Cover Image for Sevasadan (सेवासदन) by Munshi Premchand - Novel
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उपन्यास•1918•55 अध्याय•12h 15m

सेवासदन

Sevasadan

प्रेमचंद का उपन्यास 'सेवासदन' सुमन के जीवन के माध्यम से विवाह, दहेज, स्त्री-पराधीनता, वेश्यावृत्ति और सामाजिक सुधार के प्रश्नों को प्रस्तुत करता है।

पात्र:सुमन, गजाधर प्रसाद, सदनसिंह, शांता, पद्मसिंह शर्मा, विट्ठलदास, कृष्णचंद्र, भोलीबाई
सेटिंग:20वीं सदी के प्रारंभ में बनारस (वाराणसी), भारत

अध्याय 16 / 55

8 मिनट पठन • 1,118 शब्द

अध्याय 16: सेवासदन

महाशय विट्ठलदास इस समय ऐसे खुश थे मानो उन्‍हें कोई संपत्ति मिल गई हो। उन्‍हें विश्‍वास था कि पद्मसिंह इस जरा से कष्‍ट से मुँह न मोड़ेंगे, केवल उनके पास जाने की देर है। वह होली के कई दिन पहले से शर्माजी के पास नहीं गए थे। यथाशक्ति उनकी निंदा करने में कोई बात न उठा रखी थी, जिस पर कदाचित् अब वह मन में लज्जित थे, तिस पर भी शर्माजी के पास जाने में उन्‍हें जरा भी संकोच न हुआ। उनके घर की ओर चले।

रात के दस बजे गए थे। आकाश में बादल उमड़े हुए थे, घोर अंधकार छाया हुआ था। लेकिन राग-रंग का बाजार पूरी रौनक पर था। अट्टालिकाओं से प्रकाश की किरणें छिटक रही थीं। कहीं सुरीली तानें सुनाई देती थीं,कहीं मधुर हास्‍य की ध्‍वनि, कहीं आमोद-प्रमोद की बातें। चारों ओर विषय-वासना अपने नग्‍न रूप में दिखाई दे रही थी।

दालमंडी से निकलकर विट्ठलदास को ऐसा जान पड़ा, मानों वह किसी निर्जन स्‍थान पर आ गए। रास्‍ता अभी बंद न हुआ था। विट्ठलदास को ज्‍यों ही कोई परिचित मनुष्‍य मिल जाता, वह उसे तुरंत अपनी सफलता की सूचना देते ! आप कुछ समझते हैं, कहां से आ रहा हूँ? सुमनबाई की सेवा में गया था। ऐसा मंत्र पढ़ा कि सिर न उठा सकी, विधवाश्रम में जाने पर तैयार है। काम करनेवाले यों काम किया करते हैं।

पद्मसिंह चारपाई पर लेटे हुए निद्रा देवी की आराधना कर रहे थे कि इतने में विट्ठलदास ने आकर आवाज दी। जीतन कहार अपनी कोठरी में बैठा हुआ दिन-भर की कमाई का हिसाब लगा रहा था कि यह आवाज कान में आई। बड़ी फुरती से पैसे समेटकर कमर में रख लिए और बोला-कौन है?

विट्ठलदास ने कहा-अजी मैं हूँ, क्‍या पंडितजी सो गए? जरा भीतर जाकर जगा तो दो, मेरा नाम लेना, कहना बाहर खड़े हैं, बड़ा जरूरी काम है, जरा चले आएं।

जीतन मन में बहुत झुंझलाया। उसका हिसाब अधूरा रह गया, मालूम नहीं, अभी रुपया पूरा होने में कितनी कसर है। अलसाता हुआ उठा, किवाड़ खोले, पंडितजी को खबर दी। वह समझ गए कि कोई नया समाचार होगा, तभी यह इतनी रात को आए हैं। तुरंत बाहर निकल आए।

विट्ठलदास-आइए, मैंने आपको बहुत कष्‍ट दिया, क्षमा कीजिएगा। कुछ समझे,कहां से आ रहा हूँ? सुमनबाई के पास गया था। आपका पत्र पाते ही दौड़ा कि बन पड़े, तो उसे सीधी राह पर लाऊं। इसमें उसी की बदनामी नहीं, सारी जाति की बदनामी है। वहाँ पहुंचा तो उसके ठाट देखकर दंग रह गया। वह भोली-भाली स्‍त्री अब दालमंडी की रानी है। मालूम नहीं, इतनी जल्‍दी वह ऐसी चतुर कैसे हो गई। कुछ देर तक तो चुपचाप मेरी बातें सुनती रहीं, फिर रोने लगी। मैंने समझा,अभी लोहा लाल है, दो-चार चोटें और लगाई, बस आ गई पंजे में। पहले विधवाश्रम का नाम सुनकर घबराई। कहने लगी-मुझे पचास रुपये महीना गुजर के लिए दिलवाएं। लेकिन आप जानते हैं,यहाँ पचास रुपये देने वाला कौन है? मैंने हामी न भरी। अंत में कहते-सुनते एक शर्त पर राजी हुई। उस शर्त को पूरा करना आपका काम है।

पद्मसिंह ने विस्मित होकर विट्ठलदास की ओर देखा।

विट्ठलदास-घबराइए नहीं, बहुत सीधी-सी शर्त है, बस यही कि आप जरा देर के लिए उसके पास चले जाएं, वह आपसे कुछ कहना चाहती है। यह तो मुझे निश्‍चय था कि आपको इसमें कोई आपत्ति न होगी, यह शर्त मंजूर कर ली। तो बताइए, कब चलने का विचार है? मेरी समझ में सबेरे चलें।

किंतु पद्मसिंह विचारशील मनुष्‍य थे। वह घंटों सोच-विचार के बिना कोई फैसला न कर सकते थे। सोचने लगे कि इस शर्त का क्‍या अभिप्राय है? वह मुझसे क्‍या कहना चाहती है? क्‍या बात पत्र द्वारा न हो सकती थी? इसमें कोई-न-कोई रहस्‍य अवश्‍य है। आज अबुलवफा ने मेरे बग्घी पर से कूद पड़ने का वृतांत उससे कहा होगा। उसने सोचा होगा, यह महाशय इस तरह नहीं आते,तो यह चाल चलूं, देखूं कैसे नहीं आते। केवल मुझे नीचा दिखाना चाहती है। अच्‍छा,अगर मैं जाऊं भी, लेकिन पीछे से वह अपना वचन पूरा न करे तो क्‍या होगा? यह युक्ति उन्‍हें अपना गला छुड़ाने के लिए उपयोगी मालूम हुई। बोले-अच्‍छा, अगर वह अपने वचन से फिर जाए तो?

विट्ठलदास-फिर क्‍या जाएगी? ऐसा हो सकता है?

पद्मसिंह-हां, ऐसा होना असंभव नहीं।

विट्ठलदास-तो क्‍या आप कोई प्रतिज्ञापत्र लिखवाना चाहते हैं?

पद्मसिंह-नहीं, मुझे संदेह यही है कि वह सुख-विलास छोड़कर विधवाश्रम में क्‍यों जाने लगी और सभा वाले उसे लेना स्‍वीकार कब करेंगे?

विट्ठलदास-सभावालों को मनाना तो मेरा काम है। न मानेंगे तो मैं उसके गुजारे का और कोई प्रबंध करूंगा। रही पहली बात। मान लीजिए, वह अपने वचन को मिथ्‍या ही कर दे, तो इसमें हमारी क्‍या हानि है? हमारा कर्त्तव्य पूरा हो जाएगा।

पद्मसिंह-हां, यह संतोष चाहे तो जाए, लेकिन देख लीजिएगा, वह अवश्‍य धोखा देगी।

विट्ठलदास अधीर हो गए, झुंझलाकर बोले-अगर धोखा ही दे दिया, तो आपका कौन छप्‍पन टका खर्च हुआ जाता है।

पद्मसिंह-आपके निकट मेरी कुछ प्रतिष्‍ठा न हो, लेकिन मैं अपने को इतना तुच्‍छ नहीं समझता।

विट्ठलदास-सारांश यह कि न जाएंगे?

पद्मसिंह-मेरे जाने से कोई लाभ नहीं हैं। हां, यदि मेरा मान-मर्दन कराना ही अभीष्‍ट हो, तो दूसरी बात है।

विट्ठलदास-कितने खेद की बात है कि आप एक जातीय कार्य के लिए इतना मीन-मेख निकाल रहे हैं ! शोक ! आप आंखों से देख रहे हैं कि एक हिंदू जाति की स्‍त्री कुएं में गिरी हुई है, और आप उसी जाति के एक विचारवान पुरुष होकर उसे निकालने में इतना आगा-पीछा कर रहे हैं। बस आप इसी काम के हैं कि मूर्ख किसानों और जमींदारों का रक्‍त चूसें। आपसे और कुछ न होगा।

शर्माजी ने इस तिरस्‍कार का उत्तर न दिया। वह मन में अपनी अकर्मण्‍यता पर स्‍वयं लज्जित थे और अपने को इस तिरस्‍कार का भागी समझते थे। लेकिन एक ऐसे पुरुष के मुँह से ये बातें अत्‍यंत अप्रिय मालूम हुई जो इस बुराई का मूल कारण हो। वह बड़ी कठिनाई से प्रत्‍युत्तर देने के आवेग को रोक सके। यथार्थ में वह सुमन की रक्षा करना चाहते थे, लेकिन गुप्‍त रीति से,बोले -उसकी ओर भी तो शर्तें हैं?

विट्ठलदास-जी हां, हैं तो लेकिन आप में उन्‍हें पूरा करने का सामर्थ्‍य है? वह गुजारे के लिए पचास रुपये मासिक मांगती है, आप दे सकते हैं?

शर्माजी-पचास रुपये नहीं, लेकिन बीस रुपये देने को तैयार हूँ।

विट्ठलदास-शर्माजी, बातें न बनाइए। एक जरा-सा कष्‍ट तो आपसे उठाया नहीं जाता, आप बीस रुपये मासिक देंगे?

शर्माजी-मैं आपको वचन देता हूँ कि बीस रुपये मासि‍क दिया करूंगा और अगर मेरी आमदनी कुछ भी बढ़ी तो पूरी रकम दूंगा। हां, इस समय विवश हूँ। यह बीस रुपये भी घोड़ा-गाड़ी बेचने से बच सकेंगे। मालूम नहीं, क्‍यों इन दिनों मेरा बाजार गिरा जा रहा है।

विट्ठलदास-अच्‍छा, आपने बीस रुपये दे ही दिए, तो शेष कहां से आएंगे? औरों का तो हाल आप जानते ही हैं, विधवाश्रम के चंदे ही कठिनाई से वसूल होते हैं। मैं जाता हूँ, यथाशक्ति उद्योग करूंगा, लेकिन यदि कार्य न हुआ, तो उसका दोष अपके सिर पड़ेगा।

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शोध एवं शोध-पत्रों के लिए अकादमिक संदर्भ

Premchand, Munshi. "सेवासदन." *Munshi Premchand Digital Archive*, 1918, https://munshipremchand.com/works/novels/sevasadan. Accessed 22 Sep. 2026.