने के लिए आपने जो उपाय बताए हैं, वे बहुत ही विचारपूर्ण हैं।

इस स्नेह-मृदुल आलिंगन और सहृदयतापूर्ण आलोचना ने चक्रधर को मोहित कर लिया! वह कुछ जवाब देना ही चाहते थे कि मुंशी वज्रधर बोल उठे–आज बहुत देर लगा दी। राजा साहब से कुछ बातचीत होने लगी थी क्या? (यशोदानन्दन से) राजा साहब की इनके ऊपर बड़ी कृपा है। बिलकुल लड़कों की तरह मानते हैं। इनकी बातें सुनने से उनका जी ही नहीं भरता। (नाई से) देख ले, चिलम बदल दे और जाकर झिनकू से कह दे, सितार-वितार लेकर थोड़ी देर के लिए यहाँ आ जाए। इधर ही से गणेश के घर जाकर कहना कि तहसीलदार साहब ने एक हाँडी अच्छा दही माँगा है। कह देना, दही खराब हुआ, तो दाम न मिलेंगे।

यह हुक्म देकर मुंशीजी घर में चले गये। उधर की फ़्रिक थी, पर मेहमान को छोड़कर न जा सकते थे। आज उनका ठाठ-बाट देखते ही बनता था। अपना अल्पकालीन तहसीलदार के समय का अलापाके का चोंगा निकाला था। उसी ज़माने की मंदील भी सिर पर थी। आँखों में सुरमा भी था, बालों में तेल भी, मानों उन्हीं का ब्याह होनेवाला है। चक्रधर शरमा रहे थे, यह महाशय इनके वेश पर दिल में क्या कहते होंगे। राजा साहब की बात सुनकर तो वह गड़ से गए।

मुंशीजी चले गये, तो यशोदानन्दन बोले–अब आपका क्या काम करने का इरादा है?

चक्रधर–अभी तो कुछ निश्चय नहीं किया है। हाँ, यह इरादा है कि कुछ दिनों आज़ाद रहकर सेवा-कार्य करूँ।

यशोदा०–इससे बढ़कर क्या हो सकता है! आप जितने उत्साह से समिति को चला रहे हैं, उसकी तारीफ़ नहीं की जा सकती। आप जैसे उत्साही युवकों का ऊँचे आदर्शों के साथ सेवा-क्षेत्र में आना जाति के लिए सौभाग्य की बात है। आपके इन्हीं गुणों ने मुझे आपकी ओर खींचा है। यह तो आपको मालूम ही होगा कि मैं किस इरादे से आया हूँ। अगर मुझे धन या ज़ायदाद की परवाह होती, तो यहाँ न आता! मेरी दृष्टि से चरित्र का जो मूल्य है, वह और किसी वस्तु का नहीं।

चक्रधर ने आँखें नीची करके कहा–लेकिन मैं तो अभी गृहस्थी के बन्धन में नहीं पड़ना चाहता। मेरा विचार है कि गृहस्थी में फँसकर कोई तन-मन से सेवाकार्य नहीं कर सकता।

यशोदा०–ऐसी बात तो नहीं। इस वक़्त भी जितने आदमी सेवा-कार्य कर रहे हैं, वे प्रायः सभी बाल-बच्चों वाले आदमी हैं।

चक्रधर–इसी से तो सेवा-कार्य इतना शिथिल है!

यशोदा०–मैं समझता हूँ कि यदि स्त्री और पुरुष के विचार और आदर्श एक से हों, तो पुरुष के कामों में बाधक होने के बदले स्त्री सहायक हो सकती है। मेरी पुत्री का स्वभाव, विचार, सिद्धान्त सभी आपसे मिलते हैं और मुझे पूरा विश्वास है कि आप दोनों एक साथ रहकर सुखी रहोगे। उसे कपड़े का शौक नहीं, गहने का शौक़ नहीं, अपनी हैसियत को बढ़ाकर दिखाने की धुन नहीं। आपके साथ वह मोटे-से-मोटे वस्त्र और मोटे-से-मोटे भोजन में सन्तुष्ट रहेगी। अगर आप इसे अत्युक्ति न समझें, तो मैं यहाँ तक कह सकता हूँ कि ईश्वर ने आपको उसके लिए बनाया है और उसको आपके लिए। सेवा कार्य में वह हमेशा आपसे एक कदम आगे रहेगी। अंग्रेज़ी, हिन्दी, उर्दू, संस्कृत पढ़ी हुई है, घर के कामों में इतनी कुशल है कि मैं नहीं समझता, उसके बिना मेरी गृहस्थी कैसे चलेगी? मेरी दो बहुएँ हैं, लड़की की माँ हैं, किन्तु सब-की-सब फूहड; किसी में भी वह तमीज़ नहीं। रही शक्ल-सूरत, वह भी आपको इस तस्वीर से मालूम हो जाएगी।

यह कहकर यशोदानन्दन ने कहार से तस्वीर मँगवायी और चक्रधर के सामने रखते हुए बोले–मैं तो इसमें कोई हरज़ नहीं समझता। लड़के को क्या ख़बर है कि मुझे बहू कैसी मिलेगी। स्त्री में कितने गुण हों, लेकिन यदि उसकी सूरत पुरुष को पसन्द न आयी, तो वह उसकी नज़रों से गिर जाती है और उनका दाम्पत्य-जीवन दुःखमय हो जाता है। मैं तो यहाँ तक कहता हूँ कि वर और कन्या में दो-चार बार मुलाक़ात भी हो जानी चाहिए। कन्या के लिए तो वह अनिवार्य है। पुरुष को स्त्री पसन्द न आई, तो वह और शादियाँ कर सकता है। स्त्री को पुरुष पसन्द न आया तो उसकी सारी उम्र रोते ही गुज़रेगी।

चक्रधर के पेट में चूहे दौड़ने लगे कि तस्वीर क्योंकर ध्यान से देखूँ। वहाँ देखते शरम आती थी, मेहमान को अकेला छोड़कर घर में न जाते बनता था। कई मिनट तक तो सब्र किए बैठे रहे, लेकिन न रहा गया। पान की तश्तरी और तस्वीर लिये हुए घर में चले आये। चाहते थे कि अपने कमरे में जाकर देखें कि निर्मला ने पूछा–क्या बातचीत हुई? कुछ देंगे-दिलाएँगे भी कि वही ५१ रुपयेवालों में से हैं?

चक्रधर ने उग्र होकर कहा–अगर तुम मेरे सामने देने-दिलाने का नाम लोगी, तो ज़हर खा लूँगा।

निर्मला–वाह रे! तो पच्चीस बरस तक यों ही पाला-पोसा है क्या? मुँह धो रखें!

चक्रधर–तो बाज़ार में खड़ा करके बेच क्यों नहीं लेतीं? देखो, कै टके मिलते हैं।

निर्मला–तुम तो अभी से ससुर के पक्ष में मुझसे लड़ने लगे। ब्याह के नाम ही में कुछ जादू है क्या?

इतने में चक्रधर की छोटी बहन मंगला तश्तरी में पान रखकर उनको देने लगीं, तो काग़ज़ में लिपटी हुई तसवीर उसे नज़र आयी। उसने तसवीर ले ली और लालटेन के सामने ले जाकर बोली–यह बहू की तसवीर है। देखो, कितनी सुन्दर हैं!

निर्मला ने जाकर तसवीर देखी, तो चकित रह गई। उसकी आँखें आनन्द से चमक उठीं। बोली–बेटा, तेरे भाग्य जाग गए। मुझे तो कुछ भी न मिले, तो भी इससे तेरा ब्याह कर दूँ। कितनी बड़ी-बड़ी आम की फाँक-सी आँखें हैं, मैंने ऐसी सुन्दर लड़की नहीं देखी।

चक्रधर ने समीप जाकर उड़ती हुई नज़रों से तसवीर देखी और हँसकर बोले–लखावरी ईंट की-सी मोटी तो नाक है, उस पर कहती हो, कितनी सुन्दर है!

निर्मला–चल, दिल में तो फूला न समाता होगा, ऊपर से बातें बनाता है।

चक्रधर–इसी मारे मैं यहाँ न लाता था। लाओ, लौटा दूँ।

निर्मला–तुझे मेरी ही कसम है, जो भाँजी मारे। मुझे तो इस लड़की ने मोह लिया।

चक्रधर पान की तश्तरी और तसवीर लेकर चले; पर बाहर न जाकर अपने कमरे में गये और बड़ी उत्सुकता से चित्र पर आँखें ज़मा दीं। उन्हें ऐसा मालूम हुआ, मनों चित्र ने लज्जा से आँखें नीची कर ली हैं, मानों वह उनसे कुछ कह रही है। उन्होंने तसवीर को उलटकर रख दिया और चाहा कि बाहर चला जाऊँ, लेकिन दिल न माना, फिर तसवीर उठा ली और देखने लगे। आँखों की तृप्ति ही न होती थी। उन्होंने अब तक जितनी मूरतें देखी थीं, उनसे मन में इसकी तुलना करने लगे। मनोरमा ही इससे मिलती थी। आँखें दोनों की एक-सी हैं, बाल नेत्रों के समान विहँसते। वर्ण भी एक से हैं, नख-शिख बिलकुल मिलता-जुलता, किन्तु यह कितनी लज्जाशील है, वह कितनी चपल! यह किसी साधु की शान्ति कुटी की भाँति लताओं और फूलों से लज्जित है, वह किसी गगनस्पर्शी शैल की भाँति विशाल। यह चित्त को मोहित करती है, वह पराभूत करती है। यह किसी पालतू पक्षी की भाँति पिंजरे में गानेवाली, वह किसी अन्य पक्षी की भाँति आकाश में उड़नेवाली; यह किसी कवि-कल्पना की भाँति मधुर और रसमयी, वह किसी दार्शनिक तत्त्व की भाँति दुर्बोध और जटिल!

चित्र हाथ में लिए हुए चक्रधर भावी जीवन के मधुर स्वप्न देखने लगे। यह ध्यान ही न रहा कि मुंशी यशोदानन्दन बाहर अकेले बैठे हुए हैं। अपना व्रत भूल ही गए, सेवा-सिद्धान्त भूल गए, आदर्श भूल गए, भूत और वर्तमान भूल गए, भविष्य में लीन हो गए, केवल एक ही सत्य था, और वह इस चित्र की मधुर कल्पना थी।

सहसा तबले की थाप ने उनकी समाधि भंग की। बाहर संगीत-समाज ज़मा था। मुंशी वज्रधर को गाने-बजाने का शौक़ था। गला तो रसीला न था; पर ताल-स्वर के ज्ञाता थे। चक्रधर डरे कि दादा इस समय कहीं गाने लगे, तो नाहक भद्द हो। जाकर उनके कान में कहा–आप न गाइएगा। संगीत से रुचि थी; पर यह असह्य था कि मेरे पिताजी कत्थकों के साथ बैठकर एक प्रतष्ठित मेहमान के सामने गाएँ।

जब साज मिल गया, तो झिनकू ने कहा–तहसीलदार साहब, पहले आप ही की हो जाए।

चक्रधर का दिल धड़कने लगा, लेकिन मुंशीजी ने उनकी ओर आश्वासन की दृष्टि के देखकर कहा–तुम लोग अपना गाना सुनाओ, मैं क्या गाऊँ।

झिनकू–वाह मालिक, वाह! आपके सामने हम क्या गाएँगे। अच्छे-अच्छे उस्तादों की तो हिम्मत नहीं पड़ती।

वज्रधर अपनी प्रशंसा सुनकर फूल उठते थे। दो-चार बार तो ‘नहीं-नहीं’ की फिर ध्रुपद की एक गत छेड़ ही दी। पंचम स्वर था, आवाज़ फटी हुई, साँस उखड़ जाती थी, बार-बार खाँसकर गला साफ़ करते थे, लोच का नाम न था, कभी-कभी बेसुरे भी हो जाते थे, पर साज़िन्दे वाह-वाह की धूम मचाए हुए थे, क्या कहना, तहसीलदार साहब! ओ हो!

मुंशीजी को गाने की धुन सवार होती थी, तो जब तक गला न पड़ जाए, चुप न होते थे। गत समाप्त होते ही आपने ‘सूर’ का पद छेड़ दिया और ‘देश’ की धुन में गाने लगे।

झिनकू–यह पुराने गले की बहार है! ओ हो!

वज्रधर–नैर नीर छीजत नहि कबहूँ, निस-दिन बहत पनारे।

झिनकू–ज़रा बता दीजिएगा, कैसे?

वज्रधर ने दोनों आँखों पर हाथ रखकर बताया।

चक्रधर से अब सहा नहीं गया। नाहक अपनी हँसी करा रहे हैं। इस बेसुरेपन पर मुंशी यशोदानन्दन दिल में कितना हँस रहे होंगे। शर्म के मारे वह वहाँ खड़े न रहे सके। घर में चले गए, लेकिन यशोदानन्दन बड़े ध्यान से गाना सुन रहे थे। बीच-बीच में सिर भी हिला देते थे। जब गीत समाप्त हुआ, तो बोले–तहसीलदार साहब, आप इस फ़न के उस्ताद हैं!

वज्रधर–यह आपकी कृपा है, मैं गाना क्या जानूँ। इन्हीं लोगों की संगति में कुछ शुद-बुद आ गया।

झिनकू–ऐसा न कहिए मालिक, हम सब तो आप ही के सिखाए-पढ़ाए हैं।

यशोदा०–मेरा तो जी चाहता है कि आपका शिष्य बन जाऊँ।

वज्रधर–क्या कहूँ, आपने स्वर्गीय पिताजी का गाना नहीं सुना। बड़ा कमाल का गाते थे। कोई उस्ताद उनके सामने मुँह नहीं खोल सकता था। लाखों की ज़ायदाद उसी के पीछे लुटा दी। अब तो इसकी चर्चा ही उठती जाती है।

यशोदा०–अब की न कहिए। आजकल के युवकों में तो गाने की रुचि ही नहीं रही। न गा सकते हैं न समझ सकते हैं। उन्हें गाते शर्म आती है।

वज्रधर–रईसों में भी इसका शौक उठता जाता है।

यशोदा०–पेट के धन्धे से किसी को छुट्टी नहीं मिलती, गाए-बजाए कौन?

झिनकू–(यशोदानन्द से) हुज़ूर को गाने का शौक़ मालूम होता है।

यशोदा०–अजी, जब था, तब था? सितार-वितार की दो-चार गतें बजा लेता था। अब सब छोड़-छाड़ दिया।

झिनकु–कितना ही छोड़ दिया है, लेकिन आजकल के नौसिखियों से अच्छे ही होंगे। अबकी आप ही की हो।

यशोदानन्दन ने भी दो-चार बार इनकार करने के बाद काफ़ी की धुन में एक ठुमरी छेड़ दी। उनका गला मँजा हुआ था, इस कला में निपुण थे, ऐसा मस्त होकर गाया कि सुननेवाले झूम-झूम गए। उनकी सुरीली तान साज में मिल जाती थी। वज्रधर ने तो वाह-वाह का तार बाँध दिया। झिनकू के छक्के छूट गए। मज़ा यह कि साथ-ही-साथ सितार भी बजाते थे। आसपास के लोग आकर ज़मा हो गए। समाँ बँध गया। चक्रधर ने यह आवाज़ सुनी, तो दिल में, यह महाशय भी उसी टुकड़ी के लोगों में हैं, उसी रंग में रँगे हुए। अब झेंप जाती रही। बाहर आकर बैठ गए।

वज्रधर ने कहा–भाई साहब, आपने तो कमाल कर दिया। बहुत दिनों से ऐसा गाना न सुना था। कैसी रही, झिनकू?

झिनकू-हुज़ूर, कुछ न पूछिए, सिर धुन रहा हूँ। मेरी तो अब गाने की हिम्मत ही नहीं पड़ती। आपने हम सभी का रंग फ़ीका कर दिया। पुराने जमाने के रईसों की क्या बातें हैं!

यशोदा०–कभी-कभी जी बहला लिया करता हूँ, वह भी लुक-छिपकर। लड़के सुनते हैं तो कानों पर हाथ रख लेते हैं। मैं समझता हूँ, जिसमें यह रस नहीं, वह किसी सोहबत में बैठने लायक नहीं। क्यों बाबू चक्रधर, आपको तो शौक़ होगा?

वज्रधर–जी, छू नहीं गया। बस, अपने लड़कों का हाल समझिए।

चक्रधर ने झेंपते हुए कहा–मैं गाने को बुरा नहीं समझता। हाँ, इतना ज़रूर चाहता हूँ कि शरीफ लोग शरीफ़ों में ही गाएँ-बजाएँ।

यशोदा०–गुणियों की जात-पात नहीं देखी जाती। हमने तो बरसों एक अन्धे फ़कीर की गुलामी की तब जाके सितार बजाना आया।

आधी रात के क़रीब गाना बन्द हुआ। लोगों ने भोजन किया। जब मुंशी यशोदानन्दन बाहर आकर बैठे, तो वज्रधर ने पूछा–आपसे कुछ बातचीत हुई?

यशोदा०–जी हाँ, लेकिन साफ़ नहीं खुले।

वज्रधर–विवाह के नाम से चिढ़ता है।

यशोदा०–अब शायद राजी हो जाएँ।

वज्रधर–अजी, सैकड़ों आदमी आ-आकर लौट गए। कई आदमी तो दस-दस हज़ार तक देने पर तैयार थे। एक साहब तो अपनी रियासत ही लिख देते थे; लेकिन इसने हामी न भरी।

दोनों आदमी सोए। प्रातःकाल यशोदानन्दन ने चक्रधर से पूछा–क्यों बेटा, एक दिन के लिए मेरे साथ आगरे चलोगे?

चक्रधर–मुझे तो आप इस जंजाल में न फँसाएँ तो बहुत अच्छा हो।

यशोदा०–तुम्हें जंजाल में नहीं फँसाता बेटा, तुम्हें ऐसा सच्चा मन्त्री, ऐसा सच्चा सहायक और ऐसा सच्चा मित्र दे रहा हूँ, जो तुम्हारे उद्देश्यों को पूरा करना अपने जीवन का मुख्य कर्तव्य समझेगी। मैं स्वार्थवश ऐसा नहीं कर रहा हूँ। मैं स्वयं आगरे की हिन्दू-सभा का मन्त्री हूँ और सेवा-कार्य का महत्त्व समझता हूँ। अगर मैं समझता कि यह सम्बन्ध आपके काम में बाधक होगा, तो कभी आग्रह न करता। मैं चाहता हूँ कि आप एक बार अहिल्या से मिल लें। यों मैं मन से आपको अपना दामाद बना चुका; पर अहिल्या की अनुमति ले लेनी आवश्यक समझता हूँ! आप भी शायद यह पसन्द न करेंगे कि मैं इस विषय में स्वेच्छा से काम लूँ। आप शरमाएँ नहीं, यों समझ लीजिए कि आप मेरे दामाद हो चुके; केवल मेरे साथ सैर करने चल रहे हैं। आपको देखकर आपकी सास, साले सभी खुश होंगे।

चक्रधर बड़े संकट में पड़े। सिद्धांत-रूप से वह विवाह के विषय में स्त्रियों को पूरी स्वाधीनता देने के पक्ष में थे; पर इस समय आगरे जाते हुए बड़ा संकोच हो रहा था। कहीं उसकी इच्छा न हुई तो? कौन बड़ा सजीला जवान हूँ, बातचीत करने में भी तो चतुर नहीं, और उसके सामने तो शायद मेरा मुँह ही न खुले। कहीं उसने मन फ़ीका कर लिया, तो मेरे लिए डूब मरने की जगह होगी। फिर कपड़े-लत्ते भी तो नहीं हैं, यह दो कुर्तों की पूँजी है। बहुत हैस-वैस के बाद बोले–मैं सच कहता हूँ, मैं अपने को ऐसी...ऐसी सुयोग्य स्त्री के योग्य नहीं समझता।

यशोदा०–इन हीलों से मैं आपका दामन छोड़नेवाला नहीं हूँ। मैं आपके मनोभावों को समझ रहा हूँ। आप संकोच के कारण ऐसा कह रहे हैं; पर अहिल्या उन चंचल लड़कियों में से नहीं है, जिसके सामने जाते हुए आपको शरमाना पड़े। आप उसकी सरलता देखकर प्रसन्न होंगे। हाँ, मैं इतना कर सकता हूँ कि आपकी खातिर उससे पहले यह कहूँ कि आप एक परदेशी आदमी हैं, यहाँ सैर करने के लिए आए हैं। स्टेशन पर होटल पूछ रहे थे। मैंने समझा, सीधे आदमी हैं, होटल में लुट जाएँगे, साथ लेता आया। क्यों, कैसी रहेगी?

चक्रधर ने अपनी प्रसन्नता को छिपाकर कहा–क्या यह नहीं हो सकता कि मैं और किसी समय आ जाऊँ?

यशोदा०–नहीं, मैं इस काम में विलम्ब नहीं करना चाहता। मैं तो उसी को लाकर दो-चार दिन के लिए यहाँ ठहरा सकता हूँ, पर शायद आपके घर के लोग यह पसन्द न करेंगे।

चक्रधर ने सोचा, अगर मैंने और ज़्यादा टाल-मटोल की, तो कहीं यह महाशय सचमुच ही अहिल्या को यहाँ न पहुँचा दें। तब तो सारा परदा ही खुल जाएगा। घर की दशा देखकर अवश्य ही उनका दिल फिर जाएगा। एक तो ज़रा-सा घर, कहीं बैठने की जगह नहीं, उस पर न कोई साज, न सामान। विवाह होने के बाद दूसरी बात हो जाती है। लड़की कितने ही बड़े घराने की हो, समझ लेती है, अब तो यही मेरा घर है–अच्छा हो या बुरा। दो-चार दिन अपनी तकदीर को रोकर शान्त हो जाती है। बोले–जी हाँ, यह मुनासिब नहीं मालूम होता। मैं ही चला चलूँगा।

घर में विद्या का प्रचार होने से प्रायः सभी प्राणी कुछ-न-कुछ उदार हो जाते हैं। निर्मला तो खुशी से ऱाजी हो गई। हाँ, मुंशी वज्रधर को कुछ संकोच हुआ; लेकिन यह समझकर कि यह महाशय लड़के पर लट्टू हो रहे हैं कोई अच्छी रकम दे मरेंगे, उन्होंने भी कोई आपत्ति नहीं की। अब केवल ठाकुर हरिसेवक सिंह को सूचना देनी थी। चक्रधर यों तीसरे पहर पढ़ाने जाया करते थे; पर आज नौ बजते-बजते जा पहुँचे।

ठाकुर साहब इस वक़्त अपनी प्राणेश्वरी लौंगी से कुछ बातें कर रहे थे। मनोरमा की माता का देहान्त हो चुका था। लौंगी उस वक़्त लौंडी थी। उसने इतनी कुशलता से घर सँभाला कि ठाकुर साहब उस पर रीझ गए और उसे गृहिणी के रिक्त स्थान पर अभिषिक्त कर दिया। नाम और गुण में इतना प्रत्यक्ष विरोध बहुत कम होगा। लोग कहते हैं, पहले वह इतनी दुबली थी कि फूँक दो तो उड़ जाए; पर गृहिणी का पद पाते ही उसकी प्रतिमा स्थूल रूप धारण करने लगी।

क्षीण जलधारा बरसात की नदी की भाँति बढ़ने लगी और इस समय तो स्थूल प्रतिमा की विशाल मूर्ति थी, अचल और अपार। बरसाती नदी का जल गड़हों और गड़हियों में भर गया था। बस, जल-ही-जल दिखाई देता था। न आँखों का पता था, न नाक का, न मुँह का, सभी जगह स्थूलता व्याप्त हो रही थी, पर बाहर की स्थूलता ने अन्दर की कोमलता को अक्षुझण रखा था। सरल, सहद, हँसमुख, सहनशील स्त्री थी, जिसने सारे घर को वशीभूत कर लिया था। यह उसी की सज्जनता थी, जो नौकरों को वेतन न मिलने पर भी जाने न देती थी। मनोरमा पर तो वह प्राण देती थी। ईर्ष्या, क्रोध, मत्सर उसे छू भी न गया था। वह उदार न हो; पर कृपण न थी। ठाकुर साहब कभी-कभी उस पर भी गिड़ जाते थे, मारने दौड़ते थे, दो-एक बार मारा भी था; पर उसके माथे पर ज़रा भी बल न आता। ठाकुर साहब का सिर भी दुखे, तो उसकी जान निकल जाती थी। वह उसकी स्नेहमयी सेवा ही थी, जिसने ऐसे हिंसक जीव को जकड़ रखा था।

इस वक़्त दोनों प्राणियों में कोई बहस छिड़ी हुई थी। ठाकुर साहब झल्ला-झल्लाकर बोल रहे थे और लौंगी अपराधियों की भाँति सिर झुकाए खड़ी थी कि मनोरमा ने आकर कहा–बाबूजी आए हैं, आपसे कुछ कहना चाहते हैं।

ठाकुर साहब की भौहें तन गईं, बोले–कहना क्या चाहते होंगे, रुपये माँगने आए होंगे। अच्छा, जाकर कह दो कि आते हैं, बैठिए।

लौंगी–इनके रुपये दे क्यों नहीं देते? बेचारे ग़रीब आदमी हैं, संकोच के मारे नहीं माँगते, कई महीने तो चढ़ गए?

ठाकुर–यह भी तुम्हारी मूर्खता थी, जिसकी बदौलत मुझे यह तावान देना पड़ता है। कहता था कि कोई ईसाइन रख लो, दो-चार रुपये में काम चल जाएगा। तुमने कहा–नहीं, कोई लायक आदमी होना चाहिए। इनके लायक होने में शक नहीं; पर यह तो बुरा मालूम होता है कि जब देखो, रुपये के लिए सिर पर सवार। अभी कल कह दिया कि घबराइए नहीं, दस-पाँच दिनों में मिल जाएँगे। तब तक फिर भूत की तरह सवार हो गए।

लौंगी–कोई ऐसी ही ज़रूरत आ पड़ी होगी, तभी आए होंगे १२० रुपये हुए न? मैं लाए देती हूँ।

ठाकुर–हाँ सन्दूक खोलकर लाना तो कोई कठिन काम नहीं। अखर तो उसे होती है, जिसे कुआँ खोदना पड़ता है।

लौंगी–वही कुआँ तो उन्होंने भी खोदा है। तुम्हें चार महीने तक कुछ न मिले, तो क्या हाल होगा, सोचो। मुझे तो बेचारे पर दया आती है।

यह कहकर लौंगी गयी और रुपये लाकर ठाकुर साहब से बोली–लो, दे आओ। सुन लेना, शायद कुछ कहना भी चाहते हों।

ठाकुर–लायी तो रुपये, नोट न थे क्या?

लौंगी–जैसे नोट वैसे रुपये, इसमें भी कुछ भेद है?

ठाकुर–अब तुमसे क्या कहूँ। अच्छा रख दो, जाता हूँ। पानी तो नहीं बरस रहा है कि भीग रहे होंगे।

ठाकुर साहब ने झुँझलाकर रुपये उठा लिये और बाहर चले, लेकिन रास्ते में क्रोध शान्त हो गया। चक्रधर के पास पहुँचे, तो विनय के देवता बने हुए थे।

चक्रधर–आपको कष्ट देने...

ठाकुर–नहीं-नहीं, मुझे कोई कष्ट नहीं हुआ। मैंने आपसे दस-पाँच दिन में देने का वादा किया था। मेरे पास रुपये न थे, पर स्त्रियों को तो आप जानते हैं, कि कितनी चतुर होती हैं। घर में रुपये निकल आए। यह लीजिए।

चक्रधर–मैं इस वक़्त एक दूसरे ही काम से आया हूँ। मुझे एक काम से आगरे जाना है। शायद दो-तीन दिन लगेंगे। इसके लिए क्षमा चाहता हूँ।

ठाकुर–हाँ, हाँ, शौक़ से जाइए। मुझसे पूछने की ज़रूरत न थी।

ठाकुर साहब अन्दर चले गये तब मनोरमा ने पूछा–आप आगरे क्या करने जा रहे हैं?

चक्रधर–एक काम से जाता हूँ।

मनोरमा–कोई बीमारी है क्या?

चक्रधर–नहीं, बीमारी कोई नहीं है।

मनोरमा–फिर क्या काम है, बताते क्यों नहीं? जब तक न बतलाएँगे, मैं जाने न दूँगी।

चक्रधर–लौटकर बता दूँगा।

मनोरमा–जी नहीं, मैं यह नहीं मानती, अभी बताइए।

चक्रधर–एक मित्र से मिलने जाता हूँ।

मनोरमा–आप मुस्कुरा रहे हैं। मैं समझ गई, नौकरी की तलाश में जाते हैं।

चक्रधर–नहीं मनोरमा, यह बात नहीं हैं। मेरी नौकरी करने की इच्छा नहीं।

मनोरमा–तो क्या आप हमेशा इसी तरह देहातों में घूमा करेंगे?

चक्रधर–विचार तो ऐसा ही है, फिर जैसी ईश्वर की इच्छा!

मनोरमा–आप रुपये कहाँ से लाएँगे? उन कामों के लिए भी तो रुपयों की ज़रूरत होती होगी?

चक्रधर–भिक्षा माँगूँगा। पुण्य-कार्य भिक्षा पर ही चलते हैं।

मनोरमा–तो आजकल भी आप भिक्षा माँगते होंगे?

चक्रधर–हाँ, माँगता क्यों नहीं। नहीं माँगूँ, तो काम कैसे चले!

मनोरमा–मुझसे तो आपने नहीं माँगा।

चक्रधर–तुम्हारे ऊपर तो विश्वास है कि जब माँगूँगा, तब दे दोगी, इसलिए कोई विशेष काम आ पड़ने पर माँगूँगा।

मनोरमा–और जो उस वक़्त मेरे पास न हुए तो?

चक्रधर–तो फिर कभी माँगूँगा।

मनोरमा–तो आप मुझसे अभी माँग लीजिए, अभी मेरे पास रुपये हैं, दे दूँगी। फिर आप जाने किस वक़्त माँग बैंठे?

यह कहकर मनोरमा अन्दर गयी और कलवाले १२० रुपये लाकर चक्रधर के सामने रख दिये।

चक्रधर–इस वक़्त तो मुझे ज़रूरत नहीं। फिर कभी ले लूँगा।

मनोरमा–जी नहीं, लेते जाइए। मेरे पास खर्च हो जाएँगे। एक दफ़े भी बाज़ार गयी, तो ग़ायब हो जाएँगे। इसी डर के मारे मैं बाज़ार नहीं जाती।

चक्रधर–तुमने ठाकुर साहब से पूछ लिया है? मनोरमा–उनसे क्यों पूछूँ? गुड़िया लाती हूँ, तो उनसे नहीं पूछती, तो फिर इसके लिए उनसे क्यों पूछूँ।

चक्रधर–तो फिर यों मैं नहीं लूँगा। यह स्थिति और ही है। यह ख़याल हो सकता है कि मैंने तुमसे रुपये ठग लिये। तुम्हीं सोचो, हो सकता है या नहीं?

मनोरमा–अच्छा, आप अमानत समझकर अपने पास रखे रहिए।

इतने में सामने से मुश्की घोड़ों की फिटन जाती हुई दिखाई दी। घोड़ों के साज़ों पर गंगा-यमुनी काम किया हुआ था। चार सवार भाले उठाए पीछे दौड़ते चले आते थे।

चक्रधर–कोई रानी मालूम होती हैं।

मनोरमा–जगदीशपुर की महारानी हैं। जब उनके यहाँ जाती हूँ, मुझे एक गिन्नी देती हैं। ये आठों गिन्नियाँ उन्हीं की दी हुई हैं। न जाने क्यों मुझे बहुत मानती हैं।

चक्रधर–इनकी कोठी दुर्गाकुण्ड की तरफ़ है ना! मैं एक दिन इनके यहाँ भिक्षा माँगने जाऊँगा।

मनोरमा–मैं जगदीशपुर की रानी होती, तो आपको बिना माँगे ही बहुत-सा धन दे देती।

चक्रधर ने मुस्कुराकर कहा–तब भूल जातीं।

मनोरमा–जी नहीं, मैं कभी नहीं भूलती।

चक्रधर–अच्छा कभी याद दिलाऊँगा। इस वक़्त यह रुपये अपने ही पास रहने दो।

मनोरमा–आपको इन्हें लेते संकोच क्यों होता है? रुपये मेरे हैं, महारानी ने मुझे दिये हैं। मैं इन्हें पानी में डाल सकती हूँ, किसी को मुझे रोकने का क्या अधिकार है! आप न लेंगे तो मैं सच कहती हूँ, आज ही जाकर इन्हें गंगा में फेंक आऊँगी।

चक्रधर ने धर्मसंकट में पड़कर कहा–तुम इतना आग्रह करती हो, तो मैं लिये लेता हूँ, लेकिन इसे अमानत समझूँगा।

मनोरमा प्रसन्न होकर बोली–हाँ, अमानत ही समझ लीजिए।

चक्रधर–तो मैं जाता हूँ। किताब देखती रहना।

मनोरमा–आप मुझसे बिना बताए चले जाएँगे, तो मैं कुछ न पढूँगी।

चक्रधर–यह तो बड़ी टेढ़ी शर्त हैं। बता ही दूँ। अच्छा, हँसना मत। तुम ज़रा भी मुस्कुरायीं और मैं चला।

मनोरमा–मैं दोंनों हाथों से मुँह बन्द किए लेती हूँ।

चक्रधर ने झेंपते हुए कहा–मेरे विवाह की कुछ बातचीत है। मेरी तो इच्छा नहीं है; पर एक महाशय ज़बरदस्ती खींचे लिये चले जाते हैं।

यह कहकर चक्रधर उठ खड़े हुए। मनोरमा भी उनके साथ-साथ आयी। जब वह बरामदे से नीचे उतरे, तो प्रणाम किया और तुरन्त अपने कमरे में लौट आयी। उसकी आँखें डबडबाई थीं और बार-बार रुलाई आती थी, मानों चक्रधर किसी दूर देश जा रहे हों!

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शोध एवं शोध-पत्रों के लिए अकादमिक संदर्भ

Premchand, Munshi. "कायाकल्प." *Munshi Premchand Digital Archive*, 1926, https://munshipremchand.com/works/novels/kayakalp. Accessed 22 Sep. 2026.