कहानियाँ

Short Stories

भारतीय जनजीवन और समाज की यथार्थ तस्वीर प्रस्तुत करती प्रेमचंद की 300 से अधिक कालजयी कहानियाँ।

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मुंशी प्रेमचंद कृत कर्मों का फल का कवर इमेज
कहानी

कर्मों का फल

Karmon Ka Phal

‘कर्मों का फल’ प्रेमचंद की मार्मिक कहानी है, जिसमें दुःख, धैर्य, आस्था और अपने कर्मों की जिम्मेदारी का प्रश्न उठाया गया है। कथावाचक अपने मित्र लाला साईंदयाल को गरीबी, बीमारी और प्रियजनों की मृत्यु जैसी अनेक विपत्तियों के बीच भी अद्भुत धैर्य रखते देखता है। साईंदयाल बार-बार अपने दुःख को ‘कर्मों का फल’ कहते हैं, लेकिन कहानी के अंत में उनके इस विश्वास के पीछे छिपा एक अधिक गहरा और पीड़ादायक रहस्य सामने आता है।

20 मिनट
मुंशी प्रेमचंद कृत कोई दुख न हो तो बकरी ख़रीद लो का कवर इमेज
कहानी

कोई दुख न हो तो बकरी ख़रीद लो

Koi Dukh Na Ho To Bakri Kharid Lo

प्रेमचंद की हास्य-व्यंग्य प्रधान कहानी ‘कोई दुख न हो तो बकरी ख़रीद लो’ एक घरेलू समस्या के आसान समाधान की तलाश में पैदा होने वाली नई परेशानियों का मनोरंजक चित्रण करती है। दूध की खराब गुणवत्ता से परेशान कथावाचक पहले गाय रखने और फिर बकरी पालने के बारे में सोचता है। पंडितजी बकरी के गुणों का ऐसा बखान करते हैं कि कथावाचक उसे खरीदे बिना ही उसका प्रशंसक बन जाता है। लेकिन बकरी घर में आने के बाद जिस सुविधा की उम्मीद थी, उसके बजाय नई जिम्मेदारियाँ, खर्च और झंझट सामने आने लगते हैं। प्रेमचंद इस छोटे-से घरेलू प्रसंग के माध्यम से मध्यवर्गीय जीवन, मानवीय स्वभाव और पुरानी परेशानी से छुटकारा पाने के प्रयास में नई परेशानी खड़ी कर लेने की प्रवृत्ति पर हास्यपूर्ण व्यंग्य करते हैं।

32 मिनट
मुंशी प्रेमचंद कृत लाग-डाट का कवर इमेज
कहानी

लाग-डाट

Laag Daat

प्रेमचंद की कहानी 'लाग-डाट' तीन पीढ़ियों से चले आ रहे जोखू भगत और बेचन चौधरी के वैर की कथा है। उनकी व्यक्तिगत दुश्मनी पूरे गाँव को दो विरोधी दलों में बाँट देती है, लेकिन स्वराज्य आंदोलन के प्रभाव से वही प्रतिद्वंद्विता अंततः दोनों को एकता और देशहित की ओर ले जाती है।

18 मिनट
मुंशी प्रेमचंद कृत मोटर के छींटे का कवर इमेज
कहानी1936

मोटर के छींटे

Motor Ke Chhinte

प्रेमचंद की 'मोटर के छींटे' हास्य और व्यंग्य के माध्यम से वर्ग-अहंकार, सामाजिक असमानता और सार्वजनिक जीवन में शक्ति के असमान संबंधों पर चोट करती है। एक ब्राह्मण पंडित को तेज़ी से गुजरती मोटर कीचड़ के छींटों से भिगो देती है। अपमानित पंडित इसका बदला लेने के लिए मोटरवालों को रोकना शुरू कर देता है। धीरे-धीरे उसका निजी क्रोध सामाजिक प्रतिशोध का रूप ले लेता है। वह मोटरवालों को वही असुविधा और अपमान महसूस कराता है जिसे पैदल चलने वाले लोग झेलते हैं। एक अंग्रेज अधिकारी के साथ उसका टकराव कहानी के वर्ग और औपनिवेशिक सत्ता संबंधों को और तीखा कर देता है।

14 मिनट
मुंशी प्रेमचंद कृत मनोवृत्ति का कवर इमेज
कहानी1934

मनोवृत्ति

Manovritti

प्रेमचंद की 'मनोवृत्ति' समाज की उस मानसिकता पर तीखा व्यंग्य है जो किसी स्त्री के बारे में बिना सत्य जाने उसके चरित्र और नैतिकता के निर्णय कर देती है। गांधी पार्क की एक बेंच पर सोती हुई एक युवती को देखकर वहाँ आने वाले पुरुष और स्त्रियाँ अपने-अपने पूर्वाग्रहों के आधार पर उसके बारे में तरह-तरह की धारणाएँ बनाने लगते हैं। कोई उसे वेश्या समझता है, कोई आधुनिकता का प्रतीक, तो कोई कुलवधू। अंत में युवती की वास्तविक स्थिति सामने आने पर स्पष्ट होता है कि लोगों के सारे अनुमान निराधार थे। प्रेमचंद इस विरोधाभास के माध्यम से स्त्री की स्वतंत्रता, सामाजिक निगरानी और लैंगिक दोहरे मानदंड पर प्रश्न उठाते हैं।

17 मिनट
मुंशी प्रेमचंद कृत मुफ़्त का यश का कवर इमेज
कहानी1934

मुफ़्त का यश

Muft Ka Yash

प्रेमचंद की 'मुफ़्त का यश' झूठी प्रतिष्ठा, अफसरी के प्रभाव और बिना किसी वास्तविक काम के मिलने वाले यश पर व्यंग्य करती है। कथावाचक एक लेखक है जो सामान्यतः सरकारी अधिकारियों से दूरी बनाए रखता है। एक दिन जिले के हाकिम उसे अपने बंगले पर बुलाते हैं। मुलाकात साधारण होती है, लेकिन समाज इस छोटी-सी निकटता को बढ़ा-चढ़ाकर यह मान लेता है कि हाकिम हर महत्वपूर्ण निर्णय लेने से पहले लेखक से सलाह लेते हैं। कथावाचक का बचपन का मित्र बलदेवसिंह अपने बेटे को झूठे पुलिस मुकदमे से बचाने के लिए उसके पास आता है। कथावाचक केवल उससे पीछा छुड़ाने के लिए हाकिम से बात करने का झूठा वादा कर देता है, जबकि वास्तव में वह कुछ नहीं करता। संयोग से लड़का फिर भी छूट जाता है क्योंकि हाकिम पुलिस अधिकारी को डाँट देते हैं। बलदेवसिंह इसका श्रेय कथावाचक की सिफारिश को देता है और उसके लिए देहाती उपहार लेकर आता है। कथावाचक सच बताने की स्थिति में होते हुए भी इस 'मुफ़्त के यश' को छोड़ नहीं पाता। प्रेमचंद इसी आत्म-विडंबना के माध्यम से दिखाते हैं कि प्रतिष्ठा और प्रभाव का भ्रम मनुष्य के स्वाभिमान तथा नैतिकता को किस प्रकार कमजोर कर सकता है।

23 मिनट
मुंशी प्रेमचंद कृत पंडित मोटेराम की डायरी का कवर इमेज
कहानी1934

पंडित मोटेराम की डायरी

Pandit Moteram Ki Dairy

प्रेमचंद की कहानी 'पंडित मोटेराम की डायरी' हास्य और व्यंग्य से भरपूर एक अनोखी कहानी है जिसमें पंडित मोटेराम शास्त्री साम्यवाद और आधुनिक समाज पर चुटीली टिप्पणियाँ करते हैं।

47 मिनट
मुंशी प्रेमचंद कृत रियासत का दीवान का कवर इमेज
विशेष
कहानी1934

रियासत का दीवान

Riyasat Ka Deewan

प्रेमचंद की 'रियासत का दीवान' सत्ता, अंतरात्मा और नैतिक समझौते की गहरी राजनीतिक कहानी है। अंग्रेजी शासन के प्रभाव वाले एक देशी राज्य में दीवान मेहता वर्षों के अपमान के बाद यह सीख चुके हैं कि केवल ईमानदारी से काम करना पर्याप्त नहीं; राजा को प्रसन्न रखना ही पद और सम्मान बचाने का साधन है। वे धीरे-धीरे राजा के हर उचित-अनुचित आदेश का पालन करते हुए अपनी अंतरात्मा को दबा देते हैं। पोलिटिकल एजेंट के स्वागत के लिए किसानों से जबरन चंदा वसूला जाता है और मजदूरों से बेगार कराई जाती है। मेहता का बेटा जयकृष्ण इन अत्याचारों के विरुद्ध खुलकर आवाज उठाता है और राज्य से निकाल दिया जाता है। मेहता अपने पद को बेटे से अधिक महत्वपूर्ण मानकर उसका साथ नहीं देते। बाद में उनकी पत्नी सुनीता भी बेटे के पक्ष में राजा के सामने बोलती है और उसे भी राज्य से निकाल दिया जाता है। मेहता अंततः तब जागते हैं जब राजा उनसे अपनी निजी वासना पूरी करने के लिए एक विवाहित साहूकार की बेटी का अपहरण कराने को कहता है। मेहता इस आदेश को नीति और धर्म के विरुद्ध मानकर ठुकरा देते हैं, इस्तीफा देते हैं और रियासत छोड़ देते हैं। कहानी दिखाती है कि निरंकुश सत्ता संस्थाओं को कैसे भ्रष्ट करती है और लगातार समझौता करते-करते मनुष्य अपनी अंतरात्मा को कैसे दबा देता है—लेकिन एक सीमा ऐसी होती है जहाँ नैतिक विवेक फिर जाग उठता है।

49 मिनट