मनुष्य का परम धर्म
Manushya Ka Param Dharma
प्रेमचंद की 'मनुष्य का परम धर्म' धार्मिक पाखंड, रूढ़िवादिता और स्वार्थ के लिए धर्म के दुरुपयोग पर तीखा हास्य-व्यंग्य है। होली के दिन पंडित मोटेराम शास्त्री और उनके मित्र चिंतामणि इस बात से परेशान हैं कि कहीं से दावत का निमंत्रण नहीं आया। वे गंगा तट पर पहुँचकर अपनी भूख को धर्मोपदेश का रूप देते हैं। मोटेराम शास्त्रों की मनमानी व्याख्या करते हुए सिद्ध करते हैं कि चूँकि ब्राह्मण ब्रह्मा के मुख से निकले हैं, इसलिए मुख को सुख देना मनुष्य का परम धर्म है और ब्राह्मणों को उत्तम-से-उत्तम मिठाइयाँ खिलाना सबसे बड़ा धार्मिक कर्तव्य है। उनका पूरा तर्क वास्तव में मुफ्त भोजन प्राप्त करने का साधन है। जब चिंतामणि भी मिठाइयों की श्रेष्ठता को लेकर अपना अलग 'शास्त्रोक्त' सिद्धांत पेश करता है, तो दोनों पाखंडी धर्माचार्य तर्क-वितर्क से आगे बढ़कर हास्यास्पद शारीरिक झगड़े में उतर आते हैं। प्रेमचंद इस हास्य के माध्यम से सच्चे धर्म और स्वार्थपूर्ण धार्मिक प्रदर्शन के बीच का अंतर उजागर करते हैं।