पहला दृश्य
दोपहर का समय। रेगिस्तान में हुसैन के काफ़िले का पड़ाव। बगूले उड़ रहे है। हुसैन असगर को गोद में लिए अपने खेमे के द्वार पर खड़े हैं।
हुसैन: (मन में) उफ्, यह गर्मी! निगाहें जलती हैं। पत्थर की चट्टानों से चिनगारियां निकल रही हैं। झीलें, कुएं सब सूखे पड़े हुए हैं, गोया उन्हें गर्मी ने जला दिया हो। हवा से बदन झूलसा जाता है। बच्चों के चेहरे कैसे संवला गए हैं। यह सफेदी, यह रेगिस्तान, इसकी कहीं हद भी है या नहीं। जिन लोगों ने प्यास के मारे हौक-हौककर पानी पी लिया है, उनके कलेजे में दर्द हो रहा है। अब तक कूफ़ा से कोई क़ासिद नहीं आया। ख़ुदा जाने मुसलिम का क्या हाल हुआ। करीने से ऐसा मालूम होता है कि ईराकवालों ने उनसे दग़ा की, और उनको शहीद कर दिया, वरना यह खामोशी क्यों? अगर वह जन्नत को सिधारे हैं, तो मेरे लिए भी दूसरा रास्ता नहीं हैं। शहादत मेरा इंतज़ार कर रही है। कोई मुझसे मिलने आ रहा हैं।
फर्जूक का प्रवेश
फ़र्ज़ूक़: अस्सलामअलेक या हज़रत हुसैन, मैंने बहुत चाहा कि मक्के ही में आपकी जियारत करूं, लेकिन अफसोस, मेरी कोशिश बेकार हुई।
हुसैन: अगर ईराक से आए हो, तो वहां की क्या ख़बर हैं?
फ़र्ज़ूक़: या हज़रत! वहां की खबरें वे ही हैं, जो आपको मालूम हैं। लोगों के दिल आपके साथ हैं, क्योंकि आप हक़ पर हैं और, उनकी तलवारें यज़ीद के साथ है, क्योंकि उसके पास दौलत है।
हुसैन: और मेरे भाई मुसलिम की भी कुछ ख़बर लाए हो?
फ़र्ज़ूक़: उनकी रूह जन्नत में है, और सिर किले की दीवार पर। मातम है कई दिन से मुसलमानों के घर में; खंदक में है लाश उनकी व सर किले की दर में।
हुसैन: सीने पर हाथ धरकर आह! मुसलिम, वही हुआ, जिसका मुझे ख़ौफ़ था। अब तक तुम्हें कफ़न भी नसीब नहीं हुआ। क्या तुम्हारी नेकनियती का यही सिला था? आह! तुम इतने दिनों तक मेरे साथ रहे, पर मैंने तुम्हारी कद्र न जानी। मैंने तुम्हारे ऊपर ज़ुल्म किया, मैंने जान-बूझकर तुम्हारी जान ली। मेरे अजीज और दोस्त, सब के सब मुझे कूफ़ावालों से होशियार कर रहे थे, पर मैंने किसी की न सुनी, और तुम्हें हाथ से खोया। मैं उनके बेटों को और उनकी बीबी को कौन मुँह दिखाऊंगा।
मुसलिम की लड़की फातिमा आती है।
आओ बेटी, बैठो, मेरी गोद में चली आओ। कुछ खाया कि नहीं?
फातिमा: बुआ ने शहद और रोटी दी थी। चचाजान, अब हम लोग कै दिन में अब्बा के पास पहुंचेगे? पाँच-छः दिन तो हो गए!
हुसैन: दिल में आह! कलेजा मुंह को आता है। इस सवाल का क्या जवाब दूं। कैसे कह दूं कि अब तेरे अब्बा जन्नत में मिलेंगे। प्रकट बेटी, ख़ुदा की जब मरजी होगी।
अली अकबर: आह! तुम अब्बाजान की गोद में बैठ गई। उतरिए चटपट।
फातिमा: तुम मेरे अब्बाजान की गोद में बैठोगे, तो मैं अभी उतार दूंगी।
हुसैन: बेटी, मैं ही तुम्हारा अब्बाजान हूं। तुम बैठी रहो। इसे बकने दो।
फातिमा: आप मेरी तरफ़ देखकर आंखों में आंसू क्यों भरे हुए हैं। आप मेरा इतना प्यार क्यों कर रहे हैं? आप यह क्यों कहते हैं कि मैं ही अब्बाजान हूं? ऐसी बातें तो यतीमों से की जाती हैं।
हुसैन: रोकर बेटी, तेरे अब्बा को ख़ुदा ने बुला लिया।
फातिमा रोती हुई अपनी मां के पास जाती है। औरतें रोने लगती हैं।
जैनब: बाहर आकर भैया, यह क्या गजब हो गया?
हुसैन: बहन, क्या कहूं सितम टूट पड़ा। मुसलिम तो शहीद हो गए। कूफ़ावालों ने दग़ा की।
जैनब: तो ऐसे दग़ाबाजों से मदद की क्या उम्मीद हो सकती है? मैं तुमसे मिन्नत करती हूं कि यहीं से वापस चलो। कूफ़ावालों ने कभी वफा नहीं की।
मुसलिम के बेटे अब्दुला का प्रवेश।
अब्बदुल्ला: फूफीजान, अब तो अगर तक़दीर भी रास्ते में खड़ी हो जाये, तो भी मेरे क़दम पीछे न हटेंगे। तुफ् है मुझ पर, अगर अपने बाप का बदला न लू! हाय वह इंसान, जिसने किसी से बदी नहीं की, जो रहम और मुरौवत का पुतला था, जो दिल का इतना साफ था कि उसे किसी का शुबहा न होता था इतनी बेदरदी से क़त्ल किया जाये। अब्बास का प्रवेश
अब्बास: बेशक, अब कूफ़ावालों को उनकी दग़ा की सजा दिए बग़ैर लौट जाना ऐसी ज़िल्लत हैं जिससे हमारी गर्दन हमेशा झुकी रहेगी। ख़ुदा को जो कुछ मंजूर है, वह होगा। हम सब शहीद हो जायें, रसूल के ख़ानदान का निशान मिट जाये, पर यहां से लौटकर हम दुनिया को अपने ऊपर हंसने का मौका न देंगे। मुझे यकीन है कि यह शरारत कूफ़ा के रईसों और सरदारों की है, जिन्हें ज़ियाद के वादों ने दीवाना बना रखा है। आप जिस वक्त कूफ़ा में क़दम रखेंगे, रियाया अपने सरदारों से मुंह फेरकर आपके कदमों पर झुकेगी और वह दिन दूर नहीं जब यज़ीद का नापाक सिर उसके तन से जुदा होगा। आप ख़ुदा का नाम लेकर खेमे उखड़वाइए। अब देर करने का मौका नहीं है। हक़ के लिए शहीद होना वह मौत है जिसके लिए फरिश्तों की रूहें तड़पती हैं।
जैनब: भैया, मैं तुझ पर सदके। घर वापस चलो।
हुसैन: आह! अब यहां से वापस होना मेरे अख्तियार की बात नहीं है। मुझे दूर से दुश्मन की फ़ौज का गुबार नज़र आ रहा है। पुश्त की तरफ़ भी दुश्मन ने रास्ता रोक रखा है। दाहिने-बाएं कोसों तक बस्ती का निशान नहीं। कूफ़ा में हमें तख्त नसीब हो या तख्ता, हमारे लिए कोई दूसरा मक़ाम नहीं है। अब्बास, जाकर मेरे साथियों से कह दो, मैं उन्हें ख़ुशी से इजाज़त देता हूं, जहां जिसका जी चाहे, चला जाये। मुझे किसी से कोई शिकायत नहीं है। चलो, हम लोग खेमे उखाड़े।
दूसरा दृश्य
संध्या का समय। हुसैन का क़ाफ़िला रेगिस्तान में चला जा रहा है।
अब्बास: अल्लाहोअकबर। वह कूफ़ा के दरख्त नज़र आने लगे।
हबीद: अभी कूफ़ा दूर है। कोई दूसरा गांव होगा।
अब्बास: रसूल पाक की क़सम, फ़ौज है। भालों की नोंके साफ नज़र आ रही हैं।
हुसैन: हां, फ़ौज ही है। दुश्मनों ने कूफे से हमारी दावत का यह सामान भेजा है। यहीं उस टीले के क़रीब खेमे लगा दो। अजब नहीं कि इसी मैदान में किस्मतों का फ़ैसला हो।
क़ाफ़िला रुक जाता हैं। खेमे गड़ने लगते हैं। बेगमें ऊंटों से उतरती हैं। दुश्मन की फ़ौज क़रीब आ जाती है।
अब्बास: खबरदार, कोई क़दम आगे न रखे। यहां हज़रत हुसैन के खेमे हैं।
अली अकबर:अभी जाकर इन बेअदबों की तबीह करता हूं।
हुसैन:अब्बास, पूछो, ये लोग कौन हैं, और क्या चाहते हैं?
अब्बास: फ़ौज से तुम्हारा सरदार कौन हैं?
हुर: (सामने आकर) मेरा नाम हुर है। हज़रत हुसैन का ग़ुलाम हूं।
अब्बास: दोस्त दुश्मन बनकर आए, तो वह भी दुश्मन है।
हुर: या हजरत, हाकिम के हुक्म से मज़बूर हूं, बैयत से मजबूत हूं, नमक की क़ैद से मजबूत हूं, लेकिन दिल हुसैन ही का ग़ुलाम है।
हुसैन: अब्बास से भाई, आने दो, इसकी बातों में सच्चाई की बू आती है।
हुर: या हज़रत, आपको कूफ़ावालों ने दग़ा दी है! ज़ियाद और यज़ीद, दोनों आपको क़त्ल करने की तैयारियां कर रहे हैं। चारों तरफ़ से फौजें जमा की जा रही हैं। कूफ़ा से सरदार आप से जंग करने के लिए तैयार बैठे हैं।
हुसैन: पहले यह बतलाओ कि तुम्हारे सिपाही क्यों इतने निढाल और परेशान हो रहे हैं?
हुर: या हज़रत क्या अर्ज करूं। तीन पहर से पानी का एक बूंद न मिला। प्यास के मारे सबों के दम लबों पर आ रहे हैं।
हुसैन: अब्बास से भैया, प्यासों की प्यास बुझानी एक सौ नमाज़ों से ज्यादा सवाब का काम है। तुम्हारे पास पानी हो, तो इन्हें पिला दो। क्या हुआ, अगर मेरे ये दुश्मन हैं, हैं तो मुसलमान मेरे नाना के नाम पर मरनेवाले।
अब्बास: या हज़रत, आपके साथ बच्चे हैं, औरतें और पानी यहां उनका है।
हुसैन: इन्हें पानी पिला दो, मेरे बच्चों का ख़ुदा है।
अब्बास, अली अकबर, हबीब पानी की मशकें लाकर सिपाहियों को पानी पिलाते हैं।
अब्बास: हुर, अब यह बतलाओ कि तुम हमसे सुलह करना चाहते हो या जंग?
हुर: हज़रत, मुझे आपसे न जंग का हुक्म दिया गया है, न सुलह का। मैं सिर्फ इसलिए भेजा गया हूं कि हज़रत को ज़ियाद के पास ले जाऊं, और किसी दूसरी तरफ़ न जाने दूं।
अब्बास: इसके मानी यह हैं कि तुम जंग करना चाहते हो। हम किसी ख़लीफ़ा या आमिल के हुक्म के पाबंद नहीं हैं कि किसी खास तरफ़ जायें। मुल्क ख़ुदा का है। हम आजादी से जहां चाहेंगे, जायेंगे। अगर हमको कोई रोकेगा, तो उसे कांटों की तरह रास्ते से हटा देंगे।
हुसैन: नमाज़ का वक्त आ गया। पहले नमाज अदा कर लें, उसके बाद और बातें होंगी। हुर, तुम मेरे साथ नमाज़ पढ़ोगे या अपनी फ़ौज के साथ?
हुर: या हज़रत, आपके पीछे खड़े होकर नमाज अदा करने का सवाब न छोड़ूगा, चाहे मेरी फ़ौज मुझसे जुदा क्यों न हो जाये।
तीसरा दृश्य
संध्या का समय– नसीमा बगीचे में बैठी आहिस्ता-आहिस्ता गा रही है।
दफ़न करने ले चले जब मेरे घर से मुझे, काश तुम भी झांक लेते रौज़ने घर से मुझे। सांस पूरी हो चुकी दुनिया से रुख्सत हो चुका, तुम अब आए हो उठाने मेरे बिस्तर से मुझे। क्यों उठाता है मुझे मेरी तमन्ना को निकाल, तेरे दर तक खींच लाई थी यही घर से मुझे।
हिज्र की सब कुछ यही मूनिस था मेरा ऐ क़जाएक ज़रा रो लेने दे मिल-मिल के बिस्तर से मुझे। याद है तस्कीन अब तक वह ज़माना याद है, जब छुड़ाया था फ़लक ने मेरे दिलवर से मुझे।
वहब का प्रवेश। नसीमा चुप हो जाती है।
वहब: ख़ामोश क्यों हो गई। यही सुनकर मैं आया था।
नसीमा: मेरा गाना ख़याल है, तनहाई का मूनिस अपना दर्द क्यों सुनाऊं, जब कोई सुनना न चाहे।
बहब: नसीमा, शिकवे, करने का ह़क मेरा है, तुम इसे ज़बरदस्ती छीन लेती हो।
नसीमा: तुम मेरे हो, तुम्हारा सब कुछ मेरा है, पर मुझे इसका यकीन नहीं आता। मुझे हरदम यहीं अंदेशा रहता है कि तुम मुझे भूल जाओगे, तुम्हारा दिल मुझसे बेज़ार हो जायेगा, मुझसे बेतनाई करने लगोगे। यह ख़याल दिल से नहीं निकलता। बहुत चाहती हूं कि निकल जाये, पर वह किसी पानी से भीगी हुई बिल्ली की तरह नहीं निकलता। तब मैं रोने लगती हूं, और ग़मनाक ख़याल मुझे चारों तरफ़ से घेर लेते हैं। तुमने न-जाने मुझ पर कौन-सा जादू कर दिया है कि मैं अपनी नहीं रही। मुझे ऐसा ग़ुमान होता है कि हमारी बहार थोड़े ही दिनों की मेहमान है। मैं तुमसे इल्तजा करती हूं कि मेरी तरफ़ से निगाहें न मोटी करना, वरना मेरा दिल पाश-पाश हो जायेगा। मुझे यहां आने के पहले कभी न मालूम हुआ था कि मेरा दिल इतना नाजुक है।
वहब: मेरी क़ैफ़ियत इससे ठीक उल्टी है। मेरे दिल में एक नई कूबत आ गई है, मुझे ख़याल होता है अब दुनिया की कोई फ़िक्र, कोई तग़ीव, कोई आरजू मेरे दिल पर फ़तह नहीं पा सकती। ऐसी कोई ताक़त नहीं है, जिसका मैं मुकाबला न कर सकूं। तुमने मेरे दिल की कूबत सौगुनी कर दी। यहां तक अब मुझे मौत का भी ग़म नहीं। मुहब्बत ने मुझे दिलेर, बैख़ौफ़, मजबूत बना दिया है, मुझे तो ऐसा ग़ुमान होता है कि मुहब्बत कूबते-दिल की कीमिया है।
नसीमा: वहब, इन बातों से वहशत हो रही है, शायद हमारी तबाही के सामान हो रहे हैं। वहब, मैं तुम्हें न जाने दूंगी, क़लाम पाक की क़सम, कहीं न जाने दूंगी। मुझे इसकी फ़िक्र नहीं कि कौन ख़लीफ़ा होता है और कौन अमीर। मुझे माल व ज़र की, इलाके व जागीर की मुतलक़ परवा नहीं। मैं तुम्हें चाहती हूं, सिर्फ तुम्हें।
कमर का प्रवेश
कमर: वहब, देख, दरवाजे पर ज़ालिम ज़ियाद के सिपाही क्या गजब कर रहे हैं। तेरे वालिद को गिरफ्तार कर लिया है और जामा मसजिद की तरफ़ खींचे लिए जाते हैं।
नसीमा: हाय सितम, इसीलिए तो मुझे वहसत हो रही थी।
वहब उठ खड़ा होता है। नसीमा उसका हाथ पकड़ लेती है।
वहब: नसीमा, मैं अभी लौटा आता हूं, तुम घबराओ नहीं।
नसीमा: नहीं-नहीं तुम यहां मुझे जिंदा छोड़कर नहीं जा सकते। मैं ज़ियाद को जानती हूं। तुमको भी जानती हूं। ज़ियाद के सामने जाकर फिर तुम नहीं लौट सकते।
कमर: बेटा, अगर नसीमा तुझे नहीं जाने देती, तो मत जा। मगर याद रख, तेरे चेहरे पर हमेशा के लिए स्याही का दाग़ लग जायेगा। खुद जाती हूं। नसीमा, शायद हमारी-तुम्हारी फिर मुलाकात न हो, यह आखिरी मुलाकात है। रुखसत। वहब, घर-बार तुझे सौंपा ख़ुदा तुझे नेकी की तौफ़ीक दे, तेरी उम्र दराज़ हो।
वहब: अम्मा, मैं भी चलता हूं।
कमर: नहीं, तुझ पर अपनी बीबी का हक़ सबसे ज्यादा है।
वहब: नसीमा, ख़ुदा के लिए…।
नसीमा: नहीं। मेरे प्यारे आक़ा, मुझे जिंदा छोड़कर नहीं।
कमर चली जाती है। वहब सिर थामकर बैठ जाता है।
नसीमा: प्यारे, तुम्हारी मुहब्बत की क़तावार हूँ, जो सजा चाहे दो। मुहब्बत खुदग़रज होती है। मैं अपने चमन को हवा के झोंकों से बचाना चाहती हूं। काश तक़दीर ने मुझे इस गुलज़ार में न बिठाया होता, काश मैंने इस चमन में अपना घोंसला न बनाया होता, तो आज वर्क और सैयाद का इतना ख़ौफ़ क्यों होता! मेरी बदौलत तुम्हें यह नदामत उठानी पड़ी काश मैं मर जाती!
नसीमा वहब के पैरों पर सिर रख देती है।
चौथा दृश्य
आधी रात का समय। अब्बास हुसैन के खेमे के सामने खड़े पहरा दे रहे हैं। हुर आहिस्ता से आकर खेमे के क़रीब खड़ा हो जाता है।
हुर: दिल में ख़ुदा को क्या मुंह दिखाऊंगा? किस मुंह से रसूल के सामने जाऊंगा? आह, गुलामी तेरा बुरा हो। जिस बुजुर्ग ने हमें ईमान की रोशनी दी, ख़ुदा की इबादत सिखाई, इंसान बनाया, उसी के बेटे से जंग करना मेरे लिये कितनी शर्म की बात है। यह मुझसे न होगा। मैं जानता हूं, यज़ीद मेरे ख़ून का प्यासा हो जायेगा, मेरी जागीर छीन ली जाएगी, मेरे लड़के रोटियों के मुहताज हो जायेंगे, मगर दुनिया खोकर रसूल की निगाह का हकदार हो जाऊंगा। मुझे न मालूम था कि यज़ीद की बैयत लेकर मैं अपनी आक़बत बिगाड़ने पर मज़बूर किया जाऊंगा। अब यह जान हज़रत हुसैन पर निसार है। जो होना है, हो। यज़ीद की ख़िलाफ़त पर कोई हक़ नहीं। मैंने उसकी बैयत लेने में खास ग़लती की। उसके हुक्म की पाबंदी मुझ पर फ़र्ज़ नहीं। ख़ुदा के दरबार में मैं इसके लिये गुनहगार न ठहरूंगा।
आगे बढ़ता है।
अब्बास: कौन है? खबरदार, एक क़दम आगे न बढ़े, वरना लाश ज़मीन पर होगी।
हुर: या हज़रत, आपका ग़ुलाम हुर हूं। हज़रत हुसैन की ख़िदमत में कुछ अर्ज करना चाहता हूं।
अब्बास: इस वक्त वह आराम फरमा रहे हैं।
हुर: मेरा उनसे इसी वक्त मिलना जरूरी है।
अब्बास: दिल में दग़ा का अंदेशा तो नहीं मालूम होता। मैं भी इसके साथ चलता हूं। ज़रा भी हाथ-पांव हिलाया कि सिर उड़ा दूंगा प्रकट अच्छा, जाओ।
अब्बास खेमे से बाहर हुसैन को बुला लाते है।
हुर: या हज़रत, मुआफ कीजिएगा। मैंने आपको नावक्त तकलीफ़ दी। मैं यह अर्ज करने आया हूं कि आप कूफ़ा की तरफ़ न जाये। रात का वक्त है, मेरी फ़ौज सो रही है, आप किसी दूसरे तरफ़ चले जायें। मेरी यह अर्ज क़बूल कीजिए।
हुसैन: हुर, यह अपनी जान बचाने का मौका नहीं, इस्लाम की आबरू को क़ायम रखने का सवाल है।
हुर: आप यमन की तरफ़ चले जायें, तो वहां आपको काफी मदद मिलेगी। मैंने सुना है, सुलेमान और मुख्तार वहां आपकी मदद के लिये फ़ौज जमा कर रहे हैं।
हुसैन: हुर जिस लालच ने कूफ़ा के रईसों को मुझसे फेर दिया, क्या वह यमन में अपना असर न दिखाएगा? इंसान की गफ़लत सब जगह एक-सी होती है। मेरे लिए कूफ़ा के सिवा दूसरा रास्ता नहीं है। अगर तुम न जाने दोगे, तो जबरदस्ती जाऊंगा। यह जानता हूं कि वहीं मुझे शहादत नसीब होगी। इसकी ख़बर मुझे नाना की ज़बान मुबारक से मिल चुकी है। क्या ख़ौफ़ से शहादत के रुतबे को छोड़ दूं?
हुर: अगर आप जाना ही चाहते हैं, तो मस्तूरात को वापस कर दीजिए।
हुसैन: हाय, ऐसा मुमकिन होता, तो मुझसे ज्यादा ख़ुश कोई न होता। मगर इनमें से कोई भी मेरा साथ छोड़ने पर तैयार नहीं है।
किसी तरह से ऊँ ऊँ की आवाज आ रही।
हुर: या हजरत, यह आवाज कहां से आ रही है? इसे सुनकर दिल पर रोब तारी हो रहा है।
एक योगी भभूत रमाए, जटा बढ़ाए, मृग-चर्म कंधे पर रखे हुए आते हैं।
योगी: भगवन्! मैं उस स्थान को जाना चाहता हूं, जहां महर्षि मुहम्मद की समाधि है।
हुसैन: तुम कौन हो? यह कैसी शक्ल बना रखी है?
योगी: साधु हूं। उस देश से आ रहा हूं, जहां प्रथम ओंकार-ध्वनि की सृष्टि हुई थी। महर्षि मुहम्मद ने उसी ध्वनि से संपूर्ण जगत को निनादित कर दिया है। उनके अद्वैतवाद ने भारत के समाधि-मग्न ऋषियों को भी जागृति प्रदान कर दी है। उसी महात्मा की समाधि का दर्शन करने के लिए मैं भारत से आया हूं, कृपा कर मुझे मार्ग बता दीजिए।
हुसैन: आइए, ख़ुशनसीब कि आपकी जियारत हुई। रात का वक्त है अंधेरा छाया हुआ है। इस वक्त यहीं आराम कीजिए। सुबह मैं आपके साथ अपना एक आदमी भेज दूंगा।
योगी: गौर से हुसैन के चेहरे को देखकर नहीं महात्मन् मेरा व्रत है कि उस पावन भूमि का दर्शन किए बिना कहीं विश्राम न करूंगा। प्रभो, आपके मुखारविंद पर भी मुझे उसी महर्षि के तेज का प्रतिबिंब दिखाई देता है। आप उनके आत्मीय हैं?
हुसैन: जी हां, उनका नेवासा हूं। मगर आपने नाना को देखा ही नहीं, फिर आपको कैसे मालूम हुआ कि मेरी सूरत उनसे मिलती है?
योगी: हंसकर भगवन्! मैंने उनका स्थूल शरीर नहीं देखा, पर उनके आत्मशरीर का दर्शन किया है। आत्मा द्वारा उनकी पवित्र वार्ता सुनी है। में प्रत्यक्ष देख रहा हूं कि आप में वही पवित्र आत्मा अवतरित हुई है। आज्ञा दीजिए, आपके चरण-रज से अपने मस्तक को पवित्र करूं।
हुसैन: पैरों को हटाकर नहीं-नहीं, मैं इंसान हूं और रसूल पाक की हिदायत है कि इंसान को इंसान की इबादत वाजिब नहीं।
योगी: धन्य है! मनुष्य के ब्रह्मत्व का कितना उच्च आदर्श है! यह ज्ञान-ज्योति, जो इस देश के उद्भाषित हुई है, एक दिन समस्त भूमंडल को आलोकित करेगी, और देश-देशांतरों में सत्य और न्याय का मुख उज्जवल करेगी। हां, इस महार्षि की संतान-न्याय-गौरव का पालन करेगी। अब मुझे आज्ञा दीजिए, आपके दर्शनों से कृतार्थ हो गया।
योगी चला जाता है
हुसैन: अब मुझे मरने का ग़म नहीं रहा। मेरे नाना की उम्मत हक़ और इंसाफ़ की हिमायत करेगी। शायद इसीलिए रसूल ने अपनी औलाद को हक़ पर कुर्बान करने का फ़ैसला किया है। हुर, तुमने इस फकीर की पेशगोई सुनी?
हुर: या हज़रत, आपका रुतबा आज जैसा समझा हूं, ऐसा कभी न समझा था। हुजूर रसूल पाक से मेरे हक़ में दुआ करें कि मुझ रूहस्याह के गुनाह मुआफ़ करें।
चला जाता है
हुसैन: अब्बास, अब हमें कूफ़ावालों को अपने पहुंचने की इत्तिला देनी चाहिए।
अब्बा: सवजा है।
हुसैन: कौन जा सकता है?
अब्बास: सैदावी को भेज दूं?
हुसैन: बहुत अच्छी बात है।
अब्बास सैदावी को बुला लाते हैं।
अब्बासP सैदावी, तुम्हें हमारे पहुंचाने की ख़बर लेकर कूफ़ा जाना पड़ेगा। यह कहने की ज़रूरत नहीं कि यह बड़े खतरे का काम है।
सैदावी: या हजरत, जब आपकी मुझ पर निगाह है, तो फिर ख़ौफ़ किस-किस बात का।
हुसैन: शाबाश, यह ख़त लो, और वहां किसी ऐसे सरदार को देना, जो रसूल का सच्चा बंदा हो। जाओ, ख़ुदा तुम्हें खैरियत से ले जाये।
सैदावी जाता है।
हुसैन: दिल में सैदावी, जाते हो, मगर मुझे शक है कि तुम लौटोगे! तुमने जिसे न दीन की हिफ़ाजत का ख्याल है, न हक़ का, जिसे दुश्मनों ने चारों तरफ़ से घेर नहीं रखा है, जिसको शहीद करने के लिए फौजे नहीं जमा की जा रही हैं, जो दुनिया में आराम से ज़िंदगी बसर कर सकता है, महज वफ़ादारी का हक़ अदा करने के लिए जान-बूझकर मौत के मुंह में क़दम रखा है, तो मैं मौत से क्यों डरूं।
गाते हैं।
मौत का क्या उसको हैं, जो मुसलमां हो गया, जिसकी नीयत नेक हैं, जो सिदकू ईमां हो गया। कब दिलेरों को सताए फ़िक्र जर और ख़ौफ़ जो, अज्म सादिक उसका है, जो पाक दामा हो गया। क्यों नदामत हो मुझे, दुनिया में ग़र जिंदा रहा, जाय ग़म क्या है, जो नज़रे-तेग़ बुर्रा हो गया। हो अदू दुनिया में रुसवा, आखिरत में ग़म नसीब, मुनहरिफ दीं से हुआ, औं’ नंग-दौरां हो गया।
पांचवां दृश्य
रात का समय। हुसैन अपने खेमे में सोए हुए हैं। वह चौंक पड़ते हैं, और लेटे हुए, चौकन्नी आंखों से, इधर-उधर ताकते हैं।
हुसैन: दिल में यहां तो कोई नज़र नहीं आता। मैं हूं, शमा है, और मेरा धड़कता हुआ दिल है। फिर मैंने आवाज किसकी सुनी! सिर में कैसा चक्कर आ रहा है। ज़रूर कोई था। ख्वाब पर हकीकत का धोखा नहीं हो सकता। ख्वाब के आदमी शबनम के परदे में ढकी हुई तस्वीरों की तरह होते हैं। ख्वाब की आवाज़ें जमींन के नीचे से निकलने वाली आवाजों की तरह मालूम होती है। उनमें यह बात कहां! देखूं, कोई बाहर तो खड़ा नहीं है। खेमे से बाहर निकलकर उफ् कितनी गहरी तारीकी है, गोया मेरी आँखों ने कभी रोशनी देखी ही नहीं। कैसा गहरा सन्नाटा है, गोया सुनने की ताक़त ही से महरूम हूं। गोया यह दुनिया अभी-अभी अदम के ग़ार से निकली है प्रकट कोई हैं।
अली अकबर का प्रवेश
अली अकबर: हाज़िर हूं, अब्बाजान, क्या इरशाद है?
हुसैन: यहां से अभी कोई सवार तो नहीं गुज़रा है?
अली अकबर: अगर मेरे होश-हवास बजा हैं, तो इधर कोई जानदार नहीं गुज़रा।
हुसैन: ताज्जुब है, अभी लेटा हुआ था, और जहां तक मुझे याद है, मेरी पलकें तक नहीं झपकीं, पर मैंने देखा, एक आदमी मुश्की घोड़े पर सवार सामने खड़े होकर मुझसे कह रहा है कि ‘ऐ हुसैन! इराक जाने की जल्दी कर रहे हो, और मौत तुम्हारे पीछे-पीछे दौड़ी जा रही है।’ बेटा, मालूम हो रहा है, मेरी मौत क़रीब है!
अली अकबर: बाबा, क्या हम हक़ पर नहीं हैं?
हुसैन: बेशक, हम हक़ पर हैं, तो मौत का क्या डर। क्या परवा, अगर हम मौत की तरफ़ जायें या मौत हमारी तरफ़ आए।
हुसैन: बेटा, तुमने दिल खुद कर दिया। ख़ुदा तुमको वह सबसे बड़ा इनाम दे, जो बाप बेटे को दे सकता है।
जहीर, हबीब, अब्दुला, कलबी और उसकी स्त्री का प्रवेश।
अली अकबर: कौन इधर से जा रहा है?
जहीर: हम मुसाफ़िर हैं। ये खेमे क्या हज़रत हुसैन के हैं?
अली अकबर: हां।
जहीर: ख़ुदा का शुक्र है कि हम मंजिल-मक़सूद पर पहुंच गए। हम उन्हीं की जियारत के लिए कूफ़ा से आ रहे हैं।
हुसैन: जिसके लिए आप कूफ़ा से आ रहे है, वह खुद आपसे मिलने के लिए कूफ़ा जा रहा है। मैं ही हुसैन बिन अली हूं।
जहीर: हमारे जहे-नसीब कि आपकी जियारत हुई। हम सब-के-सब आपके ग़ुलाम हैं। कूफ़ा में इस वक्त दर व दीवार आपके दुश्मन हो रहे हैं। आप उधर क़स्द न फरमाएं। हम इसलिए चले आए हैं कि वहां रहकर आपकी कुछ ख़िदमत नहीं कर सकते। हमने हज़रत मुसलिम के क़त्ल का खूनी नज़ारा देखा है, रानी को क़त्ल होते देखा है, और ग़रीब तौआ की चोटियां कटते देखी है। जो लोग आपकी दोस्ती का दम भरते थे, वे आज ज़ियाद के दाहिने बाजू बने हुए हैं।
हुसैन: ख़ुदा उन्हें नेक रास्ते पर लाए। तक़दीर मुझे कूफ़ा लिए जाती है, और अब कोई ताक़त मुझे वहां जाने से रोक नहीं सकती। आप लोग चलकर आराम फरमाएं। कल का दिन मुबारक होगा, क्योंकि मैं उस मक़ाम पर पहुंच जाऊंगा, जहां शहादत मेरे इंतज़ार में खड़ी है।
सब जाते हैं
छठा दृश्य
कर्बला का मैदान। एक तरफ़ केरात-नदी लहरें मार रही है। हुसैन मैदान में खड़े हैं। अब्बास और अली अकबर भी उनके साथ हैं।
अली अकबर: दरिया के किनारे खेमे लगाए जाए, वहां ठंडी हवा आएगी।
अब्बास: बड़ी फ़िजा की जगह है।
हुसैन: आंखों में आंसू भरे हुए भाई, लहराते हुए दरिया को देखकर खुद-बखुद बाबा बहुत ग़मग़ीन थे। उनकी आंखों से आंसू न थमते थे। न खाना खाते थे, न सोते थे।
मैंने पूछा‘‘या हजरत, आप क्यों इस क़दर बेताब हैं?’’
मुझे छाती से लिपटाकर बोले‘‘बेटा, तू मेरे बाद एक दिन यहां आएगा, उस दिन तुझे मेरे रोने का सबब मालूम होगा। आज मुझे उनकी वह बात याद आती है। उनका रोना बेसबब नहीं था। इसी जगह हमारे ख़ून बहाए जायेंगे, इसी जगह हमारी बहनें और बेटियां, क़ैद की जाएंगी, इसी जगह हमारे आदमी क़त्ल होंगे, और हम ज़िल्लत उठाएंगे। ख़ुदा की क़सम, इसी जगह मेरी गर्दन की रगें कटेंगी और मेरी दाढ़ी ख़ून में रंगी जायेगी। इसी जगह का वादा मेरे नाना से अल्लाहताला ने किया है, और उसका वादा तक़दीर की तहरीर है।
गाते हैं।
देगा जगह कोई मुश्ते गुबार को, बैठेगा कौन लेके किसी बेकरार को। दर सैकड़ों कफ़स में हैं, फिर भी असीर हूं, कैसा मकां मिला है, गरीबे-दबार को। दिल-सौज कौन है, जो न जाने के ज़ुल्म से, देखे मेरी बुझी हुई शमए-मज़ार को। आखिर है दास्तान शबे-ग़म कि बाग मर्ग, करता है बंद दीदए-अख्तर शुमार को। आवाज ए-
चमन की उम्मीद और मेरे बादचुप कर दिया फ़लक ने ज़बाने-बहार को। राहत कहां नसीब कि सहराए-ग़म को धूप, देती है आग हर शजरे शायादार को। खुद आसमां को नक्शे-वफा से है दुश्मनी, तुम क्यों मिटा रहे हो निशाने-मजार को। इस हादिसे से क़बूल कि मैं फिर कुछ न कह सकूं, सुन लो बयान हाले-दिले बेकरार को।
जैनब खेमे से बाहर निकल आती है।
जैनब: भैया, यह कौन-सा सहरा है कि इसे देखकर ख़ौफ़ से कलेजा मुंह को आ रहा है। बानू बहुत घबराई हुई है, और असगर छाती से मुंह नहीं लगाता।
हुसैन: बहन! यही कर्बला का मैदान है।
जैनब: दोनों हाथों से सिर पीटकर भैया, मेरी आंखों के तारे, तुम पर मेरी जान निसार हो। हमें तक़दीर ने यहां कहां लाके छोड़ा, क्यों कहीं और चलते?
हुसैन: बहन, कहां जाऊं? चारो तरफ़ से नाके बंद हैं। ज़ियाद का हुक्म कि मेरा लश्कर यहीं उतरे। मजबूत हूं, लड़ाई में बहस नहीं करना चाहता।
जैनब: हाय भैया! यह बड़ी मनहूस जगह है। मुझे लड़कपन से यहां की ख़बर है। हाय भैया! इस जगह तुम मुझसे बिछुड़ जाओगे। मैं बैठी देखूंगी, और तुम बर्छियां खाओगे। मुझे मदीने भी न पहुंचा सकोगे? रसूल की औलाद यहीं तबाह होगी, उनकी नामूस यहीं लूटेगी। हाय तक़दीर!
इस दश्त में तुम मुझसे बिछुड़ जाओगे भाई, गर ख़ाक भी छानूं तो न हाथ आवेगा भाई। बहनों को मदीने में न पहुंचाओगे भाई, मैं देखूंगी और बरछिया तुम खाओगे भाई। औलाद से बानू की यह छूटने की जगह है, नामूसे-नबी की यही लूटने की जगह है।
बेहोश हो जाती हैं। लोग पानी के छींटे देते हैं
अली अकबर: या हजरत, खेमे कहां लगाए जाये?
अब्बास: मेरी सलाह तो है कि दरिया के किनारे लगें।
हुसैन: नहीं, भैया, दुश्मन हमें दरिया के किनारे न उतरने देंगे। इसी मैदान में खेमे लगाओ, ख़ुदा यहां भी है, और वहां भी। उसकी मर्जी पूरी होकर रहेगी।
जैनब को औरतें उठाकर खेमे में ले जाती हैं।
बानू: हाय-हाय! बाजीजान को क्या हो गया। या ख़ुदा हम मुसीबत के मारे हुए हैं, हमारे हाल पर रहम कर।
हुसैन: बानू, यह मेरी बहन नहीं, मां है। अगर इस्लाम में बुतपरस्ती हराम न होती, तो मैं इसकी इबादत करता। यह मेरे ख़ानदान का रोशन सितारा है। मुझ-सा ख़ुशनसीब भाई दुनिया में और कौन होगा, जिसे ख़ुदा ने ऐसी बहन अता की। जैनब के मुंह पर पानी के छींटे देते हैं।
सातवां दृश्य
नसीमा अपने कमरे में अकेली बैठी हुई है– समय १२ बजे रात का।
नसीमा: दिल में वह अब तक नहीं आए। ग़ुलाम को उन्हें साथ लाने के लिए भेजा, वह भी वहीं का हो रहा। ख़ुदा करे, वह आते हों। दुनिया में रहते हुए हमारे ऊपर मुल्क की हालात का असर न पड़े। मुहल्ले में आग लगी हो तो अपना दरवाजा बंद करके बैठ रहना खतरे से नहीं बचा सकता। मैंने अपने तई इन झगड़ों से कितना बचाया था, यहां तक कि अब्बाजान और अम्मा जो यज़ीद की बैयत न क़बूल करने के जुर्म में जलावतन कर दिए गए, तब भी मैं अपना दरवाजा बंद किए बैठी रही, पर कोई तदबीर कारगर न हुई। बैयत की बला फिर गले पड़ी। वहब मेरे लिए सब कुछ करने को तैयार है। वह यज़ीद की बैयत भी क़बूल कर लेता, चाहें उसके दिल को कितना ही सदमा हो। पर जो कुछ हो रहा है, उसे देखकर अब मेरा दिन भी यज़ीद की बैयत की तरफ़ मायल नहीं होता, उससे नफ़रत होती है। मुसलिम कितनी बेदरदी से क़त्ल किए गए हानी को ज़ालिम ने किस बुरी तरह क़त्ल कराया। यह सब देखकर अगर यज़ीद की बैयत क़बूल कर लूं, तो शायद मेरा जमीर मुझे कभी मुआफ न करेगा। हमेशा पहलू में खलिश होती रहेगी। आह! इस खलिश को भी सह सकती हूँ, पर वहब की रूहानी कोफ्त अब नहीं सही जाती। मैंने उन पर बहुत जुलम किए। अब उनकी मुहब्बत की जंजीर को और न खींचूंगी। जिस दिन से अब्बा और अम्मा निकाले गए हैं, मैंने वहब को कभी दिल से ख़ुश नहीं देखा। उनकी वह जिंदादिली ग़ायब हो गई। यों वह अब भी मेरे साथ हंसते हैं, गाते हैं, पर मैं जानती हूं, यह मेरी दिलजुई है। मैं उन्हें जब अकेले बैठे देखती हूं, तो वह उदास और बेचैन नज़र आते हैं…वह आ गए, चलूं दरवाजा खोल दूं।
जाकर दरवाजा खोल देती है। वहब अंदर दाखिल होता है।
नसीमा: तुम आ गए, वरना मैं खुद आती। तबियत बहुत घबरा रही थी। ग़ुलाम कहां रह गया?
वहब: क़त्ल कर दिया गया। नसीमा, मैंने किसी को इतनी दिलेरी से जान लेते नहीं देखा। इतनी लापरवाही से कोई कुत्ते के सामने लुकमा भी न फेंकता होगा। मैं तो समझता हूं, वह कोई औलिया था।
नसीमा: हाय, मेरे वफ़ादार और ग़रीब सालिम! ख़ुदा तुझे जन्नत नसीब करे। जालियों ने उसे क्यों क़त्ल किया?
वहब: आह! मेरे ही कारण उस ग़रीब की जान गई। जामा मसजिद में हजारों आदमी जमा थे। ख़बर है, और तहकीक ख़बर है कि हज़रत हुसैन मक्के से बैयत लेने आ रहे हैं। जालिमों के होश उड़े हुए हैं। जो पहले बच रहे थे, उनसे अब यज़ीद की ख़िलाफ़त का हलफ़ लिया जा रहा है। ज़ियाद ने जब मुझसे हलफ़ लेने को कहा, तो मैं राजी हो गया। इनकार करता तो उसी वक्त कैदखाने में डाल दिया जाता। ज़ियाद ने ख़ुश होकर मेरी तारीफ की, और यज़ीद के हामियों की सफ़ में ऊंचे दर्जे पर बिठाया, जागीर में इजाफ़ा किया, और कोई मंसब भी देना चाहते हैं। उसकी मंशा यह भी है कि सब हामियों को एक सफ़ में बिठाकर एकबारगी सबसे हलफ़ ले लिया जाये इसीलिये मुझे देर हो रही थी। इसी असना में सालिम पहुंचा, और मुझे यजीदवालों की सफ़ में बैठे देखकर मुझसे बदजबानी करने लगा। मुझे दग़ाबाज जमानासाज बेशर्म, ख़ुदा जाने, क्या-क्या कहा, और उसी जोश में यज़ीद और ज़ियाद दोनों ही को शान में बेअदबी की। मुझे ताना देता हुआ बोला, मैं आज तुम्हारे नमक की क़ैद से आजाद हो गया। मुझे क़त्ल होना मंजूर हैं मगर ऐसे आदमी की गुलामी मंजूर नहीं, जो खुद दूसरों का ग़ुलाम है।
ज़ियाद ने हुक्म दियाइस बदमाश की गर्दन मार दो और, जल्लादों ने वहीं सहन में उसको कल्ल कर डाला। हाय! मेरी आंखों के सामने उसकी जान ली गई, और मैं उसके हक़ में ज़बान तक न खोल सका, उसकी तड़पती हुई लाश मेरी आंखों के सामने घसीटकर कुत्तों के आगे डाल दी गई, और मेरे ख़ून में जोश न आया। आफियत बड़े मंहगे दामों में मिलती है।
नसीमा: बेशक, महंगे दाम हैं। तुमने अभी बैयत तो नहीं ली?
वहब: अभी नहीं, बहुत देर हो गई, लोगों की तादाद बढ़ती जाती थी आखिर आज हलफ़ लेना मुल्तवी किया गया। कल फिर सबकी तलबी है।
नसीमा: तुम इन जालिमों को बैयत हर्गिज न लेना।
वहब: नहीं नसीमा, अब उसका मौका निकल गया।
नसीमा: मैं तुमसे मिन्नत करती हूं हर्गिज न लेना।
वहब: तुम मेरी दिलजूई के लिए अपने ऊपर जब्र कर रही हो।
नसीमा: नहीं वहब, अगर तुम दिल से भी बैयत क़बूल करनी चाहो, तो मैं ख़ुश न हूंगी। में भी इंसान हूं वहब, निरी भेड़ नहीं हूं। मेरे दिल के जज़बात मुर्दा नहीं हुए है। मैं तुम्हें इन जालिमों के सामने सिर न झुकाने दूंगी। जानती हूं जागरी जब्त हो जायेगी,. वजीफ़ा बंद हो जायेगा, जलावतन कर दिए जायेंगे। मैं तुम्हारे साथ ये सारी आफ़तें झेल लूंगी।
वहब: और अगर जालिमों ने इतने ही पर बस न की?
नसीमा: आह वहब, अगर यह होना है, तो ख़ुदा के लिए इसी वक्त यहां से चले चलो। किसी सामान की ज़रूरत नहीं। इसी तरह, इन्हीं पांवों चलो। यहां से दूर किसी दरख्त के साए में बैठकर दिन काट दूंगी, पर इन जालिमों की खुशामद न करूंगी।
बहबन: सीमा को गले लगाकर नसीमा, मेरी जान तुझ पर फ़िदा हो। जालिमों की सख्ती मेरे हक़ में अकसीर हो गई। अब उस ज़ुल्म से मुझे कोई शिकायत नहीं। हमारे जिस्म बारहा गले मिल चुके है, आज हमारी रूहें गले मिली हैं, मगर इस वक्त नाके बंद होंगे।
नसीमा: जालिमों के नौकर बहुत ईमानदार नहीं होते। मैं उसे 50 दीनार दूंगी, और वहीं हमें अपने घोड़े पर सवार कराके शहर पहुंचा देगा।
वहब: सोच लो, बागियों के साथ किसी की रू-रियासत नहीं हो सकती उनकी एक ही सजा है, और वह है क़त्ल।
नसीमा: वहब, इंसान के दिल की क़ैफियत हमेशा एक-सी-नहीं रहती। केंचुए से डरने वाला आदमी सांप की गर्दन पकड़ लेता है। ऐश के वंदे गुदड़ियों में मस्त हो जाते हैं। मैंने समझा था, जो खतरा है, घोंसलों से बाहर निकलने में है, अंदर बैठे रहने में आराम-ही-आराम है। पर अब मालूम हुआ कि सैयाद के हाथ घोंसले के बाहर निकलने में है, अंदर बैठे रहने में आराम-ही-आराम है। पर अब मालूम हुआ कि सैयाद के हाथ घोंसले के अंदर भी पहुंच जाते हैं। हमारी नजात ज़माना से भागने में नहीं, उसका मुकाबला करने में है। तुम्हारी सोहबत ने, मुल्क की हालत ने, क़ौम के रईसों और अमीरों की पस्ती ने मुझ पर रोशन कर दिया कि यहां इतमीनान के मानी ईमान-फ़रोशी और आफ़ियत के मानी हक़कुशी हैं। ईमान और हक़ की हिफ़ाजत असली आफ़ियत और इतमीनान है।
लुफ्त मरने में है बाक़ी न मज़ा जीने में, कुछ अगर है, तो यही खूने-जिगर पीने में।
वहब: मुआफ करो नसीमा, मैंने तुम्हें पहचानने में ग़लती की। चलो, सफ़र का सामान करें।
