Cover Image for Sevasadan (सेवासदन) by Munshi Premchand - Novel
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उपन्यास•1918•55 अध्याय•12h 15m

सेवासदन

Sevasadan

प्रेमचंद का उपन्यास 'सेवासदन' सुमन के जीवन के माध्यम से विवाह, दहेज, स्त्री-पराधीनता, वेश्यावृत्ति और सामाजिक सुधार के प्रश्नों को प्रस्तुत करता है।

पात्र:सुमन, गजाधर प्रसाद, सदनसिंह, शांता, पद्मसिंह शर्मा, विट्ठलदास, कृष्णचंद्र, भोलीबाई
सेटिंग:20वीं सदी के प्रारंभ में बनारस (वाराणसी), भारत

अध्याय 48 / 55

8 मिनट पठन • 1,122 शब्द

अध्याय 48: सेवासदन

सदनसिंह का विवाह संस्‍कार हो गया। झोंपड़ा खूब सजाया गया था। वही मंडप का काम दे रहा था, लेकिन कोई भीड़-भाड़ न थी।

पद्मसिंह उस दिन घर चले गए और मदनसिंह से सब समाचार कहा। वह यह सुनते ही आग हो गए, बोले-मैं उस छोकरे का सिर काट लूंगा, वह अपने को समझता क्‍या है? भाभी ने कहा - मैं आज ही जाती हूँ उसे समझाकर अपने साथ लिवा लाऊंगी ! अभी नादान लड़का है। उस कुटनी सुमन की बातों में आ गया है। मेरा कहना वह कभी न टालेगा।

लेकिन मदनसिंह ने भामा को डांटा और धमकाकर कहा - अगर तुमने उधर जाने का नाम लिया, तो मैं अपना और तुम्‍हारा गला एक साथ घोंट दूंगा। वह आग में कूदता है, कूदने दो। ऐसा दूध पीता नादान बच्‍चा नहीं। यह सब उसकी जिद है। बच्‍चू को भीख मंगाकर न छोडूं तो कहना। सोचते होंगे, दादा मर जाएंगे तो आनंद करूंगा। मुँह धो रखें, यह कोई मौरूसी जायदाद नहीं है। यह मेरी अपनी कमाई है, सब - की - सब कृष्‍णार्पण कर दूंगा। एक फूटी कौड़ी तो मिलेगी नहीं।

गांव में चारों ओर बतकहाव होने लगा। लाला बैजनाथ को निश्‍चय हो गया कि संसार से धर्म उठ गया। जब लोग ऐसे - ऐसे नीच कर्म करने लगे, तो धर्म कहां रहा? न हुई नवाबी, नहीं तो आज बच्‍चू की धज्जियां उड़ जातीं। अब देखें, कौन मुँह लेकर गांव में आते हैं?

पद्मसिंह रात को बहुत देर तक भाई के साथ बैठे रहे, लेकिन ज्‍यों ही वह सदन का कुछ जिक्र छेड़ते,मदनसिंह उनकी ओर ऐसी आग्‍नेय दृष्टि से देखते कि उन्‍हें बोलने की हिम्‍मत न पड़ती अंत में जब वह सोने चले, तो पद्मसिंह ने हताश होकर कहा- भैया, सदन आपसे अलग रहे, तब भी आपका लड़का ही कहलाएगा। वह जो कुछ नेक-बद करेगा, उसकी बदनामी हम सब पर आएगी। जो लोग इस अवस्‍था को भली - भांति जानते हैं, वह चाहे हम लोगों को निर्दोष समझें, लेकिन जनता सदन में और हममें कोई भेद नहीं कर सकती, तो इससे क्‍या फायदा कि सांप भी मरे और लाठी भी टूट जाए। एक ओर दो बुराइयां हैं- बदनामी भी होती है और लड़का भी हाथ से जाता है। दूसरी ओर एक ही बुराई है, बदनामी होगी, लेकिन लड़का अपने हाथ में रहेगा। इसलिए मुझे तो यही उचित जान पड़ता है कि हम लोग को समझाएं और यदि वह किसी तरह न माने तो...

मदनसिंह ने बात काटकर कहा- तो उसक चुड़ैल से उसका विवाह ठान दें? क्‍यों, यही न कहना चाहते हो? यह मुझसे न होगा। एक बार नहीं, हजार बार नहीं।

यह कहकर वह चुप हो गए। एक क्षण के बाद पद्मसिंह को लांछित कर बोले- आश्‍चर्य यह है कि यह सब तुम्‍हारे सामने हुआ और तुम्‍हें जरा भी खबर न हुई। उसने नाव ली, झोंपड़ा बनाया, दोनों चुडैलों से सांठ-गांठ की और तुम आंखें बंद किए बैठे रहे। मैंने तो उसे तुम्‍हारे ही भरोसे भेजा था। यह क्‍या जानता था कि तुम कान में तेल डाले बैठे रहते हो। अगर तुमने जरा भी चतुराई से काम लिया होता तो यह नौबत न आती। तुमने इन बातों की सूचना तक मुझे न दी, नहीं तो यह नौबत न आती। तुमने इन बातों की सूचना तक मुझे न दी, नहीं तो मैं स्‍वयं जाकर उसे किसी उपाय से बचा लाता। अब जब सारी गोटियां पिट गई, सारा खेल बिगड़ गया, तो चले हो वहाँ से मुझसे सलाह लेने। मैं साफ-साफ कहता हूँ कि तुम्‍हारी आनाकानी से मुझे तुम्‍हारे ऊपर भी संदेह होता है। तुमने जान-बूझकर उसे आग में गिरने दिया। मैंने तुम्‍हारे साथ बहुत बुराइयां की थीं, उनका तुमने बदला लिया। खैर, कल प्रात:काल एक दान-पत्र लिख दो। तीन पाई जो मौरूसी जमीन है, उसे छोड़कर मैं अपनी सब जायदाद कृष्‍णार्पण करता हूँ, यहाँ न लिख सको तो वहाँ से लिखकर भेज देना। मैं दस्‍तखत कर दूंगा और उसकी रजिस्‍ट्री हो जाएगी।

यह कहकर मदनसिंह सोने चले गए। लेकिन पद्मसिंह के मर्म-स्‍थान पर ऐसा वार कर गए कि वह रात-भर तड़पते रहे। जिस अपराध से बचने के लिए उन्‍होंने अपने सिद्धांतों की भी परवाह न की और अपने सहवर्गियों में बदनाम हुए, वह अपराध लग ही गया। इतना ही नहीं, भाई के हृदय में उनकी ओर से मैल पड़ गई। अब उन्‍हें अपनीभूल दिखाई दे रही थी। नि:संदेह अगर उन्‍होंने बुद्धिमानी से काम लिया होता, तो यह नौबत न आती।लेकिन इस वेदना में इस विचार से कुछ संतोष होता था कि जो कुछ हुआ सो हुआ, एक अबला का उद्धार तो हो गया।

प्रात:काल जब वह घर से चलने लगे, तो भामा रोती हुई आई और बोली- भैया, इनका हठ तो देख रहे हो, लड़के की जान ही लेने पर उतारू हैं, लेकिन तुम जरा सेाच-समझकर काम करना। भूल-चूक तो बड़ों-बड़ों से हो जाती है, वह बेचारा तो अभी नादान लड़का है। तुम उसकी ओर से मन न मैला करना। उसे किसी की टेढ़ी निगाह भी सहन नहीं है। ऐसा न हो, कहीं देश-विदेश की राह ले,मैं तो कहीं की न रहूँ। उसकी सुध लेते रहना। खाने-पीने की तकलीफ न होने पाए। यहाँ रहता था तो एक भैंस का दूध पी जाता था। उसे दाल में घी अच्‍छा नहीं लगता, लेकिन मैं उससे छिपाकर लौंदे-के-लौंदे दाल में डाल देती थी। अब इतना सेवा - जतन कौन करेगा? न जाने बेचारा कैसे होगा? यहाँ घर पर कोई खाने वाला नहीं, वहाँ वह इन्‍ही चीजों के लिए तरसता होगा। क्‍यों भैया, क्‍या अपने हाथ से नाव चलाता है?

पद्मसिंह - नहीं, दो मल्‍लाह रख लिए हैं।

भामा - तब भी दिन - भर दौड़ - धूप तो करनी ही पड़ती होगी। मजूर बिना देखे-भाले थोड़े ही काम करते हैं। मेरा तो यहाँ कुछ बस नहीं है, उसे तुम्‍हें सौंपती हूँ। उसे अनाथ समझकर खोज - खबर लेते रहना। मेरा रोआं - रोआं तुम्‍हें आशीर्वाददेगा। अब की कार्तिक - स्‍नान में मैं उसे जरूर देखने जाऊंगी। कह देना, तुम्‍हारी अम्‍मा तुम्‍हें बहुत याद करती थीं, बहुत रोती थीं। यह सुनकर उसे ढाढ़स हो जाएगा। उसका जी बड़ा कच्‍चा है। मुझे याद करके रोज रोता होगा। यह थोड़े - से रुपये हैं, लेते जाओ, उसके पास भिजवा देना।

पद्मसिंह - इसकी क्‍या जरूरत है? मैं तो वहाँ हूँ ही, मेरे देखते उसे किसी बात की तकलीफ न होने पाएगी।

भामा-नहीं भैया, लेते जाओ, क्‍या हुआ! इस हांड़ी में थोड़ा-सा घी है, यह भी भिजवा देना! बाजारू घी घर के घी को कहां पाता है, न वह सुगंध है, न वह स्‍वाद। उसे अमावट की चटनी बहुत अच्‍छी लगती है, मैं थोड़ी-सी अमावट भी रखे देती हूँ। मीठे-मीठे आम चुनकर रस निकाला था। समझाकर कह देना, बेटा, कोई चिंता मत करो। जब तक तुम्‍हारी मां जीती है तुमको कोई कष्‍ट न होने पाएगा। मेरे तो वही एक अंधे की लकड़ी है। अच्‍छा है तो, बुरा है तो, अपना ही है। संसार की लाज से आंखों से चाहे दूर कर दूं।, लेकिन मन से थोड़े ही दूर कर सकती हूँ।

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शोध एवं शोध-पत्रों के लिए अकादमिक संदर्भ

Premchand, Munshi. "सेवासदन." *Munshi Premchand Digital Archive*, 1918, https://munshipremchand.com/works/novels/sevasadan. Accessed 22 Sep. 2026.