Cover Image for Sevasadan (सेवासदन) by Munshi Premchand - Novel
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उपन्यास•1918•55 अध्याय•12h 15m

सेवासदन

Sevasadan

प्रेमचंद का उपन्यास 'सेवासदन' सुमन के जीवन के माध्यम से विवाह, दहेज, स्त्री-पराधीनता, वेश्यावृत्ति और सामाजिक सुधार के प्रश्नों को प्रस्तुत करता है।

पात्र:सुमन, गजाधर प्रसाद, सदनसिंह, शांता, पद्मसिंह शर्मा, विट्ठलदास, कृष्णचंद्र, भोलीबाई
सेटिंग:20वीं सदी के प्रारंभ में बनारस (वाराणसी), भारत

अध्याय 14 / 55

24 मिनट पठन • 3,481 शब्द

अध्याय 14: सेवासदन

दूसरे दिन पद्मसिंह सदन को साथ लेकर किसी स्‍कूल में दाखिल कराने चले। किंतु जहां गए, साफ जवाब मिला 'स्‍थान नहीं है। ' शहर में बारह पाठशालाएं थीं लेकिन सदन के लिए कहीं स्‍थान न था।

शर्माजी ने विवश होकर निश्‍चय किया कि मैं स्‍वयं पढ़ाऊंगा। प्रात:कांल तो मुवक्किलों के मारे अवकाश नहीं मिलता। कचहरी से आकर पढ़ाते,किंतु एक ही सप्‍ताह में हिम्‍मत हार बैठे। कहां कचहरी से आकर पत्र पढ़ते थे, कभी हारमोनियम बजाते, कहां अब बूढ़े तोते को रटाना पड़ता था। वह बारंबार झुंझलाते, उन्‍हें मालूम होता कि सदन मंद-बुद्धि है। यदि वह कोई पढ़ा हुआ शब्‍द पूछ बैठता, तो शर्माजी झल्‍ला पड़ते। वह स्‍थान उलट-पुलटकर दिखाते,जहां वह शब्‍द प्रथम आया था। फिर प्रश्‍न करते और सदन ही से उस शब्‍द का अर्थ निकलवाते। इस उद्योग में काम कम होता था, किंतु उलझन बहुत थी। सदन भी उनके सामने पुस्‍तक खोलते हुए डरता। वह पछताता कि कहां-से-कहां यहाँ आया, इससे तो गांव ही अच्‍छा था। चार पंक्तियां पढ़ाएंगे,लेकिन घंटों बिगड़ेंगे। पढ़ा चुकने के बाद शर्माजी कुछ थक-से जाते। सैर करने को जी नहीं चाहता। उन्‍हें विश्‍वास हो गया कि इस काम की क्षमता मुझमें नहीं है। मुहल्‍ले में एक मास्‍टर साहब रहते थे। उन्‍होंने बीस रुपये मासिक पर सदन को पढ़ाना स्‍वीकार किया। अब चिंता हुई कि रुपये आएं कहां से? शर्माजी फैशनेबुल मनुष्‍य थे, खर्च का पल्‍ला सदा दबा ही रहता था। फैशन का बोझ अखरता तो अवश्‍य था, किंतु उसके सामने कंधा न डालते थे। बहुत देर तक एकांत में बैठे सोचते रहे, किंतु बुद्धि ने कुछ काम न किया, तब सुभद्रा के पास जाकर बोले -मास्‍टर बीस रुपये पर राजी है।

सुभद्रा-तो क्‍या मास्‍टर ही न मिलते थे। मास्‍टर तो एक नहीं सौ हैं, रुपये कहां हैं?

शर्माजी-रुपये भी ईश्‍वर कहीं से देंगे ही।

सुभद्रा-मैं तो कई साल से देख रही हूँ, ईश्‍वर ने कभी विशेष कृपा नहीं की। बस, इतना दे देते हैं कि पेट की रोटियां चल जाएं, वही तो ईश्‍वर हैं !

पद्मसिंह-तो तुम्‍हीं कोई उपाय निकालो।

सुभद्रा-मुझे जो कुछ देते हो, मत देना बस !

पद्मसिंह-तुम तो जरा-सी बात में चिढ़ जाती हो।

सुभद्रा-चिढ़ने की बात ही करते हो, आय-व्‍यय तुमसे छिपा नहीं है, मैं और कौन-सी बचत निकाल दूंगी? दूध-घी की तुम्‍हारे यहाँ नदी नहीं बहती, मिठाई-मुरब्‍बे में कभी फफूंदी नहीं लगी,कहारिन के बिना काम चलने ही का नहीं, महराजिन का होना जरूरी है। और किस खर्चे में कमी करने को कहते हो?

पद्मसिंह-दूध ही बंद कर दो।

सुभद्रा-हां,बद कर दो। मगर तुम न पीयोगे, सदन के लिए तो लेना ही होगा।

शर्माजी फिर सोचने लगे। पान-तम्‍बाकू का खर्च दस रुपये मासिक से कम न था, और भी कई छोटी-छोटी मदों में कुछ-न-कुछ बचत हो सकती थी। किंतु उनकी चर्चा करने से सुभद्रा की अप्रसन्‍नता का भय था। सुभद्रा की बातों से उन्‍हें स्‍पष्‍ट विदित हो गया था कि इस विषय में उसे मेरे साथ सहानुभूति‍ नहीं है। मन में बाहर के खर्च का लेखा जोड़ने लगे। अंत में बोले-क्‍यों, रोशनी और पंखे के खर्च में कुछ किफायत हो सकती है?

सुभद्रा-हां, हो सकती है, रोशनी की क्‍या आवश्‍यकता है, सांझ ही से बिछावन पर पड़ रहें। यदि कोई मिलने-मिलाने आएगा, तो आप ही चिल्‍लाकर चला जाएगा, या घूमने निकल गए, नौ बजे लौटकर आए, और पंखा तो हाथ से भी झला जा सकता है। क्‍या जब बिजली नहीं थी, तो लोग गर्मी के मारे बावले हो जाते थे?

पद्मसिंह-घोड़े के रातिब में कमी कर दूं?

सुभद्रा-हां, यह दूर की सूझी। घोड़े को रातिब दिया ही क्‍यों जाए, घास काफी है। यही न होगा कि कूल्‍हे पर हड्डीयां निकल आएंगी। किसी तरह मर-जीकर कचहरी तक ले ही जाएगा,यह तो कोई नहीं कहेगा कि वकील साहब के पास सवारी नहीं है।

पद्मसिंह-लड़कियों की पाठशाला को दो रुपये मासिक चंदा देता हूँ, नौ रुपये क्‍लब का चंदा है, तीन रुपये मासिक अनाथालय को देता हूँ। यह सब चंदे बंद कर दूं तो कैसा हो?

सुभद्रा-बहुत अच्‍छा होगा। संसार की रीति है कि पहले अपने घर में दीया जलाकर मस्जिद में जलाते हैं।

शर्माजी सुभद्रा की व्‍यंग्‍यपूर्ण बातों को सुन-सुनकर मन में झुंझला रहे थे, पर धीरज के साथ बोले-इस तरह कोई पंद्रह रुपये मासिक तो मैं दूंगा,शेष पांच रुपये का बोझ तुम्‍हारे ऊपर है। मैं हिसाब-किताब नहीं पूछता, किसी तरह संख्‍या पूरी करो।

सुभद्रा-हां, हो जाएगा, कुछ कठिन नहीं है। भोजन एक ही समय बने, दोनों समय बनने की क्‍या जरूरत है? संसार में करोड़ों मनुष्‍य एक ही समय खाते हैं, किंतु बीमार या दुबले नहीं होते।

शर्माजी अधीर हो गए। घर की लड़ाई से उनका ह्रदय कांपता था, पर यह चोट न सही गई। बोले-तुम क्‍या चाहती हो कि सदन के लिए मास्‍टर न रखा जाए और वह यों ही अपना जीवन नष्‍ट करे? चाहिए तो यह था कि तुम मेरी सहायता करतीं, उल्‍टे और जी जला रही हो। सदन मेरे उसी भई का लड़का है, जो अपने सिर पर आटे-दाल की गठरी लादकर मुझे स्‍कूल में दाखिल कराने आए थे। मुझे वह दिन भूले नहीं हैं। उनके उस प्रेम का स्‍मरण करता हूँ, तो जी चाहता है कि उनके चरणों में गिरकर घंटों रोऊं। तुम्‍हें अब अपने रोशनी और पंखें के खर्च में, पान-तंबाकू के खर्च में, घोड़े-साईस के खर्च में किफायत करना भारी मालूम होता है, किंतु भैया मुझे वार्निश वाले जूते पहनाकर आप नंगे पांव रहते थे। मैं रेशमी कपड़े पहनता था, वे फटे कुर्ते पर ही काटते थे। उनके उपकारों और भलाइयों का इतना भरी बोझ मेरी गर्दन पर है कि मैं इस जीवन में उससे मुक्‍त नहीं हो सकता। सदन के लिए मैं प्रत्‍येक कष्‍ट सहने को तैयार हूँ। उसके लिए यदि मुझे पैदल कचहरी जाना पड़े, उपवास करना पड़े, अपने हाथों से उसके जूते साफ करने पड़ें,तब भी मुझे इनकार न होगा; नहीं तो मुझ जैसा कृतघ्‍न संसार में न होगा।

ग्‍लानि से सुभद्रा का मुखकमल कुम्‍हला गया। यद्यपि शर्माजी ने वे बातें सच्‍चे दिल से कहीं थीं,पर उसने यह समझा कि यह मुझे लज्जित करने के निमित्त कही गई हैं। सिर नीचा करके बोली-तो मैंने यह कब कहा कि सदन के लिए मास्‍टर न रखा जाए? जो काम करना ही है, उसे कर डालिए। जो कुछ होगा, देखा जाएगा। जब दादाजी ने आपके लिए इतने कष्‍ट उठाए हैं तो यही उचित है कि आप भी सदन के लिए कोई बात उठा न रखें। मुझसे जो कुछ करने को कहिए,वह करूं। आपने अब तक कभी इस विषय पर जोर नहीं दिया था, इसलिए मुझे यह भ्रम हुआ कि यह कोई आवश्‍यक खर्च नहीं है। आपको पहले ही दिन से मास्‍टर का प्रबन्‍ध करना चाहिए था। इतने आगे-पीछे का क्‍या काम था? अब तक तो यह थोड़ा-बहुत पढ़ भी चुका होता। इतनी उम्र गंवाने के बाद जब पढ़ने का विचार किया है,तो उसका एक दिन भी व्‍यर्थ न जाना चाहिए।

सुभद्रा ने तत्‍क्षण अपनी लज्‍जा का बदला ले लिया। पंडितजी को अपनी भूल स्‍वीकार करनी पड़ी। यदि अपना पुत्र होता, तो उन्‍होंने कदापि इतना सोच-विचार न किया होता।

सुभद्रा को अपने प्रतिवाद पर खेद हुआ। उसने पान बनाकर शर्माजी को दिया। यह मानो संधिपत्र था। शर्माजी ने पान ले लिया, संधि स्‍वीकृत हो गई।

जब वह चलने लगे तो सुभद्रा ने पूछा-कुछ सुमन का पता चला?

शर्माजी-कुछ भी नहीं। न जाने कहां गायब हो गई, गजाधर भी नहीं दिखाई दिया। सुनता हूँ, घर-बार छोड़कर किसी तरफ निकल गया है।

दूसरे दिन से मास्टर साहब सदन को पढ़ाने लगे। नौ बजे वह पढ़ाकर चले जाते तब सदन स्‍नान-भोजन करके सोता। अकेले उसका जी बहुत घबराता, कोई संगी न साथी, न कोई हंसी न दिल्‍लगी, कैसे जी लगे। हां, प्रात:काल थोड़ी-सी कसरत कर लिया करता था। इसका उसे व्‍यसन था। अपने गांव में उसने एक छोटा-सा अखाड़ा बनवा रखा था। यहाँ अखाड़ा तो न था, कमरे में ही डंड कर लेता। शाम को शर्माजी उसके लिए फिटन तैयार करा देते। तब सदन अपना सूट पहनकर गर्व के साथ फिटन पर सैर करने निकलता। शर्माजी पैदल घूमा करते थे। वह पार्क या छावनी की ओर जाते, किंतु सदन उस तरफ न जाता। वायु-सेवन में जो एक प्रकार का दार्शनिक आनंद होता है, उसका उसे क्‍या ज्ञान। शुद्ध वायु की सुखद शीतलता, हरे-भरे मैदानों की विचारोत्‍पादन निर्जनता और सुरम्‍य दृश्‍यों की आनंदमयी नि:स्‍तब्‍धता-उसमें इनके रसास्‍वादन की योग्‍यता न थी। उसका यौवनकाल था, जब बनाव-श्रृंगार का भूत सिर पर सवार रहता है। वह अत्‍यंत रूपवान, सुगठित, बलिष्‍ठ युवक था। देहात में रहा, न पढ़ना न लिखना, न मास्‍टर का भय, न परीक्षा की चिंता, सेरों दूध पीता था। घर की भैंसे थीं, घी के लोंदे-के-लोंदे उठाकर खा जाता। उस पर कसरत का शौक। शरीर बहुत सुडौल निकल आया था। छाती चौड़ी, गर्दन तनी हुई, ऐसा जान पड़ता था, मानो देह में ईंगुर भरा हुआ है।

उसके चेहरे पर वह गंभीरता और कोमलता न थी, जो शिक्षा और ज्ञान से उत्‍पन्‍न होती है। उसके मुख से वीरता और उद्दंडता झलकती थी। आंखें मतवाली, सतेज और चंचल थीं। वह बाग का कलमी पौधा नहीं, वन का सुदृढ़ वृक्ष था। निर्जन पार्क या मैदान में उस पर किसकी निगाह पड़ती? कौन उसके रूप और यौवन को देखता। इसलिए वह कभी दालमंडी की तरफ जाता, कभी चौक की तरफ। उसके रंग-रूप,ठाट-बाट पर बूढ़े-जवान सबकी आंखें उठ जातीं। युवक उसे ईर्ष्‍या से देखते, बूढ़े स्‍नेह से। लोग राह चलते-चलते उसे एक आंख देखने के लिए ठिठक जाते। दुकानदार समझते कि यह किसी रईस का लड़का है।

इन दुकानों के ऊपर सौंदर्य का बाजार था। सदन को देखते ही उस बाजार में एक हलचल मच जाती। वेश्‍याएं छज्‍जों पर आकर खड़ी हो जाती और प्रेम कटाक्ष के बाण उस पर चलातीं। देखें, यह बहका हुआ कबूतर किस छतरी पर उतरता है? यह सोने की चिड़िया किस जाल में फंसती है?

सदन में वह विवेक तो था नहीं, जो सदाचरण की रक्षा करता है। उसमें वह आत्‍मसम्‍मान भी नहीं था, जो आंखों को ऊपर नहीं उठने देता। उसकी फिटन बाजार में बहुत धीरे-धीरे चलती। सदन की आंखें उन्‍हीं रमणियों की ओर लगी रहतीं। यौवन के पूर्वकाल में हम अपनी कुवासनाओं के प्रदर्शन पर गर्व करते हैं, उत्तरकाल में अपने सद्गुणों के प्रदर्शन पर। सदन अपने को रसिया दिखाना चाहता था, प्रेम से अधिक बदनामी का आकांक्षी था। इस समय यदि उसका कोई अभिन्‍न मित्र होत, तो सदन उससे अपने कल्पित दुष्‍प्रेम की विस्‍तृत कथाएं वर्णन करता।

धीरे-धीरे सदन के चित्त की चंचलता यहाँ तक बढ़ी कि पढ़ना-लिखना सब छूट गया। मास्‍टर आते और पढ़ाकर चले जाते लेकिन सदन को उनका आना बहुत बुरा मालूम होता। उसका मन हर घड़ी बाजार की ओर लगा रहता। वही दृश्‍य आंखों में फिरा करते। रमणियों के हाव-भाव और मृदु मुस्‍कान के स्‍मरण में मग्‍न रहता। इस भांति दिन काटने के बाद ज्‍यों ही शाम होती, यह बन-ठनकर दालमंडी की ओर निकल जाता। अंत में इस कुप्रवृत्ति का वही फल हुआ, जो सदैव हुआ करता है। तीन ही चार मास में उसका संकोच उड़ गया। फिटन पर दो आदमी दूतों की तरह उसके सिर पर सवार रहते।

तीन ही चार मास में उसका संकोच उड़ गया। फिटन पर दो आदमी दूतों की तरह उसके सिर पर सवार रहते। इसलिए वह इस बाग के फूलों में हाथ लगाने का साहस न कर सकता था। वह सोचने लगा कि किसी भांति इन दूतों से गला छुड़ाऊं। सोचते-सोचते उसे एक उपाय सूझ गया। एक दिन उसने शर्माजी से कहा-चाचा, मुझे एक अच्‍छा-सा घोड़ा ले दीजिए। फिटन पर अपाहिजों की तरह बैठे रहना कुछ अच्‍छा नहीं मालूम होता। घोड़े पर सवार होने से कसरत भी हो जाएगी ओर मुझे सवारी का भी अभ्‍यास हो जाएगा।

जिस दिन से सुमन गई थी, शर्माजी कुछ चिंतातुर रहा करते थे। मुवक्किल लोग कहते कि आजकल इन्‍हें न जाने क्‍या हो गया है। बात-बात पर झुंझला जाते हैं। हमारी बात ही न सुनेंगे तो बहस क्‍या करेंगे। जब हमको मेहनताना देना है, तो क्‍या यही एक वकील है? गली-गली तो मारे-मारे फिरते हैं। इससे शर्माजी की आमदनी दिन-प्रतिदिन कम होती जाती थी। यह प्रस्‍ताव सुनकर चिंतित स्‍वर में बोले-अगर इसी घोड़े पर जीन खिंचा लो तो कैसा हो? दो-चार दिन में निकल जाएगा।

सदन-जी नहीं; बहुत दुर्बल है, सवारी में न ठहरेगा। कोई चाल भी तो नहीं; न कदम, न सरपट। कचहरी से थका-मांदा आएगा तो क्‍या चलेगा।

शर्माजी-अच्‍छा, तलाश करूंगा, कोई जानवर मिला तो ले लूंगा।

शर्माजी ने चाहा कि इस तरह बात टाल दूं। मामूली घोड़ा भी ढ़ाई-तीन सौ से कम में न मिलेगा, उस पर कम-से-कम पच्‍चीस रुपये मासिक का खर्च अलग। इस समय वह इतना खर्च उठाने में समर्थ न थे, किंतु सदन कब माननेवाला था? नित्‍य‍प्रति उनसे तकाजा करता, यहाँ तक कि दिन में कई बार टोकने की नौबत आ पहुंची। शर्माजी उसकी सूरत चुप हो जता, लेकिन अपनी चिंताओं में रामकहानी सुनाकर वह उसे कष्‍ट में नहीं डालना चाहते थे।

सदन ने अपने दोनों साइसों से कह रखा था कि कहीं घोड़ा बिकाऊ हो तो हमें कहना। साइसों ने दलाली के लोभ से दत्तचित्त होकर तलाश की। घोड़ा मिल गया। डिगवी नाम के एक साहब विलायत जा रहे थे। उनका घोड़ा बिकनेवाला था। सदन खुद गया , घोड़े को देखा, उस पर सवार हुआ, चाल देखी। मोहित हो गया। शर्माजी से आकर कहा-चलिए, घोड़ा देख लीजिए, मुझे बहुत पसंद है।

शर्माजी को अब भागने का कोई रास्‍तान रहा, जाकर घोड़े को देखा, डिगवी साहब से मिले, दाम पूछे। उन्‍होंने चार सौ रुपये मांगे, इससे कौड़ी कम नहीं।

अब इतने रुपये कहां से आएं? घर में अगर सौ-दो रुपये थे तो वह सुभद्रा के पास थे, और सुभद्रा से इस विषय में शर्माजी को सहानुभूति की लेशमात्र भी आशा न थी। उपकारी बैंक के मैनेजर बाबू चारूचन्‍द्र से उनकी मित्रता थी। उनसे उधार लेने का विचार किया, लेकिन आज तक शर्माजी को ऋण मांगने का अवसर नहीं पड़ा था। बार-बार इरादा करते और फिर हिम्‍मत हार जाते। कहीं वह इनकार कर गए तब? इस इनकार का भीषण भय उन्‍हें सता रहा था। वह यह बिल्‍कुल न जानते थे कि लोग कैसे महाजन पर अपना विश्‍वास जमा लेते हैं। कई बार कलम-दवात लेकर रूक्‍का लिखने बैठे, किंतु लिखें क्‍या, यह न सूझा।

इसी बीच में सदन डिगवी साहब के यहाँ से घोड़ा ले आया। जीन-साज का मूल्‍य 50 रुपये और हो गया। दूसरे दिन रुपये चुका देने का वादा हुआ। केवल रात-भर की मोहलत थी, प्रात:काल रुपये देना परमावश्‍यक था। शर्माजी की हैसियत के आदमी के लिए इतने रुपये का प्रबंध करना कोई मुश्किल न था। किंतु उन्‍हें चारों ओर अंधकार दिखाई देता था। उन्‍हें आज अपनी क्षुद्रता का ज्ञान हुआ । जो मनुष्‍य कभी पहाड़ पर नहीं चढ़ा है, उसका सिर एक छोटे से टीले पर भी चक्‍कर खाने लगता है। इस दुरावस्‍था में सुभद्रा के सिवा उन्‍हें कोई अवलंब न सूझा। उसने उनकी रोनी सूरत देखी तो पूछा-आज इतने उदास क्‍यों हो? जी तो अच्‍छा है। शर्माजी ने सिर झुकाकर उत्तर दिया-हां, जी तो अच्‍छा है।

सुभद्रा-तो चेहरा क्‍यों उतरा है?

शर्माजी-क्‍या बताऊं, कुछ कहा नहीं जाता, सदन के मारे हैरान हूँ। कई दिन से घोड़े की रट लगाए हुए था। आज डिगवी साहब के यहाँ से घोड़ा ले आया, साढ़े चार सौ रुपये के मत्‍थे डाल दिया।

सुभद्रा ने विस्मित होकर कहा-अच्‍छा, यह सब हो गया और मुझे खबर ही नहीं।

शर्माजी-तुमसे कहते हुए डर मालूम होता था।

सुभद्रा-डर की कौन बात थी? क्‍या मैं सदन की दुश्‍मन थी, जो जल-भुन जाती? उसके खेलने-खाने के क्‍या और दिन आएंगे? कौन बड़ा खर्च है, तुम्‍हें ईश्‍वर कुशल से रखें, ऐसे चार-पांच सौ रुपये कहां आएंगे और कहां जाएंगे। लड़के का मन तो रह जाएगा। उसी भाई का तो बेटा है, जिसने आपको पाल-पोसकर आज इस योग्‍य बनाया।

शर्माजी इस व्‍यंग्‍य के लिए तैयार थे। इसीलिए उन्‍होंने सदन की शिकायत करके यह बात छेड़ी थी। किंतु वास्‍तव में उन्‍हें सदन का यह व्‍यसन दु:खजनक नहीं मालूम होता था, जितनी अपनी दारूण धनहीनता। सुभद्रा की सहानुभूति प्राप्‍त करने के लिए लगता था। मन की बात कहता हूँ। लड़कों का खाना-खेलना सबको अच्‍छा लगता है, पर घर में पूंजी न हो तब। दिन-भर से इसी फिक्र में पड़ा हुआ हूँ। कुछ बुद्धि काम नहीं करती। सबेरे डिगवी साहब का आदमी आएगा, उसे क्‍या उत्तर दूंगा? बीमार भी पड़ जाता,तो एक बहाना मिल जाता।

सुभद्रा-तो यह कौन मुश्किल बात है, सबेरे चादर ओढ़कर लेट रहिएगा, मैं कह दूंगी आज तबीयत अच्‍छी नहीं है।

शर्माजी हंसी रोक न सके। इस व्‍यंग्‍य में कितनी निर्दयता, कितनी विरक्ति थी। बोले-अच्‍छा, मान लिया कि आदमी कल लौट गया, परसों तो डिगवी साहब जानेवाले ही हैं। कल कोई-न-कोई फिक्र करनी ही पड़ेगी।

सुभद्रा-तो वही फिक्र आज ही क्‍यों नहीं कर डालते?

शर्माजी-भाई चिढ़ाओ मत। अगर मेरी बुद्धि काम करती तो तुम्‍हारी शरण क्‍यों आता? चुपचाप काम न कर डालता? जब कुछ नहीं बन पड़ा है, तब तुम्‍हारे पास आया हूँ। बताओ, क्‍या करूं?

सुभद्रा-मैं क्‍या बताऊं? आपने बकालत पढ़ी है, मैं तो मिडिल तक भी नहीं पढ़ी, मेरी बुद्धि यहाँ क्‍या काम देगी? इतना जानती हूँ कि घोड़े को द्वार पर हिनहिनाते सुनकर बैरियों की छाती धड़क जाएगी। जिस वक्‍त आप सदन को उस पर बैठे देखेंगे, तो आंखें तृप्‍त हो जाएंगी।

शर्माजी-वही तो पूछता हूँ कि यह अभिलाषाएं कैसे पूरी हों?

सुभद्रा-ईश्‍वर पर भरोसा रखिए, वह कोई-न-कोई जुगत निकालेगा ही।

शर्माजी-तुम तो ताने देने लगीं।

सुभद्रा-इसके सिवा मेरे पास और है ही क्‍या? अगर आप समझते हों कि मेरे पास रुपये होंगे, तो यह आपकी भूल है। मुझे हेर-फेर करना नहीं आता, संदूक की चाबी लीजिए,सौ-सवा सौ रुपये पड़े हुए हैं, निकाल ले जाइए। बाकी के लिए और कोई फिक्र कीजिए। आपके कितने ही मित्र हैं, क्‍या दो-चार सौ रुपये का प्रबंध नहीं कर देंगे।

यद्यपि पद्मसिंह यही उत्तर पाने की आशा रखते थे, पर इसे कानों से सुनकर वह अधीर हो गए। गांठ जरा भी हलकी न पड़ी। चुपचाप आकाश की ओर ताकने लगे, जैसे कोई अथाह जल में बहा जाता हो।

सुभद्रा संदूक की चाबी देने को तैयार तो थी, लेकिन संदूक में सौ रुपये की जगह पूरे पांच सौ रुपये बटुए में रखे हुए थे। यह सुभद्रा की दो साल की कमाई थी। इन रुपयों को देख-देख सुभद्रा फूली न समाती थी। कभी सोचती, अबकी घर चलूंगी,तो भाभी के लिए अच्‍छा-सा कंगन लेती चलूंगी और गांव की सब कन्‍याओं के लिए एक-एक साड़ी। कभी सोचती, यहीं कोई काम पड़ जाए और शर्माजी रुपये के लिए परेशान हों, तो मैं चट निकालकर दू दूंगी। वह कैसे प्रसन्‍न होंगे। चकित हो जाएंगे। साधारणत: युवतियों के ह्रदय में ऐसे उदार भाव नहीं उठा करते। वह रुपये जमा करती हैं अपने गहनों के लिए लेकिन सुभद्रा बड़े धनी घर की बेटी थी, गहनों से मन भरा हुआ था।

उसे रुपयों का जरा भी लोभ न था। हां,एक ऐसे अनावश्‍यक कार्य के लिए उन्‍हें निकालने मे कष्‍ट होता था, पर पंडितजी की रोनी सूरत देखकर उसे दया आ गई, बोली-आपने बैठे-बिठाए यह चिंता अपने सिर ली। सीधी-सी तो बात थी। कह देते भाई रुपये नहीं हैं, तब तक किसी तरह काम चलाओ। इस तरह मन बढ़ाना कौन-सी अच्‍छी बात है? आज घोड़ों की जिद है, कल मोटरकार की धुन होगी, तब क्‍या कीजिएगा? माना कि दादाजी ने आपके साथ बड़े अच्‍छे सलूक किए हैं, लेकिन सब काम अपनी हैसियत देखकर ही किए जाते हैं। दादाजी यह सुनकर आपसे खुश न होंगे।

यह कहकर वह झमककर उठी और संदूक में से रुपयों की पांच पोटलियां निकाल लाई, उन्‍हें पति के सामने पटक दिया और कहा-यह लीजिए पांच सौ रुपये हैं, जो चाहे कीजिए। रखे रहते तो आप ही के काम आते, पर ले जाइए, किसी भांति आपकी चिंता तो मिटे। अब संदूक में फूटी कौड़ी भी नहीं है।

पंडित जी ने हकबकाकर रुपयों की ओर कातर नेत्रों से देखा, पर उन पर टूटे नहीं। मन का बोझ हल्‍का अवश्‍य हुआ, चेहरे से चित्त की शांति झलकने लगी। किंतु वह उल्‍लास, वह विह्वलता, जिसका सुभद्रा को आशा थी, दिखाई न दी। एक ही क्षण में वह शांति की झलक भी मिट गई। खेद और लज्‍जा का रंग प्रकट हुआ। इन रुपयों में हाथ लगाना उन्‍हें अतीव अनुचित प्रतीत हुआ। सोचने लगे,मालूम नहीं, सुभद्रा ने किस नीयत से यह रुपये बचाए थे , मालूम नहीं, इनके लिए कौन-कौन से कष्‍ट सहे थे।

सुभद्रा ने पूछा-सेंत का धन पाकर भी प्रसन्‍न नहीं हुए?

शर्माजी ने अनुग्रहपूर्ण दृष्टि से देखकर कहा-क्‍या प्रसन्‍न होऊं? तुमने नाहक यह रुपये निकले। मैं जाता हूँ, घोड़े को लौटा देता हूँ। कह दूंगा 'सितारा-पेशानी' है या और कोई दोष लगा दूंगा। सदन को बुरा लगेगा, इसके लिए क्‍या करूं।

यदि रुपये देने के पहले सुभद्रा ने यह प्रस्‍ताव किया होता, तो शर्माजी बिगड़ जाते। इसे सज्‍जनता के विरुद्ध समझते और सुभद्रा को आड़े हाथों लेते, पर इस समय सुभद्रा के आत्‍मोत्‍सर्ग ने उन्‍हें वशीभूत कर लिया था। समस्‍या यह थी कि घर में सज्‍जनता दिखाएं या बाहर? उन्‍होंने निश्‍चय किया कि घर में इसकी आवश्‍यकता है, किंतु हम बाहरवालों की दृष्टि में मान-मर्यादा बनाए रखने के लिए घरवालों की कब परवाह करते हैं?

सुभद्रा विस्मित होकर बोली-यह क्‍या? इतनी जल्‍दी कायापालट हो गई। जानवर लेकर उसे लौटा दोगे, तो क्‍या बात रह जाएगी। यदि डिगवी साहब फेर भी लें, तो यह उनके साथ कितना अन्‍याय है? वह बेचारे विलायत जाने के लिए तैयार बैठे हैं। उन्‍हें यह बात कितनी अखरेगी। नहीं, यह छोटी-सी बात है, रुपये ले जाइए, दे दीजिए। रुपया इन्‍हीं दिनों के लिए जमा किया जाता है। मुझे इनकी कोई जरूरत नहीं है, मैं सहर्ष दे रही हूँ। यदि ऐसा ही है, तो मेरे रुपये फेर दीजिएगा, ऋण समझकर लीजिए।

बात वही थी, पर जरा बदले हुए रूप में शर्माजी ने प्रसन्‍न होकर कहा-हां,इस शर्त पर ले सकता हूँ। मासिक किस्‍त बांधकर अदा करूंगा।

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शोध एवं शोध-पत्रों के लिए अकादमिक संदर्भ

Premchand, Munshi. "सेवासदन." *Munshi Premchand Digital Archive*, 1918, https://munshipremchand.com/works/novels/sevasadan. Accessed 22 Sep. 2026.