कहानियाँ

Short Stories

भारतीय जनजीवन और समाज की यथार्थ तस्वीर प्रस्तुत करती प्रेमचंद की 300 से अधिक कालजयी कहानियाँ।

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मुंशी प्रेमचंद कृत चमत्कार का कवर इमेज
कहानी1932

चमत्कार

Chamatkar

प्रेमचंद की 'चमत्कार' प्रलोभन, नैतिक पतन और आत्मशुद्धि की कहानी है। गरीब लेकिन शिक्षित युवक चन्द्रप्रकाश ठाकुर साहब के बेटे को पढ़ाता है और परिवार में नौकर की तरह नहीं बल्कि घर के सदस्य की तरह सम्मान पाता है। जब उसे विवाह की पूरी व्यवस्था का जिम्मा मिलता है, तब वह महँगे गहनों को देखकर अपनी गरीबी और पत्नी चम्पा के अभाव से तुलना करने लगता है। ईर्ष्या धीरे-धीरे लालच और फिर चोरी में बदल जाती है और वह दुल्हन के गहने चुरा लेता है। बाद में चम्पा को गहने मिल जाते हैं और वह पति को सार्वजनिक रूप से अपमानित करने के बजाय उसे ठाकुर साहब के विश्वास और उपकार याद दिलाती है। उसके शब्द चन्द्रप्रकाश के विवेक को जगा देते हैं। वह अंततः गहने चुपचाप वापस रख देता है और परिवार को लगता है कि गहने किसी चमत्कार से वापस मिल गए। वास्तविक 'चमत्कार' किसी दैवी घटना में नहीं, बल्कि एक अपराध की ओर जा चुके मनुष्य के भीतर नैतिक चेतना के जागने में है।

37 मिनट
मुंशी प्रेमचंद कृत दामुल का कैदी का कवर इमेज
विशेष
कहानी1932

दामुल का कैदी

Damul Ka Kaidi

प्रेमचंद की 'दामुल का कैदी' वर्ग-संघर्ष, मजदूर-शोषण, नैतिक जागरण और प्रायश्चित की अत्यंत प्रभावशाली कहानी है। धनी मिल-मालिक सेठ खूबचंद भारी लाभ के बावजूद मजदूरों की मजदूरी घटा देता है और हड़ताल के उत्तर में पुलिस की हिंसा का सहारा लेता है। मजदूरों के नेता गोपीनाथ के सामने आने पर खूबचंद उसे गोली मार देता है। लेकिन मृत्यु के क्षणों में भी गोपीनाथ उत्तेजित मजदूरों को खूबचंद की हत्या करने से रोक देता है। एक निर्दोष और उदार मनुष्य की हत्या का अपराध खूबचंद के अंत:करण को झकझोर देता है। वह स्वयं अपना अपराध स्वीकार करता है और चौदह वर्ष के काले पानी की सजा पाता है। उसके पंद्रह वर्षों के निर्वासन में उसकी सारी संपत्ति नष्ट हो जाती है और उसकी पत्नी प्रमिला कठिन परिस्थितियों में बेटे कृष्णचंद्र का पालन करती है। लौटने पर खूबचंद देखता है कि उसका बेटा गोपीनाथ जैसा ही रूप और स्वभाव रखता है। कृष्णचंद्र मजदूरों का नेता बनता है और अंततः हड़ताल के दौरान गोलियों से मारा जाता है। खूबचंद अपने बेटे के बलिदान को शोक के बजाय न्याय के पक्ष में वीरगति के रूप में स्वीकार करता है। जो व्यक्ति कभी मजदूर नेता को गोली मार चुका था, वही अंत में मजदूरों के अधिकार के पक्ष में खड़ा हो जाता है।

1 घंटे
मुंशी प्रेमचंद कृत ढपोरशंख का कवर इमेज
कहानी1931

ढपोरशंख

Dhaporsankh

प्रेमचंद की हास्य-व्यंग्य कहानी 'ढपोरशंख' मित्रता, विश्वास, दिखावे और अतिशयोक्ति की कथा है। एक भोला-भाला व्यक्ति एक लेखक की बढ़ा-चढ़ाकर कही गई कहानी पर विश्वास कर लेता है और उसके कारण हास्यास्पद परिस्थितियाँ पैदा होती हैं।

54 मिनट
मुंशी प्रेमचंद कृत भूत का कवर इमेज
कहानी1929

भूत

Bhoot

प्रेमचंद की 'भूत' अंधविश्वास, भय, अपराध-बोध और मानवीय मनोविज्ञान की कहानी है। एक परिवार को एक कथित भूत भयभीत करता है, लेकिन उसके पीछे छिपी वास्तविकता सामने आने पर पता चलता है कि अपराध, प्रतिशोध और मनुष्य की कल्पना स्वयं किसी भूत से कम भयावह नहीं हैं।

33 मिनट
मुंशी प्रेमचंद कृत दारोगाजी का कवर इमेज
कहानी1928

दारोगाजी

Daroga Ji

प्रेमचंद की कहानी 'दारोगाजी' पुलिस व्यवस्था, रिश्वत, प्रेम, विश्वासघात, भय और प्रतिशोध पर व्यंग्यपूर्ण कथा है। एक दारोगा रास्ते में हुए हमले के बाद अपने अतीत की वह कहानी सुनाता है जिसमें प्रेमिका से विश्वासघात, एक प्रतिद्वंद्वी की नाक कटवाना और वर्षों बाद उसी व्यक्ति का बदला शामिल है।

23 मिनट
मुंशी प्रेमचंद कृत चोरी का कवर इमेज
कहानी1927

चोरी

Chori

प्रेमचंद की 'चोरी' गरीबी, भूख, बाल-मन, अपराध-बोध और मानवीय करुणा पर आधारित संक्षिप्त कहानी है। भूख से विवश होकर एक बच्चा चोरी करता है, लेकिन यह घटना उसके भीतर गहरे अपराध-बोध और नैतिक संघर्ष को जन्म देती है। प्रेमचंद चोरी को केवल व्यक्तिगत अपराध के रूप में नहीं देखते, बल्कि उन सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियों पर भी प्रश्न उठाते हैं जो एक बच्चे को गलत रास्ते पर जाने के लिए विवश कर सकती हैं।

25 मिनट
मुंशी प्रेमचंद कृत भाड़े का टट्टू का कवर इमेज
कहानी1925

भाड़े का टट्टू

Bhade Ka Tattoo

प्रेमचंद की 'भाड़े का टट्टू' आदर्श और स्वार्थ, मित्रता और विश्वासघात तथा औपनिवेशिक सत्ता के दबाव में व्यक्ति की नैतिक परीक्षा की कहानी है। यशवंत और रमेश बचपन से मित्र हैं, लेकिन धन और जीवन-मूल्यों के विषय में दोनों की सोच अलग है। यशवंत आदर्शवादी होने का दावा करता है, जबकि रमेश खुलकर मानता है कि मनुष्य के लिए स्वार्थ का त्याग कठिन है। समय के साथ यशवंत मेहनत करके औपनिवेशिक न्याय-व्यवस्था में जिला-जज बन जाता है और रमेश निर्भीक राजनीतिक कार्यकर्ता तथा क्रांतिकारी बन जाता है। जब रमेश पर डकैती और हत्या का झूठा मुकदमा चलता है, यशवंत उसे निर्दोष जानते हुए भी अपनी नौकरी और प्रतिष्ठा के भय से उसके पक्ष में गवाही नहीं देता और उसे सात वर्ष की सजा सुना देता है। बाद में रमेश फिर पकड़ा जाता है। इस बार उसकी पत्नी यशवंत को भारी फीस और पचास हजार रुपये के इनाम का प्रस्ताव देती है। धन के लालच में यशवंत मुकदमा लड़ता है और रमेश को निर्दोष सिद्ध कर देता है। लेकिन रमेश उसके प्रति कृतज्ञ नहीं होता। वह कहता है कि यशवंत ने इस बार मित्रता या साहस से नहीं, बल्कि स्वार्थ से काम किया है। 'भाड़े का टट्टू' इस प्रकार केवल एक व्यक्ति का उपहास नहीं बल्कि उस नैतिक पतन का प्रतीक बन जाता है जिसमें सिद्धांत धन के सामने झुक जाते हैं।

35 मिनट