सन्ध्या समय जब रेलगाड़ी बनारस से चली, तो यशोदानन्दन ने चक्रधर से पूछा–क्यों भैया, तुम्हारी राय में झूठ बोलना किसी दशा में क्षम्य है या नहीं?
चक्रधर ने विस्मित होकर कहा–मैं तो समझता हूँ नहीं।
यशोदा०–किसी भी दशा में नहीं?
चक्रधर–मैं तो यही कहूँगा कि किसी दशा में भी नहीं, हालाँकि कुछ लोग परोपकार के लिए असत्य को क्षम्य समझते हैं।
यशोदा०–मैं भी उन्हीं लोगों में से हूँ। मेरा ख़याल है कि पूरा वृत्तान्त सुनकर शायद आप भी मुझसे सहमत हो जाएँ। मैंने अहिल्या के विषय में आपसे झूठी बातें कहीं हैं। वह वास्तव में मेरी लड़की नहीं है। उसके माता-पिता का हमें कुछ भी पता नहीं।
चक्रधर ने आँखें बड़ी-बड़ी करके कहा–तो फिर आपके यहाँ कैसे आयी?
यशोदा०–विचित्र कथा है। १५ वर्ष हुए एक बार सूर्य-ग्रहण लगा था। मैं उन दिनों कॉलेज में था। हमारी एक सेवा-समिति थी। हम लोग उसी स्नान के अवसर पर यात्रियों की सेवा करने प्रयाग आये थे। तुम तो उस वक़्त बहुत छोटे से रहे होगे। इतना बड़ा मेला फिर नहीं लगा। वहीं हमें यह लड़की एक नाली में पड़ी रोती मिली। न जाने उसके माँ-बाप नदी में डूब गए, या भीड़ में कुचल गए। बहुत खोज की; पर उनका पता न लगा। विवश होकर उसे साथ लेते गए। ४-५ वर्ष तक तो उसे अनाथालय में रखा; लेकिन जब कार्यकर्ताओं की फूट के कारण अनाथालय बन्द हो गया, तो अपने ही घर में उसका पालन-पोषण करने लगा। जन्म से न हो, पर संस्कारों से वह हमारी लड़की है। उसके कुलीन होने में सन्देह नहीं। उसका शील, स्वभाव और चातुर्य देखकर अच्छे-अच्छे घरों की स्त्रियाँ चकित रह जाती हैं। मैं इधर एक साल से उसके लिए योग्य वर की तलाश में था। ऐसा आदमी चाहता था, जो स्थिति को जानकर उसे सहर्ष स्वीकार करे और पाकर अपने का धन्य समझे, पत्रों में आपके लेख देखकर और आपके सेवा-कार्य की प्रशंसा सुनकर मेरी धारणा हो गई कि आप ही उसके लिए सबसे योग्य हैं। यह निश्चय करके आपके यहाँ आया। मैंने आपसे सारा वृत्तान्त कह दिया। अब आपको अख़्तियार हैं, उसे अपनाएँ या त्यागें। हाँ, इतना कह सकता हूँ कि ऐसा रत्न आप फिर न पाएँगे। मैं यह जानता हूँ कि वीरात्माएँ सत्कार्य में विरोध की परवाह नहीं करतीं और अन्त में उस पर विजय ही पाती हैं।
चक्रधर गहरे विचार में पड़ गए। एक तरफ़ अहिल्या का अनुपम सौन्दर्य और उज्ज्वल चरित्र था, दूसरी ओर माता-पिता का विरोध और लोक-निन्दा का भय, मन में तर्क-संग्राम होने लगा। यशोदानन्दन ने उन्हें असमंजस में पड़े देखकर कहा–आप चिन्तित दिखाई पड़ते हैं और चिन्ता की बात भी है, लेकिन जब आप जैसे सुशिक्षित और उदार पुरुष विरोध और भय के कारण कर्तव्य और न्याय से मुँह मोड़ें, तो फिर हमारा उद्धार हो चुका! मैं आपसे सच कहता हूँ, यदि मेरे दो पुत्रों में से एक भी कुँवारा होता और अहिल्या उसे स्वीकार करती, तो मैं बड़े हर्ष से उसका विवाह उससे कर देता। आपके सामाजिक विचारों की स्वतन्त्रता का परिचय पाकर ही मैंने आपके ऊपर इस बालिका के उद्धार का भार रखा और यदि आपने कर्तव्य को न समझा, तो मैं नहीं कह सकता, उस अबला की क्या दशा होगी।
चक्रधर रूप-लावण्य की ओर से तो आँखें बन्द कर सकते थे, लेकिन उद्धार के भाव को दबाना उनके लिए असम्भव था। वह स्वतन्त्रता के उपासक थे और निर्भीकता स्वतन्त्रता की पहली सीढ़ी है। उनके मन ने कहा, क्या यह काम ऐसा है कि समाज हँसे? समाज को इसकी प्रशंसा करनी चाहिए। अगर ऐसे काम के लिए कोई मेरा तिरस्कार करे, तो मैं तृण बराबर भी उसकी परवाह न करूँगा–चाहे वह मेरे माता-पिता ही हों। दृढ़-भाव से बोले–मेरी ओर से आप ज़रा भी शंका न करें। मैं इतना भीरु नहीं हूँ कि ऐसे कामों में समाज-निन्दा से डरूँ। माता-पिता को प्रसन्न रखना मेरा धर्म हैं, लेकिन कर्तव्य और न्याय की हत्या करके नहीं। कर्तव्य के सामने माता-पिता की इच्छा का मूल्य नहीं है।
यशोदानन्दन ने चक्रधर को गले लगाते हुए कहा–भैया, तुमसे ऐसी ही आशा थी।
यह कहकर यशोदानन्दन ने अपना सितार उठा लिया और बजाने लगे। चक्रधर को कभी सितार की ध्वनि इतनी प्रिय, इतनी मधुर न लगी और न चाँदनी कभी इतनी सुहृदय और विहँसित। दाएँ-बाएँ चाँदनी छिटकी हुई थी और उसकी मन्द छटा में अहिल्या रेलगाड़ी के साथ, अगणित रूप धारण किए दौड़ती चली जाती थी। कभी वह उछलकर आकाश में जा पहुँचती थी, कभी नदियों की चन्द्रचंचल तरंगों में। यशोदान्दन को न कभी इतना उल्लास हुआ था, न चक्रधर को कभी इतना गर्व, दोनों आनन्द-कल्पना में डूबे हुए थे।
गाड़ी आगरे पहुँची तो दिन निकल आया था। सुनहरा नगर हरे-हरे कुंजों के बीच विश्राम कर रहा था, मानों बालक माता की गोद में सोया हो।
इस नगर को देखते ही चक्रधर को कितनी ही ऐतिहासिक घटनाएँ याद आ गईं। सारा नगर किसी उजड़े हुए घर की भाँति श्रीहीन हो रहा था।
मुंशी यशोदानन्दन अभी कुलियों को पुकार रहे थे कि उनकी निग़ाह पुलिस के सिपाहियों पर पड़ी। चारों तरफ़ पहरा था। मुसाफ़िरों के बिस्तरे, सन्दूक खोल-खोलकर देखे जाने लगे। एक थानेदार ने यशोदानन्दन का भी असबाब देखना शुरू किया।
यशोदानन्दन ने आश्चर्य से पूछा–क्यों साहब, अब यह सख्ती क्यों है?
थानेदार–आप लोगों ने जो काँटे बोए हैं, उन्हीं का फल है। शहर में फ़साद हो गया है।
यशोदा०–अभी तीन दिन पहले तो अमन का राज्य था, यह भूत कहाँ से उठ खड़ा हुआ?
इतने में समिति का एक सेवक दौड़ता हुआ आ पहुँचा। यशोदानन्दन ने आगे बढ़कर पूछा–क्यों राधामोहन, यह क्या मामला हो गया? अभी जिस दिन मैं गया हूँ उस दिन तक तो दंगे का कोई लक्षण न था।
राधा–जिस दिन आप गए, उसी दिन पंजाब से मौलवी दीनमुहम्मद साहब का आगमन हुआ। खुले-मैदान में मुसलमानों का एक बड़ा जसला हुआ। उसमें मौलाना साहब ने न जाने क्या ज़हर उगला कि तभी से मुसलमानों को क़ुर्बानी की धुन सवार है। इधर हिन्दुओं को भी यह ज़िद है कि चाहे खून की नदी बह जाए, पर क़ुर्बानी न होने पाएगी। दोनों तरफ़ से तैयारियाँ हो रही हैं, हम लोग तो समझाकर हार गए।
यशोदानन्दन ने पूछा–ख्वाज़ा महमूद कुछ न बोले?
राधा–वही तो उस जलसे के प्रधान थे।
यशोदानन्दन आँखें फाड़कर बोले–ख्वाज़ा महमूद!
राधा–जी हाँ, ख्वाज़ा महमूद! आप उन्हें फ़रिश्ता समझें, असल में वे रँगे सियार हैं। हम लोग हमेशा से कहते आते हैं कि इनसे होशियार रहिए, लेकिन आपको न जाने क्यों उन पर इतना विश्वास था।
यशोदानन्दन ने आत्मग्लानि से पीड़ित होकर कहा–जिस आदमी को आज २४ वर्षों से देखता आता हूँ, जिसके साथ कॉलेज में पढ़ा, जो इसी समिति का किसी ज़माने में मेम्बर था, उस पर क्योंकर विश्वास न करता? दुनिया कुछ कहे, पर मुझे ख्वाज़ा महमूद पर कभी शक न होगा।
राधा–आपको अख़्तियार है कि उन्हें देवता समझें, मगर अभी-अभी आप देखेंगे। कि वह कितनी मुस्तैदी के क़ुबानी की तैयारी कर रहे हैं। उन्होंने देहातों से लठैत बुलाए हैं, उन्हीं ने गौएँ मोल ली हैं और उन्हीं के द्वार पर क़ुर्बानी होने जा रही है।
यशोदा०–ख्वाज़ा महमूद के द्वार पर क़ुर्बानी होगी। उनके द्वार पर इसके पहले या तो मेरी क़ुर्बानी हो जाएगी, या ख्वाज़ा महमूद की। ताँगेवाले को बुलाओ।
राधा–बहुत अच्छा हो, यदि आप इस समय यहीं ठहर जायें।
यशोदा०–वाह! वाह! शहर में आग लगी हुई है और तुम कहते हो, मैं यहीं रह जाऊँ। जो औरों पर बीतेगी, वही मुझ पर भी बीतेगी, इससे क्या भागना। तुम लोगों ने बड़ी भूल की कि मुझे पहले से सूचना न दी।
राधा–कल दोपहर तक तो हमें खुद ही न मालूम था कि क्या गुल खिल रहा है। ख्वाज़ा साहब के पास गए, तो उन्होंने विश्वास दिलाया कि क़ुर्बानी न होने पाएगी, आप लोग इत्मीनान रखें। हमसे तो यह कहा, उधर शाम ही को लठैत आ पहुँचे और मुसलमानों का डेपुटेशन सिटी मैजिस्ट्रैट के पास क़ुर्बानी की सूचना देने पहुँच गया।
यशोदा०–महमूद भी डेपुटेशन में थे?
राधा–वही तो उसके कर्ता-धर्ता थे, भला वही क्यों न होते? हमारा तो विचार है कि वही फ़साद की जड़ हैं।
यशोदा०–अगर महमूद में सचमुच यह कायापलट हो गयी है, तो मैं यही कहूँगा कि धर्म से ज़्यादा द्वैष पैदा करनेवाली वस्तु संसार में नहीं। और कोई ऐसी शक्ति नहीं है, जो महमूद में द्वेष के भाव पैदा कर सके। चलो, पहले उन्हीं से बातें होंगी। मेरे द्वार पर तो इस वक़्त बड़ा ज़माव होगा।
राधा–जी हाँ, इधर आपके द्वार पर ज़माव है, उधर ख्वाज़ा के! बीच में थोड़ी-सी जगह खाली है।
तीनों आदमी ताँगे पर बैठकर चले। सड़कों पर पुलिस के जवान चक्कर लगा रहे थे। मुसाफ़िरों की छड़ियाँ छीन ली जाती थीं। दो-चार आदमी भी साथ न खड़े होने पाते थे। सिपाही तुरन्त ललकारता था। दूकानें सब बन्द थीं, कुँजड़े भी साग बेचते न नज़र आते थे। गलियों में लोग ज़मा होकर बातें कर रहे थे।
कुछ दूर तक तीनों आदमी मौन धारण किए बैठे रहे। चक्रधर शंकित होकर–इधर-उधर ताक रहे थे। ज़रा भी घोड़ा रूक जाता, तो उनका दिल धड़कने लगता कि किसी ने ताँगा रोक तो नहीं लिया; लेकिन यशोदानन्दन के मुख पर ग्लानि का गहरा चिह्न दिखाई दे रहा था। उनके मुहल्ले में आज तक कभी क़ुर्बानी नहीं हुई थी। हिन्दू और मुसलमान का भेद ही न मालूम होता था। उन्हें आश्चर्य होता था कि और शहरों में कैसे हिन्दू-मुसलमानों में झगड़े हो जाते हैं। और तीन ही दिन में यह नौबत आ गई!
सहसा उन्होंने उत्तेजित होकर कहा–राधामोहन, देखो, मैं तो यहीं उतरा जाता हूँ! ज़रा महमूद से मिलूँगा। तुम इन बाबू साहब को लेकर घर जाओ। आप मेरे एक मित्र के लड़के हैं, यहाँ सैर करने आये हैं, बैठक में आपकी चारपाई डलवा देना, और देखो, अगर दैवसंयोग से मैं लौटकर न आ सकूँ, तो घबराने की बात नहीं। जब लोग खून-खच्चर करने पर तुले हुए हैं, तो सब कुछ सम्भव है और मैं उन आदमियों में नहीं हूँ कि गौ की हत्या होते देखूँ और शान्त खड़ा रहूँ। अगर मैं लौटकर न आ सकूँ तो तुम घर में कहला देना कि अहिल्या का पाणिग्रहण आप ही के साथ कर दिया जाए।
वह कहकर उन्होंने कोचवान से ताँगा रोकने को कहा।
चक्रधर–मैं भी आपके साथ ही रहना चाहता हूँ।
यशोदा०–नहीं भैया, तुम मेरे मेहमान हो, तुम्हें मेरे साथ रहने की ज़रूरत नहीं। तुम चलो, मैं भी अभी आता हूँ।
चक्रधर–क्या आप समझते हैं कि गौ-रक्षा आप ही का धर्म है, मेरा धर्म नहीं?
यशोदा०–नहीं, यह बात नहीं है बेटा! तुम मेरे मेहमान हो और तुम्हारी रक्षा करना मेरा धर्म है।
इस वक़्त ताँगा धीरे-धीरे ख्वाज़ा महमूद के मकान के सामने आ पहुँचा। हज़ारों आदमियों का ज़माव था। यद्यपि किसी के हाथ में लाठी या ठण्डे न थे, पर उनके मुख ज़िहाद के जोश में तमतमाए हुए थे। यशोदानन्दन को देखते ही कई आदमी उनकी तरफ़ लपके; लेकिन जब उन्होंने ज़ोर से कहा–मैं तुमसे लड़ने नहीं आया हूँ। कहाँ है ख्वाज़ा महमूद! मुमक़िन हो तो ज़रा उन्हें बुला लो, तो लोग हट गए।
ज़रा देर में एक लम्बा-सा आदमी, गाढ़े रंग की अचकन पहने, आकर खड़ा हो गया। भरा हुआ बदन था, लम्बी दाढ़ी, जिसके कुछ बाल खिचड़ी हो गए थे और गोरा रंग। मुख से शिष्टता झलक रही थी। यही ख्वाज़ा महमूद थे।
यशोदानन्दन ने त्योंरियाँ बदलकर कहा–क्यों ख्वाज़ा साहब, आपको याद है, इस मुहल्ले में कभी क़ुर्बानी हुई है?
महमूद–जी नहीं, जहाँ तक मेरा ख़याल है, यहाँ कभी क़ुर्बानी नहीं हुई।
यशोदा०–तो फिर आज यहाँ क़ुर्बानी करने की नई रस्म क्यों निकाल रहे हैं?
महमूद–इसलिए कि क़ुर्बानी करना हमारा हक़ है। अब तक हम आपके जज़बात का लिहाज़ करते थे, अपने माने हुए हक़ भूल गए थे। लेकिन जब आप लोग अपने हक़ों के सामने हमारे जज़बात की परवाह नहीं करते, तो कोई वज़ह नहीं कि हम अपने हक़ों के सामने आपके जज़बात की परवाह करें। मुसलमानों की शुद्धि करने का आप को पूरा हक है’ लेकिन कम-से-कम पाँच सौं वर्षों में आपके यहाँ शुद्धि की कोई मिसाल नहीं मिलती। आप लोगों ने एक मुर्दा हक़ को जिन्दा किया है। इसीलिए न, कि मुसलमानों की ताकत और असर कम हो जाए। जब आप हमें ज़ेर करने के लिए नये-नये हथियार निकाल रहे हैं तो हमारे लिए इसके सिवा और क्या चारा है कि अपने हथियारों को दूनी ताकत से चलाएँ।
यशोदा०–इसके यह मानी हैं कि कल आप हमारे द्वारों पर, हमारे मन्दिरों के सामने क़ुर्बानी करें और हम चुपचाप देखा करें। आप यहाँ हरगिज क़ुर्बानी नहीं कर सकते और करेंगे तो इसकी जिम्मेदारी आपके सिर पर होगी।
यह कहकर यशोदानन्दन फिर ताँगे पर बैठे। दस-पाँच आदमियों ने ताँगे को रोकना चाहा, पर कोचवान ने घोड़ा तेज कर दिया। दम-के-दम ताँगा उड़ता हुआ यशोदानन्दन के द्वार पर पहुँच गया, जहाँ हज़ारों आदमी खड़े थे। इन्हें देखते ही चारों तरफ से आकर उन्हें घेर लिया। अभी तक फ़ौज का अफ़सर न था, फ़ौज दुविधा में पड़ी हुई थी। समझ में न आता था कि क्या करें। सेनापति के आते ही सिपाहियों में जान-सी पड़ गई, जैसे सूखे धान में पानी पड़ जाए।
यशोदानन्दन ताँगे से उतर पड़े और ललकारकर बोले–क्यों भाइयों, क्या विचार है? यह क़ुर्बानी होगी? आप जानते हैं, इस मुहल्ले में आज तक कभी क़ुर्बानी नहीं हुई। अगर आज यहाँ क़ुर्बानी करने देंगे, तो कौन कह सकता है कि कल को हमारे मन्दिर के सामने गौ-हत्या न होगी।
कई आवाज़ें एक साथ आयीं–हम मर मिटेंगे, पर यहाँ क़ुर्बानी न होने देंगे।
यशोदा०–खूब सोच लो, क्या करने जा रहे हो। वह लोग सब तरह से लैस हैं। ऐसा न हो कि तुम लाठियों के पहले ही वार में वहाँ से भाग खड़े हो?
कई आवाज़ें एक साथ आयीं–भाइयों, सुन लो, अगर कोई पीछे कदम हटाएगा, तो उसे गौ-हत्या का पाप लगेगा।
एक सिक्ख जवान–अजी देखिए, छक्के छुड़ा देंगे।
एक पंजाबी हिन्दू–एक-एक की गर्दन तोड़ के रख दूँगा।
आदमियों को यों उत्तेजित करके यशोदानन्दन आगे बढे़ और जनता ‘महावीर’ और ‘श्रीरामचन्द्र’ की जयध्वनि से वायुमण्डल को कम्पायमान करती हुई उनके पीछे चली। उधर मुसलमानों ने भी डण्डे सँभाले। करीब था कि दोनों दलों में मुठभेड़ हो जाए कि एका-एक चक्रधर आगे बढ़कर यशोदानन्दन के सामने खड़े हो गए और विनीत किन्तु दृढ़ भाव से बोले–आप मगर उधर जाते हैं, तो मेरी छाती पर पाँव रखकर जाइए। मेरे देखते हुए यह अनर्थ न होने पाएगा।
यशोदानन्दन ने चिढ़कर कहा–हट जाओ। अगर एक क्षण की भी देर हुई, तो फिर पछताने के सिवा और कुछ हाथ न आएगा।
चक्रधर–आप लोग वहाँ जाकर करेंगे क्या?
यशोदा०–हम इन ज़ालिमों से गौ को छीन लेंगे।
चक्रधर–अहिंसा का नियम गौओं ही के लिए नहीं, मनुष्यों के लिए भी तो है।
यशोदा०–कैसी बात करते हो, जी! क्या यहाँ खडे होकर अपनी आँखों से गौ की हत्या होते देखें?
चक्रधर–अगर आप एक बार दिल थामकर देख लेंगे, तो यक़ीन है कि फिर आपको कभी यह दृश्य न देखना पड़े।
यशोदा०–हम इतने उदार नहीं हैं।
चक्रधर–ऐसे अवसर पर भी?
यशोदा०–हम महान्-से-महान् उद्देश्य के लिए भी यह मूल्य नहीं दे सकते? इन दामों स्वर्ग भी महँगा है।
चक्रधर–मित्रो, ज़रा विचार से काम लो।
कई आवाज़ें–विचार से काम लेना कायरों का काम हैं।
एक सिक्ख जवान–जब डण्डे से काम लेने का मौक़ा आये, तो विचार को बन्द करके रख देना चाहिए।
चक्रधर–तो फिर जाइए, लेकिन उस गौ को बचाने के लिए आपको अपने एक भाई का खून करना पड़ेगा।
सहसा एक पत्थर किसी की तरफ़ से आकर चक्रधर के सिर में लगा। खून की धारा बह निकली, चक्रधर अपनी जगह से हिले नहीं। सिर थामकर बोले–अगर मेरे रक्त से आपकी क्रोधाग्नि शान्त होती हो, तो यह मेरे लिए सौभाग्य की बात है। अगर मेरा खून और कई जानों की रक्षा कर सके, तो इससे उत्तम कौन मृत्यु होगी?
फिर दूसरा पत्थर आया; पर अबकी चक्रधर को चोट न लगी। पत्थर कानों के पास से निकल गया।
यशोदानन्दन गरजकर बोले–यह कौन पत्थर फेंक रहा है? सामने क्यों नहीं आता? क्या वह समझता है कि उसी ने गौ-रक्षा का ठेका ले लिया है? अगर वह बड़ा वीर है, तो क्यों नहीं चन्द कदम आगे आकर अपनी वीरता दिखाता? पीछे खड़ा पत्थर क्यों फेंकता है।
एक आवाज़–धर्मद्रोहियों को मारना अधर्म नहीं है।
यशोदानन्दन–जिसे तुम धर्म का द्रोही समझते हो, वह तुमसे कहीं सच्चा हिन्दू है।
एक आवाज़–सच्चे हिन्दू वही तो होते हैं, जो मौक़े पर बगलें झाँकने लगें और शहर छोड़कर दो-चार दिन के लिए खिसक जायें।
कई आदमी–यह कौन मन्त्री जी पर आक्षेप कर रहा है? कोई उसकी जुबान पकड़कर क्यों नहीं खींच लेता?
यशोदानन्दन–आप लोग सुन रहे हैं, मुझ पर कैसे-कैसे दोष लगाए जा रहे हैं। मैं सच्चा हिन्दू नहीं, मैं मौक़ा पड़ने पर बगलें झाँकता हूँ और जान बचाने के लिए शहर से भाग जाता हूँ। ऐसा आदमी आपका मन्त्री बनने के योग्य नहीं है। आप उस आदमी को अपना मन्त्री बनाएँ, जिसे आप सच्चा हिन्दू समझते हों। मैं धर्म से पहले अपने आत्मगौरव की रक्षा करना चाहता हूँ।
कई आदमी–महाशय, आपको ऐसे मुँहफट आदमियों की बात का ख़याल न करना चाहिए।
यशोदा०–यह मेरी पच्चीस वर्षों की सेवा का उपहार है! जिस सेवा का फल अपमान हो, उसे दूर ही से मेरा सलाम है।
यह कहते हुए मुंशी यशोदानन्दन घर की तरफ़ चले। कई आदमियों ने उन्हें रोकना चाहा, कई आदमी उनके पैरों पड़ने लगे, लेकिन उन्होंने एक न मानी। वह तेजस्वी आदमी थे। अपनी संस्था पर स्वेच्छाचारी राजाओं की भाँति शासन करना चाहते थे। आलोचनाओं को सहन करने की उनमें सामर्थ्य ही न थी।
उनके जाते ही यहाँ आपस में ‘तू-तू, मैं-मैं’ होने लगी। एक दूसरे पर आक्षेप करने लगा। गालियों की नौबत आ गयी, यहाँ तक कि-चार आदमियों से हाथापाई भी हो गई।
चक्रधर ने जब देखा कि इधर से अब कोई शंका नहीं है, तो वह लपककर मुसलमानों के सामने आ पहुँचे और उच्च स्वर में बोले–हज़रात, मैं कुछ अर्ज़ करने की इज़ाज़त चाहता हूँ।
एक आदमी–सुनो, सुनो, यही तो अभी हिन्दूओं के सामने खड़ा था।
दूसरा आदमी–दुश्मनों के कदम उखड़ गए। सब भागे जा रहे हैं।
तीसरा आदमी–इसी ने शायद उन्हें समझा-बुझाकर हटा दिया है। देखो, क्या कहता है?
चक्रधर–अगर इस गाय की क़ुर्बानी करना आप अपना मज़हबी फ़र्ज़ समझते हों, तो शौक़ से कीजिए। मैं आपके मज़हबी मामले में दखल नहीं दे रहा हूँ। लेकिन क्या यह लाज़मी है कि इसी जगह क़ुर्बानी की जाए?
एक आदमी–हमारी खुशी है, जहाँ चाहेंगे, क़ुर्बानी करेंगे, तुमसे मतलब?
चक्रधर–बेशक, मुझे बोलने का हक़ नहीं है लेकिन इस्लाम की जो इज़्ज़त मेरे दिल में है, वह मुझे बोलने के लिए मज़बूर कर रही है। इस्लाम ने कभी दूसरे मज़हबवालों की दिलजारी नहीं की। उसने हमेशा दूसरों के जज़बात का एहतराम किया है। बग़दाद और रोम, स्पेन और मिस्त्र की तारीख़ें उस मज़हबी आज़ादी की शाहिद हैं, जो इस्लाम ने उन्हें अदा की थीं। अगर आप हिन्दू जज़बात का लिहाज़ करके किसी दूसरी जगह क़ुर्बानी करें, तो यक़ीनन इस्लाम के वकार में फ़र्क़ न आएगा।
एक मौलवी ने ज़ोर देकर कहा–ऐसी मीठी-मीठी बातें हमने बहुत सुनी हैं। क़ुर्बानी यहीं होगी। जब दूसरे हमारे ऊपर ज़ब्र करते हैं, तो हम उनके जज़बात का क्यों लिहाज़ करें?
ख्वाज़ा महमूद बड़े गौर से चक्रधर की बातें सुन रहे थे। मौलवी साहब की उद्दण्डता पर चिढ़कर बोले–क्या शरीयत का हुक्म है क़ुर्बानी यहीं हो? किसी दूसरी जगह नहीं की जा सकती?
मौलवी साहब ने ख्वाज़ा महमूद की तरफ़ अविश्वास की दृष्टि से देखकर कहा–मज़हब के मामले में उलमा के सिवा और किसी को दखल देने का मजाज़ नहीं है।
ख्वाज़ा–बुरा न मानिएगा, मौलवी साहब! अगर दस सिपाही यहाँ आकर खड़े हो जाएँ, तो बगलें झाँकने लगिएगा!
मौलवी–किसकी मज़ाल है कि हमारे दीनी उमूर में मज़ाहमत करे?
ख्वाज़ा–आपको तो अपने हलवे-माँडे से काम है, जिम्मेदारी तो हमारे ऊपर आएगी, दूकाने तो हमारी लुटेंगी, आपके पास फटे बोरिए और फूटे बधने के सिवा और क्या रखा है? जब वे लोग मसलहत देखकर किनारा कर गए, तो हमें भी अपनी ज़िद से बाज़ आ जाना चाहिए। क्या आप समझते हैं कि वे लोग आपसे डरकर भागे? हमारे दुगने आदमी अगर चढ़ आते, तो सँभलना मुश्किल हो जाता।
मौलवी–ज़नाब, ज़िहाद करना कोई खालाजी का घर नहीं। आप दुनिया के बन्दे हैं, दीन की हक़ीक़त क्या समझें?
ख्वाज़ा–बज़ा है, आपकी शहादत तो कहीं नहीं गई है। ज़िल्लत तो हमारी है।
मौलवी–भाइयो, आप लोग ख्वाज़ा साहब की ज़्यादती देख रहे हैं। आप ही फैसला कीजिए कि दीनी मामलात में उलमा का फैसला वाज़िब है या उमरा का?
एक मोटे-ताजे दढ़ियल आदमी ने कहा–आप बिस्मिल्लाह कीजिए। उमरा को दीन से कोई सरोकार नहीं।
यह सुनते ही एक आदमी बड़ा-सा छुरा लेकर निकल पड़ा और कई आदमी गाय के सींग पकड़ने लगे। गाय अब तक तो चुपचाप खड़ी थी। छुरा देखते ही वह छटपटाने लगी। चक्रधर यह दृश्य देखकर तिलमिला उठे। निराशा और क्रोध से काँपते हुए बोले–भाइयों, एक ग़रीब, बेकस जानवर को मारना बहादुरी नहीं। खुदा बेकसों के खून से खुश नहीं होता। अगर ज़वाँमर्दी दिखानी है, तो किसी शेर का शिकार करो, किसी चीते को मारो, किसी जंगली सूअर का पीछा करो। उसकी क़ुर्बानी से मुमकिन है, खुदा खुश हो। जब तक हिन्दू सामने खड़े थे, किसी की हिम्मत न पड़ी कि छुरा हाथ में लेता। जब वे चले गए तो आप लोग शेर हो गए?
एक आदमी–तो क्यों चले गए? मैदान में क्यों न रहे? गौ-रक्षा का ज़ोश दिखाते। दुम दबाकर भाग क्यों खड़े हुए?
चक्रधर–भाग नहीं खड़े हुए और न लड़ने में वे आपसे कम ही हैं। उनकी समझ में यह बात आ गई कि जानवर की हिमायत में इन्सान का खून बहाना इन्सान को मुनासिब नहीं।
मौलवी–शुक्र हैं, उन्हें इतनी समझ तो आयी।
चक्रधर–लेकिन आप तो अभी तक उनकी दिलजारी पर कमर बाँधे हुए हैं खैर, आपको अख़्तियार है, जो चाहें, करें। मगर मैं यक़ीन के साथ कहता हूँ कि यह दिलजारी एक दिन रंग लाएगी। यह न समझिए कि इस वक़्त कोई हिन्दू मैदान में नहीं है। यह एक क़ुर्बानी हिन्दूस्तान के २१ करोड़ हिन्दुओं के दिलों में ज़ख्म कर देती है, और इतनी बड़ी तादाद के दिलों में ज़ख्म कर एक दिन पछतावे का बाइस हो सकता है? अगर आपकी गिज़ा है, तो शौक़ से खाइए। लाखों गायें रोज़ क़त्ल होती हैं, हिन्दू सिर नहीं उठाते। फिर यह क्यों कर मुमक़िन है कि वह आपके मज़हबी मामले में दखल दें? हिन्दुओं से ज़्यादा बेतअस्सुब क़ौम दुनिया में नहीं हैं, लेकिन जब आप उनकी दिलजारी और महज़ दिलजारी के लिए क़ुर्बानी करते हैं, तो उनको ज़रूर सदमा होता है और उनके दिलों में जो शोला उठता है, उसका आप कयास नहीं कर सकते। अगर आपको यक़ीन न आए, तो देख लीजिए कि गाय के साथ ही हिन्दू कितनी खुशी से अपनी जान दे देता है!
यह कहते हुए चक्रधर ने तेजी से लपककर गाय की गर्दन पकड़ ली और बोले–आज आपको इस गाय के साथ एक इन्सान की भी क़ुर्बानी करनी पड़ेगी।
सभी आदमी चकित होकर चक्रधर की ओर ताकने लगे। मौलवी साहब ने क्रोध से उन्मत्त होकर कहा–कलाम-पाक की कसम, हट जाओ, वरना ग़ज़ब हो जाएगा।
चक्रधर–हो जाने दीजिए। खुदा की यही मर्ज़ी है कि आज गाय के साथ मेरी भी क़ुर्बानी हो।
ख्वाज़ा महमूद–क्यों भई, तुम्हारा घर कहाँ है?
चक्रधर–परदेशी मुसाफिर हूँ।
ख्वाज़ा-कसम खुदा की, तुम जैसा दिलेर आदमी नहीं देखा। नाम के लिए तो गाय को माता कहनेवाले बहुत हैं; पर ऐसे विरले ही देखे, जो गाय के पीछे जान लड़ा दें। तुम कलमा क्यों नहीं पढ़ लेते?
चक्रधर–मैं एक खुदा का कायल हूँ। वही सारे जहान का ख़ालिक और मालिक है। फिर और किस पर ईमान लाऊँ?
ख्वाज़ा–वल्लाह, तब तो तुम सच्चे मुसलमान हो। हमारे हज़रत को अल्लाहताला का रसूल मानते हो?
चक्रधर–बेशक मानता हूँ, उनकी इज़्ज़त करता हूँ और उनकी तौहीद का कायल हूँ।
ख्वाज़ा–हमारे साथ खानेपीने से परहेज़ तो नहीं करते?
चक्रधर–ज़रूर करता हूँ, उसी तरह जैसे किसी ब्राह्यण के साथ खाने से परहेज करता हूँ, अगर वह पाक-साफ़ न हो।
ख्वाज़ा–काश, तुम जैसे समझदार तुम्हारे और भाई भी होते। मगर यहाँ तो लोग हमें म्लेच्छ कहते हैं। यहाँ तक कि हमें कुत्तों से भी नजिस समझते हैं। उनकी थालियों में कुत्ते खाते हैं, पर मुसलमान उनके गिलास में पानी नहीं पी सकता। वल्लाह, आपसे मिलकर दिल खुश हो गया। अब कुछ-कुछ उम्मीद हो रही है कि शायद दोनों क़ौमों में इत्तफ़ाक हो जाए। अब आप जाइए। मैं आपको यक़ीन दिलाता हूँ, क़ुर्बानी न होगी।
चक्रधर–और साहबों से तो पूछिए।
कई आवाज़ें–होती तो ज़रूर, लेकिन अब न होगी। आप वाकई दिलेर आदमी हैं।
ख्वाज़ा–यहाँ आप कहाँ ठहरे हुए हैं? मैं आपसे मिलूँगा।
चक्रधर–आप क्यों तक़लीफ़ उठाएँगे, मैं खुद हाज़िर हूँगा।
ख्वाज़ा महमूद ने चक्रधर को गले लगाकर रुख़सत किया। इधर उस वक़्त गाय की पगहिया खोल दी गई। वह जान लेकर भागी। और लोग भी इस ‘नौजवान’ की ‘हिम्मत’ और ज़वाँमर्दी की तारीफ़ करते हुए चले।
चक्रधर को आते देखकर यशोदानन्दन अपने कमरे से निकल आये और उन्हें छाती से लगाते हुए बोले–भैया, आज तुम्हारा धैर्य और साहस देखकर मैं दंग रह गया। तुम्हें देखकर मुझे अपने ऊपर लज्जा आ रही है। तुमने आज हमारी लाज रख ली। अगर यहाँ क़ुर्बानी हो जाती, तो हम मुँह दिखाने लायक भी न रहते।
एक बूढ़ा–आज तुमने वह काम कर दिखाया, जो सैकड़ों आदमियों के रक्तपात से भी न होता!
चक्रधर–मैंने कुछ भी नहीं किया। यह उन लोगों की शराफ़त थी कि उन्होंने अनुनय-विनय सुन ली।
यशोदा०–अरे भाई, रोने का भी तो ढंग होता है। अनुनय-विनय हमने भी सैकड़ों ही बार की, लेकिन हर दफ़े गुत्थी उलझती ही गई। आइए आप के घाव की मरहम-पट्टी तो हो जाए!
चक्रधर को कमरे में बैठाकर यशोदानन्दन ने घर में जाकर अपनी स्त्री वागीश्वरी से कहा–आज मेरे एक दोस्त की दावत करनी होगी। भोजन खूब दिल लगाकर बनाना। अहिल्या, आज तुम्हारी पाक-परीक्षा होगी।
अहिल्या-वह कौन आदमी था दादा, जिसने मुसलमानों के हाथों से गाय की रक्षा की?
यशोदा०–वही तो मेरे दोस्त हैं, जिनकी दावत करने को कह रहा हूँ। बेचारे रास्ते में मिल गए। यहाँ सैर करने आए हैं। मंसूरी जाएँगे।
अहिल्या (वागीश्वरी से)–अम्माँ, ज़रा उन्हें अन्दर बुला लेना, हम उनके दर्शन करेंगे। दादा, मैं कोठे पर बैठी सब तमाशा देख रही थी। जब हिन्दुओं ने उन पर पत्थर फेंकना शुरू किया, तो ऐसा क्रोध आता था कि वहीं से फटकारूँ। बेचारे के सिर से खून निकलने लगा, लेकिन ज़रा भी न बोले। जब वह मुसलमानों के सामने आकर खड़े हुए तो मेरा कलेजा धड़कने लगा कि कहीं सब-के-सब उन पर टूट न पड़ें। बड़े ही साहसी आदमी मालूम होते हैं। सिर में चोट आई है क्या?
यशोदा०–हाँ, खून जम गया है; लेकिन उन्हें उसकी कुछ परवाह की नहीं। डॉक्टर को बुला रहा हूँ।
वागीश्वरी–खा-पी चुकें, तो ज़रा देर के लिए यहीं भेज देना। मेरे लड़कों की जोड़ी तो हैं?
यशोदा०–अच्छी बात है। ज़रा सफा़ई कर लेना।
पड़ोस में एक डॉक्टर रहते थे। यशोदानन्दन ने उन्हें बुलाकर घाव पर पट्टी बँधवा दी। फिर देर तक बातें होती रहीं। धीरे-धीरे सारा मुहल्ला ज़मा हो गया। कई श्रद्धालु जनों ने चक्रधर के चरण छुए। आखिर भोजन का समय हुआ। जब लोग खाने बैठे, तो यशोदानन्दन ने कहा–भाई, बाबूजी से जो कुछ कहना हो, कह लो; फिर मुझसे शिकायत न करना कि तुम उन्हें नहीं लाये। बाबूजी, इस घर की तथा मुहल्ले की कई स्त्रियों की इच्छा है कि आपके दर्शन करें। आप को कोई आपत्ति तो नहीं है?
वागीश्वरी–हाँ बेटा, ज़रा देर के लिए चले आना; नहीं तो अपने घर जाकर कहोगे कि मैंने जिन लोगों के लिए जान लड़ा दी, उन्होंने बात भी न पूछी।
चक्रधर ने शरमाते हुए कहा–आप लोगों ने मेरी जो ख़ातिर की है, वह कभी नहीं भूल सकता। उसके लिए मैं सदैव एहसान मानता रहूँगा।
ज्यों ही लोग चौके से उठे, अहिल्या ने कमरे में सफ़ाई करनी शुरू की। दीवार की तस्वीरें साफ़ की, फ़र्श फिर से झाड़कर बिछाया; एक छोटी-सी मेज़ पर फूलों का गिलास रख दिया। एक कोने में अगरबत्ती जलाकर रख दी। पान बनाकर तश्तरी में रखे। इन कामों से फुर्सत पाकर उसने एकान्त में बैठकर फूलों की माला गूँथनी शुरू की। मन में सोचती थी कि न जाने कौन हैं, स्वाभाव कितना सरल है! लजाने में तो औरतों से भी बढ़े हुए हैं खाना खा चुके, पर सिर न उठाया। देखने में ब्राह्मण मालूम होते हैं। चेहरा देखकर तो कोई नहीं कह सकता कि वह इतने साहसी होंगे।
सहसा वागीश्वरी ने आकर कहा–बेटी, दोनों आदमी आ रहे हैं। साड़ी तो बदल लो।
अहिल्या ‘ऊँह’ करके रह गई। हाँ उसकी छाती में धड़कन होने लगी। एक क्षण में यशोदानन्दनजी चक्रधर को लिए कमरे में आए। वागीश्वरी और अहिल्या दोनों खड़ी हो गईं। यशोदानन्दन ने चक्रधर को कालीन पर बैठा दिया और खुद बाहर चले गए वागीश्वरी पंखा झलने लगी; लेकिन अहिल्या मूर्ति की भाँति खड़ी रही।
चक्रधर ने उड़ती हुई निग़ाहों से अहिल्या को देखा। ऐसा महसूस हुआ मानो कोमल, स्निग्ध एवं सुगन्धमय प्रकाश की लहर-सी आँखों में समा गई हो।
वागीश्वरी ने मिठाई की तश्तरी सामने रखते हुए कहा–कुछ जलपान कर लो भैया, तुमने कुछ खाना भी तो नहीं खाया। तुम जैसे वीरों को सवा सेर से कम न खाना चाहिए। धन्य है वह माता, जिसने ऐसे बालक को जन्म दिया। अहिल्या, ज़रा गिलास में पानी तो ला। भैया जब तुम मुसलमानों के सामने अकेले खड़े थे, तो वह ईश्वर से तुम्हारी कुशल मना रही थी। जाने कितनी मनौतियाँ कर डालीं। कहाँ है वह माला, जो तूने गूँथी थी? अब पहनाती क्यों नहीं?
अहिल्या ने लजाते हुए काँपते हाथों से माला चक्रधर के गले में डाल दी, और आहिस्ता से बोली–क्या सिर में ज़्यादा चोट आयी?
चक्रधर–नहीं तो, बाबूजी ने ख्वामख्वाह पट्टी बँधवा दी।
वागीश्वर–जब तुम्हें चोट लगी, तब इसे इतना क्रोध आया था कि उस आदमी को पा जाती, तो मुँह नोच लेती। क्या करते हो, बेटा?
चक्रधर–अभी तो कुछ नहीं करता, पड़े-पड़े खाया करता हूँ, मगर जल्दी ही कुछ-न-कुछ करना ही पड़ेगा। धन से तो मुझे बहुत प्रेम नहीं है और मिल भी जाए, तो मुझे उसको भोगने के लिए दूसरों की मदद लेनी पड़े। हाँ, इतना अवश्य चाहता हूँ कि किसी का आश्रित होकर न रहना पड़े।
वागीश्वरी–कोई सरकारी नौकरी नहीं मिलती क्या?
चक्रधर–नौकरी करने की तो मेरी इच्छा ही नहीं है। मैंने पक्का निश्चय कर लिया है कि नौकरी न करूँगा। न मुझे खाने का शौक़ है, न पहनने का, न ठाट-बाट का; मेरा निर्वाह बहुत थोड़े में हो सकता है।
वागीश्वरी–और जब विवाह हो जाएगा, तब क्या करोगे?
चक्रधर–उस वक़्त सिर पर जो आएगी, देखी जाएगी। अभी से क्यों उसकी चिंता करूं?
वागीश्वरी–जलपान तो कर लो, या मिठाई भी नहीं खाते?
चक्रधर मिठाइयाँ खाने लगे। इतने में महरी ने आकर कहा–बड़ी बहूजी, मेरे लाल को रात से खाँसी आ रही है; तिल भर नहीं रुकती, दवाई दे दो।
वागीश्वर दवा देने चली गई। अहिल्या अकेली रह गई, तो चक्रधर ने उसकी ओर देखकर कहा–आपको मेरे कारण बड़ा कष्ट हुआ। मैं तो इस उपहार के योग्य न था।
अहिल्या–यह उपहार नहीं, भक्त की भेंट है।
चक्रधर–मेरा परम सौभाग्य है कि बैठे-बिठाए इस पद को पहुँच गया।
अहिल्या–आपने आज इस शहर के हिन्दू मात्र की लाज रख ली। क्या और पानी दूँ?
चक्रधर–तृप्त हो गया। आज मालूम हुआ कि जल में कितना स्वाद है? शायद अमृत में भी यह स्वाद न होगा।
वागीश्वरी ने आकर मुस्कुराते हुए कहा–भैया, तुमने तो आधी भी मिठाइयाँ नहीं खायीं। क्या इसे देखकर भूख-प्यास बन्द हो गई? यह मोहिनी है ज़रा इससे सचेत रहना।
अहिल्या–अम्माँ, तुम छोटे-बड़े किसी का लिहाज़ नहीं करतीं!
वागीश्वरी–अच्छा, बताओ, तुमने इनकी रक्षा के लिए कौन-कौन सी मनौतियाँ की थीं?
अहिल्या–मुझे आप दिक करेंगी, तो चली जाऊँगी।
चक्रधर यहाँ कोई घण्टे भर तक बैठे रहे। वागीश्वरी ने उनके घर का सारा वृत्तान्त पूछा–कितने भाई हैं, कितनी बहनें हैं, पिताजी, क्या करते हैं, बहनों का विवाह हुआ है या नहीं? चक्रधर को उनके व्यवहार में इतना मातृस्नेह भरा मालूम होता था, मानों उससे उनका परिचय है। चार बजते-बजते ख्वाज़ा महमूद के आने की ख़बर पाकर चक्रधर बाहर चले आए। और भी कितने ही आदमी मिलने आए थे। शाम तक उन लोगों में बातें होती रहीं। निश्चय हुआ कि पंचायत बनाई जाए और आपस के झगड़े उसी के द्वारा तय हुआ करें। चक्रधर को लोगों ने उस पंचायत का एक मेम्बर बनाया। रात को जब वागीश्वरी छत पर लेटीं, तो अहिल्या से पूछा–अहिल्या, सो गई क्या?
अहिल्या–नहीं अम्माँ, जाग रही हूँ।
वागीश्वरी–हाँ, आज तुझे क्यों नींद आएगी! इनसे ब्याह करेगी?
अहिल्या–अम्माँ, मुझे गालियाँ दोगी, तो मैं नीचे जा लेटूँगी, चाहे मच्छर भले ही नोंच खाएँ।
वागीश्वरी–अरे, तो मैं कौन-सी गाली दे रही हूँ। क्या ब्याह न करेगी? ऐसी अच्छा वर तुझे और कहाँ मिलेगा?
अहिल्या–तुम न मानोगी, लो मैं जाती हूँ।
वागीश्वरी–मैं दिल्लगी नहीं कर रही हूँ, सचमुच पूछती हूँ। तुम्हारी इच्छा हो, तो बातचीत की जाए, अपनी ही बिरादरी के हैं। कौन जाने, राजी हो जाएँ।
अहिल्या–सब बातें जानकर भी?
वागीश्वरी–टालो मत,दिल की बात साफ़-साफ़ कह दो।
अहिल्या–तुम मेरे दिल का हाल मुझसे अधिक जानती हो, फिर मुझसे क्यों पूछती हो?
वागीश्वरी–वह धनी नहीं हैं, याद रखो।
अहिल्या–मैं धन की लौंडी कभी नहीं रही।
वागीश्वरी–तो अब तुम्हें संशय में क्यों रखूँ। तुम्हारे बाबूजी तुमसे मिलाने ही के लिए इन्हें काशी से लाए हैं। इनके पास और कुछ हो, या न हो, हृदय अवश्य है। और ऐसा हृदय, जो बहुत कम लोगों के हिस्सों में आता है। ऐसा स्वामी पाकर तुम्हारा जीवन सफल हो जाएगा।
अहिल्या ने डबडबाई हुई आँखों से वागीश्वर को देखा, पर मुँह से कुछ न बोली। कृतज्ञता शब्दों में आकर शिष्टता का रूप धारण कर लेती है। उसका मौलिक रूप वही है, जो आँखों से बाहर निकलते हुए काँपता और लजाता है।
