नेउर
Neur
प्रेमचंद की 'नेउर' ग्रामीण श्रमजीवी जीवन, दांपत्य-प्रेम, धार्मिक छल, गरीबी, लज्जा और अंतरात्मा की कहानी है। पचास वर्ष से अधिक आयु का मेहनती मजदूर नेउर अपनी बूढ़ी पत्नी बुधिया के लिए दिन-रात काम करता है ताकि उसके बाद भी उसे किसी के सामने हाथ न फैलाना पड़े। एक घूमता हुआ साधु उसे विश्वास दिलाता है कि उसकी चाँदी और पत्नी के गहने चमत्कार से बढ़कर धन बन सकते हैं। नेउर अपनी सारी बचत और बुधिया के गहने लेकर साधु को दे देता है और ठगा जाता है। गाँव में लोगों से उधार लिए पैसे लौटाने में असमर्थ होने के कारण वह शर्म से भाग जाता है और अंततः उसी प्रकार का साधु बन बैठता है जिसने उसे ठगा था। लेकिन जब एक दुखी युवती अपने पति को वश में करने की आशा में उसके सामने गहनों की पेटारी रखती है, तो नेउर की अंतरात्मा उसे वही छल दोहराने नहीं देती। वह गाँव लौटता है, जहाँ उसे पता चलता है कि बुधिया मर चुकी है। इसके बाद उसका जीवन मौन दुःख और निष्क्रिय अस्तित्व में बदल जाता है।