Cover Image for Sevasadan (सेवासदन) by Munshi Premchand - Novel
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उपन्यास•1918•55 अध्याय•12h 15m

सेवासदन

Sevasadan

प्रेमचंद का उपन्यास 'सेवासदन' सुमन के जीवन के माध्यम से विवाह, दहेज, स्त्री-पराधीनता, वेश्यावृत्ति और सामाजिक सुधार के प्रश्नों को प्रस्तुत करता है।

पात्र:सुमन, गजाधर प्रसाद, सदनसिंह, शांता, पद्मसिंह शर्मा, विट्ठलदास, कृष्णचंद्र, भोलीबाई
सेटिंग:20वीं सदी के प्रारंभ में बनारस (वाराणसी), भारत

अध्याय 45 / 55

4 मिनट पठन • 471 शब्द

अध्याय 45: सेवासदन

प्रभाकर राव का क्रोध बहुत कुछ तो सदन के लेखों से ही शांत हो गया था और जब पद्मसिंह ने सदन के आग्रह से सुमन का पूरा वृतांत उन्‍हें लिख भेजा, तो वह सावधान हो गए।

म्‍युनिसिपैलिटी में प्रस्‍ताव को पास हुए लगभग तीन मास बीत गए, पर उसकी तरमीम के विषय में तेगअली ने जो शंकाएं प्रकट की थीं, वह निर्मूल प्रतीत हुई। न दालमंडी के कोठों पर दुकानें ही सजीं और न वेश्‍याओं ने निकाह-बंधन से ही केई विशेष प्रेम प्रकट किया ! हां, कई कोठे खाली हो गए। उन वेश्‍याओं ने भावी निर्वासन के भय से दूसरी जगह रहने के प्रबंध कर लिया। किसी कानून का विरोध करने के लिए उससे अधिक संगठन की आवश्यकता होती है, जितनी उसके जारी करने के लिए। प्रभाकर राव का क्रोध शांत होने का यह एक और कारण था।

पद्मसिंह ने इस प्रस्‍ताव को वेश्‍याओं के प्रति घृणा से प्रेरित होकर हाथ में लिया था। पर अब इस विषय पर विचार करते-करते उनकी घृणा बहुत कुछ दया और क्षमा का रूप धारण कर चुकी। इन्‍हीं भावों ने उन्‍हें तरमीम से सहमत होने पर बाध्‍य किया था। सोचते, यह बेचारी अबलाएं अपनी इंद्रियों में, सुख-भोग में अपना सर्वस्‍व नाश कर रही हैं। विलास-प्रेम की लालसा ने उनकी आंखें बंद कर रखी हैं। इस अवस्‍था में उनके साथ दया और प्रेम की आवश्‍यकता है। इस अत्‍याचार से उनकी सुधारक शक्तियां और भी निर्बल हो जाएंगी और जिन आत्‍माओं का हम उपदेश, प्रेम से, ज्ञान से, शिक्षा से उद्धार कर सकते हैं, वे सदा के लिए हमारे हाथ से निकल जाएंगी। हम लोग जो स्‍वयं माया-मोह के अंधकार में पड़े हुए हैं, उन्‍हें दंड देने का कोई अधिकार नहीं रखते। उनके कर्म ही उन्‍हें क्‍या कम दंड दे रहे हैं कि हम यह अत्‍याचार करके उनके जीवन को और भी दुखमय बना दें।

हमारे मन के विचार कर्म के पथदर्शक होते हैं। पद्मसिंह ने झिझक और संकोच को त्‍यागकर कर्मक्षेत्र में पैर रखा। वही पद्मसिंह जो सुमन के सामने भाग खड़े हुए थे, अब दिन दोपहर दालमंडी के कोठों पर बैठे दिखाई देने लगे। उन्‍हें अब लोकनिंदा का भय न था। मुझे लोग क्‍या कहेंगे, उसकी चिंता न थी। उनकी आत्‍मा बलवान हो गई थी, हृदय में सच्‍ची सेवा का भाव जागृत हो गया था। कच्‍चा फल पत्‍थर माने से भी नहीं गिरता, किंतु पककर आप-ही-आप धरती की ओर आकर्षित हो जाता है। पद्मसिंह के अंत:करण में सेवा का-प्रेम का भाव परिपक्‍व हो गया था।

विट्ठलदास इस विषय में उनसे पृथक हो गए। उन्‍हें जन्‍म की वेश्‍याओं के सुधार पर विश्‍वास न था। सैयद शफकतअली भी, जो इसके जन्‍मदाता थे, उनसे कन्‍नी काट गए और कुंवर साहब को तो अपने साहित्‍य, संगीत और सत्‍संग से ही अवकाश न मिलता था, केवल साधु गजाधर ने इस कार्य में पद्मसिंह का हाथ बंटाया। उसे सदुद्योगी पुरुष में सेवा का भाव पूर्ण रूप से उदय हो चुका था।

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शोध एवं शोध-पत्रों के लिए अकादमिक संदर्भ

Premchand, Munshi. "सेवासदन." *Munshi Premchand Digital Archive*, 1918, https://munshipremchand.com/works/novels/sevasadan. Accessed 22 Sep. 2026.