मुंशी वज्रधर विशालसिंह के पास से लौटे, तो उनकी तारीफ़ों के पुल बाँध दिए। रईस हो, तो ऐसा हो। आँखों में कितना शील है! किसी तरह छोड़ते ही ने थे। यों समझो कि लड़कर आया हूँ। प्रजा पर तो जान देते हैं। बेगार की चर्चा सुनी, तो उनकी आँखों मे आंसू भर गए। उनके ज़माने में प्रजा चैन करेगी। यह तारीफ़ सुनकर चक्रधर को विशालसिंह से श्रद्धा-सी हो गई। उनसे मिलने गए और समिति की सभाओं में नित्य सम्मिलित होते थे। अतएव अबकी उनके यहाँ कृष्णाष्टमी का उत्सव हुआ, तब चक्रधर अपने सहवर्गियों के साथ उसमें शरीक़ हुए।
कुँवर साहब कृष्ण के परम भक्त थे। उनका जन्मोत्सव बड़ी धूमधाम से कमनाते थे। उनकी स्त्रियों में इस विषय में मतभेद था। उनके व्रत भी अलग-अलग थे। तीजों के सिवा तीनों कोई एक व्रत न रखती थीं। रोहिणी कृष्ण की उपासक थी, तो वसुमति रामनवमी रखती, ज़मीन पर सोती और दुर्गापाठ सुनती। रही रामप्रिया, वह कोई व्रत न रखती थी। कहती–इस दिखावे से क्या फ़ायदा? मन शुद्ध होना चाहिए, यही सबसे बड़ी भक्ति है। जब मन में ईर्ष्या और द्वेष की ज्वाला दहक रही हो, राग और मत्सर की आँधी चल रही हो, तो कोरा व्रत रखने से क्या होगा। ये उत्सव आपस में प्रीति बढ़ाने के लिए मनाए जाते हैं। जब प्रीति के बदले द्वेष बढ़े, तो उनका न मनाना ही अच्छा!
सन्ध्या हो गई थी। बाहर कँवल, झाड़ आदि जलाए जा रहे थे। चक्रधर अपने मित्रों के साथ बनाव-सजाव में मसरूफ़ थे। संगीत समाज के लोग आ पहुँचे थे। गाना शुरू होने वाला ही था वसुमती और रोहिणी में तकरार हो गई। वसुमती को यह तैयारियाँ एक आँख न भाती थीं। उसके रामनवमी के उत्सव में सन्नाटा-सा रहता था। विशालसिंह उस उत्सव में उदासीन रहते थे। वसुमती इसे उनका पक्षपात समझती थी। उसके विचार से उनके इस असाधारण उत्साह का कारण कृष्ण की भक्ति नहीं, रोहिणी के प्रति स्नेह था। वह दिल में जल-भुन रही थी। रोहिणी सोलहों श्रृंगार किए पकवान बना रही थी। कदचित् वसुमती को जलाने ही के लिए आप-से-आप गीत गा रही थी। घर के सब बर्तन उसी के यहाँ बिधे हुए थे। उसका यह अनुराग देख-देखकर वसुमती के कलेजे पर साँप-सा लोट रहा था। वह इस रंग में भंग मिलाना चाहती थी। सोचते-सोचते उसे एक बहाना मिल गया। महरी को भेजा, जाकर रोहिणी से कह–घर के बर्तन जल्दी खाली कर दें। दो थालियाँ दो बटलोइयाँ, कटोरे, कटोरियाँ माँग लो। उनके उत्सव के लिए दूसरे क्यों भूखे मरे। महरी गई, तो रोहिणी ने तन्नाकर कहा–आज इतनी जल्दी भूख लग गई। रोज़ तो आधी रात तक बैठी रहती थीं, आज आठ बजे ही भूख सताने लगी। अगर ऐसी ही जल्दी है, तो कुम्हारा के यहाँ से हाँडियाँ मँगवा लें। पत्तल मैं दे दूँगी।
वसुमती ने यह सुना, तो आग हो गई। हाँडियाँ चढ़ाएँ मेरे दुश्मन–जिनकी छाती फटती हो, मैं क्यों हाँडी चढ़ाऊँ? उत्सव मनाने की बड़ी साध है। तो नए बर्तन क्यों नहीं मँगवा लेती? अपने कृष्ण से कह दें, गाड़ी-भर बर्तन भेज दें। क्या जबरदस्ती दूसरों को भूखे मारेंगी?
रोहिणी रसोई से बाहर निकलकर बोली–बहन, ज़रा मुँह सँभालकर बातें करो। देवताओं का अपमान करना अच्छा नहीं।
वसुमती–अपनाम तो तुम करती हो, जो व्रत के दिन यों बन-ठनकर इठलाती फिरती हो। देवता रंग-रूप नहीं देखते, भक्ति देखते हैं।
रोहिणी–मैं बनती-ठनती हूँ, तो दूसरे की आँखें क्यों फूटती हैं? भगवान् के जन्म के दिन भी बनूँ-ठँनू? उत्सव में तो रोया नहीं जाता!
वसुमती–तो और बनो-ठनों, मेरे अँगूठे से। आँखें क्यों फोड़ती हो? आँखें फूट जायेगी, तो चुल्लू भर पानी भी ना दोगी!
रोहिणी–आज लड़ने पर उतारू हो आई हो क्या? भगवान् सब दुःख दें, पर बुरी संगत न दें। लो, यही गहने-कपड़े आँखों में गड़ रहे हैं? न पहनूँगी। जाकर बाहर कह दे, पकवान, प्रसाद किसी हलवाई से बनवा लें। मुझे क्या, मेरे मन का हाल भगवान् आप जानते हैं, पड़ेगी उनपर जिनके यह सब हो रहा है।
यह कहकर रोहिणी अपने कमरे में चली गई। सारे गहने-कपड़े उतार फेंके और मुँह ढाँपकर चारपाई पर पड़ रही। ठाकुर साहब ने यह समाचार सुना, तो माथा कूटकर बोले–इन चाण्डालिनों से आज शुभोत्सव के दिन भी शान्त नहीं बैठा जाता। इस ज़िन्दगी से तो मौत की अच्छी। घर में आकर रोहिणी से बोले–तुम मुँह ढाँपकर सो रही हो, या उठकर पकवान बनाती हो? रोहिणी ने पड़े-पड़े उत्तर दिया–फट पड़े वह सोना जिससे टूटें कान। ऐसे उत्सव से बाज़ आयी, जिसे देखकर घरवालों की छाती फटे।
विशालसिंह–तुमसे तो बार-बार कहा कि उसके मुँह न लगा करो। एक चुप सौ वक्ताओं को हरा सकती है। दो बातें सुन लो, तो तीसरी बात कहने का साहस न हो। फिर तुमसे बड़ी भी तो ठहरीं, यों भी तुमको उनका लिहाज़ करना ही चाहिए।
जिस दिन वसुमती ने विशालसिंह को व्यंग्य-बाण मारा था, जिसकी कथा हम कह चुके हैं, उसी दिन से उन्होंने उससे बोलना-चालना छोड़ दिया था, उससे कुछ डरने लगे थे, उसके क्रोध की भयंकरता का अन्दाज़ा पा लिया था। किन्तु रोहिणी क्यों दबने लगीं? यह उपदेश सुना, तो झुँझलाकर बोली–रहने भी दो, जले पर नमक छिड़कते हो! जब बड़ा देख-देखकर जले, बात-बात पर कोसे तो कोई कहाँ तक उनका लिहाज़ करे? इन्हें मेरा कहना ज़हर लगता है, तो क्या करूँ? घर छोड़कर निकल जाऊँ? वह इसी पर लगी हुई हैं। तुम्हीं ने उन्हें सिर चढ़ा लिया है न! उनसे बोलते हुए तो तुम्हारा भी कलेज़ा काँपता है। तुम न शह देते तो उनकी मजाल थी कि यों मुझे आँखें दिखातीं!
विशालसिंह–तो क्या मैं उन्हें सिखा देता हूँ कि तुम्हें गालियाँ दें? रहा, तो इसके सिवा और क्या होगा? सामने तो चुडै़ल की तरह बैठी हुई हैं, जाकर पूछते क्यों नहीं? मुँह में कालिख क्यों नहीं लगाते? दूसरा पुरुष होता, तो जूतों से बात करता, सारी शेखी किरकिरी हो जाती। लेकिन तुम तो खुद मेरी दुर्गति कराना चाहते हो। न जाने क्यों तुम्हें ब्याह का शौक़ चर्राया था?
कुँवर साहब ज्यों-ज्यों रोहिणी का क्रोध शान्त करने की चेष्टा करते थे, वह और भी बिफरती जाती थी और बार-बार कहती थी, तुमने मेरे साथ क्यों ब्याह किया। यहाँ तक कि अन्त में वह भी गर्म पड़ गए और बोले–और पुरुष स्त्रियों से विवाह करके कौन-सा सुख देते हैं, जो मैं तुम्हें नहीं दे रहा हूँ? रही लड़ाई-झगड़ों की बात। तुम न लड़ना चाहो, तो कोई ज़बरदस्ती तुमसे न लड़ेगा। आखिर रामप्रिया भी तो इसी घर में रहती है।
रोहिणी–तो मैं स्वभाव ही से लड़ाकू हूँ?
विशालसिंह–वह मैं थोड़े ही कहता हूँ।
रोहिणी–और क्या कहते हो? साफ़-साफ़ कहते हो, फिर मुकरते क्यों हो? मैं स्वभाव से ही झगड़ालू हूँ, दूसरों से छेड़-छेड़कर लड़ती हूँ। यह तुम्हें बहुत दूर की सूझी। वाह! क्या नई बात निकाली है। कहीं छपवा दो, तो खासा इनाम मिल जाएगा।
विशालसिंह–तुम बरबस बिगड़ रही हो। मैंने तो दुनिया की बात कही थी और तुम अपने ऊपर ले गईं।
रोहिणी–क्या करूँ, भगवान् ने बुद्धि ही नहीं दी। वहाँ भी ‘अंधेर नगरी और चौपट राजा’ होंगे। बुद्धि तो दो ही प्राणियों के हिस्से में पड़ी है, एक आपकी ठकुराइन के–नहीं नहीं, महारानी के–और दूसरे आपके। जो कुछ बची-खुची, वह आपके सिर में ठूँस दी गई।
विशालसिंह–अच्छा, उठकर पकवान बनाती हो कि नहीं? कुछ ख़बर है, नौ बज रहे हैं।
रोहिणी–मेरी बला जाती है! उत्सव मनाने की लालसा नहीं रही।
विशालसिंह–तो तुम नहीं उठोगी?
रोहिणी–नहीं, नहीं, नहीं। या और दो-चार बार कह दूँ?
वसुमती सायबान में बैठी हुई दोनों प्राणियों की बातें तन्मय होकर सुन रही थी।
मानों कोई सेनापति अपने प्रतिपक्षी की गति का अध्ययन कर रहा हो, कि कब यह चूके और कब मैं दबा बैठूँ। क्षण-क्षण में परिस्थिति बदल रही थी। कभी अवसर आता हुआ दिखाई देता था, फिर निकल जाता था, यहाँ तक कि अन्त में प्रतिद्वन्दी की एक भद्दी चाल ने उसे अपेक्षित अवसर दे दिया। विशालसिंह को मुँह लटकाए रोहिणी की कोठरी से निकलते देखकर बोली–क्या मेरी सूरत न देखने की कसम खाली है, या तुम्हारे हिसाब से घर में हूँ ही नहीं! बहुत दिन तो हो गए रूठे, क्या जन्म भर रूठे ही रहोगे? क्या बात है, इतने उदास क्यों हो?
विशालसिंह ने ठिठककर कहा–तुम्हारी ही लगवाई हुई आग को तो शान्त कर रहा था, पर उलटे हाथ जल गए। यह क्या रोज़-रोज़ तूफान खड़ा किया करती हो? चार दिन की जिन्दगी है, इसे हँस-खेलकर नहीं काटते बनता। मैं तो ऐसा तंग हो गया हूँ कि जी चाहता है कि कहीं भाग जाऊँ। सच कहता हूँ, ज़िन्दगी से तंग आ गया। यह सब आग तुम्हीं लगा रही हो।
वसुमती–कहाँ भागकर जाओगे? नई नवेली बहू को किस पर छोड़ोगे? नए ब्याह का कुछ सुख तो उठाया ही नहीं?
विशालसिंह–बहुत उठा चुका, जी भर गया।
वसुमती–बस, एक ब्याह और कर लो, एक ही और, जिससे चौकड़ी पूरी हो जाये।
विशालसिंह–क्यों बैठे-बैठे जलाती हो? विवाह क्या किया था, भोगविलास करने के लिए, या तुमसे कोई बड़ी सुन्दरी होगी।
वसुमती–अच्छा, आओ, सुनते जाओ।
विशालसिंह–जाने दो लोग बाहर बैठे होंगे।
वसुमती–अब यही तो नहीं अच्छा लगता। अभी घंटे-भर वहाँ बैठे चिकनी-चुपड़ी बातें करते रहे तो नहीं देर हुई; मैं एक क्षण के लिए बुलाती हूँ तो भागे जाते हो। इसी दोअक्खी की तो तुम्हें सज़ा मिल रही है।
यह कहकर वसुमती ने आकर उनका हाथ पकड़ लिया, घसीटती हुई अपने कमरे में ले गयी और चारपाई पर बैठाती हुई बोली–औरतों को सिर चढ़ाने का यही फल है। उसे तो तब चैन आये, जब घर में अकेली वही रहे। जब देखो, तब अपने भाग्य को रोया करती है, किस्मत फूट गई, माँ-बाप ने कुएँ में झोंक दिया, ज़िन्दगी खराब हो गई। यह सब मुझसे नहीं सुना जाता, यही मेरा अपराध है। तुम उसके मन के नहीं हो, सारी जलन इसी बात की है। पूछा, तुझे कोई ज़बरदस्ती निकाल लाया था, या तेरे माँ-बाप की आँखें फूट गई थीं? वहाँ तो यह मनसूबे थे कि बेटी मुँहज़ोर है ही, जाते ही जाते राजा को अपनी मुट्ठी में करके रानी बन बैठेगी। क्या मालूम था कि यहाँ उसका सिर कुचलने कोई और बैठा हुआ है। यही बातें खोलकर कह देती हूँ, तो तिलमिला उठती है और तुम दौड़ते हो मनाने। बस, उसका मिज़ाज़ और आसमान पर चढ़ जाता है। दो-दिन, दस दिन रूठी पड़ी रहने दो, फिर देखो, भीगी बिल्ली हो जाती है या नहीं। यह निरन्तर का नियम है कि लोहे को लोहा ही काटता है। कुमानुष के साथ कुमानुष बनने ही से काम चलता है। गोस्वामी तुलसीदास ने नारियों के विषय में जो कहा है, बिलकुल सच है।
विशालसिंह–यहाँ वह खटबाँस लेकर पड़ी है, अब पकवान कौन बनाए?
वसुमती–तो क्या जहाँ मुर्ग़ा न हो, वहाँ सवेरा ही न होगा? आखिर जब वह नहीं थी, तब भी तो जन्माष्टमी मनाई जाती थी। ऐसा कौन-सा बड़ा काम है? मैं बनाए देती हूँ। भगवान् थोड़े ही बाँटे हुए हैं। या मुझे जन्माष्टमी से कोई बैर है।
विशालसिंह ने पुलकित होकर कहा–बस, तुम्हारी इन्हीं बातों पर मेरी जान जाती है। कुलवन्ती स्त्रियों का, यही धर्म है। आज तुम्हारी धानी साड़ी गजब ढा रही है। कवियों ने सच कहा है, यौवन प्रौढ़ होकर और भी अजेय हो जाता है। चन्द्रमा का पूरा प्रकाश भी तो पूर्णिमा ही को होता है।
वसुमती–खुशामद करना कोई तुमसे सीखे।
विशालसिंह–जो चीज़ कम हो, वह और मँगवा लेना। विजय के गर्व से फूली हुई वसुमती आधी रात तक बैठी भाँति-भाँति के पकवान बनाती रही। द्वेष ने बरसों की सोयी हुई कृष्ण-भक्ति को जागृत कर दिया। वह इन कामों ने निपुण थी। श्रम से उसे कुछ-रुचि-सी थी। निठल्ले-न बैठा जाता था। रोहिणी जिस काम को दिन भर मर-मरकर करती, उसे वह दो घंटे में हँसते-हँसते पूर्ण कर देती थी। रामप्रिया ने उसे बहुत व्यस्त देखा, तो वह भी आ गई और दोनों मिलकर काम करने लगीं।
विशालसिंह बाहर गये और कुछ देर तक गाना सुनते रहे, पर वहाँ जी न लगा। फिर भीतर चले आये और रसोई घर के द्वार पर मोढ़ा डालकर बैठ गए। भय था कि कहीं रोहिणी कुछ कह न बैठे और दोनों फिर लड़ मरें।
वसुमती ने कहा–बाहर क्या हो रहा है?
विशालसिंह–गाना शुरू हो गया है। तुम इतनी महीन पूरियाँ कैसे बनाती हो? फट नहीं जाती!
वसुमती–चाहूँ तो इससे भी महीन बेल दूँ, काग़ज मात हो जाये।
विशालसिंह–मगर खिलेंगी न?
वसुमती–खिलाकर दिखा दूँ। डब्बे-सी न फूल जाये तो कहना। अभी महारानी नहीं उठीं क्या? इसमें छिपकर बातें सुनने की बुरी लत है। न जाने क्या चाहती है। बहुत औरतें देखीं, लेकिन इसके ढंग सबसे निराले हैं। मुहब्बत तो इसे छू नहीं गई। अभी तुम तीन दिन बाहर कराहते रहे, पर कसम ले लो, जो उसका मन ज़रा भी मैला हुआ हो। हम लोगों के प्राण तो नखों में समा गए थे, रात-दिन देवी-देवता मनाया करती थीं, वहाँ पान चबाने, आईना देखने और माँग-चोटी करने के सिवा दूसरा कोई काम ही न था। ऐसी औरतों पर कभी विश्वास न करे।
विशालसिंह–सब देखता हूँ और समझता हूँ, निरा गधा नहीं हूँ।
वसुमती–यही तो रोना है कि तुम देखकर भी नहीं देखते, समझकर भी नहीं समझते। जहाँ उसने मुस्कुराकर, आँखें मटकाकर बातें कीं, मस्त हो गए। लल्लों-चप्पो किया करते हो। थरथर काँपते रहते हो कि कहीं रानी नाराज़ न हो जाये। आदमी मे सब ऐब हों, किन्तु मेहर-बस न हो। ऐसी कोई बड़ी सुन्दर भी तो नहीं है...।
रामप्रिया–एक समय सखि सुअर सुन्दर! जवानी में कौन नहीं सुन्दर होता?
वसुमती–उसके माथे से तो तुम्हारे तलुवे अच्छे। सात जन्म ले, तो भी तुम्हारे गर्द को न पहुँचे।
विशालसिंह–मैं मेहर-बस हूँ?
वसुमती–और क्या हो?
विशालसिंह–मैं उसे ऐसी-ऐसी बातें कहता हूँ कि वह भी याद करती होगी। घंटों रुलाता हूँ।
वसुमती–क्या जाने, यहाँ तो जब देखती हूँ, मुस्कुराते देखती हूँ। कभी आँखों में आँसू न देखा।
रामप्रिया–कड़ी बात भी हँसकर कहीं जाये, तो मीठी हो जाती है।
विशालसिंह–हँसकर नहीं कहता। बहुत डाँटता हूँ, फटकारता हूँ। लौंडा नहीं हूँ कि सूरत पर लट्टू हो जाऊँ।
वसुमती–डाँटते होंगे मगर प्रेम के साथ। ढलती उम्र में सभी मर्द तुम्हारे ही जैसे हो जाते हैं। कोई नई बात नहीं है। मैं तुमसे लाख रूठी रहूँ लेकिन तुम्हारा मुँह ज़रा भी गिरा देखा और जान निकल गई। सारा क्रोध हवा हो जाता है। वहाँ जब तक जाकर पैर न सहलाओं तलुओं में आँखें न मलो, देवीजी सीधी ही नहीं होतीं। कभी-कभी तुम्हारी लम्पटता पर मुझे हँसी आती है। आदमी कड़े दम होना चाहिए। जिसका अन्याय देखे, उसे डाँट दे, बुरी तरह डाँट दे, खून पी लेने पर उतारू हो जाये। ऐसे ही पुरुषों से स्त्रियाँ प्रेम करती हैं। भय बिना प्रीति नहीं होती। आदमी ने स्त्री की पूजा की कि वह उनकी आँखों से गिरा। जैसे घोड़ा पैदल और सवार पहचानता है, उसी तरह औरत भी भड़ुए और मर्द को पहचानती है। जिसने सच्चा आसन ज़माया और लगाम कड़ी रखी, उसी की जय। जिसने रास ढीली कर दी, उसकी कुशल नहीं।
रामप्रिया मुँह फेर मुस्कुराती और बोली–बहन, तुम सब गुर बताए देती हो, किसके माथे जाएगी?
वसुमती–हम लोगों की लगाम कब ढीली थी?
रामप्रिया–जिसकी लगाम कभी कड़ी न थी, वह आज लगभग तानने से थोड़े ही काबू में आयी जाती है, और भी दुलत्तियाँ झाड़ने लगेगी।
विशालसिंह–मैंने तो अपनी जान में कभी लगाम ढीली नहीं की। आज ही देखा, कैसी फटकार बतायी।
वसुमती–क्या कहना है, ज़रा मूँछे खड़ी कर लो, लाओ, पगिया मैं सँवार दूँ। यह नहीं कही कहते कि उसने ऐसी-ऐसी चोटें कीं कि भागते ही बनी!
सहसा किसी के पैरों की आहट पाकर वसुमती ने द्वार की ओर देखा। रोहिणी रसोई के द्वार से दबे पाँव चली जा रही थी। मुँह का रंग उड़ गया। दाँतों से होंठ दबाकर बोली–छिपी खड़ी थी। मैंने साफ़ देखा। अब घर में रहना मुश्किल है। देखो, क्या रंग लाती है।
विशालसिंह ने पीछे की ओर संशक नेत्रों से देखकर कहा–बड़ा ग़ज़ब हुआ। चुड़ैल सब सुन गई होगी। मुझे ज़रा भी आहट न मिली।
वसुमती–ऊँह, रानी रूठेंगी, अपना सुहाग लेंगी। कोई कहाँ तक डरे? आदमियों को बुलाओ, यह, सामान यहाँ से ले जायें।
भादों की अँधेरी रात थी। हाथ-को-हाथ न सूझता था। मालूम होता था, पृथ्वी पाताल में चली गयी है या किसी विराट जन्तु ने उसे निगल लिया है। मोमबत्तियों का प्रकाश तिमिर सागर में पाँव रखते काँपता था। विशालसिंह भोग के पदार्थ थालियों में भरवा-भरवाकर बाहर रखवाने में लगे हुए थे। कोई केले छील रहा था, कोई खीरे काटता था, कोई दोनों में प्रसाद सजा रहा था। एकाएक रोहिणी एक चादर ओढ़े हुए घर से निकली और बाहर की ओर चली। विशालसिंह दहलीज़ के द्वार पर खड़े थे। इस अंधेरी रात में उसे यों निश्शंक भाव से निकलते देखकर उनका रक्त खौलने लगा। ज़रा भी न पूछा, कहाँ जाती हो, क्या बात है? मूर्ति की भाँति खड़े रहे। दिल ने कहा–जिसने इतनी बेहयाई की, उससे और क्या आशा की जा सकती है? वह जहाँ जाती हो, जाए; जो जी में आये, करे। जब उसने मेरा सिर ही नीचा कर दिया, तो मुझे उसकी क्या परवाह? बेहया, निर्लज्ज तो है ही, कुछ पूछूँ और गालियाँ देने लगे, तो मुँह में और भी कालिख लग जाए। अब उसको मेरी परवाह नहीं, तो मैं क्यों उसके पीछे दौड़ूँ? और लोग अपने-अपने काम में लगे हुए थे। रोहिणी पर किसी की निग़ाहें न पड़ीं।
इतने में चक्रधर उनसे कुछ पूछने आये, तो देखा कि महरी उनके सामने खड़ी है और क्रोध से आँखें लाल किए कह रहे हैं–अगर वह मेरी लौंडी नहीं है, तो मैं भी उसका गुलाम नहीं हूँ। अगर वह स्त्री होकर इतना आपे से बाहर हो सकती है, तो मैं पुरुष होकर उसके पैरों पर सिर न रखूँगा। इच्छा हो, जाये, मैंने तिलांजलि दे दी। अब इस घर में कदम न रखने दूँगा। (चक्रधर को देखकर) आपने भी तो उसे देखा होगा?
चक्रधर–किसे? मैं तो केले छील रहा था। कौन गया है?
विशालसिंह–मेरी छोटी पत्नीजी रूठकर बाहर चली गयी हैं। आपसे घर का वास्ता है। आज औरतों में किसी बात पर तकरार हो गई। अब तक तो मुँह फुलाए पड़ी रहीं, अब यह सनक सवार हुई। मेरा धर्म नहीं है कि मैं उसे मनाने जाऊँ। आप धक्के खायेगी। उसके सिर पर कुबुद्धि सवार है।
चक्रधर–किधर गयी हैं महरी?
महरी–क्या जानूँ, बाबूजी? मैं तो बर्तन माँज रही थी। सामने ही गयी होंगी।
चक्रधर ने लपककर लालटेन उठा ली और बाहर निकलकर दाएँ-बाएँ निगाहें दौड़ाते, तेजी से कदम बढ़ाते हुए चले। कोई दो सौ कदम गये होंगे कि रोहिणी एक वृक्ष के नीचे खड़ी दिखलाई दी। ऐसा मालूम होता था कि वह छिपने के लिए कोई जगह तलाश कर रही है। चक्रधर उसे देखते ही लपककर समीप जा पहुँचे और कुछ कहना ही चाहते थे कि रोहिणी खुद बोली–क्या मुझे पकड़ने आये हो? अपना भला चाहते हो तो लौट जाओ, नहीं तो अच्छा न होगा। मैं उन पापियों का मुँह न देखूँगी।
चक्रधर–आप इस अँधेरे में कहाँ जायेंगी? हाथ को हाथ सूझता नहीं।
रोहिणी–अँधेरे में डार उसे लगता है, जिसका कोई अवलम्ब हो। जिसका संसार में कोई नहीं, उसे किसका भय? गला काटनेवाले अपने होते हैं, पराए गला नहीं काटते। जाकर कह देना, अब आराम से टाँगें फैलाकर सोएँ, अब तो काँटा निकल गया।
च्रकधर–आप कुँवर साहब के साथ बड़ा अन्याय कर रही हैं। बेचारे लज्जा और शोक से खड़े रो रहे हैं।
रोहिणी–क्यों बाते बनाते हो? वह रोएँगे, और मेरे लिए? मैं जिस दिन मर जाऊँगी, उस दिन घी के चिराग़ जलेंगे। संसार में ऐसे अभागे प्राणी भी होते हैं। अपने माँ-बाप को क्या कहूँ? ईश्वर उन्हें नरक में भी चैन न दे। सोचे थे, बेटी रानी हो जायेगी, तो हम राज करेंगे। यहाँ जिस दिन डोली से उतरी, उसी दिन से सिर पर विपत्ति सवार हुई। पुरुष रोगी हो, बूढ़ा हो, दरिद्र हो, पर नीच न हो। ऐसा नीच और निर्दयी आदमी संसार में न होगा। नीचों के साथ नीच बनना ही पड़ता है।
चक्रधर–आपके यहाँ खड़े होने से कुँवर साहब का कितना अपमान हो रहा है, इसकी आपको ज़रा भी फ़िक्र नहीं?
रोहिणी–तुम्हीं ने तो मुझे रोक रक्खा है।
चक्रधर–आखिर आप कहाँ जा रही हैं?
रोहिणी–तुम पूछनेवाले कौन होते हो? मेरा जहाँ जी चाहेगा, जाऊँगी। उनके पाँव में मेंहदी रची हुई थी। उन्होंने मुझे घर से निकलते भी देखा था। क्या इसका मतलब यह नहीं है कि अच्छा हुआ, सिर से बला टली। दुत्कार सहकर जीने से मर जाना अच्छा है।
चक्रधर–आपको मेरे साथ चलना होगा।
रोहिणी–तुम्हें यह कहने का क्या अधिकार है?
चक्रधर–जो अधिकार सचेत को अचेत पर, सजान को अंजान पर होता है। वही अधिकार मुझे आपके ऊपर है। अन्धे को कुएँ में गिरने से बचाना हर एक प्राणी का धर्म है।
रोहिणी–मैं न अचेत हूँ, न अंधी। स्त्री होने ही से बावली नहीं हो गई हूँ। जिस घर में मेरा पहनना-ओढ़ना, हँसना-बोलना देख-देखकर दूसरों की छीती फटती है, जहाँ कोई अपनी बात तक नहीं पूछता, जहाँ तरह-तरह के आक्षेप लगाए जाते हैं। उस पर मैं कदम न रखूँगी।
यह कहकर रोहिणी आगे बढ़ी कि चक्रधर ने सामने खड़े होकर कहा–आप आगे नहीं जा सकतीं।
रोहिणी–जबरदस्ती रोकोगो?
चक्रधर–हाँ, जबरदस्ती रोकूँगा।
रोहिणी–सामने से हट जाओ।
चक्रधर–मैं आपको कदम भी आगे न रखने दूँगा। सोचिए, आप अपनी अन्य बहनों को किस कुमार्ग पर ले जा रही हैं? जब वे देखेंगी कि बड़े-बड़े घरों की स्त्रियाँ भी रूठकर घर से निकल खड़ी होती हैं, तो उन्हें भी ज़रा-ज़रा सी बात पर ऐसा ही साहस होगा या नहीं? नीति के विरुद्घ कोई काम करने का फल अपने ही तक नहीं रहता, दूसरों पर उसका और भी बुरा असर पड़ता है।
रोहिणी–मैं चुपके से चली जाती थी, तुम्हीं तो ढिंढोरा पीट रहे हो।
चक्रधर–जिस तरह रण से भागते हुए सिपाही को देखकर लोगों को उससे घृणा होती है–यहाँ तक कि उसका वध कर डालना भी पाप नहीं समझा जाता, उसी तरह कुल में कलंक लगानेवाली स्त्रियों से भी सबको घृणा हो जाती है और कोई उनकी सूरत तक नहीं देखना चाहता। हम चाहते हैं कि सिपाही गोली और आग के सामने अटल खड़ा रहे। उसी तरह हम यह भी चाहते हैं कि स्त्री सब झेलकर अपनी मर्यादा का पालन करती रहे! हमारा मुँह हमारी देवियों से उज्जवल है और जिस दिन हमारी देवियाँ इस भाँति मर्यादा की हत्या करने लगेंगी, उसी दिन हमारा सर्वनाश हो जायेगा।
रोहिणी रुँधे हुए कण्ठ से बोली–तो क्या चाहते हो कि मैं फिर उसी आग में जलूँ?
चक्रधर–हाँ, यही चाहता हूँ। रणक्षेत्र में फलों की वर्षा नहीं होती। मर्यादा की रक्षा करना उससे कहीं कठिन है।
रोहिणी–लोग हँसेंगे कि घर से निकली तो थी बड़े दिमाग़ से, आखिर झख मारकर लौट आयी।
चक्रधर–ऐसा वही कहेंगे, जो नीच और दुर्जन हैं। समझदार लोग तो आपकी सराहना ही करेंगे।
रोहिणी ने कई मिनट तक आगा-पीछा करने के बाद कहा–अच्छा चलिए आप भी क्या कहेंगे। कोई बुरा कहे या भला। हाँ, कुँवर साहब को इतना ज़रूर समझा दीजिएगा कि जिन महारानी को आज वह घर की लक्ष्मी समझे हुए हैं, वह वह दिन उनको बड़ा धोखा देगी। मैं कितनी ही आपे से बाहर हो जाऊँ पर अपने ही प्राण दूँगी। वह बिगड़ेगी तो प्राण लेकर छोड़ेगी। आप किसी मौक़े से ज़रूर समझा दीजिएगा।
यह कहकर रोहिणी घर की ओर लौट पड़ी, लेकिन चक्रधर का उसके ऊपर कहाँ तक असर पड़ा और कहाँ तक स्वयं अपनी सहज बुद्धि का, इसका अनुमान कौन कर सकता है? वह लौटते वक़्त लज्जा से सिर नहीं गड़ाए हुए थी। गर्व से उसकी गर्दन उठी हुई थी। उसने अपनी टेक को मर्यादा की वेदी पर बलिदान कर दिया था, पर इसके साथ ही उन व्यंग्य-वाक्यों की रचना भी कर ली थी, जिससे वह कुँवर साहब का स्वागत करना चाहती थी।
जब दोनों आदमी घर पहुँचे, तो विशालसिंह अभी तक वहीं मूर्तिवत् खड़े थे, महरी भी खड़ी थी। भक्तजन अपना-अपना काम छोड़कर लालटेन की ओर ताक रहे थे। सन्नाटा छाया हुआ था।
रोहिणी ने दहलीज़ में कदम रखा, मगर ठाकुर साहब ने उसकी ओर आँख उठाकर भी न देखा। जब वह अन्दर चली गयी, तो उन्होने चक्रधर का हाथ पकड़ लिया और बोले–मैं तो समझता था, किसी तरह न आएगी, मगर आप खींच ही लाए। क्या बहुत बिगड़ती थी?
चक्रधर ने कहा–आपको कुछ नहीं कहा। मुझे तो बहुत समझदार मालूम होती हैं। हाँ, मिज़ाज़ नाजुक हैं, बात बर्दाश्त नहीं कर सकतीं।
विशालसिंह–मैं यहाँ से टला तो नहीं, लेकिन सच पूछिए तो ज़्यादती मेरी ही थी। मेरा क्रोध बहुत बुरा है। अगर आप न पहुँच जातें, तो बड़ी मुश्किल पड़ती। जान पर खेल जानेवाली स्त्री है। आपका यह एहसान कभी न भूलूँगा। देखिए तो, सामने कुछ रोशनी-सी मालूम हो रही है, बैण्ड भी बज रहा है। क्या माज़रा है?
चक्रधर–हाँ, मशालें और लालटेनें हैं। बहुत-से आदमी भी साथ हैं। आदमी कतार बाँधे मशालों और लालटेनों के साथ चले आ रहे थे, आगे-आगे दो अश्वारोही भी नज़र आते थे। बैण्ड की मनोहर ध्वनि आ रही थी। सब खड़े-खड़े देख रहे थे; पर किसी की समझ में न आता था कि माज़रा क्या है?
