कहानी1934
बासी भात में खुदा का साझा
Basi Bhat Mein Khuda Ka Sajha
प्रेमचंद की 'बासी भात में खुदा का साझा' गरीबी, आस्था, अपराध-बोध और नैतिक दुविधा पर केंद्रित मनोवैज्ञानिक-सामाजिक कहानी है। एक वर्ष की बेरोजगारी और आर्थिक संकट के बाद दीनानाथ को पचास रुपये की नौकरी मिलती है और गौरी इसे ईश्वर की कृपा मानती है। कुछ समय बाद उसका मालिक उसे कार्यालय के हिसाब में जालसाजी करने के लिए तैयार करता है और तर्क देता है कि ऐसा करने से सौ कर्मचारियों की रोजी बच जाएगी। दीनानाथ अनिच्छा के बावजूद गलत काम कर देता है। उसे तरक्की और बोनस मिलता है, लेकिन उसका धार्मिक विश्वास उसे लगातार डराता रहता है कि इस पाप का दंड अवश्य मिलेगा। बच्चे के बीमार पड़ने और बाद में स्वयं दीनानाथ को मलेरिया होने पर वह सामान्य बीमारी को ईश्वरीय दंड समझने लगता है। उसकी पत्नी गौरी इन घटनाओं को ईश्वर की दया मानती है, जबकि दीनानाथ धीरे-धीरे ऐसे ईश्वर की धारणा को अस्वीकार करने लगता है जो मनुष्य को प्रेम के बजाय भय और दंड से नियंत्रित करता है। कहानी पाप, ईश्वरीय न्याय, मानवीय नैतिकता और आर्थिक विवशता के बीच के जटिल संबंध पर प्रश्न उठाती है।
24 मिनट