Cover Image for Premashram (प्रेमाश्रम) by Munshi Premchand - Novel
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उपन्यास•1922•66 अध्याय•20h 46m

प्रेमाश्रम

Premashram

प्रेमचंद का उपन्यास 'प्रेमाश्रम' किसानों और जमींदारों के संघर्ष, भूमि-अधिकार, शोषण और सामाजिक परिवर्तन की कहानी है।

पात्र:प्रेमशंकर, ज्ञानशंकर, प्रभाशंकर, मनोहर, बलराज, गायत्री, श्रद्धा, विद्यावती, मायाशंकर
सेटिंग:

अध्याय 34 / 66

9 मिनट पठन • 1,322 शब्द

अध्याय 34: प्रेमाश्रम

जब मुकदमा सेशन सुपुर्द हो गया और ज्ञानशंकर को विश्वास हो गया कि अब अभियुक्तों का बचना कठिन है तब उन्होंने गौस खाँ की जगह पर फैजुल्लाह को नियुक्त किया और खुद गोरखपुर चले आए। यहाँ से गायत्री की कई चिट्ठियाँ गयी थीं। मायाशंकर को भी साथ लाए। विद्या ने बहुत कहा कि मेरा जी घबड़ायेगा, पर उन्होंने न माना।

इस एक महीने में ज्ञानशंकर ने वह समस्या हल कर ली थी जिस पर वह कई सालों से विचार कर रहे थे। उन्होंने वह मार्ग निर्धारित कर लिया था जिससे गायत्री देवी के ह्रदय तक पहुँच सकें। इस मार्ग की दो शाखाएँ थीं, एक विरोधात्मक और दूसरी विधानात्मक। ज्ञानशंकर ने यही दूसरा मार्ग ग्रहण करना निश्चय किया। गायत्री के धार्मिक भावों को हटाना, जो किसी गढ़ की दुर्भेद्य दीवारों की भाँति उसको वासनाओं से बचाए हुए थे, दुस्तर था। ज्ञानशंकर एक बार इस प्रथल में असफल हो चुके थे और कोई कारण न था कि उस साधन का आश्रय ले कर वह फिर असफल न हों। इसकी अपेक्षा दूसरा मार्ग सुगम और सुलभ था। उन धार्मिक भावों को हटाने के बदले उन्हें और दृढ़ क्यों न कर दूँ! इमारत को विध्वंस करने के बदले उसी भित्ति पर क्यों न और रहे चढ़ा दूँ? उसको अपना बनाने के बदले क्यों न आप ही उसका हो जाऊँ?

ज्ञानशंकर ने गोरखपुर आ कर पहले से भी अधिक उत्साह और अध्यवसाय से काम करना शुरू किया। धर्मशाला का काम स्थगित हो गया था। अब की ठेकेदारों से काम न ले कर उन्होंने अपनी ही निगरानी में बनवाना शुरू किया। उसके सामने ही एक ठाकुरद्वारे का शिलारोपण भी कर दिया। वह नित्यप्रति प्रातःकाल मोटर पर सवार हो कर घर से निकल जाते और इलाके का चक्कर लगा कर सन्ध्या तक लौट आते। किसी कारिन्दे या कर्मचारी की मजाल न थी कि एक कौड़ी तक खा सके। किसी शहना या चपरासी की ताव न थी कि असामियों पर किसी प्रकार की सख्ती कर सके और न किसी असामी का दिल था कि लगान चुकाने में एक दिन का भी विलम्ब कर सके। सहकारी बैंक का काम भी चल निकला। किसान महाजनों के जाल से मुक्त होने लगे और उनमें यह सामर्थ्य होने लगी कि खरीदारों के भाव पर जिन्स न बेचकर अपने भाव पर बेच सकें। ज्ञानशंकर का यह सुप्रबन्ध और कार्यपटता देख कर गायत्री की सदिच्छा श्रद्धा का रूप धारण करती जाती है। वह विविध रूप से प्रत्युपकार की चेष्टा करती। विद्या के लिए तरह-तरह की सौगात मेजती और मायाशंकर पर तो जान ही देती थी। उसकी सवारी के लिए दो टाँघन थे, पढ़ाने के लिए दो मास्टर। एक सुबह को आता था, दूसरा शाम को। उसकी टहल के लिए अलग दो नौकर थे। उसे अपने सामने बुला कर नाश्ता कराती थी। आप अच्छी-अच्छी चीजें बना कर उसे खिलाती, कहानियाँ सुनाती और उसकी कहानियाँ सुनती। उसे आये दिन इनाम देती रहती। मायाशंकर अपनी माँ को भूल गया। वह ऐसा समझदार, ऐसा मिष्टभाषी, ऐसा विनयशील, ऐसा सरल बालक था कि थोड़े ही दिनों में गायत्री उसे हृदय से प्यार करने लगी।

ज्ञानशंकर के जीवन में भी एक विशेष परिवर्तन हुआ। अब वह नित्य सन्ध्या समय भागवत की कथा सुना करते। दो-चार साधु-सन्त-जमा होते, मेल-जोल के दस-पाँच सज्जन आ जाते, मोहल्ले के दो-चार श्रद्धालु पुरुष आ बैठते और एक छोटी-मोटी धार्मिक सभा हो जाती। यहाँ कृष्ण भगवान की चर्चा होती, उसकी प्रेम-कथाएँ सुनायी जाती और कभी-कभी कीर्तन भी होता था। लोग प्रेम में मग्न हो कर रोने लगते और सबसे अधिक अश्रुवर्षा ज्ञानशंकर की ही आँखों से होती थी। यह प्रेम के हाथों बिक गये थे।

एक दिन गायत्री ने कहा, अब तो आपके यहाँ नित्य कृष्ण-चर्चा होती है, पर्दे का प्रबन्ध हो जाय तो मैं भी आया करूँ। ज्ञानशंकर ने श्रद्धापूर्ण नेत्रों से गायत्री को देखकर कहा, यह सब आप ही के सत्संग का फल है। आपने ही मुझे यह भक्ति मार्ग दिखाया है और मैं आपको ही अपना गुरु मानता हूँ। आज से कई पास पहले मैं माया-मोह में फँसा हुआ, इच्छाओं का दास, वासनाओं का गुलाम और सांसारिक बन्धनों में जकड़ा हुआ था। आपने मुझे बता दिया कि संसार में निर्लिप्त हो कर क्यों कर रहना चाहिए। इतनी सम्पत्तिशानिली हो कर भी आप संयासिनी हैं। आपके जीवन ने मेरे लिए सदुपदेश का काम किया है।

गायत्री ज्ञानशंकर को विद्या और ज्ञान का अगाध सागर समझती थी। वह महान् पुरुष जिसकी लेखनी में यह सामर्थ्य हो कि मुझे रानी के पद से विभूषित करा दे, जिसकी वक्तृताओं को सुन कर बड़े-बड़े अँगरेज उच्चाधिकारी दंग रह जायँ, जिसके सुप्रबन्ध की आज सारे जिले में धूम है, मेरा इतना भक्त हो, इस कल्पना से ही उसका गौरवशील विह्वल हो गया। ऐसे सम्मानों के अवसरों परउसे अपनी स्वामी की याद आ जाती थी। विनीत भाव से बोली, बाबू जी यह सब भगवान् की दया है। उन्होंने आपको यह भक्ति प्रदान की है नहीं तो लोग यावज्जीवन धर्मोपदेश सुनते रह जाते हैं और पिर भी उनके ज्ञानचक्षु नहीं खुलते। कहीं स्वामी से आपकी भेंट हो गयी होती तो आप उनके दर्शनमात्र से ही मुग्ध हो जाते। वह धर्म और प्रेम के अवतार थे। मैं जो कुछ हूँ उन्हीं की बनायी हुई हूँ। यथासाध्य उन्हीं की शिक्षाओं का पालन करती हूँ, नहीं तो मेरी गति कहाँ थी कि भक्तिरस का स्वाद पा सकती।

ज्ञानशंकर मुझे भी यह खेद है कि उन महात्मा के दर्शनों से वंचित रह गया। जिसके सदुपदेश में यह महान् शक्ति है वह स्वयं कितना प्रतिभाशील होगा! मैं कभी-कभी स्वप्न में उनके दर्शन से कृतार्थ हो जाता हूँ। कितनी सौम्य मूर्ति थी मुखारविन्द से प्रेम की ज्योति सी प्रसारित होती हुई जान पड़ती है। साक्षात् कृष्ण भगवान के अवतार मालूम होते हैं।

दूसरे दिन से पर्दे का आयोजना हो गयी और गायत्री नित्य प्रति इन सत्संगों में भाग लेने लगी। भक्तों की संख्या दिनों-दिन बढ़ने लगी। कीर्तन के सयम लोग भावोन्मत्त होकर नाचने लगते। गायत्री के हृदय से भी यही प्रेम-तरंगें उठतीं। यहाँ तक कि ज्ञानशंकर भी स्थिर चित्त न रह सकते। कृष्ण के पवित्र प्रेम की लीलाएँ उनके चित्त को एक क्षण के लिए प्रेम से आभासित कर देती थीं। और इस प्रकाश में उन्हें अपनी कुटिलता और क्षुद्रता अत्यन्त घृणोत्पादक दीख पड़ती। लेकिन सत्संग के समाप्त होते ही यह क्षणि ज्योति फिर स्वार्थन्धकार में विलीन हो जाती थी। बालक कृष्ण की भोली-भाली क्रीड़ाएँ, उनकी वह मनोहर तोतली बातें, यशोदा का वह विलक्षण पुत्र-प्रेम, गोपियों को वह आत्माविस्मृति, प्रीति के वह भावमय रहस्य, यह अनुराग के उद्गार वह वंशी की मतवाली तान, वह यमुना तट के विहार की कथाएँ, लोगों को अतीव आनन्दप्रद आत्मिक उल्लास का अनुभव देती थीं। भूतवादियों की दृष्टि में ये कथाएँ कितनी ही लज्जास्पद क्यों न हों, पर उन भक्तों के अन्तःकरण इनके श्रवण-मात्र से ही गद्गद हो जाते थे। राधा और यशोदा का नाम आते ही आँखों से आँसू की झड़ी लग जाती थी। कृष्ण के नाम में क्या जादू है, इसका अनुभव हो जाता था।

एक बार वृन्दावन से रासलीला मंडली आयी और महीने भर तक लीला करती रहीं। सारा शहर देखने को फट पड़ता था। ज्ञानशंकर प्रेम की मूर्ति बने हुए लोगों का आदर-सत्कार करते। छोटे-बड़े सबको खातिर से बैठाते। स्त्रियों के लिए विशेष प्रबन्ध कर दिया गया था। यहाँ गायत्री उनका स्वागत करती, उनके बच्चों को प्यार करती और मिठाई-मेवे बाँटती। जिस दिन कृष्ण के मथुरा गमन की लीला हुई, दर्शकों की इतनी भीड़ हुई कि साँस लेना मश्किल था। यशोदा और नन्द की हृदय-विदारणी बातें सुन कर दर्शकों में कोहराम मच गया रोते-रोते कितने ही भक्तों की घिग्घी बैंध गयी और गायत्री तो मूच्छित होकर गिर ही पड़ी। होश आने पर उसने अपने को अपने शयनगृह में पाया। कमरे में सन्नाटा छाया हुआ था, केवल ज्ञानशंकर उसे पंखा झल रहे थे। गायत्री पर इस समय अलसता छायी हुई थी। जब मनुष्य किसी थके हुए पथिक की भाँति अधीर हो कर छाँव की ओर दौड़ता है, उसका हृदय निर्मल, विशुद्ध प्रेम से परिपूर्ण हो जाता है। उसने ज्ञानशंकर को बैठ जाने का संकेत किया और तब शैशवोचित सरलता से उनकी गोद से सिर रखकर आकांक्षापूर्ण भाव से बोली, मुझे वृन्दावन ले चलो।

तीसरे दिन रासलीला समाप्त हुई। उसी दिन ज्ञानशंकर गायत्री को संग ले बड़े समारोह के साथ वृन्दावन चले।

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शोध एवं शोध-पत्रों के लिए अकादमिक संदर्भ

Premchand, Munshi. "प्रेमाश्रम." *Munshi Premchand Digital Archive*, 1922, https://munshipremchand.com/works/novels/premashram. Accessed 22 Sep. 2026.