Cover Image for Kayakalp (कायाकल्प) by Munshi Premchand - Novel
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उपन्यास•1926•57 अध्याय•17h 56m

कायाकल्प

Kayakalp

प्रेमचंद का उपन्यास 'कायाकल्प' सामाजिक और राजनीतिक संघर्ष, हिंदू-मुस्लिम संबंधों, प्रेम, सत्ता, पुनर्जन्म और नैतिक परिवर्तन के प्रश्नों को एक साथ प्रस्तुत करता है।

पात्र:चक्रधर, मनोरमा, अहिल्या, राजा विशालसिंह, देवप्रिया, शंखधर, यशोदानंदन, ख्वाजा महमूद, मुंशी वज्रधर, लोंगी
सेटिंग:20वीं सदी के प्रारंभ में उत्तर भारत, विशेष रूप से आगरा और जगदीशपुर का रियासती राज्य

अध्याय 7 / 57

19 मिनट पठन • 2,734 शब्द

अध्याय 7: कायाकल्प

चक्रधर की कीर्ति उनसे पहले ही बनारस पहुँच चुकी थी। उनके मित्र और अन्य लोग उनसे मिलने के लिए उत्सुक हो रहे थे। बार-बार आते थे और पूछकर लौट जाते थे। जब वह पाँचवें दिन घर पहुँचे, तो लोग मिलने और बधाई देने आ पहुँचे। नगर का सभ्य समाज मुक्त कंठ से उनकी तारीफ़ कर रहा था। यद्यपि चक्रधर गंभीर आदमी थे, पर अपनी कीर्ति की प्रशंसा से उन्हें सच्चा आनन्द मिल रहा था। मुसलमानों की संख्या के विषय में किसी को भ्रम होता, तो वह तुरन्त उसे ठीक कर देते थे–एक हज़ार! अजी, पूरे पाँच हज़ार आदमी थे और सबी की त्योरियाँ चढ़ी हुई थीं। मालूम होता था, मुझे खड़ा निगल जाएँगे। जान पर खेल गया और क्या कहूँ। कुछ लोग ऐसे भी थे, जिन्हें चक्रधर की वह अनुनय-विनय अपमान जान पड़ती थी। उनका ख़्याल था कि इससे तो मुसलमान और भी शेर हो गए होंगे। इन लोगों से चक्रधर को घण्टों बहस करनी पड़ी, पर वे कायल न हुए। मुसलमानों में भी चक्रधर की तारीफ़ हो रही थी। दो-चार आदमी मिलने भी आए, लेकिन हिन्दुओं का जमघट देखकर लौट गये।

और लोग तो तारीफ़ कर रहे थे, पर मुंशी वज्रधर लड़के की नादानी पर बिगड़ रहे थे–तुम्हीं को क्यों यह भूत सवार हो जाता है? क्या तुम्हारी ही जान सस्ती है। तुम्हीं को अपनी जान भारी पड़ी है? क्या वहाँ और लोग न थे, फिर तुम क्यों आग में कूदने गये? मान लो, मुसलमानों ने हाथ चला दिया होता, तो क्या करते? फिर तो कोई साहब पास न फटकते! ये हज़ारों आदमी, जो आज, खुशी के मारे फूले नहीं समाते, बात तक न पूछते।

निर्मला तो इतनी बिगड़ी कि चक्रधर से बात तक न करना चाहती थी।

शाम को चक्रधर मनोरमा के घर गये। वह बगीचे में दौड़-दौड़कर हजारे से पौधों को सींच रही थी। पानी से कपड़े लथपथ हो गए थे। उन्हें देखते ही हजारा फेंककर दौड़ी और पास आकर बोली–आप कब आये बाबूजी? मैं पत्रों में रोज़ वहाँ का समाचार देखती थी और सोचती थी, आप यहाँ आएँगे, तो आपकी पूजा करूँगी। आप न होते तो वहाँ ज़रूर दंगा हो जाता। आपको बिगड़े हुए मुसलमानों के सामने अकेले जाते हुए ज़रा भी शंका न हुई?

चक्रधर ने कुर्सी पर बैठते हुए कहा–ज़रा भी नहीं। मुझे तो यही धुन थी कि इस वक़्त क़ुर्बानी न होने दूँगा, इसके बिना दिल में और कोई ख़याल न था। अब सोचता हूँ, तो आश्चर्य होता है कि मुझमें इतना बल और साहस कहाँ से आ गया था। मैं तो यही कहूँगा कि मुसलमानों को लोग नाहक बदनाम करते हैं। फ़साद से वे भी उतना ही डरते हैं, जितना हिन्दू। शान्ति की इच्छा भी उनमें हिन्दुओं से कम नहीं है। लोगों का यह ख़याल कि मुसलमान लोग हिन्दुओं पर राज्य करने का स्वप्न देख रहे हैं, बिल्कुल ग़लत है। मुसलमानों को केवल यह शंका हो गई है कि हिन्दू उनसे पुराना बैर चुकाना चाहते हैं और उनकी हस्ती को मिटा देने की फ़िक्र कर रहे हैं। इसी भय से वे ज़रा-ज़रा-सी बातों पर तिनक उठते हैं और मरने-मारने पर आमादा हो जाते हैं।

मनोरमा–मैंने तो जब पढ़ा कि आप उन बौखलाए हुए आदमियों के सामने निःशंक भाव से खड़े थे, तो मेरे रोंगटे खड़े हो गए। आगे पढ़ने ही हिम्मत न पड़ती थी कि कहीं कोई बुरी खबर न हो। क्षमा कीजिएगा, मैं उस समय वहाँ होती, तो आपको पकड़कर खींच लाती। आपको अपनी जान का ज़रा मोह नहीं है।

चक्रधर–(हँसकर) जान और है ही किसलिए? पेट पालने ही के लिए तो आदमी नहीं बनाए गए हैं। हमारे जीवन का आदर्श कुछ तो ऊँचा होना चाहिए, विशेषकर उन लोगों का, जो सभ्य कहलाते हैं। ठाठ से रहना ही सभ्यता नहीं।

मनोरमा–(मुस्कुराकर) अच्छा, अगर इस वक़्त आपको पाँच लाख रुपये मिल जाए, तो आप लें या न लें?

चक्रधर–कह नहीं कहता, मनोरमा, उस वक़्त दिल की क्या हालत हो। दान तो न लूँगा, पड़ा हुआ धन भी न लूँगा; लेकिन अगर किसी ऐसी विधि से मिले कि उसे लेने में आत्मा की हत्या न होती हो, तो शायद मैं प्रलोभन को रोक न सकूँ, पर इतना अवश्य कह सकता हूँ कि उसे भोग-विलास में न उड़ाऊँगा। धन की मैं निन्दा नहीं करता, उससे मुझे डर लगता है। दूसरों का आश्रित बनना तो लज्जा की बात है; लेकिन जीवन को इतना सरल रखना चाहता हूँ कि सारी शक्ति धन कमाने और अपनी ज़रूरतों को पूरा करने ही में न लगानी पड़े।

मनोरमा–धन के बिना परोपकार भी नहीं हो सकता।

चक्रधर–परोपकार मैं नहीं करना चाहता, मुझमें इतना सामर्थ्य ही नहीं। यह तो वे ही लोग कर सकते हैं, जिन पर ईश्वर की कृपादृष्टि हो। मैं परोपकार के लिए अपने जीवन को सरल नहीं बनाना चाहता; बल्कि अपने उपकार के लिए, अपनी आत्मा के सुधार के लिए। मुझे अपने ऊपर भरोसा नहीं है कि धन पाकर भी भोग में न पड़ जाऊँ। इसलिए मैं उससे दूर ही रहता हूँ।

मनोरमा–अच्छा, अब यह तो बताइए कि आपसे वधूजी ने क्या बातें कीं? (मुस्कुराकर) मैं तो जानती हूँ, आपने कोई बातचीत न की होगी, चुपचाप लजाए बैठे रहे होंगे। उसी तरह वह भी आपके सामने आकर खड़ी हो गई होंगी और खड़ी-खड़ी चली गई होंगी।

चक्रधर शरम से सिर झुकाकर बोले–हाँ, मरोरमा, हुआ तो ऐसा ही। मेरी समझ ही में न आता था कि क्या करूँ। उसने दो-एक बार कुछ बोलने का साहस भी किया।

मनोरमा–आपको देखकर खुश तो बहुत हुई होंगी?

चक्रधर–(शरमाकर) किसी के मन का हाल मैं क्या जानूँ!

मनोरमा ने अत्यन्त सरल भाव से कहा–सब मालूम हो जाता है। आप मुझसे बता नहीं रहे हैं। कम-से-कम उनकी इच्छा तो मालूम हो ही गई होगी।। मैं तो समझती हूँ, जो विवाह लड़की की इच्छा के विरूद्ध किया जाता है, वह विवाह ही नहीं है। आपका क्या विचार है?

चक्रधर बड़े असमंजस में पड़े। मनोरमा से ऐसी बातें करते उन्हें संकोच होता था। डरते थे कि कहीं ठाकुर साहब को ख़बर मिल जाए। सरला मनोरमा ही कह दे–तो वह समझेंगे, मैं इसके सामाजिक विचारों में क्रान्ति पैदा करना चाहता हूँ। अब तक उन्हें ज्ञान न था कि ठाकुर साहब किस विचारों के आदमी हैं। हाँ, उनके गंगा-स्नान से आभास होता था कि वह सनातन धर्म के भक्त हैं। सिर झुकाकर बोले–मनोरमा, हमारे यहाँ विवाह का आधार प्रेम और इच्छा पर नहीं, धर्म और कर्तव्य पर रखा गया है। इच्छा चंचल है, क्षण-क्षण में बदलती रहती है। कर्तव्य स्थायी है, उसमें कभी परिवर्तन नहीं होता।

मनोरमा–अगर यह बात है, तो पुराने जमाने में स्वयंवर क्यों होते थे?

चक्रधर–स्वयंवर में कन्या की इच्छा ही सर्वप्रधान नहीं होती थी। वह वीर-युग था और वीरता ही मनुष्य का सबसे उज्ज्वल गुण समझा जाता था। लोग आजकल वैवाहिक प्रथा सुधारने का प्रयत्न तो कर रहे हैं।

मनोरमा–जानती हूँ, लेकिन कहीं सुधार हो रहा है? माता-पिता धन देखकर लट्टू हो जाते हैं। इच्छा अस्थायी है, मानती हूँ, लेकिन एक बार अनुमति देने के बाद फिर लड़की को पछताने के लिए कोई हीला नहीं रहता।

चक्रधर–अपने मन को समझाने के लिए तर्कों की कभी कमी नहीं रहती, मनोरमा! कर्तव्य ही ऐसा आदर्श है, जो कभी धोखा नहीं दे सकता।

मनोरमा–हाँ, लेकिन आदर्श तो आदर्श ही रहता है, यथार्थ नहीं हो सकता। (मुस्कुराकर) यदि आप ही का विवाह किसी कानी, काली-कलूटी स्त्री से हो जाए, तो क्या आपको दुःख न होगा? बोलिए! क्या आप समझते हैं कि लड़की का विवाह किसी खूसट से हो जाता है, तो उसे दुःख नहीं होता। उसका बस चले तो वह पति का मुँह तक न देखे। लेकिन इन बातों को जाने दाजिए। वधूजी बहुत सुन्दर हैं?

चक्रधर ने बात टालने के लिए कहा–सुन्दरता मनोभावों पर होती है। माता अपने कुरूप बालक को भी सुन्दर समझती है।

मनोरमा–आप तो ऐसी बातें कर रहे हैं, जैसे भागना चाहते हों। क्या माता किसी सुंदर बालक को देखकर यह नहीं सोचती कि मेरा भी बालक ऐसा ही होता!

चक्रधर ने लज्जित होकर कहा–मेरा आशय यह न था। मैं यही कहना चाहता था कि सुन्दरता के विषय में सबकी राय एक-सी नहीं हो सकती।

मनोरमा–आप फिर भागने लगे। मैं जब आपसे यह प्रश्न करती हूँ, तो उसका साफ़ मतलब यह है आप उन्हें सुन्दर समझते हैं या नहीं?

चक्रधर लज्जा से सिर झुकाकर बोले–ऐसी बुरी तो नहीं है।

मनोरमा–तब तो आप उन्हें खूब प्यार करेंगे?

चक्रधर–प्रेम केवल रूप का भक्त नहीं होता।

सहसा घर के अन्दर से किसी के कर्कश शब्द कान में आये, फिर लौंगी का रोना सुनाई दिया। चक्रधर ने पूछा–यह लौंगी रो रही है?

मनोरमा–जी हाँ! आपकी तो भाई साहब से भेंट नहीं हुई। गुरुसेवक सिंह नाम है। कई महीनों से देहात में ज़मींदारी का काम करते हैं। हैं तो सगे भाई और पढ़े-लिखे भी खूब हैं; लेकिन भलमनसी छू भी नहीं गई। जब आते हैं लौंगी अम्माँ से झूठमूठ तकरार करते हैं। न जाने उससे इन्हें क्या अदावत है।

इतने में गुरुसेवक सिंह साल-लाल आँखें किए निकल आये और मनोरमा से बोले–बाबूजी कहाँ गए हैं? तुझे मालूम है कब तक आएँगे? मैं आज ही फैसला कर लेना चाहता हूँ।

गुरुसेवक सिंह की उम्र २५ वर्ष से अधिक न थी। लम्बे, छरहरे एवं रूपवान थे; आँखों पर ऐनक थी, मुँह में पान का बीड़ा, देह पर तनज़ेब का कुरता, माँग निकली हुई। बहुत शौक़ीन आदमी थे।

चक्रधर को बैठे देखकर वह कुछ झिझके और अन्दर लौटना ही चाहते थे कि लौंगी रोती हुई आकर चक्रधर के पास खड़ी हो गई और बोली–बाबूजी, इन्हें समझाइए कि मैं अब बुढ़ापे में कहाँ जाऊँ? इतनी उम्र तो इस घर में कटी, अब किसके द्वार पर जाऊँ? जहाँ इतने नौकरों-चाकरों के लिए खाने को रोटियाँ हैं, क्या वहाँ मेरे लिए एक टुकड़ा भी नहीं? बाबूजी, सच कहती हूँ, मैंने इन्हें अपना दूध पिलाकर पाला है; मालकिन के दूध न होता था, और अब यह मुझे घर से निकालने पर तुले हुए हैं।

गुरुसेवक सिंह की इच्छा तो न थी कि चक्रधर से इस कलह के संबंध में कुछ कहें; लेकिन जब लौंगी ने उन्हें पंच बनाने में संकोच न किया, तो वह भी खुल पड़े। बोले–महाशय, इससे यह पूछिए कि अब यह बुढ़िया हुई, इसके मरने के दिए आए, क्यों नहीं किसी तीर्थस्थान में जाकर अपने कलुषित जीवन के बचे दिन काटती? मैंने दादाजी से कहा था कि इसे वृन्दावन पहुँचा दीजिए, और वह तैयार भी हो गए थे; पर इसने सैकड़ों बहाने किए और न गयी। आपसे अब तो कोई परदा नहीं है, इसके कारण मैंने यहाँ रहना छोड़ दिया। इसके साथ इस घर में रहते हुए मुझे लज्जा आती है। इसे इसकी ज़रा भी परवाह नहीं कि जो लोग सुनते होंगे, वे दिल में क्या कहते होंगे। हमें कहीं मुँह दिखाने को जगह नहीं रही। मनोरमा अब सयानी हुई। उसका विवाह करना है या नहीं? इसके घर में रहते हुए हम किस भले आदमी के द्वार पर जा सकते हैं? मगर इसे इन बातों की बिल्कुल चिन्ता नहीं। बस, मरते दम तक घर की स्वामिनी बनी रहना चाहती है। दादाजी भी सठिया गए हैं, उन्हें मान-अपमान की ज़रा भी फ़िक्र नहीं। इसे उन पर न जाने क्या मोहिनी डाल दी है कि इसके पीछे मुझसे लड़ने पर तैयार रहते हैं। आज मैं निश्चय करके आया हूँ कि इसे घर से बाहर निकालकर ही छोड़ूँगा। या तो यह किसी दूसरे मकान में रहे या किसी तीर्थ-स्थान को प्रस्थान करे।

लौंगी–तो बच्चा सुनो, जब तक मालिक जीता है, लौंगी इसी घर में रहेगी और इसी तरह रहेगी। जब वह न रहेगा, तो जो सिर पर प़ड़ेगी, झेल लूँगी। जो तुम चाहो कि लौंगी गली-गली ठोकरें खाए तो यह न होगा! मैं लौंडी नहीं हूँ कि घर से बाहर रहूँ। तुम्हें यह कहते लज्जा नहीं आती? चार भाँवरें फिर जाने से ही ब्याह नहीं हो जाता। मैंने अपने मालिक की जितनी सेवा की है और करने को तैयार हूँ, उतनी कौन ब्याहता करेगी। लाए तो हो बहू, कभी उठकर एक लुटिया पानी भी देती है? खायी है कभी उसकी बनाई हुई कोई चीज़? नाम से कोई ब्याहता नहीं होती, सेवा और प्रेम से होती है।

गुरुसेवक–यह तो मैं जानता हूँ कि तुझे बातें बहुत करनी आती हैं; पर अपने मुँह से जो चाहे बने, मैं तुझे लौंडी ही समझता हूँ।

लौंगी–तुम्हारे समझने से क्या होता है; अभी तो मेरा मालिक जीता है। भगवान् उसे अमर करें! जब तक जीती हूँ, इसी तरह रहूँगी, चाहे तुम्हें अच्छा लगे या बुरा, जिसने जवानी में बाँह पकड़ी, वह क्या अब छोड़ देगा? भगवान् को कौन मुँह दिखाएगा?

यह कहती हुई लौंगी घर में चली गई। मनोरमा चुपचाप सिर झुकाए दोनों की बातें सुन रही थी। उसे लौंगी से सच्चा प्रेम था। मातृ-स्नेह का जो कुछ सुख उसे मिला था, लौंगी ही से मिला था। उसकी माता तो उसे गोद में छोड़कर परलोक सिधारी थीं। उस एहसान को वह कभी न भूल सकती थी। अब भी लौंगी उस पर प्राण देती थी। इसलिए गुरुसेवक सिंह की यह निर्दयता उसे बहुत बुरी मालूम होती थी।

लौंगी के जाते ही गुरुसेवक सिंह बड़े शान्त भाव से एक कुर्सी पर बैठ गए और चक्रधर से बोले–महाशय, आपसे मिलने की इच्छा हो रही थी और इस समय मेरे यहाँ आने का एक कारण यह भी था। आपने आगरे की समस्या जिस बुद्धिमानी से हल की, उसकी जितनी प्रशंसा की जाये, कम है।

चक्रधर–वह तो मेरा कर्त्तव्य ही था।

गुरुसेवक सिंह–इसीलिए कि आपके कर्तव्य का आदर्श बहुत ऊँचा है। १०० से ९९ आदमी तो ऐसे अवसर पर लड़ जाना ही अपना कर्तव्य समझते हैं। मुश्किल से एक आदमी ऐसा निकलता है, जो धैर्य से काम ले। शान्ति के लिए आत्मसमर्पण करनेवाला तो लाख-दो-लाख में एक होता है। आप विलक्षण धैर्य और साहब के मनुष्य हैं। मैंने भी अपने इलाके में कुछ लड़कों का खेल-सा कर रखा है। वहाँ पठानों के कई बड़े-बड़े गाँव हैं; उन्हीं से मिले हुए ठाकुरों के भी कई गाँव हैं। पहले पठानों और ठाकुरों में इतना मेल था कि शादी, ग़मी, तीज-त्योहार में एक दूसरे साथ शरीक़ होते थे; लेकिन अब तो यह हाल है कि कोई त्योहार ऐसा नहीं जाता, जिसमें खून-खच्चर या कम-से-कम मार-पीट न हो। आप अगर दो-एक दिन के लिए वहाँ चलें, तो आपस में कुछ सफ़ाई हो जाए। मुसलमानों ने अपने पत्रों में आपका जिक्र देखा है और शौक़ से आपका स्वागत करेंगे। आपके उपदेशों का बहुत कुछ असर पड़ सकता है।

चक्रधर–बातों में असर डालना तो ईश्वर की इच्छा के अधीन है। हाँ, मैं आपके साथ चलने को तैयार हूँ। मुझसे जो सेवा हो सकेगी, वह उठा न रखूँगा। कब चलने का इरादा है?

गुरुसेवक–चलता तो इस गाड़ी से; लेकिन मैं इस कटुता को अबकी निकाल बाहर किए वग़ैर नहीं जाना चाहता। दादाजी ने रोक-टोक की, तो मनोरमा को लेता जाऊँगा। और फिर इस घर में कदम न रखूँगा। सोचिए तो, कितनी बड़ी बदनामी है।

चक्रधर बड़े संकट में पड़ गए। विरोध की कटुता को मिटाने के लिए मुस्कुराते हुए बोले–मेरे और आपके सामाजिक विचारों में बड़ा अन्तर है। मैं बिल्कुल भ्रष्ट हो गया हूँ।

गुरुसेवक–क्या आप लौंगी का यहाँ रहना अनुचित नहीं समझते?

चक्रधर–जी नहीं, खानदान की बदनामी अवश्य है; लेकिन मैं बदनामी के भय से अन्याय करने की सलाह नहीं दे सकता। क्षमा कीजिएगा, मैं बड़ी निर्भीकता से अपना मत प्रकट कर रहा हूँ।

गुरुसेवक–नहीं, नहीं, मैं बुरा नहीं मान रहा हूँ। (मुस्कुराकर) इतना उजड्ड नहीं हूँ कि किसी मित्र की सच्ची राय न सुन सकूँ। अगर आप मुझे समझा दें कि उसका यहाँ रहना उचित है, तो मैं आपका बहुत अनुगृहीत हूँगा। मैं खुद नहीं चाहता कि मेरे हाथों किसी को अकारण कष्ट पहुँचे।

चक्रधर–जब किसी पुरुष का एक स्त्री के साथ पति-पत्नी का संबंध हो जाए, तो पुरुष का धर्म है कि स्त्री की ओर से कोई विरूद्ध आचरण न देखे, उस सम्बन्ध को निबाहे।

गुरुसेवक–चाहे स्त्री कितनी ही नीच जाति की हो? चक्रधर–हाँ, चाहे किसी भी जाति की हो! मनोरमा यह जवाब सुनकर गर्व से फूल उठी। वह आवेश में उठ खड़ी हुई और पुलकित होकर खिड़की के बाहर झँकने लगी। गुरुसेवक सिंह वहाँ न होते तो वह ज़रूर कह उठती–आप मेरे मुँह से बात ले गए।

एकाएक फिटन की आवाज़ आयी और ठाकुर साहब उतरकर अन्दर गये। गुरुसेवक सिंह भी उनके पीछे-पीछे चले। वह डर रहे थे कि लौंगी अवसर पाकर कहीं उसके कान न भर दे।

जब वह चले गये, तो मनोरमा बोली–आपने मेरी मन की बात कही। बहुत-सी बातों में मेरे विचार आपके विचारों से मिलते हैं।

चक्रधर–उन्हें बुरा तो ज़रूर लगा होगा!

मनोरमा–वह फिर आपसे बहस करने आते होंगे। अगर आज मौक़ा न मिलेगा तो कल करेंगे। अबकी वह शास्त्रों के प्रमाण पेश करेंगे, देख लीजिएगा।

चक्रधर–खैर, यह तो बताओ कि तुमने इन चार-पाँच दिनों में क्या काम किया?

मनोरमा–मैंने तो किताब तक नहीं खोली। बस, समाचार पढ़ती थी और वही बातें सोचती थी। आप नहीं रहते तो मेरा किसी काम में जी नहीं लगता। आप अब कभी बाहर न जाइएगा।

चक्रधर ने मनोरमा की ओर देखा, तो उसकी आँखें सजल हो गई थीं। सोचने लगे, बालिका का हृदय कितना सरल, कितना उदार, कितना कोमल और कितना भावमय है।

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शोध एवं शोध-पत्रों के लिए अकादमिक संदर्भ

Premchand, Munshi. "कायाकल्प." *Munshi Premchand Digital Archive*, 1926, https://munshipremchand.com/works/novels/kayakalp. Accessed 22 Sep. 2026.