मुंशी प्रेमचंद की कालजयी कहानियाँ (भाग-2)
मुंशी प्रेमचंद की प्रसिद्ध कहानी श्रृंखला ‘मानसरोवर भाग-2’ में संकलित कुल 26 अमर रचनाएँ। ऑनलाइन निःशुल्क पढ़ें।
Basi Bhat Mein Khuda Ka Sajha
प्रेमचंद की 'बासी भात में खुदा का साझा' गरीबी, आस्था, अपराध-बोध और नैतिक दुविधा पर केंद्रित मनोवैज्ञानिक-सामाजिक कहानी है। एक वर्ष की बेरोजगारी और आर्थिक संकट के बाद दीनानाथ को पचास रुपये की नौकरी मिलती है और गौरी इसे ईश्वर की कृपा मानती है। कुछ समय बाद उसका मालिक उसे कार्यालय के हिसाब में जालसाजी करने के लिए तैयार करता है और तर्क देता है कि ऐसा करने से सौ कर्मचारियों की रोजी बच जाएगी। दीनानाथ अनिच्छा के बावजूद गलत काम कर देता है। उसे तरक्की और बोनस मिलता है, लेकिन उसका धार्मिक विश्वास उसे लगातार डराता रहता है कि इस पाप का दंड अवश्य मिलेगा। बच्चे के बीमार पड़ने और बाद में स्वयं दीनानाथ को मलेरिया होने पर वह सामान्य बीमारी को ईश्वरीय दंड समझने लगता है। उसकी पत्नी गौरी इन घटनाओं को ईश्वर की दया मानती है, जबकि दीनानाथ धीरे-धीरे ऐसे ईश्वर की धारणा को अस्वीकार करने लगता है जो मनुष्य को प्रेम के बजाय भय और दंड से नियंत्रित करता है। कहानी पाप, ईश्वरीय न्याय, मानवीय नैतिकता और आर्थिक विवशता के बीच के जटिल संबंध पर प्रश्न उठाती है।
Chamatkar
प्रेमचंद की 'चमत्कार' प्रलोभन, नैतिक पतन और आत्मशुद्धि की कहानी है। गरीब लेकिन शिक्षित युवक चन्द्रप्रकाश ठाकुर साहब के बेटे को पढ़ाता है और परिवार में नौकर की तरह नहीं बल्कि घर के सदस्य की तरह सम्मान पाता है। जब उसे विवाह की पूरी व्यवस्था का जिम्मा मिलता है, तब वह महँगे गहनों को देखकर अपनी गरीबी और पत्नी चम्पा के अभाव से तुलना करने लगता है। ईर्ष्या धीरे-धीरे लालच और फिर चोरी में बदल जाती है और वह दुल्हन के गहने चुरा लेता है। बाद में चम्पा को गहने मिल जाते हैं और वह पति को सार्वजनिक रूप से अपमानित करने के बजाय उसे ठाकुर साहब के विश्वास और उपकार याद दिलाती है। उसके शब्द चन्द्रप्रकाश के विवेक को जगा देते हैं। वह अंततः गहने चुपचाप वापस रख देता है और परिवार को लगता है कि गहने किसी चमत्कार से वापस मिल गए। वास्तविक 'चमत्कार' किसी दैवी घटना में नहीं, बल्कि एक अपराध की ओर जा चुके मनुष्य के भीतर नैतिक चेतना के जागने में है।
Damul Ka Kaidi
प्रेमचंद की 'दामुल का कैदी' वर्ग-संघर्ष, मजदूर-शोषण, नैतिक जागरण और प्रायश्चित की अत्यंत प्रभावशाली कहानी है। धनी मिल-मालिक सेठ खूबचंद भारी लाभ के बावजूद मजदूरों की मजदूरी घटा देता है और हड़ताल के उत्तर में पुलिस की हिंसा का सहारा लेता है। मजदूरों के नेता गोपीनाथ के सामने आने पर खूबचंद उसे गोली मार देता है। लेकिन मृत्यु के क्षणों में भी गोपीनाथ उत्तेजित मजदूरों को खूबचंद की हत्या करने से रोक देता है। एक निर्दोष और उदार मनुष्य की हत्या का अपराध खूबचंद के अंत:करण को झकझोर देता है। वह स्वयं अपना अपराध स्वीकार करता है और चौदह वर्ष के काले पानी की सजा पाता है। उसके पंद्रह वर्षों के निर्वासन में उसकी सारी संपत्ति नष्ट हो जाती है और उसकी पत्नी प्रमिला कठिन परिस्थितियों में बेटे कृष्णचंद्र का पालन करती है। लौटने पर खूबचंद देखता है कि उसका बेटा गोपीनाथ जैसा ही रूप और स्वभाव रखता है। कृष्णचंद्र मजदूरों का नेता बनता है और अंततः हड़ताल के दौरान गोलियों से मारा जाता है। खूबचंद अपने बेटे के बलिदान को शोक के बजाय न्याय के पक्ष में वीरगति के रूप में स्वीकार करता है। जो व्यक्ति कभी मजदूर नेता को गोली मार चुका था, वही अंत में मजदूरों के अधिकार के पक्ष में खड़ा हो जाता है।
Do Bailon Ki Katha
प्रेमचंद की कहानी 'दो बैलों की कथा' हीरा और मोती नामक दो बैलों की आज़ादी की कहानी है, जो भारत के स्वतंत्रता संघर्ष का रूपक है।
Balak
प्रेमचंद की 'बालक' कहानी सामाजिक प्रतिष्ठा, विधवा-विवाह, जातिगत रूढ़ियों और मनुष्यता की वास्तविक कसौटी पर केंद्रित है। कथावाचक एक संपन्न जमींदार है, जिसके यहाँ गंगू नाम का नौकर काम करता है। गंगू ब्राह्मण है और अपने आत्मसम्मान के कारण सामान्य नौकरों की तरह मालिक की खुशामद नहीं करता। जब वह गोमती देवी नाम की एक विधवा से विवाह करने का निर्णय लेता है, तो कथावाचक इस विवाह को अनुचित समझता है। गंगू नौकरी छोड़ देता है और गोमती से विवाह कर लेता है। दोनों साधारण जीवन शुरू करते हैं और कुछ समय बाद उनके यहाँ एक बच्चा जन्म लेता है। बच्चे के प्रति गंगू का प्रेम, जिम्मेदारी और आत्मीयता धीरे-धीरे कथावाचक की धारणाएँ बदल देते हैं। कहानी दिखाती है कि सामाजिक पद, शिक्षा और प्रतिष्ठा मनुष्य के चरित्र के विश्वसनीय प्रमाण नहीं हैं; वास्तविक श्रेष्ठता स्वतंत्र विचार, प्रेम, जिम्मेदारी और मनुष्यता में है।
Grih Neeti
प्रेमचंद की 'गृह-नीति' सास-बहू के संघर्ष के माध्यम से घरेलू सत्ता, स्त्री की गरिमा और परंपरा तथा आधुनिक वैवाहिक संबंधों के टकराव को सामने लाती है। विधवा माँ लगातार अपने बेटे से बहू की शिकायत करती है। वह चाहती है कि बहू पुराने ढंग से सेवा करे, चरण दबाए, बड़ों के सामने झुके और घर के काम को अपना कर्तव्य माने। बेटा इस धारणा का विरोध करता है। वह कहता है कि पत्नी उसकी जीवन-संगिनी है, लौंडी नहीं, और पति-पत्नी दोनों बराबर हैं। बहू अचानक उनकी बातचीत सुन लेती है और स्पष्ट शब्दों में कहती है कि वह इस घर में गुलामी करने नहीं, जीवन-संगिनी बनकर आई है। उसके अनुसार कर्तव्य प्रेम से पैदा होना चाहिए, तिरस्कार और दबाव से नहीं। इसके बाद पति अपनी माँ के कथित हृदय-परिवर्तन की बात पत्नी को बताता है। बहू तुरंत बदला लेने के बजाय स्वयं आगे बढ़कर सास के प्रति प्रेम और सेवा का भाव अपनाने को तैयार हो जाती है। कहानी दिखाती है कि परिवार में अधिकार और परंपरा से पैदा हुआ संघर्ष संवेदना, संवाद और पारस्परिक सम्मान से समाप्त किया जा सकता है।
Jeevan Ka Shaap
प्रेमचंद की 'जीवन का शाप' धन, विवाह, दांपत्य-संबंध और मनुष्य की इच्छाओं के भ्रम पर केंद्रित एक तीखा मनोवैज्ञानिक-सामाजिक व्यंग्य है। निर्धन समाचारपत्र-संपादक कावसजी अपने धनी मित्र शापूरजी के सुखी जीवन से ईर्ष्या करते हैं और उनकी पत्नी शीरीं में वह आदर्श देखते हैं जो उन्हें अपनी पत्नी गुलशन में दिखाई नहीं देता। लेकिन शीरीं बताती है कि धन और ऐश के बावजूद उसके विवाह में प्रेम और सहचर्य का अभाव है और शापूरजी रातें भोग-विलास में बिताते हैं। कावसजी धीरे-धीरे शीरीं के साथ नया जीवन बसाने की कल्पना करने लगते हैं। जब शीरीं सचमुच उनके साथ चलने के लिए तैयार हो जाती है, तब कावसजी पहली बार उस जीवन की वास्तविक आर्थिक कठिनाइयों के बारे में सोचते हैं जो वे उसे दे सकते हैं। उन्हें गुलशन की शिकायतों और कठोरता के पीछे छिपी निष्ठा, घरेलू जिम्मेदारी और त्याग दिखाई देने लगता है। अंततः गुलशन कहती है कि मनुष्य अक्सर उसी चीज की ओर दौड़ता है जिसमें उसका अमंगल छिपा होता है—यही 'जीवन का शाप' है।
Doodh Ka Daam
प्रेमचंद की 'दूध का दाम' जाति-व्यवस्था, छुआछूत और श्रम के शोषण पर तीखा प्रहार करने वाली कहानी है। गरीब भंगी स्त्री भुंगी अपने बेटे मंगल के साथ-साथ जमींदार महेशनाथ के बेटे सुरेश को भी अपना दूध पिलाकर पालती है। उसका मातृ-दूध उस संपन्न परिवार के बच्चे के जीवन का आधार बनता है, लेकिन भुंगी और उसके बेटे को इसके बदले सम्मान या सुरक्षा नहीं मिलती। बाद में भुंगी को घर से निकाल दिया जाता है और उसकी मृत्यु के बाद मंगल अनाथ तथा निर्धन हो जाता है। सुरेश विशेषाधिकार और सुविधा में बड़ा होता है, जबकि मंगल जूठे भोजन और टुकड़ों पर जीवित रहने को मजबूर है। भुंगी के दूध के उस नैतिक ऋण को, जिसे समाज कहता है कि कोई चुका नहीं सकता, मंगल के हिस्से में सम्मान के बजाय भूख, अपमान और बहिष्कार मिलता है। शीर्षक इसी विडंबना को सामने लाता है।
Jaadu
प्रेमचंद की 'जादू' एक अत्यंत संक्षिप्त, संवादप्रधान कहानी है जिसमें दो बहनों को पता चलता है कि एक ही पुरुष दोनों से प्रेम के समान दावे कर रहा है। नीला पहले मीना से इसलिए नाराज़ होती है कि वह उस पुरुष को पत्र क्यों लिख रही है जिसने पहले उसका अपमान किया और उसके नाम को बदनाम किया था। बातचीत आगे बढ़ने पर पता चलता है कि वह पुरुष मीना से भी वही बातें कहता है जो कभी नीला से कहता था—प्यार, मर जाने और ज़हर खा लेने जैसी भावुक धमकियाँ। दोनों बहनों को समझ में आता है कि उसकी प्रेम-भाषा वास्तव में छल और शिकार करने की एक तय तरकीब है। कहानी ईर्ष्या को बहनापा और समझ में बदलते हुए पुरुष की भावनात्मक चालबाजी तथा स्त्री के आत्मसम्मान पर तीखा व्यंग्य करती है।
Kaidi
प्रेमचंद की कहानी 'कैदी' आइवन की कहानी है जो 14 साल जेल में रहने के बाद और भी खतरनाक और दृढ़ बनकर निकलता है।
Khudai Fauzdar
प्रेमचंद की 'खुदाई फ़ौज़दार' धन के लालच, धार्मिक पाखंड, पुलिस-व्यवस्था की भ्रष्टता और धनवानों के लिए उपलब्ध विशेष सुरक्षा पर तीखा व्यंग्य है। सेठ नानकचंद एक धनी महाजन हैं जो स्वयं को अत्यंत धर्मनिष्ठ और परोपकारी दिखाते हैं, लेकिन अपने असामियों से कठोर ब्याज वसूलते हैं। जब उन्हें पच्चीस हजार रुपये की फिरौती माँगने वाले धमकी भरे पत्र मिलते हैं, तो वे अपनी संपत्ति, बंदूकों और पुलिस पर भरोसा करते हैं। पुलिस के नाम पर आए कुछ लोग उन्हें समझाते हैं कि अपनी कीमती संपत्ति सरकारी खजाने में जमा कर दें। नानकचंद उनकी बात पर विश्वास कर लेते हैं। लेकिन यही लोग असली 'खुदाई फ़ौज़दार' निकलते हैं—ऐसे लुटेरे जो स्वयं को कानून और न्याय का रक्षक समझकर दूसरों पर अपना अधिकार जताते हैं। प्रेमचंद इस विडंबना के माध्यम से दिखाते हैं कि धर्म, धन और सरकारी अधिकार का बाहरी प्रदर्शन मनुष्य को वास्तविक नैतिकता से नहीं बचा सकता।
Lottery
प्रेमचंद की 'लॉटरी' अचानक मिलने वाले धन की लालसा, कल्पना और मानवीय स्वार्थ पर व्यंग्यपूर्ण कहानी है। एक स्कूल-मास्टर और उसका मित्र विक्रम मिलकर लॉटरी का टिकट खरीदते हैं और दस लाख रुपये जीतने की कल्पना करने लगते हैं। पुरस्कार अभी मिला भी नहीं है, लेकिन दोनों उसके उपयोग की योजनाएँ बनाने लगते हैं। धीरे-धीरे धन की कल्पना उनके बीच विश्वास, साझेदारी और स्वार्थ के प्रश्न खड़े कर देती है। कहानी दिखाती है कि वास्तविक धन से पहले उसका भ्रम ही मनुष्य के व्यवहार को बदल सकता है। प्रेमचंद हास्य और विडंबना के माध्यम से यह भी पूछते हैं कि अचानक मिली संपत्ति के सामने दोस्ती और नैतिकता कितनी स्थिर रह सकती है।
Kusum
प्रेमचंद की 'कुसुम' पत्रात्मक शैली में लिखी गई ऐसी सामाजिक कहानी है जिसमें एक नवविवाहिता का पति विवाह के बाद उससे बात तक नहीं करता, क्योंकि वह चाहता है कि उसके ससुर उसे विलायत जाकर पढ़ने के लिए धन दें। कुसुम बार-बार प्रेम और विनम्रता से पत्र लिखकर पूछती है कि उससे क्या अपराध हुआ है, लेकिन पति कोई उत्तर नहीं देता। जब कुसुम के पिता पति की शिक्षा के लिए पैसे भेजने की सोचते हैं, तो कुसुम इसका विरोध करती है। वह समझ जाती है कि पति की उदासीनता वास्तव में एक आर्थिक रणनीति है—वह उसे भावनात्मक रूप से तोड़कर उसके मायके से अपनी शिक्षा का खर्च निकलवाना चाहता है। अंततः बार-बार संबंध सुधारने के प्रयास विफल होने पर कुसुम आत्मसम्मान को ऐसे विवाह से ऊपर रखती है जिसमें उसके साथ अन्याय हो रहा है। प्रेमचंद दहेज-सदृश आर्थिक मांग, पितृसत्तात्मक वैवाहिक सत्ता और उस दोहरे सामाजिक मानदंड की आलोचना करते हैं जिसमें पति पत्नी की उपेक्षा कर सकता है, लेकिन पत्नी के परिवार से लगातार त्याग की अपेक्षा की जाती है।
Kutsa
प्रेमचंद की 'कुत्सा' चुगली, अपुष्ट आरोप और राजनीतिक-सामाजिक जीवन में फैली निंदा के दुष्परिणामों पर केंद्रित कहानी है। कथावाचक अपने मित्रों के साथ एक राष्ट्रीय संस्था के तीन प्रमुख कार्यकर्ताओं की आलोचना करता है और उन पर धन के दुरुपयोग, शराबखोरी तथा दिखावे जैसे आरोप लगाए जाते हैं। बाद में जब वह लगभग दस वर्ष की एक बालिका को उसके घर पहुँचाने जाता है, तो उसे पता चलता है कि वही अफवाहें बच्ची के मन में भी पहुँच चुकी हैं। कथावाचक स्वयं उन आरोपों की चर्चा कर चुका है, फिर भी वह बच्ची के निर्मल मन को कटुता और निंदा से बचाने के लिए उन्हें झूठा बताता है। कहानी का अंतिम व्यंग्य यही है कि उस दिन उसे एक सुरक्षात्मक झूठ बोलकर जितनी खुशी होती है, उतनी शायद कभी सच बोलकर भी नहीं हुई थी।
Kanooni Kumar
प्रेमचंद की 'कानूनी कुमार' कानून के माध्यम से हर सामाजिक समस्या का समाधान खोजने वाले एक आत्ममुग्ध विधायक पर तीखा व्यंग्य है। एम.एल.ए. कानूनी कुमार समाचारपत्रों और रिपोर्टों के ढेर के बीच बैठकर तंबाकू, पर्दा, भिक्षावृत्ति, चाय, होटल-जीवन, स्त्रियों की घरेलू स्थिति और अत्यधिक संतानोत्पत्ति जैसी समस्याओं के लिए एक के बाद एक कानून बनाने की योजना बनाते हैं। वे स्वयं को देश-सुधारक समझते हैं, लेकिन उनकी पत्नी उनके सुधारवाद की सबसे बड़ी कमजोरी सामने रखती है—दूसरों के जीवन को कानून से बदलने की इच्छा, जबकि अपने घर और अपने व्यवहार को बदलने की तैयारी नहीं। हास्य, अतिशयोक्ति और संवाद के माध्यम से प्रेमचंद दिखाते हैं कि कानून आवश्यक हो सकता है, लेकिन शिक्षा, सामाजिक चेतना और स्वैच्छिक सुधार के बिना केवल दंडात्मक कानून समाज को वास्तव में नहीं बदल सकता।
Motor Ke Chhinte
प्रेमचंद की 'मोटर के छींटे' हास्य और व्यंग्य के माध्यम से वर्ग-अहंकार, सामाजिक असमानता और सार्वजनिक जीवन में शक्ति के असमान संबंधों पर चोट करती है। एक ब्राह्मण पंडित को तेज़ी से गुजरती मोटर कीचड़ के छींटों से भिगो देती है। अपमानित पंडित इसका बदला लेने के लिए मोटरवालों को रोकना शुरू कर देता है। धीरे-धीरे उसका निजी क्रोध सामाजिक प्रतिशोध का रूप ले लेता है। वह मोटरवालों को वही असुविधा और अपमान महसूस कराता है जिसे पैदल चलने वाले लोग झेलते हैं। एक अंग्रेज अधिकारी के साथ उसका टकराव कहानी के वर्ग और औपनिवेशिक सत्ता संबंधों को और तीखा कर देता है।
Miss Padma
प्रेमचंद की 'मिस पद्मा' औपनिवेशिक भारत के बदलते समाज में एक आधुनिक शिक्षित महिला की प्रेम और स्वतंत्रता की खोज को दर्शाती है।
Muft Ka Yash
प्रेमचंद की 'मुफ़्त का यश' झूठी प्रतिष्ठा, अफसरी के प्रभाव और बिना किसी वास्तविक काम के मिलने वाले यश पर व्यंग्य करती है। कथावाचक एक लेखक है जो सामान्यतः सरकारी अधिकारियों से दूरी बनाए रखता है। एक दिन जिले के हाकिम उसे अपने बंगले पर बुलाते हैं। मुलाकात साधारण होती है, लेकिन समाज इस छोटी-सी निकटता को बढ़ा-चढ़ाकर यह मान लेता है कि हाकिम हर महत्वपूर्ण निर्णय लेने से पहले लेखक से सलाह लेते हैं। कथावाचक का बचपन का मित्र बलदेवसिंह अपने बेटे को झूठे पुलिस मुकदमे से बचाने के लिए उसके पास आता है। कथावाचक केवल उससे पीछा छुड़ाने के लिए हाकिम से बात करने का झूठा वादा कर देता है, जबकि वास्तव में वह कुछ नहीं करता। संयोग से लड़का फिर भी छूट जाता है क्योंकि हाकिम पुलिस अधिकारी को डाँट देते हैं। बलदेवसिंह इसका श्रेय कथावाचक की सिफारिश को देता है और उसके लिए देहाती उपहार लेकर आता है। कथावाचक सच बताने की स्थिति में होते हुए भी इस 'मुफ़्त के यश' को छोड़ नहीं पाता। प्रेमचंद इसी आत्म-विडंबना के माध्यम से दिखाते हैं कि प्रतिष्ठा और प्रभाव का भ्रम मनुष्य के स्वाभिमान तथा नैतिकता को किस प्रकार कमजोर कर सकता है।
Riyasat Ka Deewan
प्रेमचंद की 'रियासत का दीवान' सत्ता, अंतरात्मा और नैतिक समझौते की गहरी राजनीतिक कहानी है। अंग्रेजी शासन के प्रभाव वाले एक देशी राज्य में दीवान मेहता वर्षों के अपमान के बाद यह सीख चुके हैं कि केवल ईमानदारी से काम करना पर्याप्त नहीं; राजा को प्रसन्न रखना ही पद और सम्मान बचाने का साधन है। वे धीरे-धीरे राजा के हर उचित-अनुचित आदेश का पालन करते हुए अपनी अंतरात्मा को दबा देते हैं। पोलिटिकल एजेंट के स्वागत के लिए किसानों से जबरन चंदा वसूला जाता है और मजदूरों से बेगार कराई जाती है। मेहता का बेटा जयकृष्ण इन अत्याचारों के विरुद्ध खुलकर आवाज उठाता है और राज्य से निकाल दिया जाता है। मेहता अपने पद को बेटे से अधिक महत्वपूर्ण मानकर उसका साथ नहीं देते। बाद में उनकी पत्नी सुनीता भी बेटे के पक्ष में राजा के सामने बोलती है और उसे भी राज्य से निकाल दिया जाता है। मेहता अंततः तब जागते हैं जब राजा उनसे अपनी निजी वासना पूरी करने के लिए एक विवाहित साहूकार की बेटी का अपहरण कराने को कहता है। मेहता इस आदेश को नीति और धर्म के विरुद्ध मानकर ठुकरा देते हैं, इस्तीफा देते हैं और रियासत छोड़ देते हैं। कहानी दिखाती है कि निरंकुश सत्ता संस्थाओं को कैसे भ्रष्ट करती है और लगातार समझौता करते-करते मनुष्य अपनी अंतरात्मा को कैसे दबा देता है—लेकिन एक सीमा ऐसी होती है जहाँ नैतिक विवेक फिर जाग उठता है।
Neur
प्रेमचंद की 'नेउर' ग्रामीण श्रमजीवी जीवन, दांपत्य-प्रेम, धार्मिक छल, गरीबी, लज्जा और अंतरात्मा की कहानी है। पचास वर्ष से अधिक आयु का मेहनती मजदूर नेउर अपनी बूढ़ी पत्नी बुधिया के लिए दिन-रात काम करता है ताकि उसके बाद भी उसे किसी के सामने हाथ न फैलाना पड़े। एक घूमता हुआ साधु उसे विश्वास दिलाता है कि उसकी चाँदी और पत्नी के गहने चमत्कार से बढ़कर धन बन सकते हैं। नेउर अपनी सारी बचत और बुधिया के गहने लेकर साधु को दे देता है और ठगा जाता है। गाँव में लोगों से उधार लिए पैसे लौटाने में असमर्थ होने के कारण वह शर्म से भाग जाता है और अंततः उसी प्रकार का साधु बन बैठता है जिसने उसे ठगा था। लेकिन जब एक दुखी युवती अपने पति को वश में करने की आशा में उसके सामने गहनों की पेटारी रखती है, तो नेउर की अंतरात्मा उसे वही छल दोहराने नहीं देती। वह गाँव लौटता है, जहाँ उसे पता चलता है कि बुधिया मर चुकी है। इसके बाद उसका जीवन मौन दुःख और निष्क्रिय अस्तित्व में बदल जाता है।
Naya Vivah
प्रेमचंद की 'नया विवाह' वृद्धावस्था में एक पुरुष द्वारा युवा स्त्री से विवाह करके अपनी खोती हुई जवानी को फिर से पाने की मानसिकता की तीखी मनोवैज्ञानिक पड़ताल है। लाला डंगामल ने अपनी पहली पत्नी लीला के पच्चीस वर्ष के साथ को प्रेम और आत्मीयता में बदलने के बजाय उसकी ढलती उम्र को उसके विरुद्ध इस्तेमाल किया। लीला की मृत्यु के बाद वे युवा आशा से दूसरा विवाह करते हैं और मानते हैं कि नया विवाह उनके जीवन में फिर से यौवन भर देगा। लेकिन आशा उनकी तरह दिखावे, सैर-सपाटे और भोग-विलास में रुचि नहीं रखती। वह गृहस्थी, भोजन और सेवा को अधिक महत्व देती है। डंगामल उसकी उदासीनता को अपने प्रति असफलता मानते हैं। इसी बीच युवा नौकर जुगल आशा की ओर आकर्षित होने लगता है और आशा भी उसकी सहज प्रशंसा तथा सरलता से प्रभावित होती है। कहानी के माध्यम से प्रेमचंद पुरुष के स्वामित्व-बोध, उम्र के दोहरे मानदंड, विवाह में भावनात्मक उपेक्षा और खरीदी हुई सुख-सुविधा तथा वास्तविक आत्मीयता के बीच के अंतर को उजागर करते हैं।
Nyay
‘न्याय’, जिसे ‘नबी का नीति-निर्वाह’ के नाम से भी जाना जाता है, प्रेमचंद की ऐसी कहानी है जिसमें न्याय की सर्वोच्च कसौटी यह है कि व्यक्ति अपने प्रियजन के साथ भी वही व्यवहार करे जो किसी दूसरे व्यक्ति के साथ करता। कहानी प्रारंभिक इस्लामी समाज की पृष्ठभूमि में जैनब और अबुलआस के दांपत्य को केंद्र में रखती है। जैनब नए धर्म के प्रति आकर्षित है, जबकि उसका पति अबुलआस अपनी स्वतंत्र विचारधारा और पुराने विश्वासों पर कायम रहता है। धार्मिक संघर्ष और युद्ध के बीच अबुलआस बंदी बना लिया जाता है और अंततः उसे पैगंबर मुहम्मद के सामने लाया जाता है। मुहम्मद उसे केवल अपना दामाद मानकर विशेष रियायत नहीं देते, बल्कि न्याय के समान नियम को उस पर भी लागू करते हैं। उनका व्यक्तिगत प्रेम कर्तव्य के आगे नहीं आता। कहानी न्याय को प्रेम और द्वेष दोनों से ऊपर उठकर नीति निभाने की क्षमता के रूप में प्रस्तुत करती है। अंततः अबुलआस अपने धन-संपत्ति का हिसाब साफ करके ऋण चुकाता है और स्वयं मुहम्मद की सेवा में लौट आता है।
Shudra
प्रेमचंद की 'शूद्रा' प्रवासी भारतीयों, गिरमिटिया मजदूरी, स्त्री की असुरक्षा और औपनिवेशिक शोषण की अत्यंत मार्मिक कहानी है। गरीब युवती गौरा का पति मंगरू वर्षों पहले बिना बताए घर छोड़कर चला जाता है। एक दिन एक बूढ़ा ब्राह्मण यह झूठ बोलकर गौरा को अपने साथ ले जाता है कि मंगरू ने उसे बुलाया है। गौरा पति से मिलने की आशा में कलकत्ता पहुँचती है और वहाँ से जहाज द्वारा मॉरिशस भेज दी जाती है। वहाँ उसे पता चलता है कि मंगरू स्वयं गिरमिटिया मजदूर के रूप में बंधा हुआ है और भारतीय मजदूरों तथा स्त्रियों का भयंकर शोषण होता है। जब एक अंग्रेज अधिकारी गौरा को अपने अधिकार में लेना चाहता है और उसके प्रतिरोध पर मंगरू को बुरी तरह पीटता है, तब गौरा अपने पति को बचाने के लिए स्वयं को बलिदान करने को तैयार हो जाती है। कहानी प्रवासी मजदूरों को बहकाकर विदेश ले जाने वाली व्यवस्था, औपनिवेशिक सत्ता की हिंसा और स्त्री के शरीर पर अधिकार जमाने की मानसिकता को उजागर करती है।
Veshya
प्रेमचंद की 'वेश्या' समाज द्वारा वेश्याओं के प्रति किए जाने वाले तिरस्कार और उसी समाज के पुरुषों के दोहरे नैतिक मानदंडों की कहानी है। दयाकृष्ण, सिंगारसिंह, लीला और माधुरी इसके प्रमुख पात्र हैं। संपन्न युवक सिंगारसिंह अपनी पत्नी लीला की उपेक्षा करके माधुरी के पास जाता है और विलासिता में डूब जाता है। उसका मित्र दयाकृष्ण शुरू में माधुरी के प्रभाव से सिंगारसिंह को बचाने के उद्देश्य से उसके पास जाता है, लेकिन धीरे-धीरे माधुरी की बुद्धिमत्ता, संवेदनशीलता और प्रेम की क्षमता को पहचानने लगता है। माधुरी ऐसे पुरुषों की आदी है जो उसे केवल भोग की वस्तु समझते हैं; इसलिए दयाकृष्ण का संयम और निःस्वार्थ व्यवहार उसके लिए नया अनुभव बन जाता है। दोनों के बीच वास्तविक भावनात्मक संबंध विकसित होता है, लेकिन सामाजिक प्रतिष्ठा और 'कुलवधू' तथा 'वेश्या' के बीच बनाई गई नैतिक दीवार उनके संबंध को असंभव बना देती है। प्रेमचंद इस विरोधाभास के माध्यम से दिखाते हैं कि समाज पुरुषों को वेश्याओं का उपभोग करने की स्वतंत्रता देता है, लेकिन उन्हीं स्त्रियों को सम्मान और मानवीय प्रेम का अधिकार नहीं देता।
Unmaad
प्रेमचंद की 'उन्माद' महत्वाकांक्षा, दांपत्य-त्याग, पश्चिमी जीवन के आकर्षण और स्वार्थ से पैदा होने वाली आत्म-विनाशकारी मानसिक स्थिति की त्रासद कहानी है। मनहर एक साधारण क्लर्क है, जिसकी पत्नी वागेश्वरी उसके अध्ययन और उन्नति के लिए अपना जीवन समर्पित कर देती है। उसकी मेहनत और त्याग से मनहर को इंग्लैंड जाकर गुप्तचर-कला का प्रशिक्षण लेने का अवसर मिलता है। इंग्लैंड पहुँचकर वह पश्चिमी सामाजिक जीवन, विलासिता और जेनी नामक अंग्रेज युवती के आकर्षण में पड़ जाता है। वह अपनी पत्नी के त्याग और सरलता को तुच्छ समझने लगता है और जेनी से विवाह कर लेता है। जेनी के सामाजिक प्रभाव से उसे भारत लौटने पर गुप्तचर विभाग में ऊँचा पद भी मिल जाता है। लेकिन दोनों के विवाह की बुनियाद अलग-अलग अपेक्षाओं पर है। मनहर जेनी से पारंपरिक पत्नी जैसी निष्ठा और अधीनता चाहता है, जबकि जेनी अपने स्वतंत्र जीवन और अधिकारों को छोड़ने के लिए तैयार नहीं है। संबंध बिगड़ते-बिगड़ते मनहर शराब और मानसिक विघटन की ओर चला जाता है। वर्षों बाद वह भारत लौटता है, लेकिन इंग्लैंड, जेनी और अपने ऊँचे पद से जुड़े जीवन की स्मृति लगभग खो चुका है। वागेश्वरी उसके साथ फिर भी वही प्रेम और सेवा करती है। अंततः जेनी मनहर को खोजते हुए आती है और वागेश्वरी पर हमला करने का प्रयास करती है। मनहर अपनी पहली पत्नी की रक्षा करते हुए पिस्तौल छीन लेता है और स्वयं को गोली मार लेता है। प्रेमचंद दिखाते हैं कि जिस सफलता के लिए मनुष्य सच्चे संबंधों और कृतज्ञता को त्याग देता है, वह सफलता अंततः उसके लिए विनाश का कारण बन सकती है।
Vidrohi
प्रेमचंद की 'विद्रोही' कृष्ण और तारा के बाल्यकाल से विकसित हुए प्रेम की मार्मिक कहानी है। दोनों परिवारों को विश्वास है कि उनका विवाह होगा, लेकिन कृष्ण के चाचा आठ हजार रुपये के दहेज के लालच में एक धनवान परिवार का रिश्ता स्वीकार करना चाहते हैं। तारा के पिता आर्थिक रूप से इतनी बड़ी रकम देने में असमर्थ हैं और वर्षों से चले आ रहे संबंध को ही पर्याप्त समझते हैं। चाचा इस पुराने संबंध से मुकर जाते हैं। कृष्ण को विवाद की पूरी सच्चाई जानने के बजाय चाची से एकतरफा विवरण मिलता है और वह स्वयं तारा या उसके माता-पिता से बात करने का साहस नहीं जुटा पाता। तारा भी उसके पत्र की प्रतीक्षा करती रहती है। दोनों की चुप्पी और गलतफहमी ऐसी दूरी पैदा कर देती है जिसे बाद में कोई साहस भी नहीं भर पाता। कृष्ण अंततः चाचा के निर्णय का विरोध करता है, लेकिन तब तक देर हो चुकी होती है। वह तारा का विवाह अपनी आँखों से देखता है और वर्षों तक उसी दुःख में जीता है। बहुत बाद में तारा के पति से उसे पता चलता है कि तारा ने भी उसे कभी नहीं भुलाया था और उनके प्रेम को अपने जीवन की सबसे मधुर स्मृति मानती थी। कहानी में 'विद्रोह' इसलिए विडंबनापूर्ण है कि कृष्ण परिवार और दहेज-आधारित विवाह के विरुद्ध विद्रोह तो करता है, लेकिन उसका साहस समय पर नहीं जागता। प्रेमचंद दहेज, पारिवारिक अधिकार और सामाजिक प्रतिष्ठा की आलोचना के साथ-साथ संकोच, आत्म-संदेह, मौन और गलतफहमी की मनोवैज्ञानिक त्रासदी को भी सामने रखते हैं।
मानसरोवर भाग 2 मुंशी प्रेमचंद के सर्वश्रेष्ठ कथा-साहित्य का एक महत्वपूर्ण स्तम्भ है। इसमें संग्रहीत कहानियाँ सामाजिक यथार्थ, ग्रामीण जीवन की करुणा और मानवीय संवेदनाओं का सजीव वर्णन प्रस्तुत करती हैं। ऊपर दी गई सूची से आप भाग 2 की किसी भी कहानी को चुनकर उसका पूर्ण पाठ पढ़ सकते हैं।