दण्ड
Dand
प्रेमचंद की 'दण्ड' रिश्वत, जातिगत बहिष्कार और सामुदायिक दंड की विडंबना पर तीखा व्यंग्य है। मिस्टर सिन्हा एक सम्मानित जज हैं जो अपने न्यायप्रिय और कानूननिष्ठ होने की छवि बनाए रखते हैं, लेकिन जगत पांडे से रिश्वत लेते हैं। मुकदमा हार जाने के बाद जगत पांडे उनके बंगले के सामने अनशन करके बैठ जाता है और अपनी मृत्यु के माध्यम से सिन्हा के भ्रष्टाचार को सार्वजनिक करने की धमकी देता है। अंततः सिन्हा पाँच हजार रुपये देने को तैयार होते हैं, लेकिन रकम हाथ में आते ही जगत पांडे गिरकर मर जाता है। इसके बाद बिरादरी और समाज सिन्हा का बहिष्कार कर देते हैं। सबसे बड़ा संकट तब आता है जब उनकी बेटी त्रिवेणी विवाह योग्य होती है और कोई भी परिवार बहिष्कृत सिन्हा के घर से संबंध स्वीकार नहीं करता। प्रेमचंद इस स्थिति के माध्यम से प्रश्न उठाते हैं कि अपराध यदि पिता ने किया है तो उसकी सजा निर्दोष बेटी को क्यों मिले?