Cover Image for Sevasadan (सेवासदन) by Munshi Premchand - Novel
Cover Image for Sevasadan (सेवासदन) by Munshi Premchand - Novel
उपन्यास•1918•55 अध्याय•12h 15m

सेवासदन

Sevasadan

प्रेमचंद का उपन्यास 'सेवासदन' सुमन के जीवन के माध्यम से विवाह, दहेज, स्त्री-पराधीनता, वेश्यावृत्ति और सामाजिक सुधार के प्रश्नों को प्रस्तुत करता है।

पात्र:सुमन, गजाधर प्रसाद, सदनसिंह, शांता, पद्मसिंह शर्मा, विट्ठलदास, कृष्णचंद्र, भोलीबाई
सेटिंग:20वीं सदी के प्रारंभ में बनारस (वाराणसी), भारत

अध्याय 30 / 55

24 मिनट पठन • 3,562 शब्द

अध्याय 30: सेवासदन

शहर की म्‍युनिसिपैलिटी में कुल अठारह सभासद थे। उनमें आठ मुसलमान थे और दस हिंदू। सुशिक्षित मेंबरों की संख्‍या अधिक थी, इसलिए शर्माजी को विश्‍वास था कि म्‍युनिसिपैलिटी में वश्‍याओं को नगर से बाहर निकाल देने का प्रस्‍ताव स्‍वीकृत हो जाएगा। वे सब सभासदों से मिल चुके थे और इस विषय में उनकी शंकाओं का समाधान कर चुके थे, लेकिन मेंबरो में कुछ ऐसे सज्‍जन भी थे, जिनकी ओर से घारे विरोध होने का भय थे। ये लोग बड़े व्‍यापारी, धनवान् और प्रभावशाली मनुष्‍य थे। इसलिए शर्माजी को यह भय भी था कि कहीं शेष मेंबर उनके दबाव में न आ जाएं। हिंदुओं में विरोधी दल के नेता सेठ बलभद्रदास थे और मुसलमानों में हाजी हाशिम। जब तक विट्ठलदास इस आंदोलन के कर्त्‍ता-धर्त्‍ता थे, तब तक इन लोगों ने उसकी ओर कुछ ध्‍यान न दिया था, लेकिन जब से पद्मसिंह और म्‍युनिसिपैलिटी के अन्‍य कई मेंबर इस आंदोलन में सम्मिलित हो गए थे, तब से सेठजी और हाजी साहब के पेट में चूहे दौड़ रहे थे। उन्‍हें मालूम हो गया था कि शीघ्र ही यह मंतव्‍य सभा में उपस्थित होगा, इसलिए दोनों महाशय अपने पक्ष को स्थिर करने में तत्‍पर हो रहे थे। पहले हाजी साहब ने मुसलमान मेंबरों को एकत्र किया। हाजी साहब का जनता पर बड़ा प्रभाव था और वह शहर के सदस्‍य मुसलमानों के नेता समझे जाते थे। शेष सात मेंबरों में मौलाना तेगअली एक इमामबाड़े के वली थे। कविता से प्रेम था और स्‍वयं अच्‍छे कवि थे। शाकिरबेग और शरीफहसन वकील थे। उनके सामाजिक सिद्धांत बहुत उन्‍नत थे। सैयद शफकतअली पेंशनर डिप्‍टी कलेक्‍टर थे और खां साहब शोहरतखां प्रसिद्ध हकीम थे। ये दोनों महाशय सभा-समाजों से प्राय:पृथक् ही रहते थे, किंतु उनमें उदारता और विचारशीलता की कमी न थी। दोनों धार्मिक प्रवृत्ति के मनुष्‍य थे। समाज मे बड़ा सम्‍मान था।

हाजी हाशिम बोले-बिरादराने वतन की यह नई चाल आप लोगों ने देखी? वल्‍लाह इनको सूझती खूब है, बगली घूंसे मारना कोई इनसे सीख ले। मैं तो इनकी रेशादवानियों से इतना बदजन हो गया हूँ कि अगर इनकी नेकनीयती पर ईमान लाने में नजात भी होती हो, तो न लाऊं।

अबुलवफा ने फरमाया-मगर अब खुदा के फजल से हमको भी अपने नफे नुकसान का एहसास होने लगा। यह हमारी तादाद को घटाने की सरीह कोशिश है। तवायफें नब्‍बे फीसदी मुसलमान हैं, जो रोजे रखती हैं, इजादारी करती हैं, मौलूद और उर्स करती हैं। हमको उनके जाती फेलों से कोई बहस नहीं है। नेक व बद की सजा व सजा देना खुदा का काम है। हमको तो सिर्फ उनकी तादाद से गरज है।

तेगअली-मगर उनकी तादाद क्‍या इतनी ज्‍यादा है कि उससे हमारे मजमुई वोट पर कोई असर पड़ सकता है?

अबुलवफा-कुछ-न-कुछ तो जरूर पड़ेगा, ख्‍वाह वह कम हो या ज्‍यादा। बिरादराने वतन को देखिए, वह डोमड़ों तक को मिलाने की कोशिश करते हैं। उनके साए से परहेज करते हैं, उन्‍हें जानवरों से भी ज्‍यादा जलील समझते हैं, मगर महज अपने पोलिटिकल मफाद के लिए उन्‍हें अपने कौमी जिस्‍म का एक अजो बनाए हुए हैं। डोमड़ों का शुमार जरायम पेशा अबवाम में है। आलिहाजा, पासी, भर वगैरह भी इसी जेल में आते हैं। सरका, कत्‍ल, राहजनी, यह उनके पेशे हैं। मगर जब उन्‍हें हिंदू जमाअत से अलहदा करने की कोशिश की जाती है, तो बिरादराने वतन कैसे चिरागपा होते हैं। वेद और शासतर की सनदें नकल करते फिरते हैं। हमको इस मुआमिले में उन्‍हीं से सबक लेना चाहिए।

सैयद शफकतअली ने विचारपूर्ण भाव से कहा-इस जरायमपेशा अकवाम के लिए गवर्नमेंट ने शहरों में खित्‍ते अलेहदा कर दिए। उन पर पुलिस की निगरानी रहती है। मैं खुद अपने दौराने मुलाजिमत में उनकी नकल और हरकत की रिपोर्ट लिखा करता था। मगर मेरे ख्‍याल में किसी जिम्‍मेदार हिंदू ने गवर्नमेंट के इस तर्जे-अमल की मुखालिफत नहीं की। हालांकि मेरी निगाह में सरका, कत्‍ल वगैरह इतने मकरूह फेल नहीं हैं, जितनी असमतफरोशी। डोमनी भी जब असमतफरोशी करती है, तो वह अपनी बिरादरी से खारिज कर दी जाती है। अगर किसी डोम या भर के पास काफी दौलत हो, तो वह इस हुस्‍न के खुले हुए बाजार में मनमाना सौदा खरीद सकता है। खुदा वह दिन न लाए कि हम अपने पोलिटिकल मफाद के लिए इस हद तक जलील होने पर मजबूर हों। अगर इन तवायफों की दीनदारी के तुफैल में सारे इस्‍लाम को खुदा जन्‍नत अता करे, तो मैं दोजख में जाना पसंद करूंगा। अगर उनकी तादाद की बिना पर हमको इस मुल्‍क की बादशाही भी मिलती हो, तो मैं कबूल न करूं। मेरी राय तो यह है कि इन्‍हें मरकज शहर ही से नहीं, हदूद शहर से खारिज कर देना चाहिए।

हकीम शोहरत खां बोले-जनाब, मेरा बस चले तो मैं इन्‍हें हिन्‍दुस्‍तान से निकाल दूं, इनसे एक जजीरा अलग आबाद करूं। मुझे इस बाजार के खरीददारों से अक्‍सर साबिका रहता है। अगर मेरी मजहबी अकायद में फर्क न आए, तो मैं यह कहूँगा कि तवायफें हैजे और ताऊन का औतार हैं। हैजा दो घंटे में काम तमाम कर देता है, प्‍लेग दो दिन में, लेकिन यह जहन्‍नुमी हस्तियां रूला-रूलाकर और घुला-घुलाकर जान मारती हैं। मुंशी अबुलवफा साहब उन्‍हें जन्‍नती हूर समझते हों, लेकिन वे ये काली नागिनें हैं, जिनकी आंखों में जहर है। वे ये चश्‍में हैं, जहां से जरायम के सोते निकलते हैं। कितनी ही नेक बीबियां उनकी बदौलत खून के आंसू रो रही हैं। कितने ही शरीफजादे उनकी बदौलत खस्‍ता व ख्‍वार हो रहे हैं। यह हमारी बदकिस्‍मती है कि बेशतर तवायफें अपने को मुसलमान कहती हैं।

शरीफ हसन बोले-इसमें तो कोई बुराई नहीं कि वह अपने को मुसलमान कहती हैं। बुराई यह है कि इस्‍लाम भी उन्‍हेंराहै-रास्‍ते पर लाने की कोई कोशिश नहीं करता। औरत एक बार किसी वजह से गुमराह हो गई, उसकी तरफ से इस्‍लाम हमेशा के लिए अपनी आंखें बंद कर लेता है। बेशक हमारे मौलाना साहब सब्‍ज इमामा बांधे, आंखों में सुरमा लगाए, गेसू संवारे उनकी मजहबी तस्‍कीन के लिए जा पहुँचते हैं, उनके खसदान से मुअत्‍तर बीड़े उड़ाते हैं। बस, इस्‍लाम की मजहबी कूबते इस्‍लाम यहीं तक खत्‍म हो जाती है। अपने बुरे फैलों पर नादिम होना इंसानी खासा है। ये गुमराह औरतें पेशतर नहीं, तो शराब का नशा उतरने के बाद जरूर अपनी हालत पर अफसोस करती हैं, लेकिन उस वक्‍त उनका पछताना बेसूद होता है। उनके गुजरानी की इसके सिवा और कोई सूरत नहीं रहती कि वे अपनी लड़कियों को दूसरों को दामे-मुहब्‍बत में फंसाएं और इस तरह यह सिलसिला हमेशा जारी रहता है। अगर उन लड़कियों की जायज तौर पर शादी हो सके तो और उसके साथ ही उनकी परवरिश की सूरत भी निकल आए तो मेरे ख्‍याल से ज्‍यादा नहीं तो पचहत्तर फीसदी तवायफें इसे खुशी से कबूल कर लें। हम चाहे खुद कितने गुनहगार हों, पर अपनी औलाद को हम नेक और रास्‍तबाज देखने की तमन्‍ना रखते हैं। तवायफों को शहर से खारिज कर देने से उनकी इस्‍लाह नहीं हो सकती। इस ख्याल को सामने रखकर मैं इखराज की तहरीर पर करने की जुरअत कर सकता हूँ। पर पोलिटिकल मफाद की बिना पर मैं उसकी मुखालिफत नहीं कर सकता। मैं किसी फैल को कौमी ख्‍याल से पसंदीदा नहीं समझता जो इखलाकी तौर पर पसंदीदा न हो।

तेगअली-बंदानवाज, संभलकर बातें कीजिए। ऐसा न हो कि आप पर कुफ्र का फतवा सादिर हो जाए। आजकल पोलिटिकल मफाद का जोर है, हक और इंसाफ का नाम न लीजिए। अगर आप मुदर्रिस हैं, तो हिंदू लड़कों को फेल कीजिए। तहसीलदार हैं, तो हिंदुओं पर झूठे मुकदमे दायर कीजिए, तहकीकात करने जाइए, तो हिंदुओं के बयान गलत लिखिए। अगर आप चोर हैं, तो किसी हिंदू के घर में डाका डालिए, अगर आपको हुस्‍न या इश्‍क का खब्‍त है, तो किसी हिंदू नाजनीन को उड़ाइए, तब आप कौम के खादिम, कौम के मुहकिन, कौमी किश्‍ती के नाखुदा-सब कुछ हैं।

हाजी हाशिम बुड़बुड़ाए, मुंशी अबुलवफा के तेवरों पर बल पड़ गए। तेगअली की तलवार ने उन्‍हें घायल कर दिया। अबुलवफा कुछ कहना ही चाहते थे कि शाकिर बेग बोल उठे-भाई साहब,यह तान-तंज का मौका नहीं। हम अपने घर में बैठे हुए एक अमल के बारे में दोस्‍ताना मशवि‍रा कर रहे हैं। जबाने तेज मसलहत के हक में जहरे कातिल है। मैं शाहिदान तन्‍नाज को निजाम तमद्दुन में बिल्‍कुल बेकार या मायए शर नहीं समझता। आप जब कोई मकान तामीर करते हैं, तो उसमें बदरौर बनाना जरूरी खयाल करते हैं। अगर बदरौर न हो तो चंद दिनों में दीवारों की बुनियादें हिल जाएं। इस फिरके को सोसाइटी का बदरौर समझना चाहिए और जिस तरह बदरौर मकान के नुमाया हिस्‍से में नहीं होती, बल्कि निगाह से पोशीदा एक गोशे में बनाई जाती है, उसी तरह इस फिरके को शहर के पुरफिजा मुकामात से हटाकर किसी गोशे में आबाद करना चाहिए।

मुंशी अबुलवफा पहले के वाक्‍य सुनकर खुश हो गए थे, पर नाली की उपमा पर उनका मुँह लटक गया। हाजी हाशिम ने नैराश्‍य से अब्‍दुललतीफ की ओर देखा जो अब तक चुपचाप बैठे हुए थे और बोले-जनाब, कुछ आप भी फर्माते हैं? दोस्‍ती के बहाव में आप भी तो नहीं बह गए?

अब्‍दुललतीफ बोले-जनाब, बंदा को न इत्‍तहाद से दोस्‍ती, न मुखालफत से दुश्‍मनी। अपना मुशरिब तो सुलहैकुल है। मैं अभी यही तय नहीं कर सका कि आलमो बेदारी में हूँ या ख्‍वाब में। बड़े-बड़े आलिमों को एक बे-सिर-पैर की बात की ताईद में जमीं और आसमान के कुलाबे मिलाते देखता हूँ। क्‍योंकर बावर करूं कि बेदार हूँ? साबुन, चमड़े और मिट्टी के तुल की दुकानों से आपको कोई शिकायत नहीं। कपड़े, बरतन आदवियात की दुकानें चौक में हैं, आप उनको मुतलक बेमौका नहीं समझते ! क्‍या आपकी निगाहों में हुस्‍न की इतनी भी वकअत नहीं? और क्‍या यह जरूरी है कि इसे किसी तंग तारीक कूचे में बंद कर दिया जाए ! क्‍या वह बाग, बाग कहलाने का मुस्‍तहक है, जहां सरों की कतारें एक गोशे में हों, बेले और गुलाब के तख्‍ते दूसरे गोशे में और रविशों के दोनों तरफ नीम और कटहल के दरख्‍त हों, वस्‍त में पीपल का ठूंठ और किनारे बबूल की कलमें हों? चील और कौए दोनों तरफ तख्‍तों पर बैठे अपना राग अलापते हों, और बुलबुलें किसी गोश-ए-तारीक में दर्द के तराने गाती हों? मैं इस तहरीक की सख्‍त मुखालिफत करता हूँ। मैं उसे इस काबिल भी नहीं समझता कि उस पर मतानत के साथ बहस की जाए।

हाजी हाशिम मुस्‍कराए, अबुलवफा की आंखें खुशी से चमकने लगीं। अन्‍य महाशयों ने दार्शनिक मुस्‍कान के साथ यह हास्‍यपूर्ण वक्‍तृता सुनी, पर तेगअली इतने सहनशील न थे। तीव्र भाव से बोले-क्‍यों गरीब-परवर, अब की बोर्ड में यह तजवीज क्‍यों न पेश की जाए कि म्‍युनिसिपैलिटी ऐन चौक में खास एहतमाम के साथ मीनाबाजार आरास्‍ता करे और जो हजरत इस बाजार की सैर को तशरीफ ले जाएं, उन्‍हें गवर्नमेंट की जानिब से खुशनूदी मिजाज का परवाना अदा किया जाए? मेरे खयाल से इस तजवीज की ताईद करने वाले बहुत निकल आएंगे और इस तजवीज के मुहरिंर का नाम हमेशा के लिए जिंदा हो जाएगा। उसकी वफात के बाद उसके मजार पर उर्स होंगे और वह अपने गोश-ए-लहद में पड़ा हुआ हुस्‍न की बहार लूटेगा और दलपजीर नगमें सुनेगा।

मुंशी अब्‍दुललतीफ का मुँह लाल हो गया। हाजी हाशिम ने देखा कि बात बढ़ी जाती है, तो बोले-मैं अब तक सुना करता था कि उसूल भी कोई चीज है, मगर आज मालूम हुआ कि वह महज एक वहम है। अभी बहुत नहीं दिन हुए कि आप ही लोग इस्‍लामी बजाएफ का डेपुटेशन लेकर गए थे, मुसलमान कैदियों के मजहबी तस्‍कीन की तजवीजें कर रहे थे और अगर मेरा हाफिजा गलती नहीं करता, तो आप ही लोग उन मौकों पर पेश नजर आते थे। मगर आज एकाएक यह इंकलाब नजर आता है। खैर, आपका तलब्‍वुन आपको मुबारक रहे। बंदा इतना सहलयकीन नहीं है। मैंने जिंदगी का यह उसूल बना लिया है कि बिरादराने वतन की हर एक तजवीज की मुखालिफत करूंगा, क्‍योंकि मुझे उससे किसी बेहबूदी की तबक्‍को नहीं है।

अबुलवफा ने कहा-आलिहाजा, मुझे रात को आफताब का यकीन हो सकता है, पर हिंदुओं की नेकनीयत पर यकीन नहीं हो सकता।

सैयद शफकत अली बोले-हाजी साहब, आपने हम लोगों को जमाना-साज और बेउसूल समझने में मतानत से काम नहीं लिया। हमारा उसूल तो तब था वह अब भी है और हमेशा रहेगा और वह है इस्‍लामी बकार को कायम करना और हर एक जायज तरीके से बिरादराने मिल्‍लत की बेहबदी की कोशिश करना। अगर हमारे फायदे में बिरादराने वतन का नुकसान हो, तो हमको इसकी परवाह नहीं। मगर जिस तजवीज से उनके साथ हमको भी फायदा पहुँचता है और उनसे किसी तरह कम नहीं, उसकी मुखालिफत करना हमारे इमकान से बाहर है। हम मुखालिफत के लिए मुखालिफत नहीं कर सकते।

रात अधिक जा चुकी थी। सभा समाप्‍त हो गई। इस वार्तालाप का कोई विशेष फल न निकला। लोग मन में जो पक्ष स्थिर करके घर से आए थे, उसी पक्ष पर डटे रहे। हाजी हाशिम को अपनी विजय का जो पूर्ण विश्‍वास था, उसमें संदेह पड़ गया।

इस प्रस्‍ताव के विरोध में हिंदू मेंबरों को जब मुसलमानों के जलसे का हाल मालूम हुआ तो उनके कान खड़े हुए। उन्‍हें मुसलमानों से जो आशा थी, वह भंग हो गई। कुल दस हिंदू थे। सेठ बलभद्रदास चेयरमैन थे। डॉक्‍टर श्‍यामाचरण वाइस-चेयरमैन। लाला चिम्‍मनलाल और दीनानाथ तिवारी व्‍यापारियों के नेता थे। पद्मसिंह और रुस्तमभाई वकील थे। रमेशदत्‍त कॉलेज के अध्‍यापक, लाला भगतराम ठेकेदार, प्रभाकर राव हिन्‍दी पत्र जगत 'के संपादक और कुंवर अनिरुद्ध बहादुरसिंह जिले के सबसे बड़े जमींदार थे। दीनानाथ के कितने ही मकान थे। ये तीनों महाशय इस प्रस्‍ताव के विपक्षी थे। लाला भगतराम का काम चिम्‍मनलाल की आर्थिक सहायता से चलता था। इसलिए उनकी सम्‍मति भी उन्‍हीं की ओर थी। प्रभाकर राव, रमेशदत्‍त, रुस्तमभाई और पद्मसिंह इस प्रस्‍ताव के पक्ष में थे। डॉक्‍टर श्‍यामाचरण और कुंवर साहब के विषय में अभी तक कुछ निश्‍चय नहीं हो सका था। दोनों पक्ष उनसे सहायता की आशा रखते थे। उन्‍हीं पर दोनों पक्षों की हार-जीत निर्भर थी। पद्मसिंह अभी बारात से नहीं लौटे थे। सेठ बलभद्रदास ने इस अवसर को अपने पक्ष के समर्थन के लिए उपयुक्‍त समझा और सब हिंदू मेंबरों को अपनी सुसज्जित बारहदरी में निमंत्रित किया। इसका मुख्‍य उद्देश्‍य यह था कि डॉक्‍टर साहब और कुंवर महोदय की सहानुभूति अपने पक्ष में कर लें। प्रभाकर राव मुसलमानों के कट्टर विरोधी थे। वे लोग इस प्रस्‍ताव को हिंदू-मुस्लिम विवाद का रंग देकर प्रभाकर राव को अपनी तरफ खींचना चाहते थे।

दीनानाथ तिवारी बोले-हमारे मुसलमान भाइयों ने तो इस विषय में बड़ी उदारता दिखाई, पर इसमें एक गूढ़ रहस्‍य है। उन्‍होंने 'एक पंथ दो काज' वाली चाल चली है। एक ओर तो समाज-सुधार की नेकनामी हाथ आती है, दूसरी ओर हिंदुओं को हानि पहुंचाने का एक बहना मिलता है। ऐसे अवसर से वे कब चूकने-वाले थे?

चिम्‍मनलाल-मुझे पालिटिक्‍स से कोई वास्‍ता नहीं है और न मैं इसके निकट जाता हूँ। लेकिन मुझे यह कहने में तनिक भी संकोच नहीं है कि हमारे मुस्लिम भाइयों ने हमारी गर्दन बुरी तरह पकड़ी है। दालमंडी और चौक के अधिकांश मकान हिंदुओं के हैं। यदि बोर्ड ने यह स्‍वीकार कर लिया, तो हिंदुओं का मटियामेट हो जाएगा। छिपे-छिपे चोट करना कोई मुसलमानों से सीखे। अभी बहुत दिन नहीं बीते कि सूद की आड़ में हिंदुओं पर आक्रमण किया गया था। अब वह चाल पट पड़ गई, तो यह नया उपाय सोचा। खेद है कि हमारे कुछ हिंदू भाई उनके हाथों की कठपुतली बने हुए हैं। वे नहीं जानते कि अपने दुरुत्‍साह से अपनी जाति को कितनी हानि पहुंचा रहे हैं।

स्‍थानीय कौंसिल में जब सूद का प्रस्‍ताव उपस्थित था, तो प्रभाकर राव ने उसका घोर विरोध किया था। चिम्‍मनलाल ने उसका उल्‍लेख करके और वर्तमान विषय को आर्थिक दृष्टिकोण से दिखाकर प्रभाकर राव को नियम विरुद्ध करने की चेष्‍टा की। प्रभाकर राव ने विवश नेत्रों से रुस्तमभाई की ओर देखा मानो उनसे कह रहे थे कि मुझे ये लोग ब्रह्मफांस में डाल रहे हैं, आप किसी तरह मेरा उद्धार कीजिए। रुस्तमभाई बड़े निर्भीक, स्‍पष्‍टवादी पुरुष थे। वे चिम्‍मनलाल का उत्तर देने के लिए खड़े हो गए और बोले-मुझे यह देखकर शोक हो रहा है कि आप लोग एक सामाजिक प्रश्‍न को हिंदू-मुसलमानों के विवाद का स्‍वरूप दे रहे हैं। सूद के प्रश्‍न को भी यही रंग देने की चेष्‍टा की गई थी। ऐसे राष्‍ट्रीय विषयों को विवादग्रस्‍त बनाने से कुछ हिंदू साहूकारों का भला हो जाता है, किंतु इससे राष्‍ट्रीयता को जो चोट लगती है, उसका अनुमान करना कठिन है। इसमें संदेह नहीं कि इस प्रस्‍ताव के स्‍वीकृत होने से हिंदू साहूकारों को अधिक हानि पहुँचेगी, लेकिन मुसलमानों पर भी इसका प्रभाव अवश्‍य पड़ेगा। चौक और दालमंडी में मुसलमानों की दुकानें कम नहीं हैं। हमको प्रतिवाद या विरोध की धुन में अपने मुसलमान भाइयों की नीयत की सचाई पर संदेह न करना चाहिए। उन्‍होंने इस विषय पर जो कुछ निश्‍चय किया,वह सार्वजनिक उपकार के विचार से किया है, अगर हिंदुओं की इससे अधिक हानि होती, तब भी उनका यही फैसला होता। अगर आप सच्‍चे ह्रदय से मानते हैं कि यह प्रस्‍ताव एक सामाजिक कुप्रथा के सुधार के लिए उठाया है, तो आपको उसके स्‍वीकार करने में कोई बाधा न होनी चाहिए, चाहे धन की कितनी ही हानि हो। आचरण के सामने धन का कोई महत्‍व न होना चाहिए।

प्रभाकर राव को धैर्य हुआ। बोला-बस, यही मैं भी कहने वाला था। अगर थोड़ी-सी आर्थिक हानि से एक कुप्रथा का सुधार हो रहा है, तो वह हानि प्रसन्‍नता से उठा लेनी चाहिए। आप लोग जानते हैं कि हमारी गवर्नमेंट को चीन से अफीम का व्‍यापार करने में कितना लाभ था। अठारह करोड़ से कुछ अधिक ही हो। पर चीन में अफीम खाने की कुप्रथा मिटाने के लिए सरकार ने इतनी भीषण हानि उठाने में जरा भी आगा-पीछा नहीं किया।

कुंवर अनिरुद्धसिंह ने प्रभाकर राव की ओर देखते हुए पूछा-महाशय, आप तो अपनी पत्रिका के संपादन में लीन रहते हैं, आपके पास जीवन के आनंद-लाभ के लिए समय ही कहां है? पर हम जैसे बेफिक्रों को तो दिल बहलाव का कोई सामान चाहिए? संध्‍या का समय तो पोलो खेलने में कट जाता है, दोपहर का समय सोने में और प्रात:काल अफसरों से भेंट-भांट करने या घोड़े दौड़ाने में व्‍यतीत हो जाता है। लेकिन संध्‍या से दस बजे रात तक बैठे-बैठे क्‍या करेंगे? आप आज यह प्रस्‍ताव लाए है कि वेश्‍याओं को शहर से निकाल दो, कल को आप कहेंगे कि म्‍युनिसिपैलिटी के अंदर कोई आज्ञा लिए बिना नाच, गाना, मुजरा न करा पाए, तो फिर हमारा रहना कठिन हो जाएगा।

प्रभाकर राव मुस्‍कराकर बोले-क्‍या पोलो और नाच-गाने के सिवा समय काटने का और कोई उपाय नहीं है? कुछ पढ़ा कीजिए।

कुंवर-पढ़ना हम लोगों को मना है। हमको किताब के कीड़े बनने की जरूरत नहीं। अपने जीवन में सफलता प्राप्‍त करने के लिए जिन बातों की जरूरत है, उनकी शिक्षा हमको मिल चुकी है। हम फ्रांस और स्‍पेन का नाच जानते हैं, आपने उनका नाम भी न सुना होगा। प्‍यानो पर बैठा दीजिए, वह राग अलापूं कि मोजार्ट लज्जित हो जाए। अंग्रेजी रीति-व्‍यवहार का हमको पूर्ण ज्ञान है। हम जानते हैं कि कौन-सा समय सोला हैट लगाने का है, कौन-सा पगड़ली का। हम किताबें भी पढ़ते हैं। आप हमारे कमरे में कई-कई आल्‍मारियां पुस्‍तकों से सजी हुई देखेंगे, मगर उन किताबों में चिमटते नहीं। आपके इस प्रस्‍ताव से हम तो मर मिटेंगे।

कुंवर साहब की हास्‍य और व्‍यंग्‍य से भरी बातों ने दोनों पक्षों का समाधान कर दिया।

डॉक्‍टर श्‍यामाचरण ने कुंवर साहब की ओर देखकर कहा-मैं इस विषय में कौंसिल में प्रश्‍न करने वाला हूँ। जब तक गवर्नमेंट उसका उत्तर न दे, मैं अपना कोई विचार प्रकट नहीं कर सकता।

यह कहकर डॉक्‍टर महोदय ने अपने प्रश्‍नों को पढ़कर सुनाया।

रमेशदत्‍त ने कहा-इन प्रश्‍नों का कदाचित् गवर्नमेंट कुछ उत्तर न देगी।

डॉक्‍टर-उत्तर मिले या न मिले, प्रश्‍न तो हो जाएंगे। इसके सिवा और हम कर ही क्‍या सकते हैं?

सेठ बलभद्रदास को विश्‍वास हो गया कि अब अवश्‍य हमारी विजय होगी। डॉक्‍टर साहब को छोड़कर सत्रह सम्‍मतियों में नौ उनके पक्ष में थीं। इसलिए अब वह निरपेक्ष रह सकते थे, जो सभापति का धर्म है। उन्‍होंने सारगर्भित वक्‍तृता देते हुए इस प्रस्‍ताव की मीमांसा की। उन्‍होंने कहा-सामाजिक विप्‍लव पर मेरा विश्‍वास नहीं है। मेरा विचार है कि समाज को जिस सुधार की आवश्‍यकता होती है, वह स्‍वयं कर लिया करता है। विदेश-यात्रा, जाति-पांति के भेद, खान-पान के निरर्थक बंधन सब-के-सब समय के प्रवाह के सामने सिर झुकाते चले जाते हैं। इस विषय में समाज को स्‍वच्‍छंद रखना चाहता हूँ। जिस समय जनता एक स्‍वर से कहेगी कि हम वेश्‍याओं को चौक में नहीं देखना चाहते, तो संसार में ऐसी कौन-सी शक्ति है, जो उसकी बात को अनसुनी कर सके?

अंत में सेठजी ने बड़े भावपूर्ण स्‍वर में ये शब्द कहे-हमको अपने संगीत पर गर्व है। जो लोग इटली और फ्रांस के संगीत से परिचित हैं, वे भी भारतीय गान के भाव, रस और आनंदमय शांति के कायल हैं, किंतु काल की गति ! वही संस्‍था जिसकी जड़ खोदने पर हमारे कुछ सुधारक तुले हुए हैं, इस पवित्र-इस स्‍वर्गीय धन की अध्‍यक्षिणी बनी हुई है। क्‍या आप इस संस्‍था का सर्वनाश करके अपने पूर्वजों के अमूल्‍य धन को इस निर्दयता से धूल में मिला देंगे? क्‍या आप जानते थे कि हममें आज जो जातीय और धार्मिक भाव शेष रह गए हैं, उनका श्रेय हमारे संगीत को है, नहीं तो आज राम, कृष्‍ण और शिव का कोई नाम भी न जानता ! हमारा बड़े-से-बड़ा शत्रु भी हमारे ह्रदय से जातीयता का भाव मिटाने के लिए इससे अच्‍छी और कोई चाल नहीं सोच सकता। मैं यह नहींकहता कि वेश्‍याओं से समाज को हानि नहीं पहुँचती। कोई भी समझदार आदमी ऐसा कहने का साहस नहीं कर सकता। लेकिन रोग का निवारण मौन से नहीं, दवा से होता है। कोई कुप्रथा उपेक्षा या निर्दयता से नहीं मिटती। उसका नाश शिक्षा, ज्ञान और दया से होता है। स्‍वर्ग में पहुँचने के लिए कोई सीधा रास्‍ता नहीं है। वैतरणी का सामना अवश्य करना पड़ेगा। जो लोग समझते हैं कि वह किसी महात्‍मा के आशीर्वाद से कूदकर स्‍वर्ग में जा बैठेंगे, वह उनसे अधिक हास्‍यास्‍पद नहीं हैं, जो समझते हैं कि चौक से वेश्‍याओं को निकाल देने से भारत के सब दु:ख दारिद्रय मिट जाएंगे और चौक से नवीन सूर्य का उदय हो जाएगा।

इस रचना को उद्धृत करें

शोध एवं शोध-पत्रों के लिए अकादमिक संदर्भ

Premchand, Munshi. "सेवासदन." *Munshi Premchand Digital Archive*, 1918, https://munshipremchand.com/works/novels/sevasadan. Accessed 22 Sep. 2026.