मुंशी प्रेमचंद की कालजयी कहानियाँ (भाग-3)
मुंशी प्रेमचंद की प्रसिद्ध कहानी श्रृंखला ‘मानसरोवर भाग-3’ में संकलित कुल 32 अमर रचनाएँ। ऑनलाइन निःशुल्क पढ़ें।
Aadhar
प्रेमचंद की 'आधार' विधवा-जीवन, सामाजिक प्रतिष्ठा और स्त्री के सुरक्षित तथा सम्मानजनक जीवन की आवश्यकता पर केंद्रित कहानी है। एक युवा विधवा के सामने सामाजिक रूढ़ियाँ और उसके मानवीय जीवन की स्वाभाविक आवश्यकताएँ आमने-सामने खड़ी हो जाती हैं।
Babaji Ka Bhog
प्रेमचंद की 'बाबाजी का भोग' धार्मिक आडंबर, अंधविश्वास और गरीब ग्रामीण परिवारों के शोषण पर तीखा व्यंग्य है। रामधन अहीर और उसकी पत्नी के घर में अनाज का लगभग कोई भंडार नहीं बचा है। महाजन और जमींदार के प्यादे उनकी उपज का बड़ा हिस्सा ले चुके हैं। ऐसे समय में एक साधु उनके द्वार पर आकर साधु-सेवा के नाम पर भोजन माँगता है। रामधन और उसकी पत्नी अपने घर के लिए बचाकर रखा थोड़ा-सा आटा, दाल, ईंधन, आलू और अंत में घी तक उसे दे देते हैं। साधु विधि-विधान से भोग तैयार करता है, स्वयं पेट भरकर खाता है और वहीं आराम से सो जाता है, जबकि रामधन का घर भूखा रह जाता है। प्रेमचंद दिखाते हैं कि धार्मिक श्रद्धा जब विवेकहीन सामाजिक दबाव में बदल जाती है, तब वह गरीबों की सहायता करने के बजाय उनके सीमित संसाधनों के शोषण का माध्यम बन सकती है।
Bhade Ka Tattoo
प्रेमचंद की 'भाड़े का टट्टू' आदर्श और स्वार्थ, मित्रता और विश्वासघात तथा औपनिवेशिक सत्ता के दबाव में व्यक्ति की नैतिक परीक्षा की कहानी है। यशवंत और रमेश बचपन से मित्र हैं, लेकिन धन और जीवन-मूल्यों के विषय में दोनों की सोच अलग है। यशवंत आदर्शवादी होने का दावा करता है, जबकि रमेश खुलकर मानता है कि मनुष्य के लिए स्वार्थ का त्याग कठिन है। समय के साथ यशवंत मेहनत करके औपनिवेशिक न्याय-व्यवस्था में जिला-जज बन जाता है और रमेश निर्भीक राजनीतिक कार्यकर्ता तथा क्रांतिकारी बन जाता है। जब रमेश पर डकैती और हत्या का झूठा मुकदमा चलता है, यशवंत उसे निर्दोष जानते हुए भी अपनी नौकरी और प्रतिष्ठा के भय से उसके पक्ष में गवाही नहीं देता और उसे सात वर्ष की सजा सुना देता है। बाद में रमेश फिर पकड़ा जाता है। इस बार उसकी पत्नी यशवंत को भारी फीस और पचास हजार रुपये के इनाम का प्रस्ताव देती है। धन के लालच में यशवंत मुकदमा लड़ता है और रमेश को निर्दोष सिद्ध कर देता है। लेकिन रमेश उसके प्रति कृतज्ञ नहीं होता। वह कहता है कि यशवंत ने इस बार मित्रता या साहस से नहीं, बल्कि स्वार्थ से काम किया है। 'भाड़े का टट्टू' इस प्रकार केवल एक व्यक्ति का उपहास नहीं बल्कि उस नैतिक पतन का प्रतीक बन जाता है जिसमें सिद्धांत धन के सामने झुक जाते हैं।
Dand
प्रेमचंद की 'दण्ड' रिश्वत, जातिगत बहिष्कार और सामुदायिक दंड की विडंबना पर तीखा व्यंग्य है। मिस्टर सिन्हा एक सम्मानित जज हैं जो अपने न्यायप्रिय और कानूननिष्ठ होने की छवि बनाए रखते हैं, लेकिन जगत पांडे से रिश्वत लेते हैं। मुकदमा हार जाने के बाद जगत पांडे उनके बंगले के सामने अनशन करके बैठ जाता है और अपनी मृत्यु के माध्यम से सिन्हा के भ्रष्टाचार को सार्वजनिक करने की धमकी देता है। अंततः सिन्हा पाँच हजार रुपये देने को तैयार होते हैं, लेकिन रकम हाथ में आते ही जगत पांडे गिरकर मर जाता है। इसके बाद बिरादरी और समाज सिन्हा का बहिष्कार कर देते हैं। सबसे बड़ा संकट तब आता है जब उनकी बेटी त्रिवेणी विवाह योग्य होती है और कोई भी परिवार बहिष्कृत सिन्हा के घर से संबंध स्वीकार नहीं करता। प्रेमचंद इस स्थिति के माध्यम से प्रश्न उठाते हैं कि अपराध यदि पिता ने किया है तो उसकी सजा निर्दोष बेटी को क्यों मिले?
Decree Ke Rupaye
प्रेमचंद की 'डिक्री के रुपये' मित्रता, रिश्वत, औपनिवेशिक शासन, पत्रकारिता और व्यक्तिगत निष्ठा तथा सार्वजनिक कर्तव्य के बीच के संघर्ष की कहानी है। मिर्जा नईम को विष्णुपुर रियासत के मैनेजर की हत्या की जाँच सौंपी जाती है। रियासत की ओर से उसे उपहार और बीस हजार रुपये का प्रलोभन मिलता है और वह ऐसी रिपोर्ट तैयार करता है जिससे युवा कुँवर साहब हत्या के संदेह से बच जाएँ। उसका पुराना मित्र कैलास सब कुछ जानता है, क्योंकि नईम ने उससे अपने निर्णय की पूरी बात कही थी। कैलास लंबे समय तक इस धर्म-संकट में रहता है कि मित्रता निभाए या अपने पत्रकार और सार्वजनिक कर्तव्य का पालन करे। अंततः वह सत्य प्रकाशित करता है। नईम उसके विरुद्ध मानहानि का मुकदमा करता है, अदालत में सब कुछ नकार देता है और कैलास पर बीस हजार रुपये की डिक्री हो जाती है। कैलास की संपत्ति नीलाम होने और उसका अखबार बंद होने की नौबत आ जाती है। लेकिन अंत में नईम स्वयं उसके पास लौटता है और दोनों की मित्रता एक जटिल नैतिक रूप में सामने आती है—जहाँ एक मित्र सार्वजनिक रूप से दूसरे के विरुद्ध खड़ा होता है, फिर भी निजी रूप से उसे विनाश से बचाने का प्रयास करता है।
Dhikkar
प्रेमचंद की 'धिक्कार' देशभक्ति, राष्ट्रहित और निजी स्वार्थ के बीच संघर्ष की तीखी राजनीतिक कहानी है। ईरान और यूनान के युद्ध के दौरान यूनान की जनता को डेल्फी की पुजारिन बताती है कि देश की पराजय का कारण कोई देशद्रोही है। वह देशद्रोही पासोनियस निकलता है, जो धन और विलास के लोभ में यूनानी सैन्य योजनाएँ ईरानियों को बताता है। पकड़े जाने के बाद उसे देवी के मंदिर में बंद कर दिया जाता है। कठोर यातना के बाद वह पश्चात्ताप का अभिनय करते हुए जनता की सहानुभूति प्राप्त कर लेता है और लोग उसे छोड़ने को तैयार हो जाते हैं। लेकिन उसकी माँ समझ जाती है कि वह फिर देश के साथ विश्वासघात कर सकता है। वह मातृ-स्नेह को राष्ट्रहित से ऊपर नहीं रखती और स्वयं मंदिर का द्वार बंद करवाकर अपने पुत्र को भीतर कैद रहने देती है। कहानी का केंद्रीय संदेश है कि देशहित के सामने निजी मोह और स्वार्थ का स्थान नहीं होना चाहिए।
Diksha
प्रेमचंद की 'दीक्षा' नशे की लत, आत्म-छल, सिद्धांतों से समझौते और औपनिवेशिक अपमान पर तीखा व्यंग्य है। कहानी का अनाम कथावाचक किशोरावस्था में नशानिवारणी सभा का उत्साही सदस्य बनता है और जीवन भर शराब न पीने की प्रतिज्ञा करता है। लेकिन कॉलेज, मित्रों का दबाव, पेशेगत तनाव और स्वयं को दिए गए तर्क धीरे-धीरे उसकी प्रतिज्ञा को कमजोर कर देते हैं। होली के दिन वह जानबूझकर शराब पीने की अपनी 'दीक्षा' की तैयारी करता है और मित्रों के दबाव में पहली बार पीता है। शीघ्र ही शराब मनोरंजन की वस्तु न रहकर उसके जीवन की आवश्यकता बन जाती है। एक बरसाती रात मुकदमे के सिलसिले में बाहर फँसे होने पर उसकी तलब इतनी बढ़ जाती है कि वह एक अंग्रेज अधिकारी के खानसामा से चोरी-छिपे शराब खरीदता है। चोरी पकड़ी जाती है और अंग्रेज साहब उसे सार्वजनिक रूप से अपमानित करते हुए उसके मुँह पर कालिख पोत देते हैं और लोगों के सामने दौड़ाते हैं। यही अपमान उसके लिए वह निर्णायक अनुभव बन जाता है जो उसके सभी पुराने तर्कों और प्रतिज्ञाओं से अधिक प्रभावी सिद्ध होता है। वह शराब पूरी तरह छोड़ देता है और पाँच वर्षों तक उसे हाथ नहीं लगाता। प्रेमचंद हास्य और आत्मव्यंग्य के माध्यम से दिखाते हैं कि मनुष्य अपने सिद्धांतों से गिरते समय किस प्रकार स्वयं को तर्क देकर धोखा देता है, साथ ही औपनिवेशिक सत्ता की नस्लीय और प्रशासनिक निरंकुशता को भी उजागर करते हैं।
Guru Mantra
प्रेमचंद की 'गुरु-मंत्र' धार्मिक पाखंड और बनावटी साधु-संस्कृति पर केंद्रित एक संक्षिप्त व्यंग्य-कथा है। घर के झगड़ों और निमंत्रणों की कमी से परेशान पंडित चिंतामणि अचानक वैराग्य ग्रहण कर साधु बनने का निश्चय करते हैं। उनके मित्र पंडित मोटेराम शास्त्री उन्हें साधु बनने की व्यावहारिक कला सिखाते हैं—कैसे दान माँगना है, गृहस्थों को किस प्रकार संबोधित करना है और कैसी टेढ़ी-मेढ़ी भाषा बोलनी है। लेकिन चिंतामणि को शीघ्र ही पता चलता है कि साधु का वेश धारण करना और वास्तव में साधु-संस्कृति के आचरण निभाना अलग बातें हैं। गांजा पीने वाले साधुओं के बीच उनकी चिलम न पी पाने की असमर्थता उनकी पोल खोल देती है। प्रेमचंद हास्य और व्यंग्य के माध्यम से वास्तविक आध्यात्मिकता और धार्मिक प्रदर्शन के बीच का अंतर उजागर करते हैं।
Ek Aanch Ki Kasar
प्रेमचंद की 'एक आँच की कसर' सामाजिक और राजनीतिक पाखंड पर तीखा व्यंग्य है। महाशय यशोदानंद समाज-सेवी, शिक्षित और दहेज-प्रथा के विरोधी नेता के रूप में प्रसिद्ध हैं। अपने बेटे के विवाह में वे सार्वजनिक रूप से दहेज की निंदा करते हैं और अपने छोटे बेटे से भी दहेज-विरोधी भाषण दिलवाते हैं। लेकिन पर्दे के पीछे उन्होंने वधू-पक्ष से भारी दहेज लेने का सौदा कर रखा है। उनकी बनाई हुई प्रतिष्ठा उस समय ध्वस्त हो जाती है जब उनका छोटा बेटा अनजाने में वधू-पक्ष का वह पत्र पढ़ देता है जिसमें पच्चीस हजार रुपये के दहेज को घटाकर बीस हजार करने का अनुरोध किया गया है। कहानी सुधारवादी भाषण और निजी लालच के बीच के अंतर को उजागर करती है और दिखाती है कि सामाजिक प्रतिष्ठा स्वयं छल का साधन बन सकती है।
Laila
प्रेमचंद की 'लैला' प्रेम, जनसत्ता, राजसत्ता और त्याग को एक साथ रखने वाली राजनीतिक-रोमांटिक कहानी है। तेहरान में एक रहस्यमय गायिका के रूप में प्रकट होने वाली लैला अपने गीतों के माध्यम से गरीबों में आशा जगाती है, राजाओं के विलास पर प्रश्न उठाती है और प्रेम तथा न्याय पर आधारित समाज का स्वप्न दिखाती है। शाहजादा नादिर उसके प्रेम में पड़ जाता है और अंततः उससे विवाह करता है। नादिर के बादशाह बनने पर लैला मलका बनती है। उनका निजी दांपत्य आदर्श है, लेकिन राजनीति में दोनों की प्रवृत्तियाँ अलग हैं—नादिर राजसत्ता का प्रतिनिधि है और लैला प्रजासत्ता की। लैला राजमहल के खर्च घटाकर जनता के हित में धन लगाती है और अन्न पर लगने वाला कर कम करवाती है, लेकिन अंततः वही जनता उसके विरुद्ध विद्रोह कर देती है। जब नादिर विद्रोह को सेना के बल से कुचलना चाहता है, लैला रक्तपात स्वीकार नहीं करती। वह अपने प्रेम को सत्ता और हिंसा का कारण बनने देने के बजाय नादिर को छोड़कर चली जाती है। कहानी प्रेम और सिद्धांत के बीच उस अंतिम त्याग को सामने रखती है जिसमें व्यक्ति अपने प्रिय को बचाने के लिए स्वयं उसके जीवन से दूर हो जाता है।
Kshama
प्रेमचंद की 'क्षमा' धार्मिक वैमनस्य, प्रतिशोध और मानवीय करुणा के बीच संघर्ष की ऐतिहासिक कहानी है। मुस्लिम शासन वाले स्पेन में ईसाई नेता दाऊद अपने देश की स्वतंत्रता और अपने समुदाय की रक्षा के लिए संघर्ष कर रहा है। एक बहस के बाद उसका मुसलमान युवक जमाल से संघर्ष होता है और जमाल मारा जाता है। दाऊद जान बचाकर भागता है और अंततः शेख हसन के घर शरण लेता है। उसे पता चलता है कि शेख हसन उसी जमाल का पिता है जिसे उसने मारा है। हसन के भीतर पुत्र-वियोग का असहनीय दुःख और शरणागत की रक्षा करने का धार्मिक कर्तव्य आमने-सामने आ जाते हैं। अंततः वह बदले के बजाय क्षमा को चुनता है और दाऊद को सुरक्षित भाग जाने देता है। इस अनुभव से दाऊद की मुसलमानों और इस्लाम के प्रति दृष्टि बदल जाती है। प्रेमचंद इस कहानी के माध्यम से धर्म और धर्म के नाम पर किए जाने वाले अत्याचार में अंतर करते हैं तथा दिखाते हैं कि क्षमा सामुदायिक प्रतिशोध की श्रृंखला को तोड़ सकती है।
Kaushal
प्रेमचंद की 'कौशल' दांपत्य जीवन में संदेह, ईर्ष्या, स्वामित्व-बोध और बुद्धि के खेल की कहानी है। कमलाप्रसाद को संदेह है कि उसकी पत्नी सुमन किसी दूसरे पुरुष की ओर आकर्षित है। वह सीधे बात करने के बजाय उसकी निष्ठा की परीक्षा लेने के लिए एक चाल चलता है। सुमन उसकी चाल को समझ जाती है और अपनी बुद्धि से उसी खेल को उसके विरुद्ध मोड़ देती है। प्रेमचंद दिखाते हैं कि प्रेम में विश्वास के स्थान पर संदेह और परीक्षा आ जाए तो संबंध भीतर से कमजोर होने लगते हैं। साथ ही कहानी स्त्री की बुद्धि, आत्मसम्मान और भावनात्मक समझ को पुरुष के अधिकार-बोध के सामने रखती है।
Mata Ka Hriday
प्रेमचंद की 'माता का हृदय' एक माँ के प्रतिशोध से करुणा की ओर हुए नैतिक परिवर्तन की अत्यंत मार्मिक कहानी है। निर्धन विधवा माधवी का इकलौता बेटा आत्मानंद झूठी गवाहियों और राजनीतिक दमन से जुड़े मुकदमे में आठ वर्ष के कठोर कारावास की सजा पाता है। माधवी पुलिस अधिकारी मिस्टर बागची को अपने बेटे की दुर्दशा के लिए जिम्मेदार मानकर उनसे बदला लेने का निश्चय करती है। वह मजदूरनी का वेश बनाकर उनके घर में नौकरी कर लेती है। लेकिन बागची के छोटे बच्चे को माधवी से गहरा लगाव हो जाता है। जब बच्चा गंभीर रूप से बीमार पड़ता है, तो माधवी अपना प्रतिशोध भूलकर पूरी निष्ठा से उसकी सेवा करती है। परिवार उसे बच्चे की वास्तविक माँ के समान मानने लगता है। बच्चे की अचानक मृत्यु के बाद माधवी का दुःख उसके पुराने प्रतिशोध से भी अधिक गहरा हो जाता है। प्रेमचंद दिखाते हैं कि मातृत्व की करुणा व्यक्तिगत चोट, सामाजिक अन्याय और प्रतिशोध की भावना से भी अधिक शक्तिशाली हो सकती है।
Narak Ka Marg
प्रेमचंद की 'नरक का मार्ग' एक ऐसी युवती की प्रथम-पुरुष आत्मकथात्मक कथा है जिसका विवाह उससे बहुत अधिक उम्र के, संदेहशील और अधिकारवादी पुरुष से कर दिया जाता है। विवाह उसे प्रेम, सहचर्य और मानसिक सुख देने के बजाय कैद जैसा अनुभव होता है। वह अपनी सहेली सुशीला के सुखी दांपत्य को देखकर उस प्रेम और आत्मीयता के लिए तरसती रहती है जो उसे अपने विवाह में कभी नहीं मिली। पति की मृत्यु के बाद उसकी यह आकांक्षा और तीव्र हो जाती है। एक वृद्धा उसे प्रेम पाने का आश्वासन देकर अपने साथ ले जाती है, लेकिन वह रास्ता अंततः उसे शोषण और सामाजिक पतन की ओर ले जाता है। कहानी के अंत में नायिका अपने पतन की जिम्मेदारी केवल स्वयं पर नहीं रखती, बल्कि उन माता-पिता और सामाजिक परंपराओं को भी दोष देती है जो लड़कियों का विवाह धन, संपत्ति और सामाजिक प्रतिष्ठा देखकर असमान वरों से कर देते हैं।
Mukti Marg
प्रेमचंद की 'मुक्ति-मार्ग' ग्रामीण जीवन, अहंकार, ईर्ष्या और प्रतिशोध की विनाशकारी शक्ति की कहानी है। किसान झींगुर और गड़ेरिया बुद्धू के बीच एक मामूली खेत-विवाद से दुश्मनी शुरू होती है। झींगुर के अहंकार और क्रोध के कारण बुद्धू उसकी ऊख की फसल जला देता है। बदला लेने के लिए झींगुर हरिहर की सहायता से बुद्धू की बछिया को मरवा देता है और उस पर गोहत्या का आरोप लगवाकर कठोर प्रायश्चित का दंड दिलवाता है। इस दंड से बुद्धू की आर्थिक स्थिति नष्ट हो जाती है और दोनों अंततः मजदूर बन जाते हैं। निर्माण-स्थल पर फिर मिलने के बाद दोनों एक-दूसरे के सामने अपने अपराध स्वीकार करते हैं। उसी क्षण उनके भीतर का बैर समाप्त होता है। कहानी बताती है कि वास्तविक मुक्ति दूसरे को नष्ट करने में नहीं, बल्कि प्रतिशोध और अहंकार से मुक्त होने में है।
Muktidhan
प्रेमचंद की 'मुक्तिधन' ग्रामीण गरीबी, कर्ज, महाजनी व्यवस्था और हिंदू-मुस्लिम सौहार्द की अत्यंत मार्मिक कहानी है। गरीब मुसलमान किसान रहमान अपनी प्रिय गाय को इसलिए बेचने को मजबूर होता है क्योंकि उसे जमींदार के लगान संबंधी मुकदमे के लिए रुपये चाहिए। वह गाय को कसाइयों के हाथ जाने से बचाने के लिए दाऊदयाल को पाँच रुपये कम में बेच देता है। बाद में वह अपनी बूढ़ी माँ को हज कराने, उसकी बीमारी और मृत्यु से जुड़े खर्चों के लिए उसी महाजन से बार-बार कर्ज लेता है। फसल की बर्बादी और अंततः खेत में लगी आग उसके लिए कर्ज चुकाना असंभव बना देती है। फिर भी रहमान अपने कर्ज से भागना नहीं चाहता और दाऊदयाल से कहता है कि वह मेहनत-मजदूरी करके जीवन भर उनका पैसा चुकाएगा। दाऊदयाल को रहमान की पुरानी शराफत याद आती है। उन्हें एहसास होता है कि गाय ने अब तक उन्हें कर्ज से कहीं अधिक मूल्य का दूध और दो बछड़े दिए हैं। वे पूरा कर्ज माफ कर देते हैं और कहते हैं कि रहमान उनका कर्जदार नहीं, बल्कि मित्र है। कहानी आर्थिक लेन-देन को नैतिक संबंध में बदल देती है और करुणा, कृतज्ञता तथा हिंदू-मुस्लिम सौहार्द को वास्तविक 'धन' के रूप में प्रस्तुत करती है।
Nairashya
प्रेमचंद की 'नैराश्य' पुत्र-प्राथमिकता, वैवाहिक क्रूरता और स्त्री पर सामाजिक दबाव की मार्मिक त्रासदी है। निरुपमा की तीन बेटियाँ हैं और उसका पति घमंडीलाल तथा उसका परिवार पुत्र न होने के कारण उसे अभागिनी समझते हैं। पति का प्रेम समाप्त हो जाता है, वह घर छोड़ने की धमकी देता है और निरुपमा को ऐसी बात के लिए दोषी ठहराता है जिस पर उसका कोई नियंत्रण नहीं। निराश होकर निरुपमा की भाभी एक कथित महात्मा की कहानी गढ़ती है जो पुत्र का आशीर्वाद देने का दावा करता है। निरुपमा इस छल का सहारा लेकर घर लौटती है और कुछ समय बाद गर्भवती होने पर परिवार का व्यवहार पूरी तरह बदल जाता है। परिवार को विश्वास है कि अब पुत्र ही होगा। निरुपमा को स्वयं पता है कि गर्भ में फिर बेटी है, लेकिन वह अपने साथ होने वाले व्यवहार को कुछ समय तक बनाए रखने के लिए गर्भावस्था के शुभ लक्षणों का अभिनय करती है। प्रसव के समय जब फिर बेटी जन्म लेती है तो परिवार का सारा उत्साह शोक और क्रोध में बदल जाता है। उसी समय निरुपमा की मृत्यु हो जाती है। प्रेमचंद दिखाते हैं कि जिस समाज में स्त्री का सम्मान उसके मातृत्व के साथ-साथ बच्चे के लिंग पर निर्भर कर दिया जाए, वहाँ निराशा केवल मानसिक अवस्था नहीं रहती बल्कि जीवन-विनाशक सामाजिक शक्ति बन जाती है।
Nirvasan
प्रेमचंद की 'निर्वासन' स्त्री की गरिमा, पितृसत्तात्मक नैतिकता और वैवाहिक विश्वास पर तीखा प्रश्न उठाने वाली कहानी है। धार्मिक मेले में भीड़ के कारण मर्यादा अपने पति परशुराम से बिछड़ जाती है और खोई हुई स्त्रियों के शिविर में पहुँचती है। घर लौटने की बेचैनी में वह एक ऐसे व्यक्ति के छल का शिकार होती है जो उसके पति को जानने का झूठा दावा करके उसे एक गलत स्थान पर ले जाता है। मर्यादा अपनी पवित्रता की रक्षा करते हुए वहाँ से भाग निकलती है और अंततः घर लौटती है। लेकिन परशुराम उसकी बात पर विश्वास नहीं करता। उसके लिए केवल यह तथ्य पर्याप्त है कि मर्यादा कई दिनों तक घर से बाहर रही और दूसरे पुरुषों की निगाहों तथा संगति के बीच रही। मर्यादा के साथ हुए अपराध का दोषी होने के बजाय वही संदेह और सामाजिक 'मर्यादा' के नाम पर उसे घर से निकाल देता है। कहानी दिखाती है कि पितृसत्तात्मक समाज में स्त्री की गरिमा को अक्सर उसके अपने चरित्र और अनुभव से नहीं, बल्कि पुरुष की दृष्टि और संदेह से आँका जाता है।
Nairashya Leela
प्रेमचंद की 'नैराश्य लीला' बाल-विधवा के जीवन पर सामाजिक नियंत्रण और स्त्री की स्वतंत्रता की मार्मिक कहानी है। कैलासकुमारी का विवाह तेरह वर्ष की उम्र में हो जाता है और गौना होने से पहले ही वह विधवा हो जाती है। उसे अभी विवाह का अर्थ भी समझ में नहीं आया है, इसलिए माता-पिता के विपरीत वह पति की मृत्यु को वैसा शोक नहीं मानती जैसा समाज उससे अपेक्षा करता है। माता-पिता पहले उसका मन बहलाने के लिए थिएटर, संगीत, सैर और मनोरंजन की व्यवस्था करते हैं, लेकिन पड़ोस और बिरादरी विधवा के लिए ऐसे जीवन को अनुचित मानकर परिवार पर दबाव डालते हैं। इसके बाद कैलासकुमारी धार्मिक जीवन की ओर मुड़ती है और संन्यास लेना चाहती है। पिता उसे सेवा और शिक्षा के मार्ग पर ले आते हैं और वह बालिकाओं के लिए पाठशाला चलाने लगती है। लेकिन एक बीमार बालिका की सेवा करने और उसके घर कई दिन रहने पर समाज फिर उसके चरित्र पर प्रश्न उठाता है और पाठशाला बंद करनी पड़ती है। तब कैलासकुमारी खुलकर कहती है कि वह स्वयं को अभागिनी नहीं मानती और अपने आत्मसम्मान की रक्षा स्वयं कर सकती है। वह विधवा को जीवित रहते हुए सामाजिक मृत्यु स्वीकार करने से इंकार करती है। कहानी का अंत उसकी स्वतंत्रता की आकांक्षा और समाज की असहिष्णुता के बीच एक अत्यंत त्रासद टकराव पर होता है।
Pariksha
प्रेमचंद की 'परीक्षा' व्यक्ति के वास्तविक चरित्र को उसकी डिग्री, पद या बाहरी व्यवहार के बजाय उसके कर्मों से परखने वाली कहानी है। देवगढ़ रियासत के वृद्ध दीवान सरदार सुजानसिंह चालीस वर्ष की सेवा के बाद अवकाश लेना चाहते हैं। राजा उनसे नया दीवान चुनने को कहते हैं। सुजानसिंह ऐसी परीक्षा रखते हैं जिसमें उम्मीदवारों की डिग्री से अधिक उनके आचरण, कर्तव्य-बोध और चरित्र को देखा जाना है। उम्मीदवार एक महीने तक अपने व्यवहार को कृत्रिम रूप से अच्छा दिखाने का प्रयास करते हैं। वास्तविक परीक्षा तब होती है जब एक गरीब किसान की अनाज से भरी गाड़ी कीचड़ में फँस जाती है। अधिकांश उम्मीदवार उसकी सहायता किए बिना निकल जाते हैं, लेकिन हॉकी खेल में घायल होने के बावजूद पंडित जानकीनाथ किसान की सहायता करते हैं और गाड़ी को बाहर निकाल देते हैं। सुजानसिंह इस घटना को छिपकर देख रहे थे। वे जानकीनाथ को नया दीवान चुनते हैं क्योंकि उनके कार्य में दया, साहस, आत्मबल और उदारता का वास्तविक प्रमाण मिलता है। कहानी का संदेश है कि शिक्षा और बाहरी शिष्टाचार से अधिक महत्वपूर्ण मनुष्य का चरित्र और कठिन परिस्थिति में किया गया निःस्वार्थ कर्म है।
Manushya Ka Param Dharma
प्रेमचंद की 'मनुष्य का परम धर्म' धार्मिक पाखंड, रूढ़िवादिता और स्वार्थ के लिए धर्म के दुरुपयोग पर तीखा हास्य-व्यंग्य है। होली के दिन पंडित मोटेराम शास्त्री और उनके मित्र चिंतामणि इस बात से परेशान हैं कि कहीं से दावत का निमंत्रण नहीं आया। वे गंगा तट पर पहुँचकर अपनी भूख को धर्मोपदेश का रूप देते हैं। मोटेराम शास्त्रों की मनमानी व्याख्या करते हुए सिद्ध करते हैं कि चूँकि ब्राह्मण ब्रह्मा के मुख से निकले हैं, इसलिए मुख को सुख देना मनुष्य का परम धर्म है और ब्राह्मणों को उत्तम-से-उत्तम मिठाइयाँ खिलाना सबसे बड़ा धार्मिक कर्तव्य है। उनका पूरा तर्क वास्तव में मुफ्त भोजन प्राप्त करने का साधन है। जब चिंतामणि भी मिठाइयों की श्रेष्ठता को लेकर अपना अलग 'शास्त्रोक्त' सिद्धांत पेश करता है, तो दोनों पाखंडी धर्माचार्य तर्क-वितर्क से आगे बढ़कर हास्यास्पद शारीरिक झगड़े में उतर आते हैं। प्रेमचंद इस हास्य के माध्यम से सच्चे धर्म और स्वार्थपूर्ण धार्मिक प्रदर्शन के बीच का अंतर उजागर करते हैं।
Stree Aur Purush
प्रेमचंद की 'स्त्री और पुरुष' बाहरी सौंदर्य और आंतरिक सौंदर्य, आकर्षण और प्रेम, तथा दांपत्य में स्त्री की गरिमा पर केंद्रित मनोवैज्ञानिक कहानी है। कवि विपिन बाबू ने अपने मन में एक आदर्श सुंदर स्त्री की कल्पना कर रखी है। विवाह के बाद जब उन्हें पता चलता है कि उनकी पत्नी आशा उस कल्पित सौंदर्य के अनुरूप नहीं है, तो वे उससे घृणा करने लगते हैं और उसका अपमान करते हैं। वे घर से दूर रहने और विषय-भोग में डूबने लगते हैं। लेकिन जब विपिन को लकवा मार जाता है और उनका अपना चेहरा विकृत हो जाता है, तब आशा बिना किसी प्रतिशोध के उनकी सेवा करती है। उसके त्याग और प्रेम से विपिन को समझ आता है कि वास्तविक सौंदर्य शरीर में नहीं, आत्मा और चरित्र में है।
Saubhagya Ke Kode
प्रेमचंद की 'सौभाग्य के कोड़े' नथुवा नामक अनाथ बालक की कहानी है, जो जातिगत भेदभाव और गरीबी के कारण एक संपन्न घर में नौकर जैसा जीवन बिताता है। एक दिन वह घर की बेटी रत्ना के पलंग पर सो जाता है और इसके लिए राय भोलानाथ उसे बुरी तरह कोड़े मारकर घर से निकाल देते हैं। घर से निकाला जाना उसके जीवन का निर्णायक मोड़ बनता है। उसे उस्ताद घूरे के पास संगीत सीखने का अवसर मिलता है और उसकी असाधारण प्रतिभा उसे आगे चलकर प्रसिद्ध आचार्य नाथूराम बना देती है। वह ग्वालियर में शिक्षा पाता है, यूरोप जाकर पश्चिमी संगीत का अध्ययन करता है और अंतरराष्ट्रीय ख्याति अर्जित करके लखनऊ लौटता है। वहाँ उसे पता चलता है कि राय भोलानाथ जुए और सट्टे में अपनी संपत्ति गँवा चुके हैं। रत्ना अब शिक्षित युवती है और नाथूराम के संगीत से प्रभावित है। दोनों में प्रेम विकसित होता है और विवाह हो जाता है। नाथूराम को भय रहता है कि यदि उसकी जातिगत पहचान सामने आई तो रत्ना उससे घृणा करेगी, लेकिन रत्ना पहले से जानती है कि वही बचपन का नथुवा है और फिर भी उसे स्वीकार करती है। कहानी जातिगत अपमान, प्रतिभा के दमन, शिक्षा और अवसर की शक्ति तथा मानवीय संबंधों की जाति से परे संभावनाओं को सामने लाती है।
Shatranj Ke Khiladi
प्रेमचंद की 'शतरंज के खिलाड़ी' उनकी सबसे प्रसिद्ध राजनीतिक व्यंग्य-कथाओं में से एक है। 1856 के लखनऊ और अवध के अंग्रेजी अधिग्रहण की पृष्ठभूमि में लिखी गई यह कहानी दो सामंती जागीरदारों—मिर्जा सज्जाद अली और मीर रोशन अली—के शतरंज-प्रेम के माध्यम से उस वर्ग की राजनीतिक निष्क्रियता और सामाजिक पतन पर व्यंग्य करती है जो अपने कर्तव्य से विमुख होकर विलासिता में डूबा हुआ है। जब अंग्रेजी सेना अवध पर अधिकार कर रही है और वाजिद अली शाह का शासन समाप्त हो रहा है, दोनों मित्र वास्तविक राजनीतिक संकट से पूरी तरह उदासीन होकर शतरंज की बाजी में डूबे रहते हैं। शतरंज उनकी निजी लत ही नहीं बल्कि उस सामंती मानसिकता का प्रतीक बन जाती है जो वास्तविक सत्ता, स्वतंत्रता और सामाजिक उत्तरदायित्व के स्थान पर निजी मनोरंजन को प्राथमिकता देती है। कहानी का सबसे तीखा व्यंग्य तब सामने आता है जब ये दोनों वास्तविक राजनीतिक संघर्ष से बचते रहने वाले व्यक्ति शतरंज की एक चाल को लेकर एक-दूसरे पर तलवारें खींच लेते हैं।
Satyagrah
प्रेमचंद की 'सत्याग्रह' औपनिवेशिक शासन, राजनीतिक स्वार्थ और धार्मिक आडंबर पर तीखा व्यंग्य है। वायसराय के बनारस आगमन के समय कांग्रेस शहर में हड़ताल का आह्वान करती है। सरकारी अधिकारी और राजभक्त स्थानीय अभिजात वर्ग दुकानों को खुला रखने की हर कोशिश में असफल होते हैं। तब वे कांग्रेस के नैतिक बल की नकल करने के लिए पंडित मोटेराम शास्त्री को अनशन पर बैठाने की योजना बनाते हैं। मोटेराम धन और प्रतिष्ठा के लालच में इस 'सत्याग्रह' को स्वीकार कर लेते हैं, लेकिन उनका सबसे बड़ा शत्रु स्वयं उनका पेट बन जाता है। प्रेमचंद हास्य के माध्यम से दिखाते हैं कि धार्मिक आस्था और नैतिक बल का इस्तेमाल राजनीतिक स्वार्थ के लिए कैसे किया जा सकता है और नकली नैतिकता वास्तविक जन-आंदोलन की बराबरी नहीं कर सकती।
Swarg Ki Devi
प्रेमचंद की 'स्वर्ग की देवी' लीला के त्याग, धैर्य, बुद्धिमत्ता और दांपत्य-प्रेम की कहानी है। शिक्षित और स्वच्छताप्रिय परिवार में पली लीला का विवाह सीतासरन से होता है, जिसके घर की रूढ़ियाँ और अस्वच्छ जीवन-पद्धति उसके संस्कारों से बिल्कुल अलग हैं। विवाह के बाद उसके दो बच्चों की हैजे से मृत्यु हो जाती है। लीला शोक में डूब जाती है, जबकि सीतासरन धीरे-धीरे अपने दुख से बचने के लिए भोग-विलास, शराब और बुरे मित्रों की संगति में पड़ जाता है। लीला स्वयं टूट चुकी होने पर भी समझती है कि यदि वह पति को छोड़ देगी तो उसका जीवन नष्ट हो जाएगा। वह अपने शोक को पीछे रखकर अपनी बुद्धि, धैर्य और स्नेह से उसे फिर परिवार की ओर खींचती है। अंततः सीतासरन उसकी इस निःस्वार्थ शक्ति को पहचानता है और उसे 'स्वर्ग की देवी' कहता है।
Vishwas
प्रेमचंद की 'विश्वास' राजनीतिक चेतना, नैतिक विश्वास, प्रेम और आत्म-परिवर्तन की कहानी है। मिस जोशी बंबई के उच्चवर्गीय समाज की प्रभावशाली और आधुनिक विधवा है, जिसका संबंध गवर्नर मिस्टर जौहरी से है। दूसरी ओर आपटे गरीब, निर्भीक और जनपक्षधर राजनीतिक नेता हैं, जो अनाज पर लगाए गए कर और शासन की विलासिता के विरुद्ध जनता को संबोधित करते हैं। आपटे की गिरफ्तारी के बाद मिस्टर जौहरी मिस जोशी से उसे बदनाम और पराजित करने के लिए उसके विश्वास का लाभ उठाने को कहते हैं। लेकिन आपटे के घर जाकर उसके जीवन को जानने के बाद मिस जोशी का दृष्टिकोण पूरी तरह बदल जाता है। वह उसके निष्कपट चरित्र और त्याग से प्रभावित होकर अपने पुराने जीवन और सत्ता-सम्बंधों को चुनौती देती है।
Tentar
प्रेमचंद की 'तेंतर' अंधविश्वास, पुत्र-प्राथमिकता और कन्या-भेदभाव पर तीखा प्रहार करने वाली कहानी है। पंडित दामोदरदत्त के तीन बेटों के बाद एक बेटी जन्म लेती है। परिवार की वृद्ध दादी मानती है कि तीन बेटों के बाद जन्मी लड़की 'तेंतर' होती है और उसके जन्म से माता-पिता या स्वयं लड़की पर कोई बड़ा अनिष्ट आता है। यह अंधविश्वास धीरे-धीरे पूरे परिवार के व्यवहार को प्रभावित करता है। माँ बच्ची की उपेक्षा करती है और उसे शांत रखने के लिए अफीम तक देती है। बच्ची भूख और उपेक्षा से कमजोर होती जाती है। दामोदरदत्त एक रात उसकी दशा देखकर समझते हैं कि किसी कल्पित अनिष्ट के डर से एक निर्दोष शिशु को दंड देना अमानवीय है। वे उसे स्नेह देते हैं और उनके बेटे भी अपनी छोटी बहन से प्रेम करने लगते हैं। वे एक बकरी का दूध पिलाकर उसका पालन करने में मदद करते हैं और बच्ची स्वस्थ होने लगती है। लेकिन दादी का अंधविश्वास समाप्त नहीं होता। अंततः जब वह स्वयं बीमार पड़ती है तो वह अपनी बीमारी को भी तेंतर के अभिशाप का प्रमाण मानती है। प्रेमचंद दिखाते हैं कि अंधविश्वास केवल विचार की भूल नहीं है; वह परिवार के व्यवहार को बदलकर एक निर्दोष बच्चे के जीवन के लिए वास्तविक खतरा पैदा कर सकता है।
Uddhar
प्रेमचंद की 'उद्धार' सामाजिक सुधार और आत्म-त्याग की मार्मिक कहानी है। हजारीलाल क्षय रोग से पीड़ित है और डॉक्टर स्पष्ट चेतावनी देते हैं कि विवाह उसके जीवन को और छोटा कर देगा। इसके बावजूद उसके माता-पिता उसका विवाह अंबा से करने पर अड़े रहते हैं। हजारीलाल अपने परिवार को समझाने में असफल रहता है और विवाह के दिन घर से गायब हो जाता है, ताकि एक निर्दोष लड़की को अल्पायु में विधवा होने के लिए विवश न होना पड़े। बाद में अंबा को उसके त्याग का पता चलता है और वह उसे अपना उद्धारक और जीवनदाता मानती है। प्रेमचंद इस कथा के माध्यम से बाल-विवाह, अदूरदर्शी अभिभावकीय निर्णय और ऐसी विवाह-व्यवस्था की आलोचना करते हैं जिसमें लड़की के जीवन और भविष्य से अधिक परिवार की सामाजिक इच्छा को महत्व दिया जाता है।
Vinod
प्रेमचंद की 'विनोद' कॉलेज जीवन, प्रेम-आसक्ति, मित्रों की शरारत, पश्चिमी तौर-तरीकों की नकल और आत्मसम्मान पर आधारित हास्य-व्यंग्यात्मक कहानी है। पंडित चक्रधर एक गंभीर, धार्मिक और परंपरागत विद्यार्थी हैं। कॉलेज में नई आई लूसी के प्रति उनका आकर्षण उनके शरारती सहपाठियों नईम और गिरिधर सहाय की नजर से बच नहीं पाता। दोनों लूसी के नाम से नकली प्रेम-पत्र लिखकर चक्रधर को भेजते हैं। पत्रों को सच मानकर चक्रधर अपने कपड़े, बाल, भाषा और व्यवहार तक बदल डालते हैं। वे अंग्रेजी बोलने का अभ्यास करते हैं, खेलों में रुचि दिखाने की कोशिश करते हैं और लूसी को प्रभावित करने के लिए अपनी सामर्थ्य से अधिक खर्च करते हैं। अंततः मित्रों की शरारत इतनी बढ़ जाती है कि चक्रधर लूसी के सामने अपने प्रेम का इजहार करने पहुँच जाते हैं और उसे अपमानजनक परिणाम भुगतना पड़ता है। बाद में उन्हें पता चलता है कि पूरा प्रेम-प्रसंग उनके मित्रों की बनाई हुई चाल थी। कहानी हास्य के माध्यम से युवा मन की कल्पना, दिखावे, मित्र-दबाव और पश्चिमी आधुनिकता की सतही नकल पर व्यंग्य करती है।
Vajrapat
प्रेमचंद की 'वज्रपात' नादिरशाह के दिल्ली-विजय और मुगले-आजम हीरे के इर्द-गिर्द बुनी गई ऐतिहासिक कहानी है। दिल्ली में भयंकर कत्लेआम के बाद मुहम्मदशाह का वज़ीर अपनी काव्य-बुद्धि से नादिरशाह के क्रोध को शांत करता है। लेकिन शीघ्र ही नादिरशाह की लालसा मुगले-आजम नामक प्रसिद्ध हीरे पर केंद्रित हो जाती है, जिसके बारे में वह अलौकिक शक्तियों की कथाएँ सुन चुका है। मुहम्मदशाह हीरे को छिपा देता है और वज़ीर उसे पगड़ी में रखने की युक्ति बताता है। अंततः नादिरशाह संधि के अवसर पर पगड़ियों की अदला-बदली के बहाने हीरा प्राप्त कर लेता है। उसे लगता है कि यह रत्न उसकी विजय और भाग्य का प्रतीक है, लेकिन ईरान लौटने के बाद उसके पुत्र की अचानक हत्या हो जाती है। तब उसकी सारी विजय, संपत्ति और हीरे की लालसा अर्थहीन हो जाती है। अंत में वह हीरे को अपने मृत पुत्र के साथ दफना देता है।
Vichitra Holi
प्रेमचंद की 'विचित्र होली' औपनिवेशिक सत्ता, अंग्रेज़परस्ती और राष्ट्रीय चेतना के जागरण पर केंद्रित तीखा राजनीतिक व्यंग्य है। होली के दिन अंग्रेज़ कलेक्टर मिस्टर क्रास शिकार पर गए हुए हैं और उनके भारतीय नौकर उनके बंगले के भोजन-कक्ष में स्वतंत्र होकर होली मनाने लगते हैं। खानसामा शेख नूरअली घोषणा करता है कि अब वह गुलामी नहीं करेगा और सबको शराब, गीत और नृत्य के लिए बुलाता है। अंग्रेज़ों का सहयोगी सेठ उजागरमल यह समझकर इस उत्सव में शामिल हो जाता है कि साहब ने स्वयं इसकी अनुमति दी है। क्रास लौटता है तो नौकर उसे रंग और कालिख से रंग देते हैं और वह उन्हें कोड़े से पीटता है। उजागरमल भी अपमानित होकर भागता है। यह अनुभव उसके भीतर औपनिवेशिक सत्ता के प्रति गहरा मोहभंग पैदा करता है। वह सीधे कांग्रेस की सभा में पहुँचता है, जहाँ हिंदू-मुसलमान और विभिन्न सामाजिक समूह मिलकर होली मना रहे हैं। वहाँ वह सार्वजनिक रूप से अंग्रेज़ी सत्ता के सहयोग से तौबा करता है और अपना तन-मन-धन राष्ट्रीय आंदोलन को समर्पित करने की घोषणा करता है। प्रेमचंद होली के हास्य और उन्मुक्तता को राजनीतिक मुक्ति के रूपक में बदल देते हैं।
मानसरोवर भाग 3 मुंशी प्रेमचंद के सर्वश्रेष्ठ कथा-साहित्य का एक महत्वपूर्ण स्तम्भ है। इसमें संग्रहीत कहानियाँ सामाजिक यथार्थ, ग्रामीण जीवन की करुणा और मानवीय संवेदनाओं का सजीव वर्णन प्रस्तुत करती हैं। ऊपर दी गई सूची से आप भाग 3 की किसी भी कहानी को चुनकर उसका पूर्ण पाठ पढ़ सकते हैं।