मुंशी वज्रधर उन रेल मुसाफ़िरों में थे, जो पहले गाड़ी में खड़े होने की जगह माँगते हैं, फिर बैठने की फ़िक्र करने लगते हैं और अन्त में सोने की तैयारी कर देते हैं। चक्रधर एक बड़ी रियासत के दीवान की लड़की को पढ़ाएँ और वह इस स्वर्ण-संयोग से लाभ न उठाएँ! यह क्योंकर हो सकता था। दीवान साहब को सलाम करने आने-जाने लगे। बातें करने में तो निपुण थे ही, दो-चार मुलाक़ातों में उनका सिक्का जम गया। इस परिचय ने ही शीघ्र मित्रता का रूप धारण किया। एक दिन दीवान साहब के साथ वह रानी जगदीशपुर के दरबार में पहुँचे और ऐसी लच्चेदार बातें कीं, अपनी तहसीलदारी को ऐसी डींग उड़ाई की रानीजी मुग्ध हो गईं! कोई क्या तहसीलदार करेगा! जिस इलाके में मैं था, वहाँ के आदमी आज तक मुझे याद करते हैं। डींग नहीं मारता, डींग मारने की मेरी आदत नहीं, लेकिन जिस इलाके में मुश्किल से ५० हज़ार वसूल होता था, उसी इलाके से साल के अन्दर मैंने दो लाख वसूल करके दिखा दिया और लुत्फ़ यह कि किसी को हिरासत में रखने या कुर्की करने की ज़रूरत नहीं पड़ी।
ऐसे कार्य-कुशल आदमी की सभी जगह ज़रूरत रहती है। रानी ने सोचा, इस आदमी को रख लूँ, तो इलाके की आमदनी बढ़ जाए। ठाकुर साहब से सलाह की। यहाँ तो पहले ही से बातें सधी-बधी थीं। ठाकुर साहब ने रंग और भी चोखा कर दिया। उनके दोस्तों में यही ऐसे थे, जिस पर लौंगी की असीम कृपादृष्टि थी। दूसरी ही सलामी में मुंशीजी को २५ रुपये मासिक की तहसीलदारी मिल गई। मुँहमाँगी मुराद पूरी हुई। सवारी के लिए घोड़ा भी मिल गया। सोने में सुहागा हो गया।
अब मुंशीजी की पाँचों अँगुलियों घी में थीं। जहाँ महीने में एक बार भी महफ़िल न जमने पाती थी, वहाँ अब तीसों दिन जमघट होने लगा। इतने बड़े अहलकार के लिए शराब की क्या कमी; कभी इलाके पर चुपके से दस-बीस बोतलें ऐंठ लेते। बिना हींग-फिटकरी रंग चोखा हो जाता था। एक कहार भी नौकर रख लिया और ठाकुर साहब के घर से दो-चार कुर्सियाँ उठवा लाए। उनके हौसले बहुत ऊँचे न थे, केवल एक भले आदमी की भाँति जीवन व्यतीत करना चाहते थे कि इस नौकरी का कोई ठिकाना नहीं। रईसों का मिज़ाज़ एक-सा नहीं रहता। मान लिया, रानी साहब के साथ निभ ही गई, तो कितने दिन! राजा साहब आते ही पुराने नौकरों को निकाल बाहर करेंगे। जब दीवान ही न रहेंगे, तो मेरी क्या हस्ती? इसलिए उन्होंने पहले ही से नए राजा साहब के यहाँ आना-जाना शुरू कर दिया था। इनका नाम ठाकुर विशालसिंह था। रानी साहब के चचेरे देवर होते थे। उनके दादा दो भाई थे। बड़े भाई रियासत के मालिक थे। उन्हीं के वंशजों ने दो पीढ़ियों तक राज्य का आनन्द भोगा था। अब रानी ने निःसंतान होने के कारण विशालसिंह के भाग्य उदय हुए थे। दो-चार गाँव थे, उनके दादा को गुज़ारे के लिए मिले थे, उन्हीं को रेहन–बय करके इन लोगों ने ५० वर्ष काट दिए थे–यहाँ तक कि विशालसिंह के पास अब इतनी भी संपत्ति न थी कि गुज़र-बसर के लिए काफी होती। उस पर कुल-मर्यादा का पालन करना आवश्यक था। वह महारानी के पट्टीदार थे और इस हैसियत का निर्वाह करने के लिए उन्हें नौकर-चाकर, घोड़ा-गाड़ी, सभी कुछ रखना पड़ता था। अभी तक परम्परा की नक़ल होती चली आती थी। दशहरे के दिन उत्सव ज़रूर मनाया जाता, जन्माष्टमी के दिन ज़रूर धूमधाम होती।
प्रातःकाल था, माघ मास की ठण्ड पड़ रही थी। मुंशीजी ने गरम पानी से स्नान किया और चौकी से उतरे। मगर खड़ाऊँ उलटे रखे थे। कहार खड़ा था कि यह जाएँ, तो धोती छाँटूँ! मुंशीजी ने उलटे खड़ाऊँ देखे, तो कहार को डाँटा–तुमसे कितनी का बार कह चुका कि खड़ाऊँ सीधे रखा कर। तुझे याद क्यों नहीं रहता? बता, उलटे खड़ाऊँ रखे, तो इतना पीटूँगा कि तू भी याद करेगा।
कहार ने काँपते हुए हाथ से खड़ाऊँ सीधे कर दिये।
निर्मला ने हलवा बना रखा था। मुंशीजी आकर एक कुर्सी पर बैठ गए और जलता हुआ हलवा मुँह में डाल दिया। किसी तरह उसे निगल गए और आँखों से पानी पोंछते हुए बोले–तुम्हारा कोई काम ठीक नहीं होता। जलता हुआ हलवा सामने रख दिया। आखिर मुँह जलाने से तुम्हें कुछ मिल तो नहीं गया।
निर्मला–ज़रा हाथ से देख क्यों नहीं लिया?
वज्रधर–वाह, उलटा चोर कोतवाल को डाँटे। मुझी को उल्लू बनाती हो। तुम्हें खुद सोच लेना चाहिए था कि जलता हुआ हलवा खा गए, तो मुँह की क्या दशा होगी। लेकिन तुम्हें क्या परवाह। लल्लू कहाँ हैं?
निर्मला–लल्लू मुझसे कह के कहाँ जाते हैं! पहर रात रहे, न जाने किधर चले गए। जाने कहीं किसानों की सभा होनेवाली है। वहीं गए हैं।
वज्रधर–वहाँ दिन भर भूखों मरेगा। न जाने इसके सिर से यह भूत कब उतरेगा? मुझसे कल दारोग़ाजी कहते थे, आप लड़के को सँभालिए, नहीं तो धोखा खाएगा। समझ में नहीं आता, क्या करूँ? मेरे इलाके के आदमी भी इन सभाओं में अब जाने लगे हैं और मुझे ख़ौफ हो रहा है कि कहीं रानी साहब के कानों में भनक पड़ गई, तो मेरे सिर हो जाएँगी। मैं यह तो मानता हूँ कि अहलकार लोग ग़रीबों को बहुत सताते हैं, मगर किया क्या जाए, सताए वग़ैर काम भी तो नहीं चलता। आखिर उनका गुज़र-बसर कैसे हो। किसानों को समझाना बुरा नहीं, लेकिन आग में कूदना तो बुरी बात है। मेरे तो सुनने की उसने कसम खा ली है, मगर तुम क्यों नहीं समझातीं?
निर्मला–जो आग में कूदेगा, आप जलेगा, मुझे क्या करना है। उससे बहस कौन करे। आज सवेरे-सवेरे कहाँ जा रहे हो?
वज्रधर–ज़रा ठाकुर विशालसिंह के यहाँ जाता हूँ।
निर्मला–दोपहर तक लौट आओगे न?
वज्रधर–हाँ, अगर उन्होंने छोड़ा। मुझे देखते ही टूट पड़ते हैं, तरह-तरह की खातिर करने लगते हैं, दूध लाओ, मेवे लाओ, जान ही नहीं छोड़ते। तीनों औरतों का किस्सा छेड़ देते हैं। बड़े ही मिलनसार आदमी हैं। मंगला क्या अभी तक सो रही है?
निर्मला–हाँ, जगा के हार गई, उठती ही नहीं।
वज्रधर–यह तो बुरी बात है। बहू-बेटियों का इतने दिन चढ़े तक सोना क्या अच्दी बात है?
यह कहकर मुंशीजी ने लोटे का पानी उठाया और मंगला के ऊपर डाल दिया। निर्मला ‘हाँ-हाँ’ करती रह गई। पानी पड़ते ही मंगला हड़बड़ाकर उठी और यह समझकर कि वर्षा हो रही है, कोठरी में घुस गई, सरदी के मारे काँप रही थी।
निर्मला–सवेरे-सवेरे लेके नहला दिया।
वज्रधर–यह सब तुम्हारे लाड़-प्यार का फल है। खुद दोपहर तक सोती हो, वही आदतें लड़कों को भी सिखाती हो।
निर्मला–स्वभाव सबका अलग-अलग होता है। न कोई किसी के बनाने से बनता है, न बिगाड़ने से बिगड़ता है। माँ-बाप को देखकर लड़कों का स्वभाव बदल जाता, तो लल्लू कुछ और ही होता। तुम्हें पिये बिना एक दिन भी चैन नहीं आता, उसे भी कभी पीते देखा है? यह सब कहने की बातें हैं कि लड़के माँ-बाप की आदतें सीखते हैं।
वज्रधर ने इसका कुछ जवाब न दिया। कपड़े पहने; बाहर घोड़ा तैयार था, उस पर बैठे शिवपुर चले।
जब वह ठाकुर साहब के मकान पर पहुँचे, तो आठ बज गए थे! ठाकुर साहब धूप में बैठे एक पत्र पढ़ रहे थे। बड़ा तेजस्वी मुख था। वह एक काला दुशाला ओढ़े हुए थे, जिस पर समय के अत्याचार के चिह्न दिखाई दे रहे थे। इस दुशाले ने उनके गोरे रंग को और भी चमका दिया था।
मुंशीजी ने मोढ़े पर बैठते हुए कहा–सब कुशल आनन्द है न?
ठाकुर–जी हाँ, ईश्वर की दया है। कहिए दरबार के क्या समाचार हैं? यद्यपि ठाकुर साहब रानी के सम्बन्ध में कुछ पूछना ओछापन समझते थे, तथापि इस विषय में उन्हें इतना प्रेम था कि बिना पूछे रहा न जाता था।
मुंशीजी ने मुस्कुराकर कहा–सब वही पुरानी बातें हैं। डॉक्टरों के पौ बारह हैं। दिन में तीन-तीन डॉक्टर आते हैं।
ठाकुर–क्या शिकायत है?
मुंशी–बुढ़ापे की शिकायत क्या कम है? यह तो असाध्य रोग है।
ठाकुर–उन्हें तो और मनाना चाहिए कि किसी तरह इस मायाजाल से छूट जायें। दवा-दर्पण की अब क्या ज़रूरत है। इतने दिन राजसुख भोग चुकीं, पर अब भी जी नहीं भरा!
मुंशी–वह तो अभी अपने को मरने लायक नहीं समझतीं। रोज़ जगदीशपुर से १६ कहार पालकी उठाने के लिए बेगार पकड़कर आते हैं। वैद्यजी को लाना और ले जाना उनका काम है।
ठाकुर–अन्धेर है और कुछ नहीं, पुराने ज़माने में तो ख़ैर सस्ता समय था। जो दो-चार पैसे मजदूरों को मिल जाते थे, वही खाने भर को बहुत थे। आजकल तो एक आदमी का पेट भरने को एक रुपया चाहिए। यह महा अन्याय है। बेचारी प्रजा तबाह हुई जाती है। आप देखेंगे कि मैं इस प्रथा को क्योंकर जड़ से उठा देता हूँ।
मुंशी–आपसे लोगों को बड़ी आशाएँ हैं। चमारों पर भी यही आफ़त है! दस-बारह चमार रोज़ साईसी करने के लिए पकड़ बुलाए जाते हैं। सुना है, इलाके भर के चमारों ने पंचायत की है कि जो साईसी करे, उसका हुक्का पानी बन्द कर दिया जाये। अब या तो चमारों को इलाका छोड़ना पड़ेगा, या दीवान साहब को साईस नौकर रखने पड़ेंगे।
ठाकुर–चमारों को इलाके से निकालना कोई दिल्लगी नहीं है। ये लोग समझतें हैं कि अभी वही दुनिया है, जो बाबा आदम के ज़माने में थी। चारों तरफ़ देखते हैं कि ज़माना पलट गया, यहाँ तक कि किसान और मज़दूर राज्य करने लगे, पर अब भी लोगों की आँखें नहीं खुलतीं। इस देश से न जाने कब यह प्रथा मिटेगी। प्रजा तबाह हुई जाती है। आप देखेंगे, मैं रियासत को क्या कर दिखाता हूँ। कायापलट कर दूँगा। सुनता हूँ, पुलिस आये दिन इलाके में तूफान मचाती रहती है। मैं पुलिस को यहाँ कदम न रखने दूँगा। ज़ालिमों के हाथों प्रजा तबाह हुई जाती है।
मुंशी–सड़कें इतनी खराब हो गयी हैं कि एक एक्के-गाड़ी का गुजर ही नहीं हो सकता।
ठाकुर–सड़कों को दुरुस्त करना मेरा पहला काम होगा। मोटर सर्विस जारी कर दूँगा, जिसमें मुसाफ़िरों को स्टेशन से जगदीशपुर जाने में सुविधा हो। इलाकों में लाखों बीघे ऊख बोयी जाती है और उसका गुड़ या राब बनती है। मेरा इरादा है कि एक शक्कर की मिल खोल दूँ और एक अंग्रेज़ को उसका मैनेजर बना दूँ। मैं तो इन लोगों के सुप्रबन्ध का कायल हूँ। हिन्दुस्तानियों पर कभी विश्वास न करें, भूलकर भी नहीं। ये इलाके को तबाह कर देते हैं। शेखी तो नहीं मारता, इलाके में एक बार राज्यसभा स्थापित कर दूँगा, कंचन बरसने लगेगा। आपने किसी महाजन को ठीक किया?
मुंशी–हाँ, कई आदमियों से मिला था और वे बड़ी खुशी से रुपये देने के लिए तैयार हैं, केवल यही चाहते हैं कि ज़मानत के तौर पर कोई गाँव लिख दिया जाये।
ठाकुर–आपने हामी तो नहीं भर ली?
मुंशी–जी नहीं, हामी नहीं भरी; लेकिन बग़ैर ज़मानत के रुपये मिलना मुश्किल मालूम होता है।
ठाकुर–तो जाने दीजिए। कोई ऐसी ज़रूरत नहीं है, जो टाली न जा सके। अगर कोई मेरे विश्वास पर रुपये दे, तो दे दे, लेकिन रियासत की इंच भर भी ज़मीन रेहन नहीं कर सकता। मैं फ़ाके करूँ; बिक जाऊँ, लेकिन रियासत पर आँच न आने दूँगा। हाँ, इसका वायदा करता हूँ कि रियासत मिलने के साल भर बाद कौड़ी-कौड़ी सूद के साथ चुका दूँगा। सच्ची बात तो यह है कि मुझे पहले ही मालूम था कि इस शर्त पर कोई महाजन रुपये देने पर राज़ी न होगा। ये बला के चीमड़ होते हैं। मुझे को इनके नाम से चिढ़ है। मेरा वश चले, तो आज इन सभी को तोप से उड़ा दूँ। जितना डर मुझे इनसे लगता है, उतना साँप से भी नहीं लगता। इन्हीं के हाथों आज मेरी दुर्गति है, नहीं तो इस गयी बीती दशा में आज नहीं होता। इन नरपिशाचों ने सारा रक्त चूस लिया। पिताजी ने केवल पाँच हज़ार लिये थे, जिनके पचास हज़ार हो गए। पिताजी का मुझे यह अन्तिम उपदेश था कि क़र्ज कभी मत लेना। इसी शोक में उन्होंने देह त्याग दी।
यहाँ अभी यह बातें हो रही थीं कि जनानखाने में से कलह के शब्द आने लगे। मालूम होता था, कई स्त्रियों में संग्राम छिड़ा हुआ है। ठाकुर साहब ये कर्कश शब्द सुनते ही विकल हो गए, उनके माथे पर बल पड़ गए, मुख तेजहीन हो गया। यही उनके जीवन की सबसे दारुण व्यथा थी। यही काँटा था, जो नित्य उनके हृदय में खटका करता था। उनकी बड़ी स्त्री का नाम वसुमती था। वह अत्यन्त गर्वशील थी; नाक पर मक्खी भी न बैठने देती। उनकी तलवार सदैव म्यान से बाहर रहती थी। वह अपनी सपत्नियों पर उसी भाँति शासन करना चाहती थीं, जैसे कोई सास अपनी बहुओं पर करती है। वह यह भूल जाती कि ये उनकी बहुएँ नहीं, सपत्नियाँ हैं। जो उनकी हाँ में हाँ मिलाता, उस पर प्राण देती थी; किन्तु उनकी इच्छा के विरूद्ध ज़रा भी कोई बात हो जाती, तो सिंहनी का-सा विकराल रूप धारण कर लेती थी।
दूसरी स्त्री का नाम रामप्रिया था। यह रानी जगदीशपुर की सगी बहन थी। उनके पिता पुराने खिलाड़ी थे, दो दस्ती झाड़ते थे। दोधारी तलवार से लड़ते थे। रामप्रिया दया और विनम्र की मूर्ति थी, बड़ी विचारशील और वाक्मधुर; जितना कोमल अंग था, उतना कोमल हृदय भी था। वह घर में इस तरह रहती थी, मानों थी ही नहीं। उसे पुस्तकों से विशेष रुचि थी। हरदम कुछ-न-कुछ पढ़ा-लिखा करती थी। सबसे अलग-अलग रहती थी; न किसी के लेने में, न देने में, न किसी से बैर, न प्रेम।
तीसरी महिला का नाम रोहिणी था। ठाकुर साहब का उन पर विशेष प्रेम था, और वह प्राणपण से उनकी सेवा करती थी। इसमें प्रेम की मात्रा अधिक थी या माया की–इसका निर्णय करना कठिन था। उसे यह असह्य था कि ठाकुर साहब उनकी सौतों से बातचीत भी करें। वसुमती कर्कशा होने पर भी मलिन हृदय न थी, जो कुछ मन में होता, वही मुख में। एक बार मुँह से बात निकाल डालने पर फिर उसके हृदय पर उसका कोई चिह्न न रहता था। रोहिणी द्वेष को पालती थी, जैसे चिड़िया अपने अण्डे को सेती है। वह जितना मुँह से कहती थी उससे कहीं अधिक मन में रखती थी।
ठाकुर साहब ने अन्दर जाकर वसुमति ने कहा–तुम घर में रहने दोगी या नहीं? ज़रा भी शरम-लिहाज़ नहीं कि बाहर कौन बैठा हुआ है। बस, जब देखो, संग्राम मचा रहता है। इस जिन्दगी से तंग आ गया। सुनते-सुनते कलेजे में नासूर पड़ गए।
वसुमती–कर्म तो तुमने किये हैं, भोगेगा कौन?
ठाकुर–तो ज़हर दे दो। जला-जलाकर मारने से क्या फ़ायदा!
वसुमती–क्या वह महारानी लड़ने के लिए कम थीं कि तुम उनका पक्ष लेकर आ दौड़े? पूछते क्यों नहीं, क्या हुआ, जो तीरों की बौछार करने लगे?
रोहिणी–आप क्या चाहती हैं कि मैं कान पकड़कर उठाऊँ या बैठाऊँ, तो यहाँ कुछ आपके पाँव में नहीं बसी हूँ कि कोई आपसे थर-थर काँपा करूँ!
ठाकुर–आखिर कुछ मालूम भी तो हो, क्या बात हुई?
रोहिणी–वही हुई, जो रोज़ होती है। मैंने हिरिया से कहा, ज़रा मेरे सिर में तेल डाल दे। मालकिन ने उसे तेल डालते देखा, तो आग हो गईं। तलवार खींचे हुए आ पहुँची और उसका हाथ पकड़कर खींच ले गयीं। आप आज निश्चित कर दीजिए कि हिरिया उन्हीं की लौंडी है या मेरी भी। यह निश्चय किए बिना आप यहाँ से न जाने पाएँगे।
वसुमती–वह क्या निश्चय करेंगे, निश्चय मैं करूँगी। हिरिया मेरे साथ मेरे नैहर से आयी है और लौंडी है। किसी दूसरे का उस पर कोई दावा नहीं है।
रोहिणी–सुना आपने? हिरिया पर किसी का दावा नहीं है, वह अकेली उन्हीं की लौंडी है।
ठाकुर–हिरिया इस घर में रहेगी, तो उसे सबका काम करना पड़ेगा।
वसुमती यह सुनकर जल उठी। नागिन की भाँति फुफकारकर बोली–इस वक़्त तो आपने चहेती रानी की ऐसी डिग्री कर दी मानो यहाँ उन्हीं का राज्य है। ऐसे ही न्यायशील होते, तो सन्तान का मुँह देखने को न तरसते!
ठाकुर साहब को ये शब्द बाण से लगे, कुछ जवाब न दिया। बाहर आकर कई मिनट तक मर्माहत दशा में बैठे रहे। वसुमती इतनी मुँहफट है, यह उन्हें आज मालूम हुआ। सोचा, मैंने तो कोई ऐसी बात नहीं कही थी, जिस पर वह इतना झल्ला जाती। मैंने क्या बुरा कहा कि हिरिया को सबका काम करना पड़ेगा। अगर हिरिया केवल उसी का काम करती, तो दो महरियाँ और रखनी पड़ती हैं। क्या वसुमती इतना भी नहीं समझती? ताना ही देना था, तो और कोई लगती हुई बात कह देती। यह तो कठोर-से-कठोर आघात है, जो वह मुझ पर कर सकती थी। ऐसी स्त्री का तो मुँह न देखना चाहिए।
सहसा उन्हें एक बात सूझी। मुंशीजी से बोले–ज्योतिष की भविष्यवाणी के विषय में आपके क्या विचार हैं? क्या यह हमेशा सच निकलती है?
मुंशीजी असमंजस में पड़े कि इसका क्या जवाब दूँ। कैसा जवाब रुचिकर होगा–यही उनकी समझ नें न आया। अँधेरे में टटोलते हुए बोले–यह तो उसी विद्या के विषय में कहा जा सकता है, जहाँ अनुमान से काम न लिया जाएँ। ज्योतिष में बहुत कुछ पूर्व अनुभव और अनुमान ही से काम लिया जाता है।
ठाकुर–बस, ठीक यही मेरा विचार है। अगर ज्योतिष मुझे धनी बतलाए तो यह आवश्यक नहीं कि मैं धनी हो जाऊँ। ज्योतिष के धनी कहने पर भी सम्भव है कि मैं ज़िन्दगी भर कौड़ियों को मोहताज़ रहूँ। इस भाँति ज्योतिष का दरिद्र लक्ष्मी का कृपापात्र भी हो सकता है, क्यों?
मुंशीजी को अब भी पाँव ज़माने की भूमि न मिली। सन्दिग्ध भाव से बोले–हाँ, ज्योतिष की धारणा जब मनुष्यों से बदली जा सकती है, तो उसे विधि का लेख क्यों समझा जाए?
ठाकुर साहब ने बड़ी उत्सुकता से पूछा–अनुष्ठानों पर आपका विश्वास है।
मुंशीजी को ज़मीन मिल गई, बोले–अवश्य।
विशालसिंह यह तो जानते थे कि अनुष्ठानों से शंकाओं का निवारण होता है। शनि, राहु आदि का गमन करने के अनुष्ठानों से परिचित थे। बहुत दिनों से मंगल-व्रत भी रखते थे, लेकिन इन अनुष्ठानों पर अब उन्हें विश्वास न था। वह कोई ऐसा अनुष्ठान करना चाहते थे, जो किसी तरह निष्फल न हो। बोले–यदि आप यहाँ के किसी विद्वान ज्योतिषी से परिचित हों, तो कृपा करके उन्हें मेरे यहाँ से भेज दीजिएगा। मुझे एक विषय में उनसे कुछ पूछना है।
मुंशी–आज ही लीजिए, यहाँ एक से बढ़कर एक ज्योतिषी पड़े हुए हैं। आप मुझे कोई ग़ैर न समझिए। जब, जिस काम की इच्छा हो, मुझे कहला भेजिए। सिर के बल दौड़ा आऊँगा। बाज़ार से कोई अच्छी चीज़ मँगानी हो, मुझे हुक्म दीजिए। किसी वैद्य या हकीम की ज़रूरत हो, मुझे सूचना दीजिए। मैं तो जैसे महारानीजी को समझता हूँ, वैसा ही आपको भी समझता हूँ।
ठाकुर–मुझे आपसे ऐसी ही आशा है। ज़रा रानी साहब का कुशल समाचार जल्द-से-जल्द भेजिएगा। वहाँ आपके सिवा मेरा और कोई नहीं है। आप ही के ऊपर मेरा भरोसा है। ज़रा देखिएगा, कोई चीज़ इधर-उधर न होने पाए, यार लोग नोंच-खसोट न शुरू कर दें।
मुंशी–आप इससे निश्चिन्त रहें। मैं देखभाल करता रहूँगा।
ठाकुर–हो सके, तो ज़रा यह भी पता लगाइएगा कि रानी ने कहाँ-कहाँ से कितने रुपये क़र्ज़ लिये हैं।
मुंशी–समझ गया, यह तो सहज ही में मालूम हो सकता है।
ठाकुर–ज़रा इसका भी पता लगाइएगा कि आजकल उनका भोजन कौन बनाता है। पहले तो उनके मैके ही की कोई स्त्री थी। मालूम नहीं, अब भी वही बनाती है या कोई दूसरा रसोइया रखा गया है।
वज्रधर ने ठाकुर साहब के मन का भाव ताड़कर दृढ़ता से कहा–महाराज, क्षमा कीजिएगा, मैं आपका सेवक हूँ, पर रानीजी का भी सेवक हूँ। उनका शत्रु नहीं हूँ। आप और वह दोनों सिंह और सिंहनी की भाँति लड़ सकते हैं। मैं गीदड़ की भाँति अपने स्वार्थ के लिए बीच में कूदना अपमानजनक समझता हूँ। मैं वहाँ तक तो सहर्ष आपकी सेवा कर सकता हूँ, जहाँ तक रानीजी का अहित न हो। मैं तो दोनों ही द्वारों का भिक्षुक हूँ।
ठाकुर साहब दिल में शरमाएँ, पर इसके साथ मुंशीजी पर उनका विश्वास और भी दृढ़ हो गया। बात बनाते हुए बोले–नहीं-नहीं, मेरा मतलब आपने गलत समझा! छीः! छीः! मैं इतना नीच नहीं। मैं केवल इसलिए पूछता था कि नया रसोइया कुलीन है या नहीं। अगर वह सुपात्र है, तो वही मेरा भी भोजन बनाता रहेगा।
ठाकुर साब ने बात तो बनाई पर उन्हें स्वयं ज्ञात हो गया कि बात बनी नहीं। अपनी झेंप मिटाने को वह एक समाचार पत्र देखने लगे, मानो उन्हें विश्वास हो गया कि मुंशीजी ने उनकी बात सच मान ली।
इतने में हिरिया ने आकर मुँशीजी से कहा–बाबा, मालकिन ने कहा है कि आप जाने लगें तो मुझसे मिल लीजिएगा।
ठाकुर साहब ने गरजकर कहा–ऐसी क्या बात है, जिसको कहने की इतनी जल्दी है। इन बेचारे को देर हो रही है, कुछ निठल्ले थोड़े ही हैं कि बैठे-बैठे औरतों को रोना सुना करें। जा अन्दर बैठ।
यह कहकर ठाकुर साहब उठ खड़े हुए, मानों मुंशीजी को विदा कर रहे हैं। वह वसुमती को उनसे बातें करने का अवसर न देना चाहते थे। मुंशीजी को भी अब विवश होकर विदा माँगनी पड़ी।
मुंशीजी यहाँ से चले तो उनके दिल में एक शंका समायी हुई थी कि ठाकुर साहब कहीं मुझसे नाराज़ तो नहीं हो गए। हाँ, इतना संतोष था कि मैंने कोई बुरा काम नहीं किया। यदि वह सच्ची बात कहने के लिए नाराज़ हो जाते हैं, तो हो जायें। मैं क्यों रानी का बुरा चेतूँ। बहुत होगा, राजा होने पर मुझे जवाब दे देंगे। इसकी क्या चिन्ता। इस विचार से मुंशीजी और अकड़कर बैठ गए। वह इतने खुश थे, मानो हवा में उड़े जा रहे हैं। उनकी आत्मा कभी इतनी गौरवोन्मत्त न हुई थी। चिन्ताओं को कभी उन्होंने इतना तुच्छ न समझा था।
