जगदीशपुर की रानी देवप्रिया का जीवन केवल दो शब्दों में समाप्त हो जाता था–विनोद और विलास। इस वृद्धावस्था में भी उनकी विलास-वृत्ति अणुमात्रा भी कम न हुई थी। हमारी कर्मेन्द्रियाँ भले ही जर्जर हो जाएँ, चेष्टाएँ तो वृद्ध नहीं होतीं! कहते हैं, बुढ़ापा मरी हुई अभिलाषाओं की समाधि है, या पुराने पापों को पश्चात्ताप; पर रानी देवप्रिया का बुढ़ापा अतृप्त तृष्णा थी और अपूर्ण विलासाराधना। वह दान-पुण्य बहुत करती थीं; साल में दो-चार यज्ञ भी करा लिया करती थीं, साधु-सन्तों पर उनकी असीम श्रद्धा थी और इस धर्मनिष्ठा में उनका ऐहिक स्वार्थ छिपा होता था। परलोक की उन्हें कभी भूलकर भी याद न आती थी। वह भूल गई थीं कि इस जीवन के बाद भी कुछ है। उनके दान और स्नान का मुख्य उद्देश्य था–शारीरिक विकारों से निवृत्ति, विलास में रत रहने की परम योग्यता। यदि वह किसी देवता को प्रसन्न कर सकतीं, तो कदाचित् उससे यही वरदान माँगतीं कि वह कभी बूढ़ी न हों। इस पूजा और व्रत के सिवा वह इस महान् उद्देश्य को पूरा करने के लिए भाँति-भाँति के रसों को पुष्टिकारक औषधियों का सेवन करती रहती थीं। चेहरे की झुर्रियाँ मिटाने और रंग को चमकाने के लिए भी कितने प्रकार के पाउडरों, उबटनों और तेलों से काम लिया जाता था। वृद्धावस्था उनके लिए नरक से कम भयंकर न थी। चिन्ताको वह अपने पास कभी फटकने न देती थीं। रियासत उनके भोग-विलास का साधन मात्र थी। प्रजा को कष्ट होता है, उन पर कैसे-कैसे अत्याचार होते हैं, सूखे-झूरे की विपत्ति क्योंकर उनका सर्वनाश कर देती है, इन बातों की ओर कभी उनका ध्यान न जाता था। उन्हें जिस समय जितने धन की ज़रूरत हो, उतना तुरन्त देना मैनेजर का काम था। वह ऋण लेकर दे, चोरी करे या प्रजा का गला काटे, इससे उन्हें कोई प्रयोजन न था।
यों तो रानी साहब को हर प्रकार के विनोद से समान प्रेम था–चाहे वह थिएटर हो, या पहलवानों का दंगल, या अंग्रेज़ी नाच, पर उनके जीवन की सबसे आनन्दमय घड़ियाँ वे ही होती थीं, जब वह युवकों और युवतियों के साथ प्रेम-क्रीड़ा करती थीं। इस मण्डली में बैठकर उन्हें आत्म-प्रवंचना का सबसे अच्छा अवसर मिलता था। वह भूल जाती थीं कि मेरा यौवन काल बीत चुका है। अपने बुझे हुए यौवन-दीप को युवाओं की प्रज्वलित-स्फूर्ति की भाँति सदा प्रज्वलित रखती थीं नीचों को मुँह न लगाती थीं। काशी आनेवाले राजकुमारों और राजकुमारियों ही से उनका सहवास रहता था। आनेवालों की कमी न थी। एक-न-एक हमेशाही आता रहता था। रानी की अतिथिशाला हमेशा आबाद रहती थी। उन्हें युवकों की आँखों में डूब जाने की सनक-सी थी। वह चाहती थी कि मेरे सौन्दर्य-दीपक पर युवक पतंगे की भाँति आकर गिरें। उनकी रसमयी कल्पना प्रेम के आघात-प्रत्याघात से एक विशेष स्फूर्ति का अनुभव करती थी।
एक दिन ठाकुर हरिसेवक सिंह मनोरमा को रानी साहब के पास ले गए। रानी उसे देखकर मोहित हो गईं। तब से दिन में एक बार उससे ज़रूर मिलतीं। वह किसी कारण से न आतीं, तो उसे बुला भेजतीं। उसका मधुर गाना सुनकर वह मुग्ध हो जाती थीं। हरिसेवक सिंह का उद्देश्य कदाचित् यही था कि वहाँ मनोरमा को रईसों और राजकुमारों को आकर्षित करने का मौक़ा मिलेगा।
भादों की अँधेरी रात थी। मूसलाधार वर्षा हो रही थी। रानी साहब को आज कुछ ज्वर था, चेष्टा गिरी हुई थी, सिर उठाने को जी न चाहता था; पर पड़े रहने का असवर न था। हर्षपुर के राजकुमार को आज उन्होंने निमन्त्रित किया था। उनके आदर-सत्कार का काम करना ज़रूरी था। उनके सहवास के सुख से वह अपने को वंचित न कर सकती थीं। उनके आने का समय भी निकट था। रानी ने बड़ी मुश्किल से उठकर आईने में अपनी सूरत देखी। उनके हृदय पर आघात-सा हुआ। मुख प्रभातचन्द्र की भाँति मन्द हो रहा था।
रानी ने सोचा, अभी राजकुमार आते ही होंगे। क्या मैं उनसे इसी दशा में मिलूँगी? संसार में क्या कोई ऐसी संजीवनी नहीं है, जो काल के कुटिल चिह्न को मिटा दे? ऐसी वस्तु कहीं मिल जाती, तो मैं सारा राज्य बेचकर उसे ले लेती। जब भोगने का सामर्थ्य ही न हो, तो राज्य से सुख ही क्या! हा! निर्दयी काल! तूने मेरा कोई प्रयत्न सफल न होने दिया।
राजकुमार अब आते होंगे, मुझे तैयार हो जाना चाहिए, ज्वर है, कोई परवाह नहीं। मालूम नहीं, जीवन में फिर ऐसा अवसर मिले या न मिले।
सामने मेज़ पर एक एलबम रखा था। रानी ने राजकुमार का चित्र निकाल कर देखा। कितना सहास मुख था, कितना तपस्वी स्वरूप, कितनी साधुमयी छवि!
रानी एक आरामकुर्सी पर लेटकर सोचने लगीं–यह चित्र न जाने क्यों मेरे चित्त को इतने ज़ोर से खींच रहा है। चित्त कभी इतना चंचल न हुआ था। इसी एलबम में और भी कई चित्र हैं, जो इससे कहीं सुन्दर हैं; लेकिन उन नवयुवकों को मैंने कठपुतलियों की तरह नचाकर छोड़ा। यह एक ऐसा चित्र है, जो मेरे हृदय में भूली हुई बातों को याद दिला रहा है, जिसके सामने ताकते हुए मुझे लज्जा-सी आती है।
रानी ने घड़ी की ओर आतुर नेत्रों से देखा। नौ बज रहे थे। अब वह लेटी न रह सकीं; सँभलकर उठीं; अलमारी से एक शीशी निकाली। उसमें से कई बूँदें एक प्याली में डालीं और आँखें बन्द कर पी गई। इसका चमत्कारिक असर हुआ, मानो कोई कुम्हलाया फूल ताज़ा हो जाए; कोई सूखी पत्ती हरी हो जाए। उनके मुखमण्डल पर आभा दौड़ गई। आँखों में चंचल सजीवता का विकास हो गया, शरीर में नए रक्त का प्रवाह-सा होने लगा। उन्होंने फिर आईने की ओर देखा और उनके अधरों पर एक मृदुल हास्य की झलक दिखाई दी। उनके उठने की आहट पाकर लौंडी कमरे में आकर खड़ी हो गई। यह उनकी नाइन थी। गुजराती नाम था।
रानी–समय बहुत थोड़ा है, जल्दी कर।
गुजराती–रानियों को कैसी जल्दी! जिसे मिलना होगा, वह स्वयं आएगा और बैठा रहेगा।
रानी–नहीं, आज ऐसा ही अवसर है।
नाइन बड़ी निपुण थी, तुरन्त श्रृंगारदान खोलकर बैठ गई और रानी का श्रृंगार करने लगी, मानो कोई चित्रकार तस्वीर में रंग भर रहा हो। आधा घंटा भी न गुज़रा था कि उसने रानी के केश गूँथकर नागिन की-सी लटें डाल दीं। कपोलों पर एक ऐसा रंग भरा कि झुर्रियाँ ग़ायब हो गईं और मुख पर मनोहर आभा झलकने लगी। ऐसा मालूम होने लगा मानो कोई सुन्दरी युवती सोकर उठी है। वह अलसाया हुआ अंग था, वही मतवाली आँखें। रानी ने आईने की ओर देखा और प्रसन्न होकर बोलीं–गुजराती, तेरे हाथ में कोई जादू है। मैं तुझे अपने साथ स्वर्ग ले चलूँगी। वहाँ तो देवता लोग होंगे, तेरी मदद की और भी ज़रूरत होगी।
गुजराती–आप कभी इनाम तो देती नहीं। बस, बखान करके रह जाती हैं!
रानी–अच्छा, बता क्या लेगी?
गुजराती–मैं लूँगी तो वही लूँगी, जो कई बार माँग चुकी हूँ। रुपये-पैसे लेकर मुझे क्या करना।
यह एक दीवारगीर पर रखी हुई मदन की छोटी-सी मूर्ति थी। चतुर मूर्तिकार ने इस पर कुछ ऐसी कारीगरी की थी जिससे कि दिन के साथ उसका रंग बदलता रहता था।
गुजराती–अच्छा, तो न दीजिए; लेकिन फिर मुझसे कभी न पूछिएगा कि क्या लेगी?
रानी–क्या मुझसे नाराज़ हो गई? (चौंककर) वह रोशनी दिखायी दी! कुँवर साहब आ गए! मैं झूला-घर में जाती हूँ। वहीं लाना।
यह कहकर रानी ने फिर वही शीशी निकाली और दुगुनी मात्रा में दवा पीकर झूलाकर की ओर चलीं। यह एक विशाल भवन था, बहुत ऊँचा और इतना लम्बा-चौड़ा कि झूले पर बैठकर खूब पेंग ली जा सकती थीं। रेशम की डोरियों में पड़ा हुआ एक पचरा छत से लटक रहा था; पर चित्रकारों ने ऐसी कारीगरी की थी कि मालूम होता था, किसी वृक्ष की डील में पड़ा हुआ है। पौधों, झाड़ियों और लताओं ने उसे यमुना-तट का कुंज-सा बना दिया था। कई हिरन और मोर इधर-उधर विचरा करते थे। रात को उस भवन में पहुँचकर सहसा यह भान न होता था कि यह कोई भवन है। पानी का रिमझिम बरसना, ऊपर से हल्की-हल्की फुहारों का पड़ना, हौज़ में जल-पक्षियों का क्रीडा करना–यह सब किसी उपवन की शोभा दर्शाता था।
रानी झूले की डोरी पकड़कर खड़ी हो गई और एक हिरन के बच्चे को बुलाकर उसका मुँह सहलाने लगीं। सहसा कदमों ही आहट हुई। रानी मेहमान का स्वागत करने के लिए द्वार पर आयीं, पर यह राजकुमार न थे, मनोरमा थी। रानी को कुछ निराशा तो हुई; किन्तु मनोरमा भी आज के अभिनय की पात्री थी। उन्होंने उसे बुलवा भेजा था।
रानी–बड़ी देर लगायी! तेरी राह देखते-देखते आँखें थक गईं।
मनोरमा–पानी के मारे घर से निकलने ही हिम्मत ही न पड़ती थी।
रानी–राजकुमार ने न जाने क्यों देर की। आ, तब तक कोई गीत सुना।
यहीं हौज़ के किनारे एक संगमरमर का चबूतरा था। दोनों जाकर उस पर बैठ गई।
रानी–क्या मैं बहुत बुरी लगती हूँ?
मनोरमा–आप? आप तो सौन्दर्य की देवी मालूम होती हैं!
रानी–चल झूठी। मुझसे अपना रूप बदलेगी?
मनोरमा–मैं तो आपकी लौंडी की तरह भी नहीं हूँ। मुझे आपके साथ बैठते शरम आती है।
रानी–अच्छा, बता, संसार में सबसे अमूल्य रत्न कौन-सा है?
मनोरमा–कोहिनूर हीरा होगा, और क्या?
रानी–धत् पगली! संसार की सबसे उत्तम, देव-दुर्लभ वस्तु यौवन है। बता, तूने किसी से प्रेम किया है?
मनोरमा–जाइए, मैं आपसे नहीं बोलती।
रानी–आह! तूने तीर मार दिया। यही बिगड़ना तो पुरुषों का जादू का काम करता है। काश, मेरे मुँह से ऐसी बातें न निकलतीं! सच बता, तूने किसी युवक से कभी प्रेम किया है? अच्छा आ, आज मैं सिखा दूँ।
मनोरमा–आप मुझे छेड़ेंगी, तो मैं चली जाऊँगी।
रानी–ऐ, तो इतना चिढ़ती क्यों है? ऐसी कोई बालिका तो नहीं। देख, सबसे पहली बात है, कटाक्ष करने की कला में निपुण होना। जिसे यह कला आती है, वह चाहे चन्द्रमुखी न हो; फिर भी पुरुष का हृदय छीन सकती है; सौन्दर्य स्वयं कुछ नहीं कर सकता, उसी तरह जैसे कोई सिपाही शस्त्रों से कुछ नहीं कर सकता, जब तक वह उन्हें चलाना न जानता हो। चतुर खिलाड़ी एक बाँस की छड़ी से वह काम कर सकता है, जो दूसरे संगीन और बन्दूक़ से भी नहीं कर सकते। मान ले, मैं तेरा प्रेमी हूँ। बता, मेरी ओर कैसे ताकेगी?
मनोरमा ने लज्जा से सिर झुका लिया। उसे रानी की रसिकता पर कौतूहल हो रहा था। वह कितनी ही बार यहाँ आयी थी; पर रानी को कभी इतना मदमत्त नहीं पाया था।
रानी ने उसकी ठुड्डी पकड़कर मुँह उठा दिया और बोली–पगली, इस भाँति सिर झुकाने से क्या होगा? पुरुष समझेगा, यह कुछ जानती ही नहीं। अच्छा, समझ ले कि तू पुरुष है; देख, मैं तेरी ओर कैसे ताकती हूँ। सिर उठाकर मेरी ओर देख। कहती हाँ सिर उठा, नहीं तो मैं चुटकी काट लूँगी। हाँ, इस तरह।
यह कहकर रानी ने मनोरमा को भृकुटि-विलास और लोचन-कटाक्ष का ऐसा कौशल दिखाया कि मनोरमा का अज्ञान मन भी एक क्षण के लिए चंचल हो उठा। कटाक्ष में कितनी उत्तेजक शक्ति है, इसका कुछ अनुमान हो गया।
रानी–तुझे कुछ मालूम हुआ?
मनोरमा–मुझे तो तीर-सा लगा। आप मोहिनी मन्त्र जानती होंगी।
रानी–तू युवक होती, तो इस समय छाती पर हाथ धरे आहतों की भाँति खड़ी होती; यह तो कटाक्ष हुआ। आ, अब तुझे बताऊँ कि आँखों से प्रेम की बातें कैसे की जाती हैं। मेरी ओर देख!
यह कहते-कहते रानी को फिर शिथिलता का अनुभव हुआ ‘सुधाबिन्दु’ का प्रकाश मन्द होने लगा। विकल होकर पूछा–क्यों री, देख तो मेरा मुख कुछ उतरा जाता है।
मनोरमा ने चौंककर कहा–आपको यह क्या हो गया? मुख बिल्कुल पीला पड़ गया है। क्या आप बीमार हैं?
रानी–हाँ बेटी, बीमार हूँ। राजकुमार अब भी नहीं आये? तुम जाकर गुजराती से ‘सुधाबिन्दु’ की शीशी और प्याला माँग लाओ। जल्द आना, नहीं तो मैं गिर पड़ूँगी!
मनोरमा दवा लाने गयी, तो राजकुमार इन्द्रविक्रमसिंह को मोटर से उतरते देखा। कोई ३० वर्ष की अवस्था थी। मुख से संयम, तेज और संकल्प झलक रहा था। ऊँचा क़द था, गोरा रंग, चौड़ी छाती, ऊँचा मस्तक, आँखों में इतनी चमक और तेज़ी थी कि हृदय चुभ जाती थी। वह केवल एक पीले रंग का रेशमी कुरता पहने हुए थे और गले में एक सफेद चादर डाल ली थी। मनोरमा ने किसी देवऋर्षि का एक चित्र देखा था। मालूम होता था, इन्हीं को देखकर वह चित्र खींचा गया था।
उनके मोटर से उतरते ही चपरासी ने सलाम किया और लाकर दीवानखाने में बैठा दिया। इधर मनोरमा ने गुजराती से शीशी ली और जाकर रानी से यह समाचार कहा। रानी चबूतरे पर लेटी थीं। सुनते ही उठ बैठीं और मनोरमा के हाथ से शीशी ले, प्याली में बिना गिने कई बूँद निकाली, पी गईं।
दवा ने जाते ही अपना असर दिखाया। रानी के मुखमण्डल पर फिर वही मनोरम छवि, अंगों में फिर वही चपलता, वाणी में फिर वही सरसता, आँखों में वहीं मधुर हास्य कपोलों पर वही अरुण ज्योति शोभा देने लगी। वह उठकर झूले पर जा बैठीं। झूला धीरे-धीरे झूलने लगा। रानी का आँचल हवा से उड़ने लगा और केश बिखर गए। यही मोहिनी छवि वह राजकुमार को दिखाना चाहती थीं।
एक क्षण में राजकुमार ने झूलाधार में प्रवेश किया। रानी झूले से उतरना ही चाहती थीं कि वह उनके पास आ गए और बोले–क्या मधुर कल्पना स्वप्न साम्राज्य में विहार कर रही हैं?
रानी–जी नहीं, प्रतीक्षा नैराश्य की गोद में विश्राम कर रही है। इतनी देर क्यों राह दिखाई?
राजकुमार–मेरा अपराध नहीं। मैं आ ही रहा था कि विश्वविद्यालय के कई छात्र आ पहुँचे और मुझे एक गम्भीर विषय पर व्याख्यान देने के लिए घसीट ले गए। बहुत हीले-हवाले किए, लेकिन उन सबने एक न सुनी।
रानी–तो मैं आपसे शिकायत कब करती हूँ। आप आ गए, यह क्या कम अनुग्रह है? न आते तो मैं क्या कर लेती? लेकिन इसका प्रायश्चित करना पड़ेगा, याद रखिए आज रात भर क़ैद रखूँगी।
राजकुमार–अगर प्रेम के कारावास में रहना प्रायश्चित है, तो मैं उससे जीवनपर्यन्त रहने को तैयार हूँ।
रानी–आप बातें बनाने में निपुण मालूम होते हैं। इन निर्दयी केशों को ज़रा सँभाल दीजिए, बार-बार मुख पर आ जाते हैं।
राजकुमार–मेरे कठोर हाथ उन्हें स्पर्श करने योग्य नहीं हैं।
रानी ने कनखियों से–मर्मभेदी कनखियों से–राजकुमार की ओर देखा। यह असाधारण जवाब था। उन कोमल सुगन्धित, लहराते हुए केशों के स्पर्श का अवसर पाकर ऐसा कौन था, जो अपना धन्य भाग न समझता! रानी दिल में कटकर रह गई। उन्होंने पुरुष को सदैव विलास की एक वस्तु समझा था। प्रेम से उनका हृदय कभी आन्दोलित न हुआ था। वह लालसा को ही प्रेम समझती थीं। उस प्रेम से, जिसमें त्याग और भक्ति है, वह वंचित थीं; लेकिन इस समय उन्हें इसी प्रेम का अनुभव हो रहा था। उन्होंने दिल को बहुत सँभाल कर राजकुमारों से इतनी बातें की थीं। उनका अन्तःकरण उन्हें राजकुमारों से यह वासनामय करने पर धिक्कार रहा था। सिर नीचा करके कहा–यदि हाथों की भाँति हृदय भी कठोर है, तो वहाँ प्रेम का प्रवेश कैसे होगा?
राजकुमार–बिना प्रेम के तो कोई उपासक देवी के सम्मुख नहीं जाता। प्यास के बिना भी आपने किसी को सागर की ओर जाते देखा है?
रानी अब झूले पर न रह सकीं। इन शब्दों में निर्मल प्रेम झलक रहा था। जीवन में यह पहला ही अवसर था कि देवप्रिया के कानो में ऐसे सच्चे अनुराग में डूबे हुए शब्द पड़े। उन्हें ऐसा मालूम हो रहा था कि इनकी आँखें मेरे मर्मस्थल में चुभी जा रही हैं। वह उन तीव्र नेत्रों से बचना चाहती थीं। झूले से उतरकर रानी ने अपने केश समेट लिये और घूँघट से माथा छिपाती हुई बोलीं–श्रद्धा देवताओं को भी खींच लाती है। भक्त के पास सागर भी उमड़ता चला आता है।
यह कहकर वह हौज़ के किनारे जा बैठीं और फव्वारों को घुमाकर खोला, तो राजकुमारों पर गुलाब जल की फुहारें पड़ने लगीं। उन्होंने मुस्कुराकर कहा–गुलाब से सींचा हुआ पौधा लू के झोंके न सह सकेगा। इसका ख्याल रखिएगा।
रानी ने प्रेम सजल नेत्रों से ताकते हुए कहा–अभी गुलाब से सींचती हूँ, फिर अपने प्राण जल से सीचूँगी पर उसका फल खाना मेरे भाग्य में है या नहीं कौन जाने! उस वस्तु की आशा कैसे करूँ, जिसे मैं जानती हूँ कि मेरे लिए दुर्लभ है।
देवप्रिया ने यह कहते-कहते एक लम्बी साँस ली और आकाश की ओर देखने लगी। उसके मन में एक शंका हो उठती, क्या यह दुर्लभ वस्तु मुझे मिल सकती है? मेरा यह मुँह कहाँ?
राजकुमार ने करुण स्वर में कहा–जिस वस्तु को आप दुर्लभ समझ रही हैं, वह आज से बहुत पहले आपको भेंट हो चुकी है। आप मुझे नहीं जानतीं; पर मैं आपको जानता हूँ–बहुत दिनों से जानता हूँ। अब आपके मुँह से केवल यह सुनना चाहता हूँ कि आपने मेरी भेंट स्वीकार कर ली?
रानी–उस रत्न को ग्रहण करने की मुझमें सामर्थ्य नहीं है। आपकी दया के योग्य हूँ, प्रेम के योग्य नहीं।
राजकुमार–कोई ऐसा धब्बा नहीं है, जो प्रेम के जल से छूट न जाए।
रानी–समय के चिह्न को कौन मिटा सकता है? हाय! आपने मेरा असली रूप नहीं देखा। यह मोहिनी छवि, जो आप देख रहे हैं, बहुत दिन हुए, मेरा साथ छोड़ चुकी। अब मैं अपने यौवन काल का चित्र मात्र हूँ। आप मेरी असली सूरत देखेंगे, तो कदाचित् घृणा से मुँह फेर लेंगे।
यह कहते-कहते रानी को अपनी देह शिथिल होती हुई जान पड़ी। ‘सुधाबिन्दु’ का असर मिटने लगा। उनका चेहरा पीला पड़ गया, झुर्रियाँ दिखाई देने लगीं। उन्होंने लज्जा से मुँह छिपा लिया और यह सोचकर कि शीघ्र ही यह प्रेमाभिनय समाप्त हो जाएगा, वह फूट-फूटकर रोने लगीं। राजकुमार ने धीरे से उनका हाथ पकड़ लिया और प्रेम-मधुर स्वर में बोले–प्रिये, मैं तुम्हारे इसी रूप पर मुग्ध हूँ, उस बने हुए रूप पर नहीं। मैं वह चाहता हूँ, जो इस परदे के पीछे छिपी हुई है। वह बहुत दिनों से मेरी थी; हाँ इधर कुछ दिनों से उस पर मेरा अधिकार न था। मेरी तरफ़ ध्यान से देखो, मुझे पहचानती हो? कभी देखा है?
रानी ने हैरत में आकर राजकुमार के मुँह पर नज़र डाली। ऐसा मालूम हुआ, मानो आँखों के सामने से परदा हटा गया। याद आया, मैंने इन्हें कहीं देखा है। ज़रूर देखा है। वह सोचने लगी, मैंने इन्हें कहाँ देखा है। याद न आया। बोलीं–मैंने आपको कहीं पहले देखा है।
राजकुमार–खूब याद है कि आपने मुझे देखा है? भ्रम तो नहीं हो रहा है?
रानी–नहीं, मैंने आपको अवश्य देखा है। सम्भव है, कभी रेलगाड़ी में देखा हो; मगर ऐसा मालूम होता है कि आप और मैं कभी बहुत दिनों एक ही जगह रहे हैं। मुझे तो याद नहीं आता। आप ही बताइए।
राजकुमार–खूब याद कर लिया?
रानी–(सोचकर) हाँ, कुछ ठीक याद नहीं आता। शायद तब आपकी उम्र कुछ कम थी; मगर थे आप ही।
राजकुमार ने गम्भीर भाव से कहा–हाँ प्रिये, मैं ही था। तुमने मुझे अवश्य देखा है, हम और तुम एक साथ रहे हैं और इसी घर में। यही मेरा घर था। तुम स्त्री थी, मैं पुरुष था। तुम्हें याद है, हम और तुम इसी जगह, हौज़ के किनारे शाम को बैठा करते थे? अब पहचाना?
देवप्रिया की आँखें फिर राजकुमार की ओर उठीं। आईने की गर्द साफ़ हो गई। बोलीं–प्राणेश! तुम्हीं हो इस रूप में?
यह कहते-कहते वह मूर्छित हो गईं।
