Cover Image for Sevasadan (सेवासदन) by Munshi Premchand - Novel
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उपन्यास•1918•55 अध्याय•12h 15m

सेवासदन

Sevasadan

प्रेमचंद का उपन्यास 'सेवासदन' सुमन के जीवन के माध्यम से विवाह, दहेज, स्त्री-पराधीनता, वेश्यावृत्ति और सामाजिक सुधार के प्रश्नों को प्रस्तुत करता है।

पात्र:सुमन, गजाधर प्रसाद, सदनसिंह, शांता, पद्मसिंह शर्मा, विट्ठलदास, कृष्णचंद्र, भोलीबाई
सेटिंग:20वीं सदी के प्रारंभ में बनारस (वाराणसी), भारत

अध्याय 4 / 55

7 मिनट पठन • 980 शब्द

अध्याय 4: सेवासदन

कृष्‍णचन्‍द्र अपने कस्‍बे में सर्वप्रिय थे। यह खबर फैलते ही सारी बस्‍ती में हलचल मच गई। कई भले आदमी उनकी जमानत कराने आए, लेकिन साहब ने जमानत नहीं ली।

इसके एक सप्‍ताह बाद कृष्‍णचन्‍द्र पर रिश्‍वत लेने का अभियोग चलाया गया। महंत रामदास भी गिरफ्तार हुए।

दोनों मुकदमें महीने-भर तक चलते रहे। हाकिम ने उन्‍हें दौरे सुपुर्द कर दिया। वहाँ भी एक महीना लगा। अंत में कृष्‍णचन्‍द्र को पांच वर्ष की कैद हुई। महंत जी सात वर्ष के लिए गए और दोनों चेलों को काले पानी का दंड मिला।

गंगाजली के एक सगे भाई पंडित उमानाथ थे। कृष्‍णचन्‍द्र की उनसे जरा भी न बनती थी। वह उन्‍हें धूर्त्‍त और पांखडी कहा करते, उनके लंबे तिलक की चुटकी लेते। इसलिए उमानाथ उनके यहाँ बहुत कम आते थे।

लेकिन इस दुर्घटना का समाचार पाकर उमानाथ से न रहा गया। वह आकर अपनी बहन और भांजियों को अपने घर ले गए। कृष्‍णचन्‍द्र के कोई सगा भाई न था। चाचा के दो लड़के थे, पर वह अलग रहते थे। उन्‍होंने बात तक न पूछी।

कृष्‍णचन्‍द्र ने चलते-चलते गंगाजली को मना किया था कि रामदास के रुपयों में से एक कौड़ी भी मुकदमें में न खर्च करना। उन्‍हें निश्‍चय था कि मेरी सजा अवश्‍य होगी। लेकिन गंगाजली का जी न माना, उसने दिन खोलकर रुपये खर्च किए। वकील लोग अंत तक यही कहते रहे कि वे छूट जाएंगे।

जज के फैसले की हाईकोर्ट में अपील हुई। महंत जी की सजा में कमी न हुई। पर कृष्‍णचन्‍द्र की सजा घट गई। पांच के चार वर्ष रह गए।

गंगाजली आने को तो मैके आई, पर अपनी भूल पर पछताया करती थी। यह वह मैका न था, जहां उसने अपने बालकपन की गुडियां खेली थीं, मिट्टी के घरौंदे बनाए थे, माता-पिता की गोद में पली थी। माता-पिता का स्‍वर्गवास हो चुका था, गांव में पुराने आदमी न दिखाई देते थे। यहाँ तक कि पेड़ों की जगह खेत और खेतों की जगह पेड़ लगे हुए थे। वह घर भी मुश्किल से पहचान सकी और सबसे दु:ख की बात यह थी कि वहाँ उसका प्रेम या आदर न था, उसकी भावज जाह्नवी उससे मुँह फुलाए रहती। जाह्नवी अब अपने घर बहुत कम रहती। पड़ोसियों के यहाँ बैठी हुई गंगाजली का दुखड़ा रोया करती। उसके दो लड़कियां थीं। वह भी सुमन और शान्‍ता से दूर-दूर रहतीं।

गंगाजली के पास रामदास के रुपयों में से कुछ न बचा था। यही चार-पांच सौ रुपये रह गए थे, जो उसने पहले काट-काटकर जमा किए थे। इसलिए वह उमानाथ से सुमन के विवाह के विषय में कुछ न कहती। यहाँ तक कि छ: महीने बीते गए। कृष्‍णचन्‍द्र ने जहां पहला संबंध ठीक किया था, वहाँ से साफ जवाब आ चुका था।

लेकिन उमानाथ को यह चिंता बराबर लगी रहती थी। उन्‍हें जब अवकाश मिलता, दो-चार दिन के लिए वर की खोज में निकल जाते। ज्‍यों ही वह गांव में पहुचते, वहाँ हलचल मच जाती। युवक गठरियों से वह कपड़े निकालते, जिन्‍हें वह बारातों मे पहना करते थे। अंगूठियां और मोहनमाले मंगनी मांगकर पहन लेते। माताएं अपने बालकों को नहला-धुलाकर आंखों में काजल जगा देतीं और धुले हुए कपड़े पहनाकर खेलने भेजतीं। विवाह के इच्‍छुक बूढ़े नाइयों से मोंछ कटवाते और पके हुए बाल चुनवाने लगते। गांव के नाई और कहार खेतों से बुला लिए जाते, कोई अपना बड़प्‍पन दिखाने के लिए उनसे पैर दबवाता, कोई धोती छटवाता। जब तक उमानाथ वहाँ रहते, स्त्रियां घरों से न निकलतीं, कोई अपने हाथ से पानी न भरता, कोई खेत में न जाता। पर उमाना‍थ की आंखों में यह घर न जंचते थे। सुमन कितनी रूपवती, कितनी गुणशीला, कितनी पढ़ी-लिखी लड़की है, इन मूर्खों के घर पड़कर उसका जीवन नष्‍ट हो जाएगा।

अंत में उमानाथ ने निश्‍चय किया कि शहर में कोई वर ढूंढ़ना चाहिए। सुमन के योग्‍य वर देहात में नहीं मिल सकता। पर शहरवालों की लंबी-चौड़ी बातें सुनीं, तो उनके होश उड़ गए। बड़े आदमियों का तो कहना ही क्‍या, दफ्तरों के मुसद्दी और क्‍लर्क भी हजारों का राग अलापते थे। लोग उनकी सूरत देखकर भड़क जाते। दो-चार सज्‍जन उनकी कुल-मर्यादा का हाल सुनकर विवाह करने को उत्‍सुक हुए, पर कहीं तो कुंडली मिली और कहीं उमानाथ का मन ही न भरा। वह अपनी कुल-मर्यादा से नीचे न उतरना चाहते थे।

इस प्रकार पूरा एक साल बीत गया। उमानाथ दौड़ते-दौड़ते तंग आ गए, यहाँ तक कि उनकी दशा औषधियों के विज्ञापन बांटनेवाले उस मनुष्‍य की-सी हो गई, जो दिन-भर बाबू-संप्रदाय को विज्ञापन देने के बाद संध्‍या को अपने पास विज्ञापनों का भारी पुलिंदा पड़ा हुआ पाता है और उस बोझ से मुक्‍त होने के लिए उन्‍हें सर्वसाधारण को देने लगता है। उन्‍होंने मान, विद्या, रूप और गुण की ओर से आंखें बंद करके केवल कुलीनता को पकड़ा। इसे वह किसी भांति न छोड़ सकते थे।

माघ का महीना था। उमानाथ स्‍नान करने गए। घर लौटे तो गंगाजली के पास जाकर बोले-लो बहन, मनोरथ पूरा हो गया। बनारस में विवाह ठीक हो गया।

गंगाजली-भला, किसी तरह तुम्‍हारी दौड़-धूप तो ठिकाने लगी। लड़का पढ़ता है न?

उमानाथ-पढ़ता नहीं, नौकर है। एक कारखाने में पंद्रह रुपये का बाबू है। गंगाजली-घर-द्वार है न?

उमानाथ-शहर में किसके घर होता है। सब किराए के घर में रहते हैं।

गंगाजली भाई-बन्‍द, मां-बाप हैं?

उमानाथ-मां-बाप दोनों मर चुके हैं और भाई-बन्‍द शहर में किसके होते हैं?

गंगाजली उम्र क्‍या है?

उमानाथ-यही, कोई तीस साल के लगभग होगी।

गंगाजली-देखने-सुनने में कैसा है?

उमानाथ-सौ में एक। शहर में कोई कुरूप तो होता ही नहीं। सुंदर बाल, उजले कपड़े सभी के होते हैं और गुण, शील, बातचीत का तो पूछना ही क्‍या ! बात करते मुँह से फूल झड़ते हैं। नाम गजाधरप्रसाद है।

गंगाजली -तो दुआह होगा?

उमानाथ-हां, है तो दुआह, पर इससे क्‍या? शहर में कोई बुड्ढा तो होता ही नहीं। जवान लड़के होते हैं और बुड्ढे जवान, उनकी जवानी सदाबहार होती है। वही हंसी-दिल्‍लगी, वही तेल-फुलेल का शौक। लोग जवान ही रहते हैं और जवान ही मर जाते हैं।

गंगाजली-कुल कैसा है?

उमानाथ-बहुत ऊंचा। हमसे दो बिस्‍वे बड़ा है। पसंद है न?

गंगाजली ने उदासीन भाव से कहा-जब तुम्‍हें पसंद है, तो मुझे भी पसंद है।

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शोध एवं शोध-पत्रों के लिए अकादमिक संदर्भ

Premchand, Munshi. "सेवासदन." *Munshi Premchand Digital Archive*, 1918, https://munshipremchand.com/works/novels/sevasadan. Accessed 22 Sep. 2026.