प्रभात का समय था और कुआर का महीना। वर्षा समाप्त हो चुकी थी। देहातों में जिधर निकल जाइए, सड़े हुए सन की सुगन्ध उड़ती थी। कभी जेयेष्ठ को लज्जित करने वाली धूप होती थी, कभी सावन को सरमाने वाले बादल घिर आते थे। मच्छर और मलेरिया का प्रकोप था, नीम की छाल और गिलोय की बाहर थी। चरावर में दूर तक हरी-हरी घास लहरा रही थी। अभी किसी को उसे काटने का अवकाश न मिलता था। इसी समय बिन्दा महाराज और कर्तारसिंह लाठी कंधे पर रखे एक वृक्ष के नीचे आकर खड़े हो गये। कर्तार ने कहा, इस बुड्ढे को खुचट सूझती रहती है। भला बताओ, जो यहाँ मवेशी न चरने पायेंगे तो कहाँ जाएँगे और जो लोग सदा से चराते आये हैं वे मानेंगे कैसे? एक बेर कोई इसकी मरम्मत कर देता तो यह आदत छूट जाती।
बिन्दा-हमका तो ई मौजा मा तीस बरसें होय गईं। तब से कारिन्दे आये पर चरावर कोऊ न रोका।गाँव भर के मवेशी मजे से चरत रहे।
कर्तार-उन्हें हुकुम देते क्या लगता है! जायगी तो हमारे माथे।
बिन्दा-हमारे जी तो अस ऊब गया है कि मन कत है छोड़-छाड़ के घर चला जाई। सुनित है मालिक अवैया हैं। बस, एक बेर उनसे भेंट होय जाय और अपने घर के राह लेई।
कर्तार-फैज दिन भर खाट पर पड़ा रहता है, उससे कुछ नहीं कहते। जब देखो कर्तार को ही दौड़ाते हैं, मानो कर्तार उनके बाप का गुलाम है। और देखो, पीपल के नीचे जहाँ हम तुम जल चढ़ाते हैं। वहाँ नमाज पढ़ते हैं, वहीं दतुअन-कुल्ली करते हैं, वहीं नहाते हैं। बताओ, धरम नष्ट भया कि रहा? आप तो रोज कुरान पढ़ते हैं और मैं रामायण पढ़ने लगता हूँ तो कैसे डाँट के कहते हैं, क्या शोर मचा रखा है। अबकी असाढ़ में 300 रु. नजराना मिला; मुझे एक पाई से भेंट न हुई।
बिन्दा-हमका तो एक रुपया मिला रहे।
कर्तार-यह भी कोई मिलने में मिलना है। और सब कहा चपरासियों को रुपये में आठ आने मिलते हैं। यह कुछ न दें तो चार आने तो दें, लेना-देना दूर रहा उस पर आठों पहर सिर पर सवार। कल तुम कहीं गये थे। मुझसे बोले, कर्तार एक घड़ा पानी तो खींच लो। मैंने तुरन्त जवाब दिया, इसके नौकर नहीं हैं, फौजदारी करा लो, लाठी चलवा लो, अगर कदम पीछे हटाये तो कहो, लेकिन चिलम भरना, पानी खींचना हमारा काम नहीं है। इस पर आँखें लाल-पीली की। एक दिन पीपल के नीचे दाली मूरतों को देखकर बोले, यह क्या ईंट-पत्थर जमा कर रखे हैं। मैंने तो ठान लिया है कि जहाँ अबकी कोई नजराना लेकर आया और मैंने हाथ पकड़ा कि चार आने इधर रखिये। जरा भी गरम-नरम हुए, मुँह से लाम काफ निकाली और मैंने गरदन दबायी। फिर जो कुछ होगा देखा जाएगा। फैजू बोले तो उनसे भी मैं समझूगा। खूब पड़े-पड़े रोटी गोस उड़ा रहे हैं, सब निकाल दूँगा। वह देखो मवेशी इधर आ रहे हैं। बलराज तो नहीं है न?
बिन्दा-होवे करी तो कौनो डर हौ। अबकी अस जर आवा है कि ठठरी होय गया है।
कर्तार-बड़े कस-बल का पट्ठा है। सुक्खू चौधरी का तालाब जहाँ बन रहा था वहीं एक दिन अखाड़े में उससे मेरी एक पकड़ हो गई थी। मैं उसे पहले ही झपाटे में नीचे लाया; लेकिन ऐसा तड़प के नीचे से निकला कि झोंकों में आ गया। सँभल ही न सका। बदन नहीं, लोहा है।
बिन्दा-निगाह का बड़ा सच्चा जवान है। क्या मजा कि कोऊ की बिटिया-महरिया की ओर आँखें उठाके ताके।
कर्तार-वह देखो फैजू और गौस खाँ भी इधर ही आ रहे हैं। आज कुशल नहीं दीखती।
बिन्दा-यह गायें-भैंसें तो मनोहर के जान परते हैं। बिलासी लीने आवत है।
कर्तार ने उच्च स्वर में कहा, यह कौन मवेशी लिये आता है? यहाँ से निकाल ले जाव, सरकारी हुक्म नहीं है। इतने में बिलासी निकट आ गई और बिन्दा महाराज की ओर निश्चित भाव से देखकर बोली, सुनत ही महाराज ठाकुर की बात!
कर्तार-सरकारी हुक्म हो गया कि अब कोई जानवर यहाँ न चरने पाए।
बिलासी-कैसा सरकारी हुकुम? सरकारी की जमीन नहीं है। महाराज, तुम्हें तो यहाँ एक युग बीत गया, कभी किसी ने चराई भी मना किया है?
बिन्दा-उन पुरानी बातन का ना गावो, अब से हुकम भवा है। जानवर का और कौनो कैती ले जाव, नाहीं तो वह गौस खाँ आवत है, सभन का पकड़ के कानी हौद पठे दैहैं?
बिलासी-कानी हौज कैसे पठे दैहैं, कोई राहजनी है? हमारे मवेशी सदा से यहाँ चरते आए हैं और सदा यहीं चरेंगे। अच्छा सरकारी हुकुम है? आज कह दिया चरावर छोड़ दो, कल कहेंगे अपना घर छोड़ो, पेड़ तले जाकर रहो। ऐसा कोई अन्धेर है?
इतने में गौस खाँ और फैजू भी आ पहुँचे। बिलासी के अन्तिम शब्द खाँ साहब के कान में पड़े। डपटकर बोले, अपने जानवरों को फौरन निकाल ले जा, वरना मवेशीखाने भेज दूँगा।
बिलासी-क्यों निकाल ले जाऊँ चरावर सारे गाँव का है। जब सारा गाँव छोड़ देगा तो हम भी छोड़ देंगे।
गौस खाँ-जानवरों को ले जाती है कि खड़ी-खड़ी कानून बघारती है?
बिलासी-तुम तो खाँ साहब, ऐसी घुड़की जमा रहे हो जैसे मैं तुम्हारा दिया खाती है।"
गौस खाँ-फैजू, यह जबाँदराज औरत यों न मानेगी। घेर लो इसके जानवरों को और मवेशीखाने हाँक ले जाओ।
फैजू तो मवेशियों की तरफ लपका, पर कर्तार और बिन्दा महाराज धर्मसंकट में पड़े खड़े रहे। खाँ साहब ने उन्हें ललकारा-खड़े मुँह क्या देख रहे हो? घेर लो जानवरों को और हाँक ले जाओ। सरकारी हुक्म है या कोई मजाक है!
अब कर्तार और बिन्दा महाराज भी उठे और जानवरों को चारों ओर से घेरने का आयोजन करने लगे। मवेशियों ने चौकन्नी आँखों से देखा, कान खड़े किए और इधर-उधर बिदकने लगे। परिस्थिति को ताड़ गए। बिलासी ने कहा, मैं कहती हूँ इन्हें मत घेरो, नहीं तो ठीक न होगा।
किन्तु किसी ने उसकी धमकी पर ध्यान न दिया। थोड़ी देर में सब जानवर बीच में घिर गए। और कन्धे से कन्धा मिलाए, कनखियों से ताकते, तीनों चपरासियों के धीरे-धीरे चले। बिलासी एक संदिग्ध दशा में मूर्तिवत् खड़ी थी। जब जानवर कोई बीस कदम निकल गए तब वह उन्मत्तों की भाँति दौड़ी और हाँफते हुए बोली, मैं कहती हूँ इन्हें छोड़ दो, नहीं तो ठीक न होगा।
फैज-हट जा रास्ते से। कुछ शामत तो नहीं आई है।
बिलासी रास्ते में खड़ी हो गई और बोली, ले कैसे जाओगे?
गौस खाँ-न हटे तो इसकी मरम्मत कर दो।
बिलासी-कह देती हूँ, इन जानवरों के पीछे लोहू की नदी बह जाएगी। माथे गिर जाएँगे।
फैजू-हटती है या नहीं चुडैल?
बिलासी-तू हट जा दाढ़ीजार।
इतना उसके मुँह से निकलना था कि फैजू ने आगे बढ़कर बिलासी की गर्दन पकडी और उसे इतने जोर का झोंका दिया कि वह दो कदम पर जा गिरी उसकी आँखें तिलमिला गई, मूर्छा सी आ गई। एक क्षण वह वहीं अचेत पड़ी रही, तब उठी और लँगड़ाती हुई उन पुरुषों से अपनी अपमान कथा कहने चली जो उसके मान-मर्यादा के रक्षक थे।
मनोहर और बलराज दोनों एक दूसरे गाँव में धान काटने गए थे। वह यहाँ से कोस भर पडता था। लखनपर में धान के खेत न थे। इसलिए सभी लोग प्रायः उसी गाँव में धान बोते थे। बिलासी धान के मेड़ों पर चली जाती थी। कभी पैर इधर फिसलते, कभी उधर वह ऐसी उद्विग्न हो रही थी कि किसी प्रकार उड़कर वहाँ पहुँच जाऊँ। पर घुटनियों में चोट आ गई थी। अंग-अंग से यही ध्वनि निकलती थी-इनकी इतनी मजाल!
उसे इस समय परिणाम और फल की लेश-मात्र भी चिन्ता न थी। कौन मरेगा? किसका घर मिट्टी में मिलेगा? यह बातें उसके ध्यान में न भी आती थीं। वह संकल्प-विकल्प के बन्धन से मुक्त हो गयी थी।
लेकिन जब उस गाँव के समीप पहुँची और धान से लहराते हुए खेत दिखाई देने लगे तो पहली बार उसके मन में यह प्रश्न उठा कि इसका फल क्या होगा? बलराज एक ही क्रोधी है, मनोहर उससे भी एक अंगुल आगे। मेरा रोना सुनते ही दोनों भभक उठेंगे। जान पर खेल जायेंगे, तब! किन्तु आहत हृदय ने उत्तर दिया क्या हानि है? लड़कों के लिए आदमी क्यों झींकता है। पति के लिए क्यों रोता है? इसी दिन के लिए तो? इस कलमुँहें फैजू का मान मरदन तो हो जायगा! गौस खाँ का घमंड तो चूर-चूर हो जायगा!
तब भी, जब वह अपने खेतों के डाँडे पर पहुँची, मनोहर और बलराज नगर आने लगे तब उसके पैर आप ही रुकने लगे। यहाँ तक कि जब वह उनके पास पहुंची तब परिणाम चिन्ता ने उसे परास्त कर दिया। वह फूट-फूट कर रोने लगी। जानती थी और समझती थी कि यह आँसू की बूंदें आग की चिनगारियाँ हैं। पर आवेश पर अपना काबू न था। वह खेत के किनारे खड़ी हो गयी और मुँह झाँककर रोने लगी।
बलराज ने सशंक होकर पूछा, अम्मा क्या है? रोती क्यों है? क्या हुआ? यह सारा-कपड़ा कैसे लोहूलुहान हो गया?
बिलासी ने साड़ी की ओर देखा तो वास्तव में रक्त के छींटे दिखाई दिये, घुटनियों से खून बह रहा था, उसका हृदय थर-थर काँपने लगा। इन छींटों को छिपाने के लिए वह इस समय अपने प्राण तक दे सकती थी। हाय! मेरे सिर पर कौन सा भूत सवार हो गया कि यहाँ दौड़ी हुई आयी। मैं क्या जानती थी कि कहीं फूट-फाट भी गया है। अब गजब हो गया। मुझे यह चाहिए था कि धीरज धरे बैठी रहती। साँझ को जब यह लोग घर जाते और गाँव के सब आदमी जमा होते तो सारा वृत्तान्त कह देती। सबकी सलाह होती, वैसा किया जाता। इस अव्यवस्थित दसा में वह कोई शान्तिप्रद उत्तर न सोच सकी।
बलराज ने फिर पूछा, कुछ मुँह से बोलती क्यों नहीं? बस रोये जाती है। क्या हुआ, कुछ बता भी तो!
बिलासी-(सिसकते हुए) फैजू और गौस खाँ हमारी सब गायें-भैंसें कानी हौद हाँक ले गये।
बलराज-क्यों? क्या उनकी सीर में पड़ी थीं?
बिलासी-नहीं, कहते थे कि चरावर में चराने की मनाही हो गयी।
बलराज ने देखा कि माता की आँखें झुकी हुई हैं। और मुख पर मर्माघात की आभा झलक रही है। उसने उग्रावस्था में स्थिति को उससे कहीं, भंयकर समझ लिया जितनी वह वस्तुतः थी कुछ और पूछने की हिम्मत न पड़ी, आँखें रक्तवर्ण हो गयीं। कन्धे पर लट्ठ रख लिया और मनोहर से बोला, मैं जरा गाँव तक जाता हूँ।
मनोहर-क्या काम है?
बलराज-फैजू और गौस खाँ से दो-दो बातें करनी हैं।
मनोहर-ऐसी बात करने का यह मौका नहीं है। अभी जाओगे तो बात बढ़ेगी और कुछ हाथ भी न लगेगा। चार आदमी तुम्हीं को बुरा कहेंगे। अपमान का बदला इस तरह नहीं लिया जाता।
मनोहर के हर शब्दों में इतना भयंकर संकल्प, इतना घातक निश्चय भर हुआ था कि बलराज अधिक आग्रह न कर सका। उसने लाठी रख दी और माँ से कहा, अभी घर जाओ। हम लोग आयेंगे तो देखा जायगा।
मनोहर-नहीं, घर मत जाओ। यहीं बैठो। साँझ को सब जने साथ ही चलेंगे। वह कौन दौड़ा आ रहा है? बिन्दा महाराज हैं क्या?
बलराज-नहीं, कादिर दादा जान पड़ते हैं। हाँ, वहीं हैं। भागे चले जाते हैं। मालूम होता है गाँव में मारपीट हो गयी। दादा क्या है, कैसे दौड़े आते हो, कुशल तो है?
कादिर ने दम लेकर कहा, तुम्हारे ही पास तो आते हैं। बिलासी रोती आयी है। मैं डरा तुम लोग गुस्से में न जाने क्या कर बैठे। चला कि राह में मिल जाओगे तो रोक लूँगा, पर तुम कहीं मिले ही नहीं। अब तो जो हो गया सो गया, आगे की खबर करो। आज से जमींदार ने चरावर रोक दी है। अन्धेर देखते हो?
मनोहर-हाँ, देख तो रहा हूँ।, अन्धेर ही अन्धेर है।
कादिर-फिर अदालत जाना पड़ेगा।
मनोहर-चलो, मैं तैयार हूँ।
कादिर-हाँ, आज जाओ तो सलाह पक्की करके सवाल दे दें। अबकी हाईकोर्ट तक लड़ेंगे, चाहे घर बिक जाय। बस, हल पीछे चन्दा लगा लिया जाय।
मनोहर-हाँ, यही अच्छा होगा।
कादिर-मैं नवाज पढ़ता था, सुना बिलासी को चरावर में चपरासियों ने बुरा-भला कहा और वह रोती हुई इधर उधर आयी है। समझ गया कि आज गजब हो गया। बारे तुमने सबर से काम लिया अल्लाह इसका सबाब तुमको देगा तो मैं अब जाता हूँ, अपने चन्दे की बातचीत करता हूँ। जरा दिन रहते चले आना।
कादिर खाँ सावधान होकर चले गये। यह न समझे कि यहाँ मन में कुछ और ठन गयी है। मनोहर के तुले हुए शब्दों को उन्होंने मानसिक धैर्य का द्योतक समझा।
मनोहर ऐसे उद्दीप्त उत्साह से अपने काम में दत्तचित्त था मानो उसकी युवावस्था का विकास हो गया है। धान के पोलों के ढेर लगते जाते थे। न आगे ताकता था न, पीछे, न किसी से कछ बोलता था, न किसी की कुछ सुनता था, न हाथ थकते थे, न कमर दुखती थी। बलराज ने चिलम भरकर रख दी। तम्बाकू रखे-रखे जल गया। बिलासी खाँड़ का रस घोलकर सामने लायी। उसने उसकी ओर देखा तक नहीं; कुत्ता पी गया। कुआर की धूप थी, देह से चिनगारियाँ निकलतीं थीं, पसीने की धारें बहती थीं; किन्तु वह सिर तक न उठाता था। बलराज कभी खेत में आता, कभी पेड़ के नीचे जा बैठता, कभी चिलम पीता। एक ही अग्नि दोनों के हृदय में प्रज्वलित थी एक ओर सुलगती हुई, दूसरी ओर दहकती हुई। एक ओर वायु के वेग से चंचल, दूसरी ओर निर्बलता से निश्चल। एक ही भावना दोनों के हृदय में थी, एक में उद्दाम-उच्छृखल, दूसरे में गम्भीर और स्थिर। दोपहर हुई। बिलासी ने आकर डरते-डरते कहा, चबेना कर लो।
मनोहर ने सिर झुकाये हुए जवाब दिया-चलो आते हैं।
एक घंटे के बाद बिलासी फिर आकर बोली, चलो चबेना कर लो, दिन ढल गया। क्या आज ही सब खेत काट लोगे?
मनोहर ने कठोर स्वर में कहा, यही विचार में है। कौन जाने, कल आये या न आये।
जैसे किसी भरे हुए घड़े में एक कंकर लग जाय और पानी बह निकले, उसी भाँति बिलासी के हृदय में एक चोट सी लगी और आँसू बहने लगे। वह रह-रह कर हाथ मलती थी। हाय! न जाने इन्होंने मन में क्या ठान लिया है?
वह कई मिनट तक खड़ी रोती रही परिणाम की भयावह विकराल मूर्ति उसके नेत्रों के सामने नाच रही थी। मुँह खोले उसे निगलने को दौड़ती थी और शोक! इस मूर्ति को उसने अपने हाथों रचा था। अन्त में वह मनोहर के सम्मुख बैठ गयी और उसकी ओर अत्यन्त दीन भाव से देखकर बोली, हाथ जोड़कर कहती हूँ, चलकर चबेना कर लो। तुम्हारे इस तरह से गुम-सुम रहने से मेरा कलेजा दहल रहा है। तुमने क्या ठान रखी है; बोलते क्यों नहीं?
मनोहर-जाकर चुपके से बैठो। जब मुझे भूख लगेगी तब खा लूँगा।
बिलासी-हाय राम; तुम क्या करने पर तुले हो?
मनोहर-करूँगा क्या? कुछ करने लायक ही होता तो आज यह बेइज्जती नहीं होती। जो कुछ तकदीर में है वह होगा।
यह कहकर वह फिर अपने कार्य में व्यस्त हो गया। कोई किसी से न बोला। बलराज टालमटोल करता रहा और बिलासी उदास बैठी कभी रोती और कभी अपने को कोसती; यहाँ तक कि सन्ध्या हो गयी। तीनों ने धान के गढे गाड़ी पर लादे और लखनपुर चले। बलराज गाड़ी हाँकता था और मनोहर पीछे-पीछे उच्च स्वर से एक बिरहा गाता हुआ चला आता था। राह में कल्लू अहीर मिला, बोला, मनोहर काका आज बड़े मगन हो। मनोहर का गाना समाप्त हुआ तो उसने भी एक बिरहा गाया। दोनों साथ-साथ गाँव में पहुँचे तो एक हलचल सी मची हुई थी। चारों ओर चरावर की ही चर्चा थी। कादिर के द्वार पर एक पंचायत सी बैठी हुई थी। लेकिन मनोहर पंचायत में न जाकर सीधा घर गया और जाते ही जाते भोजन माँगा। बहू ने रसोई तैयार कर रखी थी। इच्छापूर्ण भोजन करके नारियल पीने लगा। थोड़ी देर में बलराज भी पंचायत से लौटा। मनोहर ने पूछा, कहो क्या हुआ?
बलराज-कुछ नहीं, यह सलाह हुई है कि खाँ साहब को कुछ नजर-वजर दे कर मना लिया जाय। अदालत से सब लोग घबड़ाते हैं।
मनोहर-यह तो मैं पहले ही समझ गया था। अच्छा जाकर चटपट खा-पी लो। आज मैं भी तुम्हारे साथ रखवाली करने चलूँगा। आँख लग जाय तो जगा लेना।
एक घंटे बाद दोनों खेत की ओर चलने को तैयार हुए। मनोहर ने पूछा, कुल्हाड़ा खूब चलता है न?
बलराज-हाँ, आज ही तो रगड़ा है।
मनोहर-तो उसे ले लो।
बलराज-मेरा तो कलेजा थर-थर काँप रहा है।
मनोहर-काँपने दो। तुम्हारे साथ मैं भी तो रहूँगा। तुम दो-एक हाथ चलाके वहाँ से लम्बे हो जाना और सब मैं देख लूँगा। इस तरह आके सो रहना, जैसे कुछ जानते ही नहीं। कोई कितना ही पूछे, डरावे-धमकावे मुँह मत खोलना। मैं अकेले ही जाता, मुदा एक तो मुझे अच्छी तरह सूझता नहीं, कई दिनों से रतौंधी होती है, दूसरे हाथों में अब वह बल नहीं कि एक चोट में वारा-न्यारा हो जाय।
मनोहर यह बातें ऐसी सावधानी से कह रहा था, मानो कोई साधारण घरेलू बातचीत हो। बलराज इसके प्रतिकूल इसके प्रतिकूल शंका और भय से आतुर हो रहा था। क्रोध के आवेश में वह आग में कूद सकता था; किन्तु इस पैशाचिक हत्याकांड से उसके प्राण सूखे जाते थे।
खेत में पहुँचकर दोनों मचान पर लेटे। अमावस की रात थी। आकाश पर कुछ बादल भी हो आये थे। चारों ओर घोर अन्धकार छाया हुआ था।
मनोहर तो लेटते ही खर्राटे लेने लगा; लेकिन बलराज पड़ा-पड़ा करवटें बदलता रहा। उसका हृदय नाना प्रकार की शंकाओं का अविरल स्रोत बना हुआ था।
दो घड़ी बीतने पर मनोहर जागा, बोला, बलराज सो गये क्या?
बलराज-नहीं, नींद नहीं आती।
मनोहर-अच्छा, तो अब राम का नाम लेकर तैयार हो जाओ। डरने या घबराने की कोई बात नहीं। अपने मरजाद की रक्षा करना मरदों का काम है। ऐसे अत्याचारों का हम और क्या जवाब दे सकते हैं? बेइज्जत होकर जीने से मर जाना अच्छा है। दिल को खूब सँभालो। अपना काम करके सीधे यहाँ चले आना। अँधेरी रात है। किसी की नजर भी नहीं पड़ सकती। थानेदार तुम्हें डरायेंगे, लेकिन खबरदार, डरना मत! बस गाँव के लोगों से मेल रखोगे। तो कोई तुम्हारा बाल भी बाँका न कर सकेगा। दुखरन भगत अच्छा आदमी नहीं है, उससे चौकन्ने रहना। हाँ, कादिर भरोसे का आदमी है। उसकी बातों का बुरा मत मानना। मैं तो फिर लौटकर घर न आऊँगा। तुम्हीं घर के मालिक बनोगे। अब वह लड़कपन छोड़ देना, कोई चार बात कहे तो गम खाना। ऐसा कोई काम न करना कि बाप-दादे के नाम को कलंक लगे। अपनी घरवाली को सिर मत चढ़ाना। उसे समझाते रहना कि सास के कहने में रहे। मैं तो देखने न आऊँगा, लेकिन इसी तरह घर में राड़ मचता रहा तो घर मिट्टी में मिल जायगा।
बलराज ने अवरुद्ध स्वर से कहा, दादा मेरी इतनी बात मानो, इस बखत सबुर कर जाओ। मैं कल एक-एक की खोपड़ी तोड़कर रख दूँगा।
मनोहर-हाँ, तुम्हें कोई मारे तो तुम संसार भर को मार गिराओ। फैजू और कर्तार क्या मिट्टी के लोंदे हैं? गौस खाँ भी पलटन में रह चुका है। तुम लकड़ी में उनसे पेश न पा सकोगे। वह देखो हिरना निकल आया। महाबीर जी का नाम लेकर उठ खड़े हो। ऐसे कामों में आगा-पीछा अच्छा नहीं होता। गाँव के बाहर ही बाहर चलना होगा, नहीं तो कुत्ते भुंकेंगे और जाग उठेंगे।
बलराज-मेरे तो हाथ-पैर काँप रहे हैं।
मनोहर-कोई परवा नहीं। कुल्हाड़ी हाथ में लोगे तो सब ठीक हो जायगा। तुम मेरे बेटे हो, तुम्हारा कलेजा मजबूत है। तुम्हें अभी जो डर लग रहा है, वह ताप के पहले का जाड़ा है। तुमने कुल्हाड़ा कन्धे पर रखा, महाबीर का नाम लेकर उधर चले, तो तुम्हारी आँखों से चिनगारियाँ निकलने लगेंगी। सिर पर खून सवार हो जाएगा। बाज की तरह शिकार पर झपटोगे। फिर तो मैं तुम्हें मना भी करूँ तो न सुनोगे। वह देखो सियार बोलने लगे, आधी रात हो गयी। मेरा हाथ पकड़ लो और आगे-आगे चलो। जय महाबीर की!
