Cover Image for Karbala (कर्बला) by Munshi Premchand - Play
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नाटक•1924•5 दृश्य

कर्बला

Karbala

मुंशी प्रेमचंद का ऐतिहासिक नाटक 'कर्बला' 680 ईस्वी में कर्बला की लड़ाई में इमाम हुसैन के बलिदान को दर्शाता है। यह बलिदान और सत्य के लिए खड़े होने की कहानी है।

दृश्य 5 / 5

पांचवां अंक

पात्र: इमाम हुसैन, अब्बास, ज़ैनब, सहस्रय, नशीमा, शिम्र

पहला दृश्य


समय ९ बजे दिन। दोनों फौ़जे लड़ाई के लिये तैयार हैं।

हुर: या हजरत, मुझे मैदान में जाने की इजाजत मिले। अब शहादत का शौक रोके नहीं रुकता।

हुसैन: वाह, अभी आए हो और अभी चले जाओगे। यह मेहमाननेवाजी का दस्तूर नहीं कि हम तुम्हें आते-ही-आते रुखसत कर दें।

हुर: या फ़र्जदे-रसूल मैं आपका मेहमान नहीं, ग़ुलाम हूं। आपके कदमों पर निसार होने के लिये आया हूं।

हुसैन: (हुर के गले मिलकर आंखों में आंसू भरे हुए) अगर तुम्हारी इसी में ख़ुशी है, तो आओ, ख़ुदा को सौंपा दुनिया के शहीदों में तेरा नाम हो भाई, उक़बा में तुझे राहतोआराम हो भाई।

हुर मैदान की तरफ़ चलते हैं, हुसैन खेमे के दरवाजे तक उन्हें पहुंचाते आते हैं। खेमे से निकलते हुए हुर हुसैन के कदमों को बोसा देते हैं, और चले जाते हैं।

हुर मैदान में जाकर

ग़ुलाम हजरते शब्बीर रन में आता है, वही जो दीन का है बंदा, वह मेरा आका है। वह आए ठीक के खम, जिसकी मौत आई है। उसी का पीने को खूँ मेरी तेग आई है।

सफ़वान उधर से झूमता हुआ आता है।

हुर: सफवान, कितनी शर्म की बात है कि तुम फ़र्जदे-रसूल से जंग करने आए हो?

सफवान: हम सिपाहियों को माल, दौलत, जागीर और रुतवा चाहिए, हमें दीन और आक़बत से क्या काम? संभल जाओ।

दोनों पहलवानों में चोटें चलने लगती हैं।

अब्बास: वह मारा। सफवान का सीना टूट गया, ज़मीन पर तड़पने लगा।

हबीब: सफ़वान के तीनों भाई दौड़े चले आते हैं।

अब्बास: वाह मेरे शेर! एक तलवार से लिया, दूसरा भी गिरा, और तीसरा भागा जाता है।

हबीब: या ख़ुदा, ख़ैर कर, हुर का घोड़ा गिर गया।

हुसैन: फ़ौरन एक घोड़ा भेजो।

एक आदमी हुर के पास घोड़ा लेकर जाता है।

अब्बास: यह पीरा नासाली और यह दिलेरी! ऐसा बहादुर आज तक नज़र से नहीं गुज़रा। तलवार बिजली की तरह कौंध रही है।

हुसैन: देखो, दुश्मन का लश्कर कैसा पीछे हटा जाता है। मरनेवालों के सामने खड़ा होना आसान नहीं है। दिलेरी को इंतहा है।

अब्बास: अफ़सोस, अब हाथ नहीं उठते। तीरों से सारा बदल चलनी हो गया।

शिमर: तीरों की बारिश करो, मार लो। हैफ़ है तुम पर कि एक आदमी से इतने ख़ौफ़ज़दा हो। वह गिरा, काट लो सिर और हुसैन की फ़ौज में फेंक दो।

कई आदमी हुर के सिर को काटने को चलते हैं, कि हुसैन मैदान की तरफ़ दौडते हैं।

एक वह हुसैन दौड़े चले आते हैं। भागों, नहीं तो जान न बचेगी।

हुसैन: (हुर की लाश से लिपटकर) टुकड़े हैं बदन, ज़ख़्म बहुत खाए हैं भाई, हो होश में आ लाश पै हम आए हैं भाई।

(हुर आंखें खोलकर देखते हैं, और अपना सिर उनकी गोद में रख देते हैं।)

हुर: या हजरत, आपके कदमों पर निसार हो गया, ज़िंदगी ठिकाने लगी।

तकिया तेरे जानू का मयस्सर हुआ आका़, जर्रा था यह सब महरे-मुनौवर हुआ आका़।

हुसैन: हाय! मेरा जांबाज रफीक़ दुनिया से रुखसत हो गया। यह वह दिलावर था, जिसने हक़ पर अपने रुतबा और दौलत को निसार कर दिया, जिसने दीन के लिये दुनिया को लात मार दी। ये हक़ पर जान देने वाले हैं, जिन्होंने इस्लाम के नाम को रोशन किया है, और हमेशा रोशन रखेंगे। जा मुहम्मद के प्यारे, जन्नत तेरे लिए हाथ फैलाये हुए है। जा, और हयात अब्दी के लुत्फ उठा। मेरे नाना से यह दीजियो कि हुसैन भी जल्द ही तुम्हारी ख़िदमत में हाजिर होने वाला है, और तुम्हारे कुन्बे को साथ लिए हुए। काबिल ताजीम हैं वे माताएं, जो ऐसे बेटे पैदा करती हैं!


दूसरा दृश्य


समर-भूमि। साद की तरफ़ से दो पहलवान आते हैं– यसार और सालिम।

यसार: (ललकारकर) कौन निकलता है, हुर का साथ देने के लिये। चला जाए, जिसे मौत का मजा चखना हो। हम वह है, जिनकी तलवार से क़ज़ा की रूह भी क़जा होती है।

अब्दुल्लाह कलवी हुसैन के लश्कर से निकलते हैं।

यसार: तू कौन हैं?

अब्दुल्लाह: मैं अब्दुल्लाह बिन अमीर कलवी हूं, जिसकी तलवार हमेशा बेदीनों के ख़ून की प्यासी रहती है।

यसार: तेरे मुकाबले में तलवार उठाते हमें शर्म आती है। जाकर हबीब या जहीर को भेज।

अब्दुल्लाह: तू उन सरदार के-फौज़ से क्या लड़ेगा, जिनकी ज़िंदगी ज़ियाद की गुलामी में गुजरी। तुझे उन रईसों को ललकारते हुए शर्म भी नहीं आती। तुझ जैसों के लिये मैं ही काफी हूं।

यसार तलवार लेकर झपटता है। अब्दुल्लाह एक ही वार में उसका काम तमाम कर देते हैं। तब सालिम उन पर टूट पड़ता है। अब्दुल्लाह की पांचों उंगलियां कट जाती है, तलवार ज़मीन पर गिर पड़ती है वह बाएं हाथ में नेजा ले लेते हैं, और सालिम के सोने में नेजा चुभा देते हैं। वह भी गिर पड़ता है। ज़ियाद की फ़ौज से निकलकर लोग अब्दुल्लाह को घेर लेते हैं। इधर से कमर लकड़ी लेकर दौड़ती है।

कमर: मेरी जान तुम पर फ़िदा हो, रसूल के नवासे के लिये लड़ते-लड़ते जान दे दो। मैं भी तुम्हारी मदद को आई।

अब्दुल्लाह: नहीं-नहीं, कमर मेरे लिये तुम्हारी दुआ काफी है; इधर मत आओ।

क़मर: मैं इन शैतानों को लकड़ी से मारकर गिरा दूंगी। एक के लिये दो भेजे, जब दोनों जहन्नम पहुंच गए, जो सारी फौज़ निकल पड़ी। यह कौन-सी जंग है?

अब्दुल्लाह: मैं एक ही हाथ से इन सबको मार गिराऊंगा। तुम खेमे में जाकर बैठो।

कमर: मैं जब तक जिंदा हूं, तुम्हारा साथ छोड़ूंगी। तुम्हारे साथ ही रसूल पाक की ख़िदमत में हाजिर हूंगी।

हुसैन: कमर से ऐ नेक खातून, तुझ पर अल्लाह ताला रहम करे। तुम वहां जाओगी, तो यहां मस्तूरात की ख़बर लेगा? औरतों को जिहाद करना मना है। लौट आओ, और देखो, तुम्हारा जांबाज शौहर एक हाथ से कितने आदमियों का मुकाबला कर रहा है। आफ़रीं है तुम पर, मेरे शेर। तुमने अपने रसूल की जो ख़िदमत की है, उसे हम कभी न भूलेंगे। ख़ुदा तुम्हें उसकी सजा देगा। आह! जालिमों ने तीर मारकर ग़रीब को गिरा दिया! ख़ुदा उसे जन्नत दे।

क़मर: या हज़रत इसका ग़म नहीं। वह आप पर निसार हो गए, इससे बेहतर और कौन-सी मौत हो सकती थी। काश मैं भी उनके साथ चली जाती। मेरे जांबाज! सच्चे दिलावर जा, और जन्नत में आराम कर। तू वह था जिसने कभी सायल को नही फेरा, जिसकी नीयत कभी ख़राब और निगाह कभी बुरी नहीं हुई। जा, और जन्नत में आराम कर।

हुसैन: कमर सब्र करो कि इसके सिवा कोई चारा नहीं है।

कमर: मुझे उनके मरने का ग़म नहीं हैं। मैं ख़ुश हूं कि उन्होंने हक़ पर जान दी। इस वक्त अगर मेरे सौ बेटे होते, तो मैं इसी तरह उन्हें भी आपके कदमों पर निसार कर देती। काश वहब इतना जनपरस्त न होता…।

वहब का प्रवेश

वहब: अस्सलामअलेक या हज़रत हुसैन।

क़मर: वहब को गले लगाकर ज़रा देर पहले ही क्यों न आ गए बेटा कि अपने बाप का आखिरी दीदार कर लेते। नसीमा कहां है?

वहब: यहीं खेमों के पीछे खड़ी है?

क़मर: मैं अभी तुम्हारा ही जिक्र कर रही थी। क्यों बेटा, अपने बाप का नाम रोशन न करोगे? मेरा तुम्हारे ऊपर बड़ा हक़ है। तुम मेरे जिगर का ख़ून पीकर पले हो। मेरा दूध हलाल न करोगे! मेरी तमन्ना है कि हुसैन पर अपनी जान निसार करो, ताकि दुनिया में क़मर का नाम क़मर की तरह चमके, जिसका और बेटा, दोनों की हक़ पर शहीद हुए।

वहब: अम्माजान, मेरी भी दिली तमन्ना यह थी और है। मैं अपने बाप के नाम को दाग़ नहीं लगाना चाहता, मगर नसीमा को क्या करूं? उसकी मुसीबतों का ख़याल हिम्मत को पस्त कर देता है। जाता हूं, अगर उसने इजाजत दे दी, तो मेरे लिये उससे बढ़कर ख़ुशी नहीं हो सकती।

क़मर: बेटा, तुम उसकी आदत से वाकिफ होकर फिर उसी से पूछने जाते हो। इसके मानी इसके सिवा और कुछ नहीं है कि तुम खुद मैदान में जाते हुए डरते हो।

वहब नसीमा के पास जाता है।

नसीमा: काश ज़रा देर कब्ल आ जाते, तो अब्बाजान की आखिरी दुआएं मिल जाती।

हमारी बदनसीबी नसीमा मैं जानती हूं, तुम हमेशा के लिये खैरबाद कहने आए हो। जाओ, प्यारे, और एक सपूत बेटे की तरह अपने वालिद का नाम रोशन करो। काश औरतों पर जिहाद हराम न होता, तो मैं भी तुम्हारे ही साथ अपने को हक़ की हिमायत में निसार कर देती। जब से मैंने फ़र्जदें-रसूल की पाक सूरत देखी है, मुझे ऐसा मालूम हो रहा है कि मेरा दिल रोशन हो गया है, और उस रोशनी में कुर्बान हो जाओ। नसीमा जब तक जिएगी, तुम्हारी मज़ार पर फ़ातिहा और दरूद पढ़ेगी। जाओ, जन्नत में मुझे भूल न जाना। मैंने हवस के दाम में फंसकर तुम्हें फ़र्ज के रास्ते से हटा दिया था। रसूल पाक से कहना, मेरा गुनाह मुआफ करें। जाओ, इन आंसुओं का ख़याल न करो, वरना ये आंसू तुम्हारे जोश को बुझा देंगे। मैं अभी बहुत दिन तक रोऊंगी, तुम इसका ग़म न करना। जाओ,

तुम्हें ख़ुदा को सौंपाआह! दिल फटा जाता है। कैसे सब्र करूं?

वहब आंसू पोंछता हुआ जाता है।

कमर: अंदर आकर बेटी, तुझे गले से लगा लूं, और तुझ पर अपनी जान फ़िदा, तूने ख़ानदान की आबरू रख ली।

नसीमा: अम्माजान, रसूल पाक ने अगर कोई बेइंसाफी की, तो वह यही है कि औरतों पर जिहाद हराम कर दिया, वरना इस वक्त मैं वहब के पहलू में होती। देखिए, दुश्मन उन पर चारों तरफ़ से कितनी बेदर्दी से नेजे़ और तीर फेंक रहे हैं। किसी की हिम्मत नहीं है कि उनके सामने खम ठोककर आए। आह! देखिए, उनके हाथ कितनी तेजी से चल रहे हैं। जिस पर उनका एक हाथ पड़ जाता है, वह फिर नहीं उठता, दुश्मन भागे जाते हैं। हा बुजदिलो, नामर्दो! वह इधर चले आ रहे हैं, बदन ख़ून से तर हैं, जिस पर भी ज़ख़्म लगे हैं।

वहब आकर खेमे के सामने खड़ा हो जाता है।

वहब: अम्माजान, मुझसे राजी हुई?

क़मर: बेटा, तुझ पर हजार जान से निसार हूं। तुमने बाप का नाम रोशन कर दिया, लेकिन मैं चाहती हूं कि जब तक तेरे हाथों में ताक़त है, तब तक दुश्मनों को आराम न लेने दे।

वहब: स्वगत आह! हक़ पर जान देना भी उतना आसान नहीं है, जितना लोग ख़याल करते हैं। प्रकट अम्मा, यही मेरा भी इरादा है, लेकिन नसीमा के आसुंओं की याद मुझे खींच लाई है।

क़मर चली जाती है।

नसीमा, तुम्हें आखिरी बार देखने की तमन्ना मैदान से खींच लाई। सनम का पुजारी सनम ही पर कुर्बान हो सकता है, दीन और ईमान, हक़ और इंसाफ़, ये सब उसकी नज़रों में खिलौने की तरह लगते हैं। मुहब्बत दुनिया की सबसे मजबूत बेड़ी है, सबसे सख्त जंजीर। चौंककर कोई पहलवान मैदान में आकर ललकार रहा है। हाय! लानत हो उन पर, जो हक़ को पामाल करके हजारों को नामुराद मरने पर मज़बूर करते हैं। नसीमा, हमेशा के लिये रूखसत? मेरी तरफ़ एक बार मुहब्बत की निगाहों से देख लो, उनमें मुहब्बत का ऐसा जाम हो कि उसका नशा मेरे सिर से कयामत तक न उतरे।

नसीमा: मेरी जान आह! दिल निकला जाता है…।

वहब मैदान की तरफ़ चला जाता है।

ख़ुदा! काश मुझे मौत आ जाती कि वह दिलखराश नज्जारा आंखों से न देख पड़ता मेरा जवान दिलेर जांबाज शौहर मौत के मुंह में जा रहा है, और मैं बैठी देख रही हूं। ज़मीन, तू क्यों नहीं फट जाती कि मैं उसमें समा जाऊं, बिजली आसमान से गिरकर क्यों मेरा खातमा नहीं कर देती! वह देव उन पर तलवार लिए झपटा, या ख़ुदा मुझ नामुराद पर रहम कर। दूर हो ज़ालिम, सीधा जहन्नम को चला जा। अब कोई आगे नहीं आता है। हाय! जालियों ने घेर लिया। ख़ुदा, तू यह बेइंसाफी देख रहा है, और इन मूजियों पर अपना कहर नहीं नाजिल करता। एक के लिये एक फ़ौज भेज देना कौन-सा आईने-जंग है। हाय! ख़ुदा गजब हो गया। अब नहीं देखा जाता।

छाती पीटकर रोने लगती है, शिमर वहब का सिर काट कर फेंक देता है, कमर दौड़कर सिर को गोद में उठा लेती है, और उसे आंखों से लगाती हैं।

कमर: मेरे सपूत बेटे, मुबारक है यह घड़ी कि मैं तुझे अपनी आंखों से हक़ पर शहीद होते देख रही हूं। आज तू मेरे कर्ज़ से अदा हो गया, आज मेरी मुराद पूरी हो गई, आज मेरी जिदंगी सफल हो गई, मैं अपनी सारी तकलीफ़ का सिला पा गई। ख़ुदा तुझे शहीदों के पहलू में जगह दे। नसीमा…मेरी जान, आज तूने सच्चा सोहाग पाया है, जो कयामत तक तुझे सुहागिन बनाए रखेगा। अब हूरें तरे तलुओं-तले आंखे बिछांएगी, और फरिश्ते तेरे क़दमों की ख़ाक का सुरमा बनाएंगे।

वहब का सिर नसीमा की गोद में रख देती है, नसीमा सिर को गोद में रखे हुए बैठ करके रोती है।

काजल बना-बनाके तेरी खाकेदर को मैं रोशन करूंगी अपनी सवादे-नज़र को मैं। आंसू भी खश्क हो गए, अल्लाह रे सोज़े-ग़म, क्योंकर बुझाऊँ आतिशे-दाग़े जिगर को मैं। तेरे सिवा है कौन, जो बेकस की ले ख़बर, आती न तेरे दर पर, तो जाती किधर को मैं। तलवार कह रही है जवानी-

क़ौम सेमुद्दत से ढूंढ़ती हूं तुम्हारी कमर को मैं। बाज आई मैं दुआ ही से, या रब कि कब तलक करती फिरू तलाश जहां में असर को मैं। गर-तेरी खाके दर से न मिलता यह इफ्तखार, करती न यों बुलंद कभी अपने सिर को मैं।

हाय प्यारे! तुम कितने बेवफा़ हो, मुझे अकेले छोड़कर चले जाते हो! लो, मैं भी आती हूं। इतनी जल्दी नहीं, ज़रा ठहरो।

साहसराय का प्रवेश

साहसराय: सती, तुम्हें नमस्कार करता हूं।

नसीमा: साहब, आप खूब आए। आपका शुक्रिया तहेदिल से शुक्रिया आपने ही मुझे आज इस दर्जे पर पहुंचाया। आपके वतन में औरतें अपने शौहरों के बाद जिंदा नहीं रहती। वे बड़ी ख़ुशनसीब होती हैं।

साहसराय: सती, हम लोगों को आशीर्वाद दो।

नसीमा: हंसकर यह दरजा! अल्लाह रे मैं, यह वहब की बदौलत, उसकी शहादत के तुफैल, ख़ुदा, तुमसे मेरी दुआ है, मेरी क़ौम में कभी शहीदों की कमी न रहे, कभी वह दिन न आए कि हक़ को जांबाजों की ज़रूरत हो, और उस पर सिर कटाने वाले न मिले। इस्लाम, मेरा प्यारा इस्लाम शहीदों से सदा मालामाल रहे!

अपने दामन से एक सलाई निकालकर वहब के ख़ून में डुबाती।

क्यों, साहसराय, तुम्हारे यहां सती के जिस्म से आग निकलती है, और वह उसमें जल जाती है। क्या बिला आग के जान नहीं निकालती?

साहसराय: नसीमा, तू देवी है। ऐसी देवियों के दर्शन दुर्लभ होते हैं। आकाश से देवता तुझ पर पुष्प-वर्षा कर रहे हैं।

नसीमा आंखों में सलाई फेर लेती है, और एक आह के साथ उसकी जान निकल जाती है।


तीसरा दृश्य


दोपहर का समय। हजरत हुसैन अब्बास के साथ खेमे के दरवाजे पर खड़े मैदाने-जंग की तरफ़ ताक रहे हैं।

हुसैन: कैसे-कैसे जांबाज दोस्त रुखसत हो गए और होते जा रहे हैं। प्यास से कलेजे मुंह को आ रहे हैं, और ये ज़ालिम नमाज तक की मुहलत नहीं देते। आह! जहीर का सा दीनदार उठ गया, मुसलिम बिन ऊसजा इस आलमेजईफ़ी में भी कितने जोश से लड़े। किस-किसका नाम गिनाऊं। अब्बास-या हजरत, मुझे अंदेशा हो रहा है कि शिमर कोई नया सितम ढाने की तैयारियां कर रहा है। यह देखिए, वह सिपाहियों की एक बड़ी जमैयत लिए इधर चला जाता है।

हबीब: जोश से शिमर, खबरदार, अगर इधर एक क़दम भी बढ़ाया, तो तेरी लाश पर कुत्ते रोवेगे। तुझे शर्म नहीं आती ज़ालिम कि अहलेबैत के खेमे पर हमला करना चाहता है।

शिमर: हम इस हमले से जंग का फ़ैसला कर देना चाहते हैं। जवानो, तीर बरसाओ।

हुसैन: अफसोस, घोड़े मरे जा रहे हैं। घुटने टेककर बैठ जाओ, और तीरों का जवाब दो। ख़ुदा ही हमारा वाली और हाफ़िज हैं।

शिमर: बढ़ो-बढ़ो, एक आन में फ़ैसला हुआ जाता है।

सिपाही: देखते नहीं हो; हमारी सफ़ें खाली होती जाती हैं! यह तीर हैं। या ख़ुदा का गजब। हम आदमियों से लड़ने आए हैं, देवों से नहीं।

शिमर: लड़कियां जलाओ, फ़ौरन इन खेमों पर आग के अंगारे फेंको, जलते हुए कुंदे फेंको जलाकर स्याह कर दो।

आग की बारिश होने लगती है। औरतें खेमे से चिल्लाती हुई बाहर निकल आती है।

जैनब: तुफ् है तुझ पर ज़ालिम, मर्दों से नहीं, औरतों पर अपनी दिलेरी दिखाता है।

हुसैन: साद! यह क्या सितम हैं? तुम लोगों का दुश्मन मैं हूं। मुझसे लड़ो, खेमों में और औरतों और बच्चों के सिवा कोई मर्द नहीं है। वे ग़रीब निकलकर भाग न सकी, तो हम इधर चले जायेगें, तुमसे लड़ न सकेंगे। अफसोस है कि इतनी जमैयत के होते हुए भी तुम यह विदअतें कर रहे हो।

शिमर: फेंको अंगारे। मुझे दोजख में जलना नसीब हो, अगर मैं इन सब खेमों को जला न डालूं।

शीस: शिमर, तुम्हारी यह हरकत आईने जंग के खिलाफ़ है। हिसाब के दिन तुम्हीं इसके ज़िम्मेदार होंगे।

कीस: रोको अपने आदमियों को।

शिमर: मैं अपने फ़ैल का मुख्तार हूं। आग बरसाओ, लगा दो आग।

शीस: साद, ख़ुदा को क्या मुंह दिखाओगे?

हबीब: दोस्त, टूट पड़ो, शिमर, पर, बाज की तरह टूट पड़ो। नामूसे-हुसैन पर निसार हो जाओ। एकबारगी नेजों का वार करो।

हबीब और उनके साथ दस आदमी नेजे ले जाकर शिमर पर टूट पड़ते हैं। शिमर भागता है, और उसकी फ़ौज भी भाग जाती है।

हुसैन: हबीब, तुमने आज अहलेबैत की आबरू रख ली। ख़ुदा तुम्हें इसकी सज़ा दे।

हबीब: या मौला, दुश्मन दो-चार लम्हों के लिए हट गया है, नमाज का वक्त आ गया है, हमारी तमन्ना है कि आपके साथ आखिरी नमाज पढ़ ले। शायद फिर यह मौका न मिले।

हुसैन: ख़ुदा तुम पर रहम करे, अजान दो। ऐ साद, क्या तू इस्लाम की शरियत को भी भूल गया? क्या इतनी मुहलत न देगा कि नमाज पढ़कर जंग की जाय?

शिमर: ख़ुदा पाक की क़सम, हर्गिज नहीं। तुम बेनमाज़ क़त्ल किए जाओगे। शरियत बागियों के लिए नहीं है।

हबीब: या मौला, आप नमाज अदा फरमाएं, इस मूजी को बकने दें। इसकी इतनी मजाल नहीं है कि नमाज में मुखिल हो।

लोग नमाज पढ़ने लगते हैं। साहसराय और उनके सातों भाई हुसैन की पुश्त पर खड़े शिमर के तीरों से उनको बचाते रहते हैं। नमाज खत्म हो जाती है।

हुसैन: दोस्तों, मेरे प्यारे ग़मसारो, यह नमाज इस्लाम की तारीख में यादग़ार रहेगी। अगर ख़ुदा के इन दिलेर बंदों ने, हमारे पुश्त पर खड़े होकर, हमें दुश्मनों के तीरों से न बचाया होता, तो हमारी नमाज हर्गिज न पूरी होती। ऐ हक़परस्तों, हम तुम्हें सलाम करते हैं। अगर्चे तुम मोमिन नहीं हो, लेकिन जिस मज़हब के पैरों ऐसे हक़परजर, ऐसे इंसाफ़ पर जान देन वाले, ज़िंदगी को इस तरह नाचीज समझने वाले, मजलूमों की हिमायत में सिर काटने वाले हों, वह सच्चा और मिनजानिब ख़ुदा है। वह मज़हब दुनिया में हमेशा क़ायम रहे और नूरे इस्लाम के साथ उसकी रोशनी भी चारों तरफ़ फैले।

साहसराय: भगवन् आपने हमारे प्रति जो शुभेच्छाएं प्रकट की हैं, उनके लिए हम आपके कृतज्ञ हैं। मेरी भी ईश्वर से यही प्रार्थना है कि जब कभी इस्लाम को हमारे रक्त की आवश्यकता हो, तो हमारी जाति में अपना वक्ष खोल देने वालों की कमी न रहे। अब मुझे आज्ञा हो कि चलकर अपने प्रायश्चित की क्रिया पूरी करूं।

हुसैन: नहीं, मेरे दोस्तों, जब तक हम बाकी हैं, अपने मेहमानों में न जाने देंगे?

साहसराय: हजरत, हम आपके मेहमान नहीं, सेवक हैं। सत्य और न्याय पर मरना ही हमारे जीवन का मुख्य उद्देश्य है। यह हमारा कर्त्तव्य मात्र है, पर किसी पर एहसान नहीं।

हुसैन: आह! किस मुंह से कहूं कि जाइए। ख़ुदा करे इस मैदान में हमारे और आपके ख़ून से जिस इमारत की बुनियाद पड़ी है, वह जमाने की नज़र में हमेशा महफूज रहे, वह कभी वीरान न हो, उसमें हमेशा नग़मे की सदाएं बुलंद हों, और आफ़ताब की किरणें हमेशा उस पर चमकती रहें।

सातों भाई गाते हुए मैदान में जाते हैं।

जय भारत, जय भारत, जय मम प्राणपते! भाल विशाल चमत्कृत सित हिमगिर राजे, परसत बाल प्रभाकर हेम-प्रभा ब्राजे। जय भारत… ऋषि-मुनि पुण्य तपोनिधि तेज-पुंजधारी, सब विधि अधम अविद्या भव-भय-तमहारी। जय भारत… जय जय वेद चतुर्मुख अखिल भेद ज्ञाता, सुविमल शांति सुधा-निधि मुद मंगलदाता। जय भारत… जय जय विश्व-विदांवर जय विश्रुत नामी, जय जय धर्म-धुरंधर जय श्रुति-पथगामी। जय भारत… अजित अजेय अलौकिक अतुलित बलधामा, पूरन प्रेम-पयोनिधि शुभ गुन-गुन-ग्रामा। जय भारत… हे प्रिय पूज्य परम मन नमो-नमो देवा, बिनवत अधम-पापि जन ग्रहन करहु सेवा। जय भारत…

अब्बास: ग़ज़ब जांबाज हैं। अब मुझ पर यह हकीकत खुली कि इस्लाम के दायरे के बाहर भी इस्लाम है। ये सचमुच मुसलमान हैं और रसूल पाक ऐसे आदमियों की शफ़ाअत न करें, मुमकिन नहीं।

हुसैन: कितनी दिलेरी से लड़ रहे हैं!

अब्बास: फौज़ में बेख़ौफ़ घुसे जाते हैं। ऐसी बेजिगरी से किसी के मौत के मुंह में जाते नहीं देखा।

अली अकबर: ऐसे पांच सौ आदमी भी हमारे साथ होते, तो मैदान हमारा था।

हुसैन: आह! वह साहसहाय घोड़े से गिरे। मक्कार शिमर ने पीछे से वार किया। इस्लाम को बदनाम करने वाला मूजी!

अब्बास: वह दूसरा भाई भी गिरा।

हुसैन: इनके रिवाज के मुताबिक लाशों को जलाना होगा। चिता तैयार कराओ।

अली अकबर: तीसरा भाई भी मारा गया।

अब्बास: जालिमों ने चारों तरफ़ से घेर लिया, मगर किस गजब के तीरंदाज हैं। तीर का शोला-सा निकलता है!

अली अकबर: अल्लाह, उनके तीरों से आग निकल रही है। कोहराम मच गया, सारी जमैयत परेशान भागी जा रही है।

अब्बास: चारों सूरमा दुश्मन के खेमों की तरफ़ जा रहे हैं। फौज़ काई की तरह फटती जाती है। वह खेमों से शोला निकलने लगे!

अली अकबर: या ख़ुदा, चारों देखते-देखते ग़ायब हो गये।

हुसैन: शायद उनके सामने कोई खदक खोदी गई है।

अब्बास: जी हां, यही मेरा भी ख़याल है।

हुसैन: चिताएं तैयार कराओ। अगर फ़रेब न किया जाता, तो ये सारी फौज़ को खाक़ कर देते। तीर है या मौजजा।

अब्बास: ख़ुदा के ऐसे बंदे भी है, जो बिना गरज के हक़ पर सिर कटाते हैं।

हुसैन: ये उस पाक मुल्क के रहने वाले हैं, जहां सबसे पहले तौहीद की सदा उठी थी। ख़ुदा से मेरी दुआ है कि इन्हें शहीदों में ऊंचा रुतबा दे। वह चिता शोले उठे! ऐ ख़ुदा, यह सोज इस्लाम के दिल से कभी न मिटे, इस क़ौम के लिए हमारे दिलेर हमेशा अपना ख़ून बहाते रहें, यह बीज जो आज आग में बोया गया है, क़यामत तक फलता रहे।


चौथा दृश्य


जैनब अपने खेमे में बैठी हुई है। शाम का वक्त

जैनब: स्वगत अब्बास और अली अकबर के सिवा अब भैया के कोई रफ़ीक़ बाकी नहीं रहे। सब लोग उन पर निसार हो गए। हाय, कासिम-सा जवान, मुसलिम के बेटे, अब्बास के भाई, भैया इमाम हसन के चारों बेटे, सब दाग़ दिए गए। देखते-देखते हरा-भरा बाग वीरान् हो गया, गुलजार बस्ती उजड़ गई। सभी माताओं के कलेजे ठंडे हुए। बापों के दिल बाग़-बाग़ हुए। एक में ही बदनसीब नामुराद रह गई। ख़ुदा ने मुझे भी दो बेटे दिए हैं, पर जब वे काम ही न आए, तो उनको देखकर जिगर क्या ठंडा हो। इससे तो यही बेहतर होता कि मैं बांझ ही रहती। तब यह बेवफ़ाई का दाग़ तो माथे पर न लगता। हुसैन ने इन लड़कों को अपने लड़कों की तरह समझा, लड़कों की तरह पाला, पर वे इस मुसीबत में, तारीकी में, साए की तरह साथ छोड़ देते हैं, दग़ा कर रहे हैं। हां, यह दग़ा नहीं, तो और क्या है? आखिर भैया अपने दिल में क्या समझ रहे होंगे। कहीं यह ख़याल न करते हों कि मैंने ही उन्हें मैदान जाने से मना कर दिया है। यह ख़याल न पैदा हो कि मैं उनके साथ अपनी गरज निकालने के लिए जमानासाजी कर रही थी। आह! उन्हें क्योंकर अपना दिल खोलकर दिखा दूं कि वह उनके लिए कितना बेकरार है, पर अपने लड़कों पर क़ाबू नहीं। जाओ, जैसे तुमने मेरे मुंह में कालिख लगाई है, मैं भी तुम्हें दूध न बख्शूंगी। ये इतने कम हिम्मत कैसे हो गए। जिसका नाना रण में तूफान पैदा कर देता था, जिनके बाप की ललकार सुनकर दुश्मनों के कलेजे दहल जाते थे, वे ही लड़के इतने वादे, पस्तहिम्मत हों। यह मेरी तक़दीर की खराबी, और क्या! जब रण में जाना ही नहीं, तो वे हथियार सजाकर क्यों मुझे जलाते हैं। भैया को कौन-सा मुंह दिखाऊंगी, उनके सामने आंखें कैसे उठाऊंगी।

दोनों लड़कों का प्रवेश

औम: अम्माजान, आप हमारा फ़ैसला कर दीजिए। मैं पहले रण में जाता हूं, पर यह मुझे जाने नहीं देता, कहता है पहले में जाऊंगा। सुबह से यही बहस छिड़ी हुई है, किसी तरह छोड़ता ही नहीं। बताओ, बड़े भाई के होते हुए छोटा भाई शहीद हो, यह कहां का इंसाफ़ है?

मुहम्मद: तो अम्माजान, यह कहां का इंसाफ़ है कि बड़ा भाई तो मरने जाये, और छोटा भाई बैठा उसकी लाश पर मातम करे। अम्मा, आप चाहे ख़ुश हों या नाराज, यह तो मुझसे न होगा। शायद इनका यह ख्याल हो कि मैं जब क़ाबिल नहीं हूं। छोटा हूं, क्या जवाब दूं, लेकिन ख़ुदा चाहेगा,

एक हमले में गर हम उलट दें सफ़े लश्कर, फिर दूध न अपना हमें तुम बख्शियो मादर! शह के क़दमे-पाक पै सिर देके फिरेंगे, या रण से सिरे-शिम्रोउमर लेके फिरेंगे।

अम्माजान, आप न मेरी ख़ातिर कीजिए न इनकी, इंसाफ़ से फरमाइये पहले किसको जाने का हक़ है?

जैनब: अच्छा, तुम लोगों के रण में जाने का यह मतलब था। मैं कुछ और समझ रही थी। प्यारो, तुम्हारी मां ने तुम्हारी दिलेरी पर शक किया, इसे माफ करो। मालूम नहीं, मुझे क्या हो गया था कि मेरे दिल में तुम्हारी तरफ़ से ऐसे बसबसे पैदा हुए। लो, मैं झगड़ा चुकाए देती हूं। तुम दोनों ख़ुदा का नाम लेकर साथ-साथ सिधारो, और दिखा दो कि तुम किसी शब्बीर की उल्फ़त में कम नहीं हो। मेरी और मेरे ख़ानदान की आबरू तुम्हारे हाथ है।

शेरों के लिए नंग है तलवार से डरना, मैदान में तन-मन के सिपर सीनों को करना। हर ज़ख़्म पै दम उलफ़ते-शब्बीर का भरना, कुरबान गई जीने से, बेहतर है वह मरना। दुनिया में भला इज्जते-इस्लाम तो रह जाय, तुम जीते रहो, या न रहो, नाम तो रह जाय। नाना की तरह कौन बग़ा करता है देखूं? सिर कौन हजारों के जुदा करता है देखूं? हक़ कौन बहुत मां का अदा करता है देखूं? एक-एक सफ़े-जंग में क्या करता है देखूं? दिखलाइयों हाथों से सफाई का तमाशा, मैं परदे से देखूंगी लड़ाई का तमाशा।

यह तो मैं जानती हूं कि तुम नाम करोगे, पर कमसिन बहुत हो, इसलिए समझती हूं। जाओ, तुम्हें ख़ुदा को सौंपा।

दोनों मैदान की तरफ़ जाकर लड़ते हैं, और जैनब परदे की आड़ से देखती है। शहरबानू का प्रवेश।

शहरबानू: है-है, बहन, यह तुमने क्या सितम किया? इन नन्हें-नन्हें बच्चों को रण में झोंक दिया। अभी अली अकबर बैठा ही हुआ है, अब्बास मौजूद ही है, ऐसी क्या जल्दी पड़ी थी?

जैनब: वे किसी के रोके रुकते थे? कल ही से हथियार सजे मुंतजिर बैठे है। रात-भर तलवारें साफ की गई है और यहां आए ही किसलिए थे। जिन्दगी बाकी है, तो दोनों फिर आएंगे। मर जाने का ग़म नहीं, आखिर किस दिन काम आते। जिहद में छोटे-बड़े की तमीज़ नहीं रहती। मैं रसूल पाक को कौन मुंह दिखाती।

शहरबानू: देखो, हाय-हाय, दोनों के दुश्मनों को किस तरह घेर रखा है। कोई जाकर बेचारों को घेर भी नहीं लेता। शब्बीर भी बैठे तमाशा देख रहे हैं। यह नहीं कि किसी को भेज दें। हैं तो ज़रा-ज़रा से, पर कैसे मछलियों की तरह चमकते फिरते है! ख़ैर अच्छा हुआ, अब्बास दौड़े जा रहे हैं।

अब्बास का मैदान की तरफ़ दौड़े हुए आना।

जैनब: खेमे से निकलकर अब्बास, तुम्हें रसूल पाक की क़सम है, जो उन्हें लौटाने जाओ। हां, उनका दिल बढ़ाते जाओ। क्या मुझे शहादत के सवाब में कुछ भी देने का इरादा नहीं है? भैया तो इतने खुदग़रज कभी न थे!

दोनों भाई मारे जाते हैं। हुसैन और अब्बास उनकी लाश उठाने जाते हैं, और जैनब एक आह भरकर बेहोश हो जाती है।


पांचवां दृश्य


१२ बजे रात का समय। लड़ाई ज़रा देर के लिए बंद है। दुश्मन की फ़ौज ग़ाफिल है। दरिया का किनारा। अब्बास हाथों में मशक लिए दरिया के किनारे खड़े हैं।

अब्बास: दिल में हम दरिया से कितने क़रीब हैं। इतनी ही दूर पर यह दरिया मौजें मार रहा है, पर हम पानी के एक-एक बूंद को तरसते रहते हैं। दो दिन से किसी के मुंह में पानी का कतरा नहीं गया, बच्चे वगैरह पानी के लिए बिलबिला रहे हैं, औरतों के लब खुश्क हुए जाते हैं, खुद हजरत हुसैन का बुरा हाल हो रहा है। मगर कोई अपनी तकलीफ़ किसी से नहीं कहती। बेचारी सकीना तड़प रही थी। काश ये ज़ालिम इसी तरह गाफ़िल पड़े रहते, और मैं मशक लिए हुए बचकर निकल जाता। जी चाहता है, दरिया-का-दरिया पी जाऊं, पर गै़रत गवारा नहीं करती कि घर के सब आदमी तो प्यासों मर रहे हों, और मैं यहीं अपनी प्यास बुझाऊं। घोड़े ने भी पानी में मुंह नहीं डाला। वफा़दार जानवर! तू हैवान होकर इतना ग़ैरतमंद है, मैं इंसान होकर बेग़ैरतमंद हो जाऊं।

दरिया से पानी लेकर घाट पर चढ़ते हैं।

एक सिपाही: यह कौन पानी लिए जाता है?

अब्बास: ख़ामोश

कई आदमी: क्या कोई पानी ले रहा है? खड़ा रह।

कई सिपाही अब्बास को घेर लेते हैं।

यह तो हुसैन के लश्कर का आदमी है, क्यों जी, तुम्हारा क्या नाम है?

अब्बास: मैं हजरत हुसैन का भाई अब्बास हूं।

कई आदमी: छीन लो मशक।

अब्बास: इतना आसान न समझो। एक-एक बूंद पानी के लिए एक-एक सिर देना पड़ेगा। पानी इतना महंगा कभी न बिका होगा।

अब्बास तलवार खींचकर दुश्मनों पर झपट पड़ते हैं, और उनके घेरे से निकल जाने की कोशिश करते हैं।

शिमर दौड़ा हुआ आता है।

शिमर: खबरदार, खबरदार, चारों तरफ़ से घेर लो, मशक में नेजे मारो, मशक में।

अब्बास: अरे ज़ालिम, बेदर्द! तू मुसलमान होकर नबी की औलाद पर इतनी संख्तियां कर रहा है। बच्चे प्यासों तड़प रहे हैं, हज़रत हुसैन का बुरा हाल हो रहा है, और तुझे ज़रा दर्द नहीं आता।

शिमर: ख़लीफ़ा से बग़ावत करने वाला मुसलमान मुसलमान नहीं, और न उसके साथ कोई रियायत की जा सकती है। दिलेरी, बस, जंग का इसी दम खातमा है। अब्बास को लिया, फिर वहां हुसैन के सिवा और कोई बाकी न रहेगा।

सिपाही अब्बास पर नेजे चलाते हैं, और अब्बास नेजों को तलवार से काट देते हैं।

साद का प्रवेश

साद: ठहरो-ठहरो! दुश्मन को दोस्त बना लेने में जितना फ़ायदा है, उतना क़त्ल करने में नहीं। अब्बास, मैं आपसे कुछ अर्ज करना चाहता हूं। एक दम के लिए तलवार रोक दीजिए। तनी हुई तलवार मसालहत की ज़बान बंद कर देती है।

अब्बास: मसालहत की गुफ्तगू अगर करनी है, तो हज़रत हुसैन के पास क्यों नहीं जाते। हालांकि अब वह कुछ न सुनेंगे। दो भांजे, दो भतीजे मारे जा चुके, कितने ही अहबाब शहीद हो चुके, वह खुद जिन्दगी से बेजार हैं, मरने पर कमर बांध चुके हैं।

साद: तो ऐसी हालत में आपको अपनी जान की और भी कद्र करनी चाहिए। दुनिया में अली की कोई निशानी तो रहे। ख़ानदान का नाम तो न मिटे।

अब्बास: भाई के बाद जीना बेकार है।

माबैन लहद साथ बिरादर नहीं जाता, भाई कोई भाई के लिए मर नहीं जाता।

भाई के लिये जी से गुजर जाता है भाई? जाता है बिरादर भी जिधर जाता है भाई? क्या भाई हो तेगों में तो डर जाता है भाई। आंच आती है भाई पै, तो मर जाता है भाई।

साद: आपसे तो ख़लीफ़ा को कोई दुश्मनी नहीं, आप उनकी बैयत क़बूल कर लें, तो आपकी हर तरह भलाई होगी। आप जो रुतबा चाहेंगे, वह आपको मिल जायेगा, और आप हजरत अली के जानशीन समझे जायेंगे।

अब्बास: जब हुसैन-जैसे सुलहपसंद आदमी ने जिसने कभी ग़ुस्से को पास नहीं आने दिया, जिसने जंग पर कभी सबकत नहीं की, जिसने आज भी मुझसे ताकीद कर दी कि राह न मिले, तो दरिया पर न जाना तुम्हारी बात नहीं मानी, तो मैं जो इस औसाफ में से एक भी नहीं रख़ता, तुम्हारी बातें मानूंगा।

साद: तुम्हें अख्तियार है।

शिमर: टूट पड़ो, टूट पड़ो।

एक सिपाही पीछे से आकर एक तलवार मारता है, जिससे अब्बास का दाहिना हाथ कट जाता है। अब्बास बाएं हाथ में तलवार ले लेते हैं।

शिमर: अभी एक हाथ बाकी है, जो उसे गिरा दे, उसे एक लाख दीनार इनाम मिलेगा। चारों तरफ़ से ज़ख़्मी सिपाहियों की आहें सुनाई दे रही हैं। अब्बास सफ़ों को चीरते, सिपाहियों को गिराते हुसैन के खेमे के सामने पहुंच जाते हैं। इनमें से एक सिपाही तलवार से उनका बायां हाथ भी गिरा देता है। शिमर उनकी छाती में भाला चुभा देता है। अब्बास मशक दांतों से पकड़ लेते है। तब सिर पर एक गुर्ज पड़ता है, और अब्बास घोड़े से गिर पड़ते हैं।

अब्बास: (चिल्लाकर) भैया, तुम्हारा ग़ुलाम अब जाता हैउसका आखिरी सलाम क़बूल करो।

हुसैन खेमे से बाहर निकलकर दौड़ते हुए आते हैं, और अब्बास के पास पहुंच कर उन्हें गोद में उठा लेते है

हुसैन: आह! मेरे प्यारे भाई, मेरे क़बूते-बाजू, तुम्हारी मौत ने कमर तोड़ दी। हाय! अब कोई सहारा नहीं रहा। तुम्हें अपने पहलू में देखते हुए मुझे वह भरोसा होता था, जो बच्चे को अपनी मां की गोद में होता है। तुम मेरे पुश्तेपनाह थे। हाय! अब किसे देखकर दिल को ढाढ़स होगा। आह! अगर तुम्हें इतनी जल्द रुखसत होना था, तो पहले मुझी को क्यों न मर जाने दिया? आह अब तक मैंने तुम्हें इस तरह बचाया था, जैसे कोई आंधी से चिराग से बचाता है। पर क़ज़ा से कुछ बस न चला। हाय! मैं खुद क्यों न पानी लेने गया। हाय, अब ख़ैर, भैया इतनी तस्कीन है कि फिर हमसे तुमसे मुलाकात होगी, और फिर हम क़यामत तक न जुदा होंगे।


छठा दृश्य


दोपहर का समय। हुसैन अपने खेमे में खड़े है, जैनब, कुलसूम, सकीना, शहरबानू, सब उन्हें घेरे खड़े हैं।

हुसैन: जैनब, अब्बास के बाद अली अकबर दिल को तस्कीन देता था। अब किसे देखकर दिल को ढाढ़स दूं? हाय! मेरा जवान बेटा प्यासा तड़प-तड़पकर मर गया! किस शान से मैदान की तरफ़ गया था। कितना हंसमुख, कितना हिम्मत का धनी! जैनब, मैंने उसे कभी उदास नहीं देखा, हमेशा मुस्कुराता रहता था। ऐ आंखों! अगर रोई, तो तुम्हें निकालकर फेंक दूंगा। ख़ुदा की मर्जी में रोना कैसा! मालूम होता है, सारी कुदरत मुझे तबाह करने पर तुली हुई है। यह धूप कि उसकी तरफ़ ताकने ही से आंखें जलने लगती है! यह जलता हुआ बालू, ये लू के झूलसाने वाले झोंके, और यह प्यास! यों जिंदा जलना तीरों और भालों के जख्मों से कहीं ज्यादा सख्त है।

अली असगर आता है, और बेहोश होकर गिर पड़ता है।

शहरबानू: हाय, मेरे बच्चे को क्या हुआ!

हुसैन: असगर को गोद में उठाकर आह! यह फूल पानी के बग़ैर मुर्झाया जा रहा है। ख़ुदा, इस रंज में अगर मेरी ज़बान से तेरी शान में कोई बेअदबी हो जाये, तो माफ कीजिए, मैं अपने होश में नहीं हूं। एक कटोरे पानी के लिए इस वक्त मैं जन्नत के हाथ धोने को तैयार हूं।

(असगर को गोद में लिए खेमे से बाहर आकर।)

ऐ ज़ालिम क़ौम, अगर तुम्हारे ख़याल में गुनहगार हूं, तो इस बच्चे ने तो कोई ख़ता नहीं की है, इसे एक घूंट पानी पिला दो। मैं तुम्हारी नबी को नेवासा हूं, अगर इसमें तुम्हें शक है, तो काबा का बेकस मुसाफ़िर तो हूं। इससे भी अगर तुम्हें ताम्मुल हो, तो मुसलमान तो हूं। यह भी नहीं, तो अल्लाह का एक नाचीज बंदा तो हूं। क्या मेरे मरते हुए बच्चे पर तुम्हें इतना रहम भी नहीं आता? मैं यह नहीं कहता हूं कि पानी मुझे ला दो, तुम आन के चिल्लू से इसे आब पिला दो। मरता है यह, मरते हुए बच्चे को जिला दो, लिल्लाह, कलेजे की मेरी आग बुझा दो। जब मुंह मेरा तकता है यह हसरत की नज़र से, ऐ जालिमो, उठता है धुआं मेरे जिगर से।

शिमर एक तीर मारता है, असगर के गले को छेदता हुआ हुसैन के बाजू में चुभ जाता है। हुसैन जल्दी से तीर को निकालते हैं और तीर निकलते ही असगर की जान निकल जाती है। हुसैन असगर को लिये फिर खेमे में आते हैं।

शहरबानू: यह मेरा फूल-सा बच्चा!

हुसैन: हमेशा के लिये इसकी प्यास बुझ गई। ख़ून से चिल्लू भरकर आसमान की तरफ़ उछालते हुए। इस सब आफ़तों का गवाह ख़ुदा हैं। अब कौन है, जो जालिमों से इस ख़ून का बदला लें।

सज्जाद चारपाई से उठकर, लड़खड़ाते हुए मैदान की तरफ़ चलते हैं।

जैनब: अरे बेटा, तुम में तो खड़े होने की भी ताब नहीं, महीनों से आंखें नहीं खोली, तुम कहाँ जाते हो।

सज्जाद: बिस्तर पर मरने से मैदान में मरना अच्छा है। जब सब जन्नत पहुंच चुके, तो मैं यहां क्यों पड़ा रहूं।?

हुसैन: बेटा, ख़ुदा के लिये बाप के ऊपर रहम करो, वापस जाओ। रसूल की तुम्हीं एक निशानी हो। तुम्हारे ही ऊपर औरतों की हिफ़ाजत का भार है। आह! और कौन है, जो इस फ़र्ज को अदा करे। तुम्हीं मेरे जांनसीन हो, इन सबको तुम्हारे हवाले करता हूं। ख़ुदा हाफिज! ऐ जैनब, ऐ कुलसूम, ऐ सकीना, तुम लोगों पर मेरा सलाम हो कि यह आखिरी मुलाकात है।

जैनब रोती हुई हुसैन से लिपट जाती है।

सकीना: अब किसका मुंह देखकर जिऊंगी।

हुसैन: जैनब! मरकर भी न भूलूंगा मैं एहसान तुम्हारे; बेटों को भला कौन बहन भाई पै वारे। प्यार न किया उनको, जो थे जान से प्यारे; बस, मा की मुहब्बत के थे ये अंदाज हैं सारे। फ़ाके में हमें बर्छियां खाने की रज़ा दो; बस, अब यही उल्फ़त है कि जाने की रज़ा़ दो। हमशीर का ग़म है किसी भाई को गवारा? मज़बूर है लेकिन असद अल्लाह का प्यारा। रंज और मुसीबत से कलेजा है दो पारा; किससे कहूं, जैसा मुझे सदमा है तुम्हारा। इस घर की तबाही के लिये रोता है शब्बीर। तुम छूटती नहीं मां से जुदा होता है शब्बीर।

हाथ उठाकर दुआ करते हैं।

या रब, है यह सादात का घर तेरे हवाले, रांड हैं कई खस्ता जिग़र तेरे हवाले, बेकस है बीमार पिसर तेरे हवाले, सब हैं मेरे दरिया के गुहरे तेरे हवाले।

मैदान की तरफ़ जाते हैं।

शिमर: फ़ौज से खबरदार, खबरदार, हुसैन आए। सब-के-सब संभल जाओ। समझ लो, अब मैदान तुम्हारा है।

हुसैन फ़ौज के सामने खड़े होकर कहते हैं।

बेटा हूं अली का व नेवासा रसूल का! मां ऐसी कि सब जिसकी शफा़अत के हैं मुहताज, बाप ऐसा, सनमखानों को जिसने किया ताराज; बेटा हूं अली का व नेवासा रसूल का। लड़ने को अगर हैदर सफ़दर न निकलते, बुत घर से ख़ुदा के कभी बाहर न निकलते। बेटा हूं अली का व नेवासा रसूल का। किस जंग में सीने को सिपर करके न आए? किस फौ़ज की सफ़ जेर व ज़बर करके न आए? बेटा हूं अली का व नेवासा रसूल का। हम पाक न करते, तो जहां पाक न होता, कुछ ख़ाक की दुनिया में सिवा ख़ाक न होता। बेटा हूं अली का व नेवासा रसूल का। यह शोर अजां का सहरोशाम कहां था। हम फर्श पै जब थे, तो यह इस्लाम कहां था? बेटा हूं अली का व नेवासा रसूल का। लाजिम है कि सादात की इमदाद करो तुम। ऐ जालिमों, इस घर को न बरबाद करो तुम। बेटा हूं अली का व नेवासा रसूल का।

फ़ौज पर टूट पड़ते हैं।

शिमर: अरे नामर्दो, क्यों भागे जाते हो, कोई शेर नहीं, जो सबको खा जायेगा।

एक सिपाही: ज़रा सामने आकर देखो, तो मालूम हो। पीछे खड़े-खड़े मुंह के आगे खंदक क्या है।

दूसरा: अरे, फिर इधर आ रहे हैं! ख़ुदा बचाना!

तीसरा: उन पर तलवार चलाने को तो हाथ भी नहीं उठते। उनकी सूरत देखते ही कलेजा थर्रा जाता है।

चौथा: मैं तो हवा में तीर छोड़ता हूं, कौन जाने, कहीं मेरे ही तीर से शहीद हो जायें, तो आक़बत में कौन मुंह दिखाऊंगा। पांचवा-मैं भी हवा ही में छोड़ता हूं।

शिमर: तीर चलाकर क्यों भागते हो? क्यों अपने मुंह में कालिख लगाते हो? दुनिया क्या कहेगी, इसकी भी तुम्हें शर्म नहीं?

क़ीस: सारी फौ़ज दहल गई, उसको खड़ा रखना मुश्किल हैं।

शीस: अली के सिवा और किसी को यह दम-खम नहीं देखा।

शिमर: तीर चलाकर सफ़ो को खूब फैला दो, ताकि दौड़ते-दौड़ते गिर पड़ें।

हुसैन: साद और शिमर, मैं तुम्हें फिर मौका देता हूं, मुझे लौट जाने दो, क्यों इन गरीबों की जान के दुश्मन हो रहे हो? तुम्हारा मैदान खाली हो गया। तुम्हीं सामने आ जाओ, जंग का फ़ैसला हो जाये।

साद: शिमर, जाते हो?

शिमर: क्यों न जाऊंगा, यहां जान देने नहीं आया हूं।

साद: मैं जाऊं भी, तो लड़ नहीं सकता।

हुसैन दरिया की तरफ़ जाते हैं।

शिमर: अब और भी गजब हो गया, पानी पीकर लौटे, तो ख़ुदा जाने क्या करेंगे। हज्जात को ताकीद करनी चाहिए कि दरिया का रास्ता न दे।

(हज्जाज को बुलाकर) हज्जाज, हुसैन को हर्गिज दरिया की तरफ़ न जाने देना।

हज्जाज: (स्वगत) यह अजाब क्यों अपने सिर लूं। मुझे भी तो रसूल से कयामत में काम पड़ेगा। प्रकट जी हां, आदमियों को जमा कर रहा हूं।

हुसैन घोड़े की बाग ढीली कर देते हैं, पर वह पानी की तरफ़ गर्दन नहीं बढ़ाता, मुंह फेरकर हुसैन की रकाब को खींचता है।

हुसैन: आह! मेरे प्यारे बेज़बान दोस्त! तू हैवान होकर आक़ा का इतना लिहाज करता है, ये इंसान होकर अपने रसूल के बेटे के ख़ून के प्यासे हो रहे हैं। मैं तब तक पानी पीऊंगा, जब तक तू न पिएगा। पानी पीना चाहते हैं।

हज्जा: हुसैन, तुम यहां पानी पी रहे हो, और लश्कर खेमों में घुसा जाता है।

हुसैन: तू सच कहता है?

हुसैन: यकीन न आए, जो जाकर देख आओ।

हुसैन: (स्वगत) इस बेकली की हालत में कोई मुझसे दग़ा नहीं कर सकता। मरते हुए आदमी से दग़ा करके कोई क्यों अपनी इज्जत से हाथ धोएगा।

घोड़े को फेर देते हैं, और दौड़ते हुए खेमे की तरफ़ आते हैं।

आह! इंसान उसने कहीं ज्यादा कमीना और ख़राब-बातिन है, जितना मैं समझता था। इस आखिरी वक्त में मुझसे दग़ा की और महज इसलिए कि मैं पानी न पी सकूं।

फिर मैदान में आकर लश्कर पर टूट पड़ते हैं, सिपाही इधर-उधर भागने लगते हैं।

शिमर: तीर चलाकर तुम मेरे ही हाथों मरोगे।

तीर हुसैन के मुंह में लगता है, और वह घोड़े से गिर पड़ते हैं। फिर संभलकर उठते हैं, और तलवार चलाने लगते हैं।

साद: शिमर, तुम्हारे सिपाही हुसैन के खेमों की तरफ़ जा रहे हैं, यह मुनासिब नहीं।

शिमर: औरतों का हिफाजत करना हमारा काम नहीं है।

हुसैन: दाढ़ी से ख़ून पोछते हुए साद, तुम्हें दीन का ख़ौफ़ नहीं है, तो इंसान तो हो, तुम्हारी भी तो बाल-बच्चे हैं। इन बदमाशों को मेरे खेमों में आने से क्यों नहीं रोकते ?

साद: आपके खेमों में कोई न जा सकेगा, जब तक मैं जिंदा हूं।

खेमो के सामने आकर खड़ा हो जाता है।

जैनब: बाहर निकलकर क्यों साद! हुसैन इस बेकसी से मारे जायें, और तुम खड़े देखते रहो? माल और दुनिया तुम्हें इतनी प्यारी है!

साद मुंह फेरकर रोने लगता है।

शिमर: तुफ् है तुम पर ऐ जवानों! एक प्यादा भी तुमसे नहीं मारा जाता! तुम अब नाहक़ डरते हो। हुसैन में अब जान नहीं है, उनके हाथ नहीं उठते, पैर थर्रा रहे हैं, आँखें झपकी जाती है, फिर भी तुम उनको शेर समझ रहे हो।

हुसैन: दिल में मालूम नहीं, मैंने कितने आदमियों को मारा, और अब भी मार सकता हूं, है तो मेरे नाना ही की उमत्त, हैं तो सब मुसलमान, फिर इन्हें मारूं, तो किसलिये? अब कौन है, जिसके लिये जिंदा रहूं? हाय, अकबर! किससे कहें, जो खूने-जिगर हमने पिया है, बाद ऐसे पिसर के भी कहीं बाप जिया है। हाय अब्बास!

गश आता है हमें प्यास के मारे, उलफ़त हमें ले आई है फिर पास तुम्हारे। इन सूखे हुए होठों से होठों को मिला के, कुछ मशक में पानी हो, तो भाई पिला दो। लेटे हुए हो रेत में क्यों मुंह को छिपाए? ग़ाफिल हो बिरादर तुम्हें किस तरह जगाएं? ख़ुश हूंगा में, आगे जो अलम लेके बढ़ोगे, क्या भाई के पीछे न नमाज आज पढ़ोगे?

लड़ते-लड़ते शाम हो गई, हाथ नहीं उठते। आखिरी नमाज पढ़ लूं। काश नमाज पढ़ते हुए सिर कट जाता, तो कितना अच्छा होता!

हुसैन नमाज में झुक जाते है, अशअस पीछे आकर उनके कंधे पर तलवार मारता है। क़ीस दूसरे कंधे पर तलवार चलाता है। हुसैन उठते हैं, फिर गिर पड़ते हैं, फौज़ में सन्नाटा छा जाता है। सबके सब आकर उन्हें घेर लेते हैं।

शिमर: ख़लीफ़ा यज़ीद ने हुसैन का सिर मांगा था, कौन है यह फख हासिल करना चाहता है?

एक सिपाही आगे बढ़कर तलवार चलाता है। मुसलिम की छोटी लड़की दौड़ी हुई खेमे से आती है, और हुसैन की पीठ पर हाथ रख देती है।

नसीमा: ओ खबीस, क्या तू मेरे चचा का क़त्ल करेगा?

तलवार नसीमा के दोनों हाथों पर पड़ती है, और हाथ कट जाते हैं।

शीस तलवार लेकर आगे बढ़ता है, हुसैन का मुंह देखते ही तलवार उसके हाथ से छूटकर गिर पड़ती हैं।

शिमर: क्यों, तलवार क्यों डाल दी?

शीस: उन्होंने जब आंखें खोलकर मुझे देखा, तो मालूम हुआ कि रसूल की आंखें हैं। मेरे होश उड़ गए।

कीस: मैं जाता हूं।

तलवार लेकर जाता है, तलवार हाथ से गिर पड़ती हैं और उल्टे क़दम कांपता हुआ लौट आता है।

शिमर: क्यों, तुम्हें क्या हो गया?

क़ीम: यह हुसैन नहीं, खुद रसूल पाक हैं। रोब से मेरे होश ग़ायब हो गए या ख़ुदा जहन्नम की आग में न डालियो।

शिमर: इनकी मौत मेरे हाथों लिखी हुई है। तुम सब दिल के कच्चे हो

तलवार लेकर हुसैन के सीने पर चढ़ बैठता है।

हुसैन आंखें खोलते हैं, और उसकी तरफ़ ताकते हैं।

शिमर: मैं उन बुजदिलों में नहीं हूं, जो तुम्हारी निगाहों से दहल उठे थे।

हुसैन: तू कौन है?

शिमर: मेरा नाम शिमर है।

हुसैन: मुझे पहचानता है?

शिमर: खूब पहचानता हूं, तुम अली और फ़ातिमा के बेटे और मुहम्मद के नेवासे हो।

हुसैन: यह जानकर भी तू तुझे क़त्ल करता है?

शिमर: मुझे जन्नत से जागीरें ज्यादा प्यारी हैं।

तलवार मारता है, हुसैन का सिर जुदा हो जाता है।

साद: रोता हुआ शिमर ज़ियाद से कह देना, मुझे ‘रै’ की जागीर से माफ़ करें। शायद अब भी नजात हो जाय।

अपने सीने में नेजा चुभा लेता है, और बेजान होकर गिर पड़ता है। फ़ौज के कितने ही सिपाही हाथों में मुंह छिपाकर रोने लगते हैं। खेमों से रोने की आवाजें आने लगती हैं।

~ ।। समाप्त ।। ~

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शोध एवं शोध-पत्रों के लिए अकादमिक संदर्भ

Premchand, Munshi. "कर्बला." *Munshi Premchand Digital Archive*, 1924, https://munshipremchand.com/works/plays/karbala. Accessed 22 Sep. 2026.