कर्मों का फल
Karmon Ka Phal
‘कर्मों का फल’ प्रेमचंद की मार्मिक कहानी है, जिसमें दुःख, धैर्य, आस्था और अपने कर्मों की जिम्मेदारी का प्रश्न उठाया गया है। कथावाचक अपने मित्र लाला साईंदयाल को गरीबी, बीमारी और प्रियजनों की मृत्यु जैसी अनेक विपत्तियों के बीच भी अद्भुत धैर्य रखते देखता है। साईंदयाल बार-बार अपने दुःख को ‘कर्मों का फल’ कहते हैं, लेकिन कहानी के अंत में उनके इस विश्वास के पीछे छिपा एक अधिक गहरा और पीड़ादायक रहस्य सामने आता है।