Cover Image for Sevasadan (सेवासदन) by Munshi Premchand - Novel
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उपन्यास•1918•55 अध्याय•12h 15m

सेवासदन

Sevasadan

प्रेमचंद का उपन्यास 'सेवासदन' सुमन के जीवन के माध्यम से विवाह, दहेज, स्त्री-पराधीनता, वेश्यावृत्ति और सामाजिक सुधार के प्रश्नों को प्रस्तुत करता है।

पात्र:सुमन, गजाधर प्रसाद, सदनसिंह, शांता, पद्मसिंह शर्मा, विट्ठलदास, कृष्णचंद्र, भोलीबाई
सेटिंग:20वीं सदी के प्रारंभ में बनारस (वाराणसी), भारत

अध्याय 24 / 55

8 मिनट पठन • 1,189 शब्द

अध्याय 24: सेवासदन

यह बात बिलकुल तो असत्‍य नहीं है कि ईश्‍वर सबको किसी-न-किसी हीले से अन्‍न-वस्‍त्र देता है। पंडित उमानाथ बिना किसी हीले ही के संसार का सुख-भोग करते थे। उनकी आकाशी वृत्ति थी। उनके भैंस और गाएं न थीं, लेकिन घर में घी-दूध की नदी बहती थी; वह खेती-बबारी न करते थे, लेकिन घर में अनाज की खत्तियां भरी रहती थीं। गांव में कहीं मछली मरे, कहीं बकरा कटे, कहीं आम टूटे, कहीं भोज हो, उमानाथ का हिस्‍सा बिना मांगे आप-ही-आप पहुँच जाता। अमोला बड़ा गांव था। ढाई-तीन हजार जनसंख्‍या थी। समस्‍त गांव में उनकी सम्‍मत्ति के बिना कोई काम न होताथा। स्त्रियों को यदि गहने बनवाने होते तो वह उमानाथ से कहतीं। लड़के-लड़कियों के विवाह उमानाथ की मार्फत तय होते। रेहननामे, बैनामे, दस्‍तावेज उमानाथ ही के परामर्श से लिखे जाते। मुआमिले-मुकद्दमे उन्‍हीं के द्वारा दायर होते और मजा यह था कि उनका यह दबाव और सम्‍मान उनकी सज्‍जनता के कारण नहीं था। गांववालों के साथ उनका व्‍यवहार शुष्‍क और रूखा होता था। वह बेलाग बात करते थे, लल्‍लो-चप्‍पो करना नहीं जानते थे, लेकिन उनके कटु वाक्‍यों को लोग दूध के समान पीते थे। मालूम नहीं, उनके स्‍वभाव में क्‍या जादू था। कोई कहता था, यह उनका इकबाल है, कोई कहता था उन्‍हें महावीर का इष्‍ट है। लेकिन हमारे विचार में यह उनके मानव-स्‍वभाव के ज्ञान का फल था। जानते थे कि कहां झुकना और कहां तनना चाहिए। गांवोंवालों से अनने में अपना काम सिद्ध होता था, अधिकारियों से झुकने में। थाने और तहसील के अमले, चपरासी ने लेकर तहसीलदार तक सभी उन पर कृपादृष्टि रखते थे। तहसीलदार साहब के लिए वह वर्षफल बनाते, डिप्‍टी साहब को भावी उन्‍नति की सूचना देते, किसी को भगवद्गीता सुनाते और जिन लोगों की श्रद्धा इन बातों पर न थी, उन्‍हें मीठे आचार और नवरत्‍न की चटनी खिलाकर प्रसन्‍न रखते। थानेदार साहब उन्‍हें अपना दाहिना हाथ समझते थे। जहां ऐसे उनकी दाल न गलती, वहाँ पंडितजी की बदौलत पांचों उंगलियां घी में हो जातीं। भला, ऐसे पुरुष की गांव वाले क्‍यों न पूजा करते?

उमानाथ को अपनी बहन गंगाजली से प्रेम था, लेकिन गंगाजली को मैके जाने के थोड़े ही दिनों पीछे ज्ञात हुआ कि भाई का प्रेम भावज की अवज्ञा के सामने नहीं ठहर सकता। उमानाथ बहन को अपने घर लाने पर मन में बहुत पछताते। वे अपनी स्‍त्री को प्रसन्‍न रखने के लिए ऊपरी मन से उसकी हां-में-हां मिला दिया करते। गंगाजली को साफ कपड़े पहनने का क्‍या अधिकार है? शान्ता का पालन पहले चाहे कितने ही लाड़-प्‍यार से हुआ हो, अब उसे उमानाथ की लड़कियों से बराबरी करने का क्‍या अधिकार है? उमानाथ स्‍त्री की इन द्वेषपूर्ण बातों को सुनते और उनका अनुमोदन करते गंगाजली को जब क्रोध आता, तो वह उसे अपने भाई पर उतारती। वह समझती थी कि वे अपनी स्‍त्री को बढ़ावा देकर मेरी दुर्गति करा रहे हैं। ये अगर उसे डांट देते तो मजाल थी कि वह यों मेरे पीछे पड़ जाती? उमानाथ की जब अवसर मिलता, तो वह गंगाजली को एकांत में समझा दिया करते। किंतु एक तो जाह्नवी उन्‍हें ऐसे अवसर मिलने ही न देती, दूसरे गंगाजली को भी उनकी सहानुभूति पर विश्‍वास न आता।

इस प्रकार एक वर्ष बीत गया। गंगाजली चिंता, शोक और निराशा से बीमार पड़ गई। उसे बुखार आने लगा। उमानाथ ने पहले तो साधारण औषधियों सेवन कराई, लेकिन जब कुछ लाभ न हुआ, तो उन्‍हें चिंता हुई। एक रोज उनकी स्‍त्री किसी पड़ोसी के घर गई हुई थी, उमानाथ बहन के कमरे में गए। वह बेसुध पड़ी हुई थी, बिछावन चिथड़ा हो रहा था, साड़ी फटकर तार-तार हो गई थी। शान्‍ता उसके पास बैठी पंखा झल रही थी। यह करुणाजनक दृश्‍य देखकर उमानाथ रो पड़े। यही बहन है, जिसकी सेवा के लिए दो दासियां लगी हुई थीं,आज उसकी यह दशा हो रही है। उन्‍हें अपनी दुर्बलता पर अत्‍यंत ग्‍लानि उत्‍पन्‍न हुई। गंगाजली के सिरहाने बैठकर रोते हुए बोले-बहन,यहाँ लाकर मैंने तुम्‍हे बड़ा कष्‍ट दिया है। नहीं जानता था कि उसका यह परिणाम होगा। मैं आज किसी वैद्य को ले आता हूँ। ईश्‍वर चाहेंगे तो तुम शीघ्र ही अच्‍छी हो जाओगी।

इतने में जाह्नवी भी आ गई, ये बातें उसके कान में पड़ी। बोली-हां-हां, दौड़ो, वैद्य को बुलाओ, नहीं तो अनर्थ हो जाएगा। अभी पिछले दिनों मुझे महीनों ज्‍वर आता रहा, तब वैद्य के पास न दौड़े। मैं भी ओढ़कर पड़ रहती, तो तुम्‍हें मालूम होता कि इसे कुछ हुआ है, लेकिन मैं कैसे पड़ रहती? घर की चक्‍की कौन पीसता? मेरे कर्म में क्‍या सुख भोगना बदा है?

उमानाथ का उत्‍साह शांत हो गया। वैद्य को बुलाने की हिम्‍मत न पड़ी। वे जानते थे कि वैद्य बुलाया, तो गंगाजली को जो दो-चार महीने जीने हैं, वह भी न जी सकेगी।

गंगाजली की अवस्‍था दिनोंदिन बिगड़ने लगी। यहाँ तक कि उसे ज्‍वरतिसार हो गया। जीने की आशा न रही। जिस उदर में सागू के पचाने की भी शक्ति न थी, वह जौ की रोटियां कैसे पचाता? निदान उसका जर्जर शरीर इन कष्‍टों को और अधिक न सह सका। छ:मास बीमार रहकर वह दुखिया अकाल मृत्‍यु का ग्रास बन गई।

शान्ता का अब इस संसार में कोई न था। सुमन के पास उसने दो पत्र लिखे, लेकिन वहाँ से कोई जवाब न गया। शान्‍ता ने समझा, बहन ने भी नाता तोड़ लिया। विपत्ति में कौन साथी होता है? जब तक गंगाजली जीती थी, शान्ता उसके अंचल में मुँह छिपाकर रो लिया करती थी। अब यह अवलंब भी न रहा। अंधे के हाथ में लकड़ी जाती रही। शान्‍ता जब-तब अपनी कोठरी के कोने में मुँह छिपाकर रोती; लेकिन घर के कोने और माता के अंचल में बड़ा अंतर है। एक शीतल जल का सागर है, दूसरा मरूभूमि।

शान्‍ता को अब शांति नहीं मिलती। उसका ह्रदय अग्नि के सदृश्‍य दहकता रहता है, वह अपनी मामी और मामा को अपनी माता का घातक समझती है। जब गंगाजली जीती थी, तब शान्‍ता उसे कटु वाक्‍यों से बचाने के लिए यत्‍न करती रहती थी, वह अपनी मामी के इशारों पर दौड़ती थी, जिससे वह माता को कुछ न कह बैठे। एक बार गंगाजली के हाथ से घी की हांडी गिर पड़ी थी। शान्‍ता ने मामी से कहा था, यह मेरे हाथ से छूट पड़ी। इस पर उसने खूब गालियां खाई। वह जानती थी कि माता का ह्रदय व्‍यंग्‍य की चोटें नहीं सह सकता।

लेकिन अब शान्‍ता को इसका भय नहीं है। वह निराधार होकर बलवती हो गई है। अब वह उतनी सहनशील नहीं है ; उसे जल्‍द क्रोध आ जाता है। वह जली-कटी बातों का बहुधा उत्तर भी दे देती है। उसने अपने ह्रदय को कड़ी-से-कड़ी यंत्रणा के लिए तैयार कर लिया है। मामा से वह दबती है, लेकिन मामी से नहीं दबती और ममेरी बहनों को तो वह तुरकी-बतुरकी जवाब देती है। अब शान्‍ता वह गाय है जो हत्‍या-भय के बल पर दूसरे का खेत चरती है।

इस तरह एक वर्ष और बीत गया, उमानाथ ने बहुत दौड़-धूप की कि उसका विवाह कर दूं, लेकिन जैसा सस्ता सौदा वह करना चाहते थे, वह कहीं ठीक न हुआ। उन्‍होंने थाने-तहसील में जोड़-तोड़कर लगाकर दो सौ रुपये का चंदा कर लिया था। मगर इतने सस्‍ते वर कहां? जाह्नवी का वश चलता, तो वह शान्‍ता को किसी भिखारी के यहाँ बांधकर अपना‍ पिंड छुड़ा लेती, लेकिन उमानाथ ने अबकी पहली बार उसका विरोध किया और सुयोग्‍य वर ढूंढ़ते रहे। गंगाजली के बलिदान ने उनकी आत्‍मा को बलवान बना दिया।

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शोध एवं शोध-पत्रों के लिए अकादमिक संदर्भ

Premchand, Munshi. "सेवासदन." *Munshi Premchand Digital Archive*, 1918, https://munshipremchand.com/works/novels/sevasadan. Accessed 22 Sep. 2026.