Cover Image for Sevasadan (सेवासदन) by Munshi Premchand - Novel
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उपन्यास•1918•55 अध्याय•12h 15m

सेवासदन

Sevasadan

प्रेमचंद का उपन्यास 'सेवासदन' सुमन के जीवन के माध्यम से विवाह, दहेज, स्त्री-पराधीनता, वेश्यावृत्ति और सामाजिक सुधार के प्रश्नों को प्रस्तुत करता है।

पात्र:सुमन, गजाधर प्रसाद, सदनसिंह, शांता, पद्मसिंह शर्मा, विट्ठलदास, कृष्णचंद्र, भोलीबाई
सेटिंग:20वीं सदी के प्रारंभ में बनारस (वाराणसी), भारत

अध्याय 46 / 55

21 मिनट पठन • 3,033 शब्द

अध्याय 46: सेवासदन

एक महीना बीत गया। सदन ने अपने इस नए धंधे की चर्चा घर में किसी से न की। वह नित्‍य सबेरे उठकर गंगा-स्‍नान के बहाने चला जाता। वहाँ से दस बजे घर आता। भोजन करके फिर चल देता और तब का गया-गया घड़ी रात गए, घर लौटता। अब उसकी नाव घाट पर की सब नावों से अधिक सजी हुई, दर्शनीय थी। उस पर दो-तीन मोढ़े रखे रहते थे और एक जाजिम बिछी रहती थी। इसलिए शहर के कितने ही रसिक, विनोदी मनुष्‍य उस पर सैर किया करते थे। सदन किराए के विषय में खुद बातचीत न करता। य‍ह काम उसका नौकर झींगुर मल्‍लाह किया करता था। वह स्‍वयं तो कभी तट पर बैठा रहता तो कभी नाव जा बैठता था। वह अपने को बहुत समझाता कि काम करने में क्‍या शरम? मैंने कोई बुरा काम तो नहीं किया है, किसी का गुलाम तो नहीं हूँ, कोई आंखें तो नहीं दिखा सकता। लेकिन जब वह किसी भले आदमी को अपनी नाव की ओर आते देखता, तो आप-ही-आप उसके कदम पीछे हट जाते और लज्‍जा से आंखें झुक जातीं। वह एक जमींदार का पुत्र था और एक वकील का भतीजा। उस उच्‍च पद से उतरकर मल्‍लाह का उद्यम करने में उसे स्‍वभावत: लज्‍जा आती थी, जो तर्क से किसी भांति न हटती। इस संकोच से उसकी बहुत हानि होती थी। जिस काम के लिए वह एक रुपया ले सकता था, उसी के लिए उसे आधे में ही राजी होना पड़ता था। ऊंची दुकान फीके पकवान होने पर भी बाजार में श्रेष्‍ठ होती है। यहाँ तो पकवान भी अच्‍छे थे, केवल एक चतुर सजीले दुकानदार की कमी थी। सदन इस बात को समझता था, पर संकोचवश कुछ कह न सकता था। तिस पर भी डेढ-दो रुपये नित्‍य मिल जाते थे और वह समय निकट आता जाता था, जब गंगा-तट पर उसका झोंपड़ा बनेगा और आबाद होगा। वह अब अपने बल-बूते पर खड़े होने के योग्‍य होता जाता था। इस विचार से उसके आत्‍मसम्‍मान को अतिशय आनंद होता था। वह बहुधा रात-की-रात इन्‍हीं अभिलाषाओं की कल्‍पना में जागता रहता।

इसी समय म्‍युनिसिपैलिटी ने वेश्‍याओं के लिए शहर से हटकर मकान बनवाने का निश्‍चय किया,लाला भगतराम को इसका ठीका मिला। नदी के इस पार ऐसी जमीन न मिल सकी, जहां वह पजावे लगाते और चूने के भट्ठे बनाते। इसलिए उन्‍होंने नदी पार जमीन ली थी और वहीं सामान तैयार करते थे। उस पार ईंटें, चूना आदि लाने के लिए उन्‍हें एक नाव की जरूरत हुई। नाव तय करने के लिए मल्‍लाहों के पास आए। सदन से भेंट हो गई। सदन ने अपनी नाव दिखाई, भगतराम ने उसे पसंद किया। झींगुर से मजूरी तय हुई, दो खेवे रोज लाने की बात ठहरी। भगतराम ने बयाना दिया और चले गए।

रुपये की चाट बुरी होती है। सदन अब वह उड़ाऊ, लुटाऊ युवक नहीं रहा। उसके सिर पर अब चिंताओं का बोझ है, कर्तव्‍य का ऋण है। वह इससे मुक्‍त होना चाहता है। उसकी निबाह एक-एक पैसे पर रहती है। उसे अब रुपये कमाने और घर बनवाने की धुन है। उस दिन वह घड़ी रात रहे, उठकर नदी किनारे चला आया और झींगुर को जगाकर नाव खुलवा दी। दिन निकलते-निकलते उस पार जा पहुंचा। लौटती बार उसने स्‍वयं डांड ले लिया और हंसते हुए दो-चार हाथ चलाए, लेकिन इतने से ही नाव की चाल बढ़ते देखकर उसने जोर-जोर से डांड़ चलाने शुरू कर दिए। नाव की गति दूनी हो गई। झींगुर पहले-पहले तो मुस्‍कराता रहा, लेकिन अब चकित हो गया।

आज से वह सदन का दबाव कुछ अधिक मानने लगा। उसे मालूम हो गया कि यह महाशय निरे मिट्टी के लौंदे नहीं हैं। काम पड़ने पर यह अकेले नाव को पार ले जा सकते हैं, और अब मेरा टर्राना उचित नहीं।

उस दिन दो खेवे हुए, दूसरे दिन एक ही हुआ। क्‍योंकि सदन को आने में देर हो गई। तीसरे दिन उसने नौ बजे रात को तीसरा खेवा पूरा किया, लेकिन पसीने से डूबा था। ऐसा थक गया था कि घर तक आना पहाड़ हो गया। इसी प्रकार दो मास तक लगातार उसने काम किया और इसमें उसे अच्‍छा लाभ हुआ। उसने दो मल्‍लाह और रख लिए थे।

सदन अब मल्‍लाहों का नेता था। उसका झोंपड़ा तैयार हो गया था। भीतर एक तख्‍ता था, दो पलंग, दो लैंप, कुछ मामूली बर्तन भी। एक कमरा बैठने का था, एक खाना पकाने का, एक सोने का। द्वार पर ईंटों का चबूतरा था। उसके इर्द-गिर्द गमले रखे हुए थे। दो गमलों में लताएं लगी हुई थीं, जो झोंपडे के ऊपर चढ़ती जाती थीं। यह चबूतरा अब मल्‍लाहों का अड्डा था। वह बहुधा वहीं बैठे तंबाकू पीते। सदन ने उनके साथ बड़ा उपकार किया था। अफसरों से लिखा-पढ़ी करके उन्‍हें आए दिन बेगार से मुक्‍त करा दिया था। इस साहस के काम ने उसका सिक्‍का जमा दिया था। उसके पास अब कुछ रुपये भी जमा हो गए थे और वह मल्‍लाहों को बिना सूद के रुपये उधार देता था। अब उसे एक पैर-गाड़ी की फिक्र थी, शौकीन आदमियों के सैर के लिए वह एक सुंदर बजरा भी लेना चाहता था और हारमोनियम के लिए तो उसने पत्र डाल ही दिया। यह सब उस देवी के आगमन की तैयारियां थीं, जो एक क्षण के लिए भी उसके ध्‍यान से न उतर‍ती थी।

सदन की अवस्‍था अब ऐसी थी कि वह गृहस्‍थी का बोझ उठा सके, लेकिन अपने चचा की सम्‍मति के बिना वह शान्‍ता को लाने का साहस न कर सकता था। वह घर पर पद्मसिंह के साथ भोजन करने बैठता, तो निश्‍चय कर लेता कि आज इस विषय को छेड़कर तय कर लूंगा। पर उसका इरादा कभी पूरा न होता, उसके मुँह से बात ही न निकलती।

यद्यपि उसने पद्मसिंह से इस व्‍यवसाय की चर्चा न की थी, पर उन्‍हें लाला भगतराम से सब हाल मालूम हो गया था। वह सदन की उद्योगशीलता पर बहुत प्रसन्‍न थे। वह चाहते थे कि एक-दो नावें और ठीक कर ली जाएं और करोबार बढ़ा लिया जाए। लेकिन जब सदन स्‍वयं कुछ नहीं कहता था, तो वह भी इस विषय में चुप रहना ही उचित समझते थे। वह पहले ही उसकी खातिर करते थे, अब कुछ आदर भी करने लगे और सुभद्रा तो उसे अपने लड़के के समान मानने लगी।

एक दिन, रात के समय सदन अपने झोंपड़े में बैठा इुआ नदी की तरफ देख रहा था। आज न जाने क्‍यों नाव के आने में देर हो रही थी। सामने लैंप जल रहा था। सदन के हाथ में एक समाचार-पत्र था, पर उसका ध्‍यान पढ़ने में न लगता था। नाव के न आने से उसे किसी अनिष्‍ट की शंका हो रही थी। उसने पत्र रख दिया और बाहर निकलकर तट पर आया। रेत पर चांदनी की सुनहरी चादर बिछी हुई थी और चांद की किरणें नदी के हिलते हुए जल पर ऐसी मालूम होती थीं, जैसे किसी झरने से निर्मल जल की धारा क्रमश: चौड़ी होती हुई निकलती है। झोंपडे के सामने चबूतरे पर कई मल्‍लाह बैठे हुए बातें कर रहे थे कि अकस्‍मात् सदन ने दो स्त्रियों को शहर की ओर से आते देखा। उनमें से एक ने मल्‍लाहों से पूछा-हमें उस पार जाना है, नाव ले चलोगे?

सदन ने शब्‍द पहचाने। यह सुमनबाई थी। उसके हृदय में एक गुदगुदी-सी हुई, आंखों में एक नशा-सा आ गया। लपककर चबूतरे के पास आया और सुमन से बोला-बाईजी, तुम यहाँ कहां?

सुमन ने ध्‍यान से सदन को देखा, मानो उसे पहचानती ही नहीं। उसके साथ वाली स्‍त्री ने घूंघट निकाल लिया और लालटेन के प्रकाश से कई पग हटकर अंधेरे में चली गई। सुमन ने आश्‍चर्य से कहा-कौन? सदन?

मल्‍लाहों ने उठकर घेर लिया, लेकिन सदन ने कहा-तुम लोग इस समय यहाँ से चले जाओ। ये हमारे घर की स्त्रियां हैं, आज यहीं रहेंगी। इसके बाद वह सुमन से बोला-बाईजी, कुशल समाचार कहिए। क्‍या माजरा है?

सुमन-सब कुशल ही है, भाग्‍य में जो कुछ लिखा है, वही भोग रही हूँ। आज का पत्र तुमने अभी न पढ़ा होगा। प्रभाकर राव ने न जाने क्‍या छाप दिया कि आश्रम में हलचल मच गई। हम दोनों बहनें वहाँ एक दिन भी और रह जातीं, तो आश्रम बिल्‍कुल खाली हो जाता। वहाँ से निकल आने में कुशल थी। अब इतनी कृपा करो कि हमें उस पार ले जाने के लिए एक नाव ठीक कर दो। वहाँ से हम इक्‍का करके मुगलसराय चली जाएंगी। अमोला के लिए कोई-न-कोई गाड़ी मिल ही जायगी। यहाँ से रात कोई गाड़ी नहीं जाती?

सदन-अब तो तुम अपने घर ही पहुँच गई, अमोला क्‍यों जाओगी? तुम लोगों को कष्‍ट तो बहुत हुआ, पर इस समय तुम्‍हारे आने से मुझे जितना आनंद हुआ, यह वर्णन नहीं कर सकता। मैं स्‍वयं कई दिन से तुम्‍हारे पास आने का इरादा कर रहा था, लेकिन काम से छुट्टी ही नहीं मिलती। मैं तीन-चार महीने से मल्‍लाह का काम करने लगा हूँ। यही तुम्‍हारा झोंपड़ा है, चलो अंदर चलो।

सुमन झोंपडे में चली गई, लेकिन शान्‍ता वहीं अंधेरे में चुपचाप सिर झुकाए रो रही थी। जब से उसने सदनसिंह के मुँह से वे बातें सुनी थीं, उस दुखिया ने रो-रोकर दिन काटे थे। उसे बार-बार अपने मान करने का पछतावा होता था। वह सोचती, यदि मैं उस मसय उनके पैरों पर गिर पड़ती, तो उन्‍हें मुझ पर अवश्‍य दया आ जाती। सदन की सूरत उसकी आंखों में फिरती और उसकी बाते उसके कानों में गूंजती। बातें कठोर थीं, लेकिन शान्‍ता को वह प्रेम-करुणा से भरी हुई प्रतीत होती थीं। उसने अपने मन को समझा लिया था कि यह सब मेरे कुदिन का फल है, सदन का कोई अपराध नहीं। वह वास्‍तव में विवश हैं। अपने माता-पिता की आज्ञा का पालन करना उनका धर्म है। यह मेरी नीचता है कि मैं उन्‍हें धर्म के मार्ग से फेरना चाहती हूँ। हां ! मैंने अपने स्‍वामी से मान किया! मैंने अपने आराध्‍यदेव का निरादर किया, मैंने अपने कुटिल स्‍वार्थ के वश होकर उनका अपमान किया। ज्‍यों-ज्‍यों दिन बीतते थे, शान्‍ता की आत्‍मग्‍लानि बढ़ती थी। इस शोक, चिंता और विरह-पीड़ा से वह रमणी इस प्रकार सूख गई थी, जैसे जेठ महीने में नदी सूख जाती है।

सुमन झोंपडे में चली गई, तो सदन धीरे-धीरे शान्‍ता के सामने आया और कांपते हुए स्‍वर से बोला-शान्‍ता।

यह कहते-कहते उसका गला रूंध गया।

शान्‍ता प्रेम से गद्गद हो गई। उसका प्रेम उस विरत दशा को पहुँच गया, जब वह संकुचित स्‍वार्थ से मुक्‍त हो जाता है।

उसने मन में कहा, जीवन का क्‍या भरोसा है? मालूम नहीं, जीती रहूँ या न रहूँ, इनके दर्शन फिर हों या न हों, एक बार इनके चरणों पर सिर रखकर रोने की अभिलाषा क्‍यों रह जाए? इसका इससे उत्तम और कौन-सा अवसर मिलेगा? स्‍वामी ! तुम एक बार अपने हाथों से उठाकर मेरे आंसू पोंछ दोगे, तो मेरा चित्त शांत हो जाएगा, मेरा जन्‍म सफल हो जाएगा। मैं जब तक जीऊंगी, इस सौभाग्‍य के स्‍मरण का आनंद उठाया करूंगी। मै तो तुम्‍हारे दर्शनों की आशा ही त्‍याग चुकी थी, किंतु जब ईश्‍वर ने यह दिन दिखा दिया, तब अपनी मनोकामना क्‍यों न पूरी कर लूं? जीवनरूपी मरूभूमि में यह वृक्ष मिल गया है, तो इसकी छांह में बैठकर क्‍यों न अपने दग्‍ध हृदय को शीतल कर लूं।

यह सोचकर शान्‍ता रेाती हुई सदन के पैरों पर गिर पड़ी, किंतु मुरझाया हुआ फूल हवा का झोंका लगते ही बिखर गया। सदन झुका कि उसे उठाकर छाती से लगा ले, चिपटा ले, लेकिन शान्‍ता की दशा देखकर उसका हृदय विकल हो गया। जब उसनेउसे पहले-पहले नदी के किनारे देखा था, तब वह सौंदर्य की एक नई कोमल कली थी, पर आज वह एक सूची हुई पीली पत्‍ती थी, जो बसंत ऋतु में गिर पड़ी है।

सदन का हृदय नदी में चमकती हुई चन्‍द्र-किरणों के सदृश थरथराने लगा। उसने कांपते हुए हाथों से उस संज्ञाशून्‍य शरीर को उठा लिया। निराश अवस्‍था में उसने ईश्‍वर की शरण ली। रोते हुए बोला-प्रभो, मैंने बड़ा पाप किया है, मैंने एक कोमल संतप्‍त हृदय को बड़ी निर्दयता से कुचला है, पर इसका यह दंड असह्य है। इस अमूल्‍य रत्‍न को इनती जल्‍दी मुझसे मत छीनो। तुम दयामय हो, मुझ पर दया करो।

शान्‍ता को छाती से लगाए हुए सदन झोंपड़ी में गया और उसे पलंग पर लिटाकर, शोकातुर स्‍वर से बोला-सुमन, देखो, यह कैसी हुई जाती है। मैं डाक्‍टर के पास दौड़ा जाता हूँ।

सुमन ने समीप आकर बहन को देखा। माथे पर पसीने की बूंदें आ गई थीं, आंखें पथराई हुई। नाड़ी का कहीं पता नहीं। मुख वर्णहीनहो गया था। उसने तुरंत पंखा उठा लिया और झलने लगी। वह क्रोध जो शान्‍ता की दशा देख-देखकर महीनों से उसके दिल में जमा हो रहा था, फूट निकला। सदन की ओर तिरस्‍कारपूर्ण नेत्रों से देखकर बोली-यह तुम्‍हारे अत्‍याचार का फल है, यह तुम्‍हारी करनी है, तुम्‍हारे ही निर्दय हाथों ने इस फल को यों मसला है। तुमने अपने पैरों से इस पौधे को यों कुचला है। लो, अब तुम्‍हारा गला छूटा जाता है। सदन, जिस दिन से इस दुखिया ने तुम्‍हारी वह अभिमान भी बातें सुनीं, इसके मुख पर हंसी नहीं आई, इसके आंसू कभी नहीं थमे। बहुत गला दबाने से दो-चार कौर खा लिया करती थी। और तुमने उसके साथ यह अत्‍याचार केवल इसलिए किया कि मैं उसकी बहन हूँ, जिसके पैरों पर तुमने बरसों नाक रगड़ी है, जिसके तलुवे तुमने बरसों सहलाए हैं। जिसके कुटिल प्रेम में तुम म‍हीनों मतवाले हुए रहते थे। उस समय भी तो तुम अपने मां-बाप के आज्ञाकारी पुत्र थे या कोई और थे? उस समय भी तो तुम वही उच्‍च कुल के ब्राह्मण थे या कोई और थे? तब तुम्‍हारे दुष्‍कर्मों से खानदान की नाक न कटती थी? आज तुम आकाश के देवता बने फिरते हो। अंधेरे में जूठा खाने पर तैयार, पर उजाले में निमत्रण भी स्‍वीकार नहीं। यह निरी धूर्तता है, दगाबाजी है। जैसा तुमने इस दुखिया के साथ किया है, उसका फल तुम्‍हें ईश्‍वर देंगे। इसे जो कुछ भुगतना था, वह भुगत चुकी। आज न मरी, कल मर जाएगी, लेकिन तुम इसे याद करके रोओगे। कोई और स्‍त्री होती, तो तुम्‍हारी बातें सुनकर फिर तुम्‍हारी ओर आंख उठाकर न देखती, तुम्‍हें कोसती, लेकिन यह अबला सदा तुम्‍हारे नाम पर मरती रही। लाओ, थोड़ा ठंडा पानी।

सदन अपराधी की भांति सिर झुकाए ये बातें सुनता रहा। इससे उसका हृदय कुछ हल्‍का हुआ। सुमन ने यदि उसे गालियां दी होतीं,तो और भी बोध होता। वह अपने को इस तिरस्‍कार के सर्वथा योग्‍य समझता था।

उसने ठंडे पानी का कटोरा सुमन को दिया और स्‍वयं पंखा झलने लगा। सुमन ने शान्‍ता के मुँह पर पानी के कई छींटे दिए। इस पर जब शान्‍ता ने आंखें न खोलीं, तब सदन बोला-जाकर डाक्‍टर को बुला लाऊं न?

सुमन-नही, घबराओ मत। ठंडक पहुँचते ही होश आ जाएगा। डाक्‍टर के पास इसकी दवा नहीं।

सदन को कुछ तसल्‍ली हुई, बोला-सुमन, चाहे तुम समझो कि मैं बात बना रहा हूँ, लेकिन मैं तुमसे सत्‍य कहता हूँ कि उसी मनहूस घड़ी से मेरी आत्‍मा को कभी शांति नहीं मिली। मैं बार-बार अपनी मूर्खता पर पछताता था। कई बार इरादा किया कि चलकर अपना अपराध क्षमा कराऊं, लेकिन यही विचार उठता कि किस बूते पर जाऊं? घरवालों से सहायता की कोई आशा न थी, और मुझे तो तुम जानती ही हो कि सदा कोतल घोड़ा बना रहा। बस, इसी चिंता में डूबा रहता था कि किसी प्रकार चार पैसे पैदा करूं और अपनी झोंपड़ी अलग बनाऊं। महीनों नौकरी की खोज में मारा-मारा फिरा, कहीं ठिकाना न लगा। अंत को मैंने गंगा-माता की शरण ली और अब ईश्‍वर की दया से मेरी नाव चल निकली है। अब मुझे किसी सहारे या मदद की आवश्‍यकता नहीं है। यह झोंपड़ी बना ली है, और विचार है कि कुछ रुपये और आ जाएं, तो उस पार किसी गांव में एक मकान बनवा लूं क्‍योंकि, इनकी तबीयत कुछ संभलती मालूम होती है?

सुमन का क्रोध शांत हुआ। बोली-हां, अब कोई भय नहीं है, केवल मूर्च्‍छा थी। आंखें बंद हो गई और होंठों का नीलापन जाता रहा।

सदन को ऐसा आनंद हुआ कि यदि वहाँ ईश्‍वर की कोई मूर्ति होती, तो उसके पैरों पर सिर रख देता। बोला-सुमन, तुमने मेरे साथ जो उपकार किया है, उसको मैं सदा याद करता रहूँगा। अगर और कोई बात हो जाती, तो इस लाश के साथ मेरी लाश भी निकलती।

सुमन-यह कैसी बात मुँह से निकालते हो। परमात्‍मा चाहेंगे तो यह बिना दवा के अच्‍छी हो जाएगी और तुम दोनों बहुत दिनों तक सुख से रहोगे। तुम्‍हीं उसकी दवा हो। तुम्‍हारा प्रेम ही उसका जीवन है, तुम्‍हें पाकर अब उसे किसी वस्‍तु की लालसा नहीं है। लेकिन अगर तुमने भूलकर भी उसका अनादर या अपमान किया,तो फिर उसकी यही दशा हो जाएगी और तुम्‍हें हाथ मलना पड़ेगा।

इतने में शान्‍ता ने करवट बदली और पानी मांगा। सुमन ने पानी का गिलास उसके मुँह से लगा दिया। उसने दो-तीन घूंट पीया और तब फिर चारपाई पर लेट गई। वह विस्मित नेत्रों से इधर-उधर ताक रही थी, मानो उसे अपनी आंखों पर विश्‍वास नहीं है। वह चौककर उठ बैठी और सुमन की ओर ताकती हुई बोली-क्‍यों, यही मेरा घर है न? हां-हां, यही है, और वह कहां हैं मेरे स्‍वामी, मेरे जीवन के आधार ! उन्‍हें बुलाओ, आकर मुझे दर्शन दें, बहुत जलाया है, इस दाह को बुझाएं। मैं उनसे कुछ पूछूंगी। क्‍या नहीं आते? तो लो, मैं ही चलती हूँ। आज मेरी उनसे तकरार होगी। नहीं, मैं उनसे तकरार न करूंगी, केवल यही कहूँगी कि अब मुझे छोड़कर कहीं मत जाओ। चाहे गले का हार बनाकर रखो, चाहे पैरों की बेड़ियां बनाकर रखो, पर अपने साथ रखो। वियोग-दुख अब नहीं सहा जाता। मैं जानतीहूँ कि तुम मुझसे प्रेम करते हो। अच्‍छा, न सही, तुम मुझे नहीं चाहते, मैं तो तुम्‍हें चाहती हूँ। अच्‍छा, यह भी न सही, मैा भी तुम्‍हें नहीं चाहती, मेरा विवाह तो तुमसे हुआ है, नहीं, नहीं हुआ! अच्‍छा कुछ न सही, मैं तुमसे विवाह नहीं करती, लेकिन मैं तुम्‍हारे साथ रहूँगी और अगर तुमने आंख फेरी तो अच्‍छा न होगा। हां, अच्‍छा न होगा, मैं संसार में रोने के लिए नहीं आई हूँ। प्‍यारे, रिसाओ मत। यही होगा, दो-चार आदमी हसेंगे, ताने देंगे। मेरी खातिर उसे सह लेना। क्‍या मां-बाप छोड़ देंगे, कैसी बात कहते हो? मां-बाप अपने लड़के को नहीं छोड़ते। तुम देख लेना,मैं उन्‍हें खींच लाऊंगी, मैं अपनी सास के पैर धो-धो पीऊंगी, अपने ससुर के पैर दबाऊंगी, क्‍या उन्‍हें मुझ पर दया न आएगी? यह कहते-कहते शान्‍ता की आंखें फिर बंद हो गई।

सुमन ने सदन से कहा-अब सो रही है, सोने दो।एक नींद सो लेगी, तो उसका जी संभल जाएगा। रात अधिक बीत गई है, अब तुम भी घर जाओ, शर्माजी बैठे घबराते होंगे।

सदन-आज न जाऊंगा।

सुमन-नहीं-नहीं, वे लोग घबराएंगे। शान्‍ता अब अच्‍छी है, देखो, कैसे सुख से सोती है। इतने दिनों में आज ही मैंने उसे यों सोते देखा है। सदन नहीं माना, वहीं बरामदे में आकर चौकी पर लेट रहा और सोचने लगा।

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शोध एवं शोध-पत्रों के लिए अकादमिक संदर्भ

Premchand, Munshi. "सेवासदन." *Munshi Premchand Digital Archive*, 1918, https://munshipremchand.com/works/novels/sevasadan. Accessed 22 Sep. 2026.