कहानी1926
बाबाजी का भोग
Babaji Ka Bhog
प्रेमचंद की 'बाबाजी का भोग' धार्मिक आडंबर, अंधविश्वास और गरीब ग्रामीण परिवारों के शोषण पर तीखा व्यंग्य है। रामधन अहीर और उसकी पत्नी के घर में अनाज का लगभग कोई भंडार नहीं बचा है। महाजन और जमींदार के प्यादे उनकी उपज का बड़ा हिस्सा ले चुके हैं। ऐसे समय में एक साधु उनके द्वार पर आकर साधु-सेवा के नाम पर भोजन माँगता है। रामधन और उसकी पत्नी अपने घर के लिए बचाकर रखा थोड़ा-सा आटा, दाल, ईंधन, आलू और अंत में घी तक उसे दे देते हैं। साधु विधि-विधान से भोग तैयार करता है, स्वयं पेट भरकर खाता है और वहीं आराम से सो जाता है, जबकि रामधन का घर भूखा रह जाता है। प्रेमचंद दिखाते हैं कि धार्मिक श्रद्धा जब विवेकहीन सामाजिक दबाव में बदल जाती है, तब वह गरीबों की सहायता करने के बजाय उनके सीमित संसाधनों के शोषण का माध्यम बन सकती है।
8 मिनट