Cover Image for Karbala (कर्बला) by Munshi Premchand - Play
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नाटक•1924•5 दृश्य

कर्बला

Karbala

मुंशी प्रेमचंद का ऐतिहासिक नाटक 'कर्बला' 680 ईस्वी में कर्बला की लड़ाई में इमाम हुसैन के बलिदान को दर्शाता है। यह बलिदान और सत्य के लिए खड़े होने की कहानी है।

दृश्य 4 / 5

चौथा अंक

पात्र: नशीमा, साद, ज़ियाद

पहला दृश्य


प्रातःकाल का समय। ज़ियाद फर्श पर बैठा हुआ सोच रहा है।

ज़ियाद: स्वगत उस वफ़ादारी की क्या कीमत है, जो महज ज़बान तक महदूद रहें? कूफ़ा के सभी सरदार, जो मुसलिम बिन अकील से जंग करते वक्त बग़लें झांक रहे हैं। कोई इस मुहिम को अंजाम देने का बीडा नहीं उठाता। आकबत और नजात की आड़ में सब-के-सब पनाह ले रहे हैं। क्या अक्ल है, जो दुनिया को अकबा की ख़याली नियामतों पर कुर्बान कर देती है। मज़हब! तेरे नाम पर कितनी हिमाकतें सबाब समझी जाती हैं, तूने इंसान को कितना बातिन-परस्त, कितना कम हिम्मत बना दिया है!

उमर साद का प्रवेश

साद: अस्सलामअलेक या अमीर, आपने क्यों याद फ़रमाया?

ज़ियाद: तुमसे एक खास मामले में सलाह लेनी है। तुम्हें मालूम हैं, ‘रै’ कितना ज़रखेज, आबाद और सेहतपरवर सूबा है?

साद: खूब जानता हूं, हुजूर, वहां कुछ दिनों रहा हूं, सारा सूबा मेवे के बागों और पहाड़ी चश्मों में गुलजार बना हुआ है। बाशिदें निहायत खलीक और मिलनसार। बीमार आदमी वहां जाकर तवाना हो जाता है!

ज़ियाद: मेरी तजवीज है कि तुम्हें उस सूबे का आमिल बनाऊं। मंजूर करोगे?

साद: बंदगी करके सिर और आंखों से। इस क़द्रदानी के लिये क़यामत तक शुक्रगुजार रहूंगा।

ज़ियाद: माकूल सालाना, मुशाहरे के अलावा तुम्हें घोड़े नौकर, ग़ुलाम सरकार की तरफ़ से मिलेंगे।

साद: ऐन बंदानवाजी है। ख़ुदा आपको हमेशा ख़ुशख़र्र रखे।

ज़ियाद: तो मैं मुंशी को हुक्म देता हूं कि तुम्हारे नाम फ़रमान जारी कर दे, और तुम वहां जाकर काम संभालो।

साद: ग़ुलाम हमेशा आपका मशकूर रहेगा।

ज़ियाद: मुझे यकीन है, तुम उतने ही कारगुज़ार और वफ़ादार साबित होगे, जैसी मुझे तुम्हारी जात से उम्मीद है।

मीर मुंशी को बुलाता है, वह साद के नाम फ़रमान लिख़ता है।

साद: फ़रमान लेकर तो मैं कल चला जाऊं?

ज़ियाद: नहीं-नहीं इतना जल्द नहीं। वहां जाने के पहले तुम्हें अपनी वफ़ादारी का सबूत देना पड़ेगा। इतना ऊंचा मंसब उसी को दिया जा सकता है, जो हमारा एतबार हासिल कर सके। यह किसी बड़ी ख़िदमत का सिला होगा।

साद: मैं हर एक ख़िदमत के लिये दिलोजान से हाजिर हूं। जिस मुहिम को और कोई अंजाम न दे सकता हो, उस पर मुझे भेज दीजिए। ख़ुदा ने चाहा, तो कामयाब होकर आऊंगा।

ज़ियाद: बेशक-बेशक, मुझे तुम्हारी जात से ऐसी ही उम्मीद है। तुम्हें मालूम है, हुसैन बिन अली कूफ़े की तरफ़ आ रहे हैं। हमको उनकी तरफ़ से बहुत अंदेशा है। तुमको उनसे जंग करने के लिये जाना होगा। उधर से हमें बेफ़िक्र करके फिर ‘रै’ की हुकूमत पर जाना।

साद: या अमीर, आप मुझे इस मुहिम पर जाने से मुआफ़ रखे, इसके सिवा आप जो हुक्म देंगे, उसकी तामिल में मुझे ज़रा भी उज्र न होगा।

ज़ियाद: क्या, हुसैन से जंग करने में तुम्हें क्या उज्र है?

साद: आपका ग़ुलाम हूं, लेकिन हुसैन के मुकाबले से मुझे मुआफ़ रखे, तो आपका हमेशा एहसान मानूंगा।

ज़ियाद: बेहतर है, तुम्हारी जगह किसी और को भेजूंगा। फ़रमान वापस देकर घर बैठ जाओ। ‘रै’ का इलाका उसी आदमी का हक़ है, जो इस मुहिम को अंजाम दे। मौत के बग़ैर जन्नत नसीब नहीं हो सकती। जो आदमी एक पैर दीन की किश्ती में रख़ता है, दूसरा पैर दुनिया की किश्ती में, उसे कभी साहिल पर पहुंचना नसीब न होगा।

साद: दिल में एक तरफ़ ‘रै’ का इलाक़ा है, दूसरी तरफ़ नजात; एक तरफ़ दौलत और हुकूमत है, दूसरी तरफ़ लामत और अजाब! ख़ुदा! मेरी तक़दीर में क्या लिखा। है प्रकट या अमीर, मुझे एक दिन की मुहलत दीजिए। मैं कल इस मामले पर गौर करके आपको जवाब दूंगा।

ज़ियाद: अच्छी बात है। सोच लो।

दोनों चले जाते हैं।


दूसरा दृश्य


प्रातःकाल का समय। साद का मकान। साद बैठा हुआ है।

साद: मन में यार दोस्त, अपने बेगाने, अजीज, सब मुझे हुसैन के मुकाबले पर जाने से मना करते हैं। बीबी कहती है, अगर तेरे पास दुनिया में कुछ भी बाकी न रहे, तो इससे बेहतर है कि तू हुसैन का ख़ून अपनी गर्दन पर ले। आज मैंने ज़ियाद को जवाब देने का वादा किया है। सारी रात सोचते गुजर गई, और अभी तक कुछ फ़ैसला न कर सका। अजीज दोफ़स्ले पड़ा हुआ हूं। अपना दिल भी हुसैन के क़त्ल पर आमादा नहीं होता। गो मैंने यज़ीद के हाथों पर बैयत की। पर हुसैन से मेरी कोई दुश्मनी नहीं है। कितना दीनदार, कितना बेलौस आदमी है। हमी ने उन्हें यहां बुलाया, बार-बार ख़त और क़ासिद भेजे, और आज जब वह यहां हमारी मदद करने आ रहे हैं, तो हम उनको जान लेने पर तैयार है हाय खुदग़रजी! तेरा बुरा हो, तेरे सामने दीन-ईमान, नेक-बद की तरफ़ से आँखें बंद हो जाती है। कितना गुनाहे-अजीम है। अपने रसूल के नवासे की गर्दन पर तलवार चलाना! ख़ुदा न करे, मैं इतना ग़ुमराह हो जाऊं। ‘रै’ का सूबा कितना जरखे़ज है। वहां थोड़े दिन भी रह गया, तो मालामाल हो जाऊंगा। कितनी शान से बसर होगी। तुफ् है मुझ पर, जो अपनी शान और हुकूमत के लिये बड़े-से-बड़े गुनाह करने का इरादा कर रहा हूं। नहीं, मुझसे यह फ़ेल न होगा। ‘रै’ जन्नत ही सही, पर फ़र्जन्दे-रसूल का ख़ून करके मुझे जन्नत में जाना भी मंजूर नहीं।

ज़ियाद का प्रवेश।

साद: अस्सलामअलेक। अमीर ज़ियाद, मैं तो खुद ही हाजिर होनेवाला था। आपने नाहक़ तकलीफ़ की।

ज़ियाद: शहर का दौरा करने निकला था। बागियों पर इस वक्त बहुत सख्त निगाह रखने की ज़रूरत है। मुझे मालूम हुआ है कि हबीब, जहीर, अब्दुलाह वगै़रा छिपकर हुसैन के लश्कर में दाखिल हो गए है। इसकी रोकथाम न की गई, जो बाग़ी शेर हो जायेंगे। हुसैन के साथ आदमी थोड़े हैं, पर मुझे ताज्जुब होगा, अगर यहां आते-आते उनके साथ आधा शहर हो जाये। शेर पिंजरे में भी हो तो, भी उससे डरना चाहिए। रसूल का नाती फ़ौज का मुहताज नहीं रह सकता। कहो, तुमने क्या फ़ैसला किया? मैं अब ज्यादा इंतज़ार नहीं कर सकता।

साद: या अमीर, हुसैन के मुकाबले के लिये न तो अपना दिल ही गवाही देता है, और न घरवालों की सलाह होती है। आपने मुझे ‘रै’ की निज़ामत अता की है, इसके लिये आपको अपनी मुरब्बी समझता हूं। मगर क़त्ले-हुसैन के वास्ते मुझे न भेजिए।

ज़ियाद: साद, दुनिया में कोई ख़ुशी बगै़र तकलीफ़ के नहीं हासिल होती। शहद के साथ मक्खी के डंक का ज़हर भी है। तुम शहद का मजा उठाना चाहते हो, मगर डंक की तकलीफ़ नहीं उठाना चाहते। बिना मौत की तकलीफ़ उठाए जन्नत में जाना चाहते हो। तुम्हें मज़बूर नहीं करता। इस इनाम पर हुसैन से जंग करने के लिये आदमियों की कमी नहीं है। मुझे फ़रमान वापस दे दो, और आराम से घर बैठकर रसूल और ख़ुदा की इबादत करो।

साद: या अमीर! सोचिए, इस हालत में मेरी कितनी बदनामी होगी। सारे शहर में ख़बर फैल गई कि मैं ‘रै’ का नाज़िम बनाया गया हूं। मेरे यार-दोस्त मुझे मुबारकबाद दे चुके। अब जो मुझसे फ़रमान ले लिया जायया, तो लोग दिल में क्या कहेंगे?

ज़ियाद: यह सवाल तो तुम्हें अपने दिल से पूछना चाहिए।

साद: या अमीर मुझे कुछ और मुहलत दीजिए।

ज़ियाद: तुम इस तरह टाल-मटोल करके देर करना चाहते हो। क़लाम पाक की क़सम है, अब मैं तुम्हारे साथ ज्यादा सख्ती से पेश आऊंगा। अगर शाम को हुसैन से जंग करने के लिये तैयार होकर न आए, तो तेरी जायदाद जब्त कर लूंगा, तेरा घर लुटवा दूंगा, यह मकान पामाल हो जायेगा, और तेरी जान की भी खैरियत नहीं।

ज़ियाद का प्रस्थान

साद: दिल में मालूम होता है, मेरी तक़दीर में रूस्याह होना ही लिखा है। अब महज़ ‘रै’ की निजामत का सवाल है। अब अपनी जायदाद और जान का सवाल है। इस ज़ालिम ने हानी को कितनी बेरहमी से क़त्ल किया। कसीर का भी अपनी अईनपरवरी की गिरां कीमत देनी पड़ी। शहरवालों ने ज़बान तक न हिलाई। वह तो महज हुसैन के अजीज थे। यह मामला उससे कहीं नाजुक है। ज़ियाद बेरहम हो जायेगा, तो जो कुछ न कर गुजरे, वह थोड़ा है। मैं ‘रै’ को ईमान पर कुर्बान कर सकता हूं, पर जान और जायदाद को नहीं कुरबान कर सकता। काश मुझसे हानी और कसीर की-सी हिम्मत होती।

शिमर का प्रवेश

शिमर: अस्सलामअलेक। साद, किस फ़िक्र में बैठे हो, ज़ियाद को तुमने क्या जवाब दिया?

साद: दिल हुसैन के मुकाबले पर राजी नहीं होना।

शिमर: सरवत और दौलत हासिल करने का ऐसा सुनहरा मौका फिर हाथ न आएगा। ऐसे मौके जिदंगी में बार-बार नहीं आते।

साद: नजात कैसे होगी?

शिमर: ख़ुदा रहीम है, करीम है, उसकी जात से कुछ बईद नहीं। गुनाहों को माफ न करता, तो रहीम क्यों कहलाता? हम गुनाह न करें, तो वह माफ क्या करेगा?

साद: ख़ुदा ऐसे बड़े गुनाह को माफ न करेगा।

शिमर: अगर ख़ुदा की जात से यह एतकाद उठ जाये, तो मैं आज मुसलमान न रहूं। यह रोजा और नजाम या ज़कात और खैरात, किस मर्ज़ की दवा है, अगर हमारे गुनाहों को भी माफ़ न करा सके।

साद: रसूले-ख़ुदा को क्या मुंह दिखाऊंगा?

शिमर: साद, तुम समझते हो, हम अपनी मर्जी के मुख्तार हैं, यह यक़ीदा बातिल है। सब-के-सब हुक्म के बंदे हैं। उसकी मर्जी के बग़ैर हम अपनी उंगली को भी नहीं हिला सकते। सबाब और अज़ाब का यहां सवाल ही नहीं रहता। अक्लमंद आदमी उधार के लिये नकद को नहीं छोड़ता। ताखीर मत करो, वरना फिर हाथ मलोगे।

शिमर चला जाता है।

साद: दिल में शिमर ने बहुत माकूल बातें कहीं। बेशक ख़ुदा अपने बंदों के गुनाहों को माफ करेगा, वरना हिसाब के दिन दोज़ख में गुनाहगारों के खड़े होने की जगह भी न मिलेगी। मैं जाहिद ख़ुदा की यही मरजी है कि हुसैन के मुकाबले पर मैं जाऊं, वरना ज़ियाद यह तजवीज़ ही क्यों करता। जब ख़ुदा की यही मर्जी है, तो मुझे सिर झुकाने के सिवा और क्या चारा है। अब जो होना हो, सो हो आग में कूद पडा, जलूं या बचूं।

ग़ुलाम को बुलाकर ज़ियाद के नाम अपनी मंजूरी का ख़त लिख़ता है।

ग़ुलाम: शायद हुजूर ने ‘रै’ की निजामत क़बूल कर ली है

साद: जा, तुझे इन बातों से क्या मतलब।

ग़ुलाम: मैं पहले ही से जानता था कि आप यही फ़ैसला करेंगे।

साद: तुझे क्योंकर इसका इल्म था?

गुलाम: मैं खुद इस मंसब को न छोड़ता, चाहे इसके लिये कितना ही ज़ुल्म करना पड़ता।

साद: दिल में ज़ालिम कैसी पते की बात कहता है।

ग़ुलाम चला जाता है, और साद गाने लगता है।

कोई तुमसे जुदा दर्दे-जुदाई लेके बैठा है, वह अपने घर में अब अपनी कमाई लेके बैठा है। जिगर, दिल, जान, ईमां अब कहां तक नाम ले कोई, वह ज़ालिम सैकड़ों चीजें पराई लेके बैठा है।

ख़ुदा ही है मेरी तौबा का, जब साक़ी कहे मुझसे अरे, पी भी, कहां की पारसाई लेके बैठा है। तेरे काटे शबे-ग़म मेरी बरसों से नहीं कटती, तो फिर तू ऐ ख़ुदा, नाहक़ खुदाई लेके बैठा है। कहूं कुछ मैं, तो मुंह फेरकर कहता है औरों सेख़ुदा जाने, यह कब की आशनाई लेके बैठा है।

अमल कुछ चल गया है शौक़ पर ज़ाहिद का ऐ यारो, कि मस्जिद में पुरानी एक चटाई लेके बैठा है।


तीसरा दृश्य


केरात-नदी के किनारे साद का लश्कर पड़ा हुआ है। केरात से दो मील के फासले पर कर्बला के मैदान में हुसैन का लश्कर है। केरात और हुसैन के लश्कर के बीच में साद ने एक लश्कर को नदी के पानी को रोकने के लिये पहरा को बैठा दिया है। प्रातःकाल का समय। शिमर और साद खेमे में बैठे हुए हैं।

साद: मेरा दिल अभी तक हुसैन से जंग करने को तैयार नहीं होता। चाहता हूं, किसी तरीके से सुलह हो जाये, मगर तीन कासिदों में से एक भी मेरे ख़त का जवाब न ला सका। एक तो हज़रत हुसैन के पास जा ही न सका, दूसरा शर्म के मारे रास्ते ही से किसी तरह खिसक गया, और तीसरे से जाकर हुसैन की बैयत अख्तियार कर ली। अब और कासिदों को भेजते हुए डरता हूं कि इनका भी वही हाल न हो।

शिमर: ज़ियाद को ये बातें मालूम होंगी, तो आपसे सख्त नाराज होगा।

साद: मुझे बार-बार यही ख्याल आता है कि हुसैन यहां जंग के इरादे से नहीं, महज हम लोगों के बुलाने से आए हैं। उन्हें बुलाकर उनसे दग़ा करना इंसानियत के खिलाफ़ मालूम होता है।

शिमर: मुझे ख़ौफ़ है कि आपके ताखीर से नाराज होकर, ज़ियाद आपको वापस न बुला लें। फिर उनके ग़ुस्से से ख़ुदा ही बचाए। ज़ियाद ने कितनी सख्त ताकीद की थी कि हुसैन के लश्कर को पानी का एक बूंद भी न मिले। वहां उनके आदमी दरिया से पानी ले जाते है, कुएं खोदते हैं। इधर से कोई रोक-टोक नहीं होती। क्या आप समझते हैं कि ज़ियाद से ये बातें छिपी होंगी।

साद: मालूम नहीं, कौन उसके पास ये सब खबरें भेजता रहता है?

शिमर: उसने यहां अपने कितने गोंइदे बिठा रखे हैं, जो दम-दम की खबरें भेज देते हैं।

एक क़ासिद का प्रवेश

क़ासिद: अस्सलामअलेक बिन साद। अमीर का हुक्मनामा लाया हूं।

साद को ज़ियाद का ख़त देता है।

साद: ख़त पढ़कर तुम बाहर बैठो, इस जवाब दिया जायेगा। क़ासिद चला जाता है इसमें भी वही ताकीद है कि हुसैन को पानी मत लेने दो, जंग करने में एक लहमें की देर न करो। देखिए,

लिखते हैं‘‘हुसैन से जंग करने के लिये अब कोई बहाना नहीं रहा। फ़ौज की कमी की शिकायत थी, सो वह भी नहीं रही। अब मेरे पास २२ हजार सवार और पैदल मौजूद हैं।’’

शिमर: बेशक, उनका लिखना वाजिब है। मैं जाकर सख्त हुक्म देता हूं कि हुसैन के लश्कर की एक चिड़िया भी दरिया के किनारे न आने पाए। आप जंग का हुक्म दे दें।

साद: आपको मालूम है, २२ हजार आदमियों में कितने अजाब के ख़ौफ़ से भाग गए, और रोज भागते जाते हैं।

शिमर: इसीलिये तो और भी जरूरी है कि जंग शुरू कर दी जाये, वरना रफ्ता-रफ्ता यह सारी फ़ौज बादलों की तरह ग़ायब हो जायेगी। पर मैंने सुना है, ज़ियाद ने उन सब आदमियों को गिरफ्तार कर लिया है, और बहुत जल्द वे सब फ़ौज में आ जायेंगे। पर यह हुक्म भी जारी कर दिया है कि जो आदमी फ़ौज से भागेगा, उसकी जायदाद छीन ली जायेगी, और उसे ख़ानदान के साथ जलावतन कर दिया जायेगा, इस हुक्म का लोगों पर अच्छा असर पड़ा है। अब उम्मीद नहीं कि भागने की कोई हिम्मत करे। मुझे यह भी ख़बर मिली है कि ज़ियाद ने कई आदमियों को क़त्ल करा दिया है।

एक और क़ासिद का प्रवेश

क़ासिद: अस्सलामअलेक बिन साद। हजरत हुसैन ने यह ख़त भेजा है, और उसका जवाब तलब किया है। साद को ख़त देता है।

साद: ख़त पढ़कर बाहर जाकर बैठो। अभी जवाब मिलेगा।

शिमर: ख़त पर झुककर इसमें क्या लिखा है?

साद: ख़त को बंद करके कुछ नहीं, यही लिखा है कि मैं तुमसे मिलना चाहता हूं।

शिमर: यह उनकी नई चाल है। क़लाम पाक की क़सम, आप उनकी दरख्वास्त मानकर पछताएंगे। आपको फ़ौज में फिर आना नसीब न होगा।

साद: क्या तुम्हारा यह मतलब है कि हुसैन मुझसे दग़ा करेगे? अली का बेटा दग़ा नहीं कर सकता।

शिमर: यह मेरा मतलब नहीं। यहां से बच निकलने की कोई तज़वीज पेश करना चाहते होंगे। उनकी ज़बान में जादू का असर है, ऐसा न हो कि वह आपको चकमा दे। क्या हर्ज है, अगर मैं भी आपके साथ चलूं?

साद: मैं समझता हूं कि मैं अपने दीन और दुनिया की हिफ़ाजत खुद कर सकता हूं। मुझे तुम्हारी मदद की ज़रूरत नहीं।

शिमर: आपको अख्तियार है। कम-से-कम मेरी इतनी सलाह तो मान ही लीजिएगा कि अपने थोड़े-से चुने हुए आदमी लेते जाइएगा।

साद: यह मेरा जाती मामला है, जैसा मुनासिब समझूंगा, करूंगा।

क़ासिद को बुलाकर ख़त का जवाब देता है

शिमर: रात का वक्त लिखा है न?

साद: इतना तो तुम्हें खुद समझ लेना चाहिए था।

शिमर: जाने के लिये खड़ा होकर मेरी बात का ज़रूर ख़याल रखिएगा। दिल में इसके अंदाज से मालूम होता है कि हुसैन की बातों में आ जायेगा। ज़ियाद के पास खुद जाकर यह किस्सा कहूं।

साद: दिल में ख़ुदा तुझसे समझे ज़ालिम? तू ज़ियाद से भी दो अंगुल बढ़ा हुआ है। शायद मेरा यह कयात ग़लत नहीं है कि तू ही ज़ियाद को यहां के हालात की इत्तिला देता है। हुसैन दग़ा करेंगे! हुसैन दग़ा करने वालों में नहीं, दग़ा का शिकार होने वालों में है।

उठकर अंदर चला जाता है


चौथा दृश्य


हुसैन के हरम की औरतें बैठी हुई बातें कर रही हैं। शाम का वक्त।

सुगरा: अम्मा, बडी प्यास लगी है।

अली असगर: पानी, बूआ पानी।

हंफ़ा: कुर्बान गई, बेटे कितना पानी पियोगे? अभी लाई मश्को को जाकर देखती है, और छाती पीटती लौटती है ऐ कुरबान गई बीबी, कहीं एक बूंद पानी नहीं। बच्चों को क्या पिलाऊं?

जैनब: क्या बिलकुल पानी ग़ायब हो गया?

हंफ़ा: ऐ कुरबान गई बीबी, सारे मटके और मशकें खाली पड़ी हुई हैं।

जैनब: गजब हो गया। नदी तो बंद ही थी, अब ज़ालिम कुएं भी नहीं खोदने देते।

असगर: पानी, बूआ पानी!

शहरबानू: या ख़ुदा! किस आवाज में फंसे। इन नन्हों को कैसे समझाऊं!

हंफ़ा: बीबी, कुरबान जाऊं। मैं जाकर दरिया से पानी लाती हूं। कौन मुआ रोकेगा, मुंह झुलस दूं उसका। क्या मेरे लाल प्यासों तड़पेंगे, जब दरिया में पानी भरा हुआ है?

जैनब: तू नहीं जानती, साढे छः हजार जवान दरिया का पानी रोकने के लिए तैनात हैं?

हंफ़ा: ऐ कुरबान जाऊं बीवी, कौन मुझसे बोलेगा, झाड़ न मारूंगी। रसूल के बेटे प्यासे रहेंगे?

हंफ़ा एक मशक लेकर दरिया की तरफ़ जाती है और थोड़ी देर बाद लौट आती है, सिर के बाल नुचे हुए, कपड़े फटे हुए, मशक नदारद। रोती हुई ज़मीन पर बैठ जाती है।

जैनब: क्या हुआ हंफ़ा? यह तेरी क्या हालत है?

हंफा: बीबी, ख़ुदा का अज़ाब इन रूस्याहों पर नाजिल हो। ज़ालिम ने मुझे रोक लिया, मेरी मशक छीन ली, और एक कुत्ते को मुझ पर छोड़ दिया। भागते-भागते किसी तरह यहां तक पहुंची हूं। हाय! इन मूजियों पर आसमान भी नहीं फट पड़ता। इतनी दुर्गति कभी न हुई थी। रोती है।

हुसैन: अंदर जाकर हंफ़ा क्यों रोती है, अरे, यह तेरे कपड़े किसने फाड़े?

जैनब: बेचारी शामत की मारी पानी लेने गई थी। बच्चे प्यास से तड़प रहे थे। जालिमों ने नोमजान कर दिया।

हुसैन: हंफ़ा, मत रोओ। रसूल के कदमों की क़सम, अभी उन जालिमों का सिर तेरे पैरों पर होगा, जिनके बेरहम हाथों ने तेरी बेहुरमती की, चाहे मेरे सारे रफ़ीक, मेरे सारे अजीज़ और मैं खुद क्यों न मर जाऊं। औरत की बेहुरमती का बदला ख़ून है, चाहे वह ग़ुलाम और बेक़स ही क्यों न हों। उन मलऊनों को दिखा दूंगा कि मुझे अपनी लौंडी की आबरू अपने हरम से कम प्यारी नहीं है।

तलवार हाथ में लेकर बाहर जाते हैं, पर हंफा उनके पैरों को पकड़ लेती है।

हंफा: मेरे आका़, मेरी जान आप पर फ़िदा हो। मैं अपना बदला दुनिया में नहीं, अक़बे में लेना चाहती हूं जहां की आग कहीं ज्यादा तेज, जहां की सजाएं यहां से कहीं ज्यादा दिल हिलाने वाली होंगी। मैं नहीं चाहती कि आपकी तलवार से क़त्ल होकर वह अजाब से छूट जाय।

हुसैन: हंफा, यह सब उसके लिए है, जो दुनिया में अपना बदला न ले सके। अगर मेरे पास एक लाख आदमी होते, तो तेरी बेइज्जती का बदला लेने के लिए मैं उन्हें कुरबान कर देता, इन बहत्तर आदमियों की हकी़क़त ही क्या है। मेरे पैरों को छोड़ दे, ऐसा न हो कि मेरा ग़ुस्सा आग बनकर मुझको जलाकर ख़ाक कर दे।

हंफा: दिल में काश इस वक्त वे ज़ालिम यहां होते और देखते कि जिसे उन्होंने कुत्तों से नुचवाया था, उसकी अली के बेटे की निगाहों में कितनी इज्जत है। नहीं मेरे मौला, मैं दुश्मनों को इतनी अच्छी मौत नहीं देना चाहती। मैं उन्हें जहन्नूम की आग में जलाना चाहती…।

अली अकबर का प्रवेश

अली अकबर: अब्बाजान, साद अपनी फ़ौज से निकलकर आया है, और आपसे मिलना चाहता है।

हुसैन: हां, मैंने इसी वक्त उसे बुलाया था। पहले उससे हंफ़ा को सताने वालों के ख़ून का मुआविजा लेना है।

हुसैन और अली अकबर बाहर जाते हैं।

अली अकबर: या हजरत, मैं भी आपके साथ रहूंगा।

अब्बास: मैं भी।

हुसैन: नहीं, मैंने उनसे तनहा मिलने का वादा किया है। तुम्हारे साथ रहने से मेरी बात में फर्क आएगा।

अली अकबर: वह तो अपने एक साथ एक सौ जवानों से ज्यादा लाया है, जो चंद कदमों के फासले पर खड़े हैं। हम आपको तनहा न जाने देंगे।

अब्बास: साद की शराफ़त पर मुझे भरोसा नहीं है।

हुसैन: मैं उसे इतना कमीना नहीं समझता कि मेरे साथ दग़ा करे। ख़ैर, अगर उसे कोई एतराज न होगा, तो वहां मौजूद रहना। उसे भी अपने साथ दो आदमियों को रखने की आजादी होगी।

तीनों आदमी अस्त्र से सुसज्जित होकर चलते हैं। परदा बदलता है। दोनों फ़ौजों के बीच में हुसैन और साद खड़े हैं। हुसैन के साथ अकबर और अब्बास हैं, साद के साथ उसका बेटा और ग़ुलाम

साद: अस्सलामअलेक। या फ़र्जदे रसूल, आपने मुझे अपनी ख़िदमत में हाज़िर होने का मौका दिया, इसके लिए आपका मशक़र हूं। मुझे क्या इर्शाद है?

हुसैन: मैंने तुम्हें यह तसफ़िया करने के लिए तकलीफ़ दी है कि आखिर तुम मुझसे क्या चाहते हो? तुम्हारे वलिद रसूल पाक के रफीकों में थे, और अगर बाप की तबियत का असर कुछ बेटे पर पड़ता है, तो मुझे उम्मीद है कि तुम में इंसानियत का जौहर मौजूद है। क्या नहीं जानते कि मैं कौन हूं। मैं तुम्हारे मुंह से सुनना चाहता हूं।

साद: आप रसूल पाक के नवासे हैं।

हुसैन: और यह जानकर भी तुम मुझसे जंग करने आए हो, क्या तुम्हें ख़ुदा का ज़रा भी ख़ौफ़ नहीं है? तुममें ज़रा भी इंसाफ़ नहीं है कि तुम मुझसे जंग करने आए हो, जो तुम्हारे ही भाइयों की दग़ा का शिकार बनकर यहां आ फंसा है, और अब यहां से वापस जाना चाहता है। क्यों ऐसा काम करते हो, जिसके लिए तुम्हें दुनिया में रुसवाई और अक़बा में रूस्याही हासिल हो?

साद: या हजरत, मैं क्या करूं। ख़ुदा जानता है कि मैं कितनी मज़बूरी की हालत में यहां आया हूं।

हुसैन: साद, कोई इंसान आज तक वह काम करने पर मज़बूर नहीं हुआ। जो उसे पसंद न आया हो। तुमको यकीन है कि मेरे क़त्ल के सिलसिले में तुम्हारी जागीर बेढ़ंगी ‘रै’ हुकूमत हाथ आएगी, दौलत हासिल होगी। लेकिन साद, हराम की दौलत ने बहुत दिनों तक किसी के साथ दोस्ती नहीं की और न वह तुम्हारे लिए अपनी पुरानी आदत छोड़ेगी। हबिस को छोड़ो और मुझे अपने घर जाने दो।

साद: फिर तो मेरी ज़िंदगी के दिन उंगलियों पर गिने जा सकते हैं।

हुसैन: अगर यह ख़ौफ़ है, तो मैं तुम्हें अपने साथ ले जा सकता हूं।

साद: या हज़रत, ज़ालिम मेरे मकान बरबाद कर देंगे, जो शहर में अपना सानी नहीं रखते।

हुसैन: सुभानल्लाह! तुमने वह बात मुंह से निकाली, जो तुम्हारी शान से बईद है। अगर हक़ पर क़ायम रहने की सजा में तुम्हारा मकान बरबाद किया जाये, तो ऐसा बड़ा नुक़सान नहीं। हक़ के लिए लोगों ने इससे कहीं बड़े नुक़सान उठाए हैं, यहां तक कि जान से भी दरेग़ नहीं किया। मैं वादा करता हूं कि मैं तुझे उससे अच्छा मकान बनवा दूंगा।

साद: या हजरत, मेरे पास बड़ी जरखे़ज और आबाद जागीरें हैं, जो जब्त कर ली जायेंगी, और मेरी औलाद उनसे महरूम रह जायेगी।

हुसैन: मैं हिजाज, मैं तुम्हें उनसे ज्यादा जरखेज और आबाद जागीरें दूंगा। इसका इतमीनान रखो कि मेरी ज़ात से तुम्हें कोई नुक़सान न पहुंचेगा।

साद: या हज़रत, आप पर मेरी जान निसार हो, मेरे साथ २२ हज़ार सवार और पैदल हैं। ज़ियाद ने उनके सरदारों से बड़े-बड़े वादे कर रखे हैं, मैं अगर आपकी तरफ़ आ भी जाऊं, तो वे आपसे ज़रूर जंग करेंगे। इसीलिए मुनासिब यही है कि आप जो शर्त पसंद फरमाएं, मैं ज़ियाद को लिख भेजूं। मैं अपने ख़त के सुलह पर ज़ोर दूंगा, और मुझे यकीन है कि ज़ियाद मेरी तजवीज मंजूर कर लेगा।

हुसैन: ख़ुदा तुम्हें इसका सबाब आक़बत में देगा। मेरी पहली शर्त है कि मुझे मक्का लौटने दिया जाये, अगर यह न मंजूर हो, तो सरहदों की तरफ़ जाकर अमन से ज़िंदगी बसर करने को राजी हूं, अगर यह भी मंजूर न हो, तो मुझे यज़ीद ही के पास जाने दिया जाये, और सबसे बड़ी शर्त यह है कि जब तक मैं यहां हूं, मुझे दरिया से पानी लेने की पूरी आजादी हासिल हो। मैं यज़ीद की बैयत किसी हालत से न क़बूल करूंगा, और अगर तुमने मेरी बापसी की यह शर्त क़ायम न की, तो हम यहां शहीद हो जाना ही पंसद करेंगे। लेकिन अगर यह मंशा है कि मुझे क़त्ल ही कर दिया जाये, तो मैं अपनी जान को गिरां से गिरां कीमत पर बेचूंगा।

साद: हजरत, आपकी शर्तें बहुत माकूल हैं।

हुसैन: मैं तुम्हारे जवाब का कब तक इंतज़ार करूं?

साद: सुबह, आफ़ताब की रोशनी के साथ मेरा क़ासिद आपकी ख़िदमत में हाजिर होगा।

दोनों आदमी अपनी-अपनी फौज़ की तरफ़ लौटते हैं।


पांचवां दृश्य


८ बजे रात का समय। ज़ियाद की खास बैठक। शिमर और ज़ियाद बातें कर रहे हैं।

ज़ियाद: क्या कहते हो। मैंने सख्त ताकीद कर दी थी कि दरिया पर हुसैन का कोई आदमी न आने पाए।

शिमर: बजा है। मगर मैं तो हुसैन के आदमियों को दरिया से पानी लाते बराबर देख़ता रहा हूं, और शायद मेरा, दरिया की हिफ़ाजत के लिए अपनी ज़िम्मेदारी पर, हुक्म जारी करना साद को बुरा लगा।

ज़ियाद: साद पर मुझे इतमीनान है। मुमकिन है, उसे लोगों को प्यासों मरते देखकर रहम आ गया हो, और हक़ तो यह है कि शायद मैं भी मौके पर इतना बेरहम नहीं हो सकता। इससे यह नहीं साबित होता कि साद की नीयत डाँवाडोल हो रही है।

शिमर: मैं साद की शिकायत करने के लिए आपकी ख़िदमत में नहीं हाजिर हुआ हूँ, सिर्फ वहां ही हालत अर्ज करनी थी। हुसैन ने आज साद को मुलाकात करने को भी तो बुलाया है। देखिए, क्या बातें होती हैं।

ज़ियाद: क्या? साद हुसैन से मुलाकातें भी कर रहा है? तुम साबित कर सकते हो?

शिमर: हूजूर, मेरे सबूत की ज़रूरत नहीं। उनका क़ासिद अभी आता ही होगा।

ज़ियाद: क्या कई बार मुलाकातें हुई हैं?

शिमर: आज की मुलाकात का भी तो मुझे इल्म है, पर शायद और भी मुलाकातें तनहाई में हुई हैं।

ज़ियाद: कोई और आदमी साथ नहीं रहा?

शिमर: मैंने खुद साथ चलना चाहा था, पर मेरी अर्ज क़बूल न हुई।

ज़ियाद: क़लाम पाक की क़सम मैं इसे बर्दाश्त नहीं कर सकता। मैंने उसे हुसैन से जंग करने को भेजा है, मसालहत करने के लिए नहीं। मैं उससे इसका जवाब तलब करूंगा।

शिमर: हुजूर के उनके साथ जो सलूक किए हैं, और इस काम के लिए सिला तजवीज किया है वह तो किसी दुश्मन को भी आपका दोस्त बना देता। मगर अपना-अपना मिजाज ही तो है।

एक क़ासिद का प्रवेश

क़ासिद: अस्सलामअलेक या अमीर, उमर दिन साद का ख़त लाया हूं।

ज़ियाद को ख़त देता है, और ज़ियाद उसे पढ़ने लगता है। क़ासिद बाहर चला जाता है।

ज़ियाद: इस मसालहत का नतीजा तो अच्छा निकला। हुसैन वापस जाने को रजामंद हैं, और साद ने इसकी ताईद करते हुए लिखा है कि उनकी जानिब से किसी खतरे का अंदेशा नहीं। खल़ीफ़ा यज़ीद की मंशा भी यही है। साद ने खूब किया कि ग़ैर जंग के फतह हासिल कर ली।

शिमर: बेशक बड़ी शानदार फतह है।

ज़ियाद: क्यों, यह फतह नहीं है? तंग क्यों करते हो?

शिमर: जिसे आप फतह करते रहे हैं, वह फतह नहीं, आपकी शिकस्त है। ऐसी शिकस्त, जो आपको फिर पनपने न देगी। आग फूस में पड़कर उतनी खौफ़नाक नहीं हो सकती, जितने इस मुहासिरे से निकलकर हुसैन हो जायेंगे। शेर किसी शिकार के पीछे दौड़ता हुआ बस्ती में आ गया है। उसे आप घेरकर मार सकते हैं, लेकिन एक बार वह फिर जंगल में पहुंच जाये, तो कौन है, जो उसके पंजों के सामने जाने की हिम्मत कर सके। कर्बला से निकलकर हुसैन वह दरिया होंगे, जो बांध को तोड़कर बाहर निकल आया हो, और आपकी हालत उसी टूटे हुए बांध की-सी होगी।

ज़ियाद: हां, इसमें तो कोई शक नहीं कि अगर वह निकलकर हिजाज और यमन चले जायें, तो शायद ख़लीफ़ा यज़ीद की ख़िलाफ़त डगमगा जाये। मगर एक शर्त यह भी तो है कि उन्हें यज़ीद के पास जाने दिया जाए। इसमें हमें क्या उज्र हो सकता है?

शिमर: अगर बाज कबूतर के क़रीब पहुंच जाये, तो दुनिया की कोई फ़ौज उसे बाज के चंगुल से नहीं बचा सकती। हुसैन अपने बाप के बेटे हैं। खलीफा़ उनकी दलीलों से पेश नहीं पा सकते। कोई अजब नहीं कि अपनी अक्ल के ज़ोर से आज का कैदी कल का ख़लीफ़ा हो, और ख़लीफ़ा को उल्टे उसकी बैयत क़बूल करनी पड़े।

ज़ियाद: तुम्हारा यह ख़याल भी बहुत सही है। काश मुझे तुम्हारी वफ़ादरी का इतना इल्म पहले होता, तो तुम्हीं फ़ौज के सिपहसालार होते।

शिमर: काश साद ने मेरी बातें इतनी कद्रदानी से सुनी होती, तो मुझे यहां आने और आपको तकलीफ़ देने की ज़रूरत ही न पड़ती।

ज़ियाद: तुम सुबह चले जाओ, और साद से कहो कि फ़ौरन जंग शुरू करे।

शिमर: हुजूर की जो हुक्म देना हो ख़त के जरिए दे। मातहत के जरिए उसके अफ़सर को हुक्म देना अफसर को मातहत के ख़ून का प्यासा बनाना है।

ज़ियाद: बेहतर, मैं ख़त ही लिख देता हूं।

ज़ियाद ख़त लिखकर शिमर को देता है

शिमर: इसमें हुजूर ने ऐसा कोई कलमा तो नहीं लिखा, जिसमें साद को सुबहा हो कि मेरे इशारे से लिखा गया है?

ज़ियाद: मुतलक़ नहीं। हां, यह अलबत्ता लिख दिया है कि अगर तूने सिरताबी की, तो तेरी जगह शिमर लश्कर का सरदार होगा।

शिमर: हुजूर की कद्रदानी की कहां तक तारीफ करूं।

ज़ियाद: इसकी ज़रूरत नहीं। अगर साद मेरे हुक्म की तामील करे, तो बेहतर, नहीं तो वह माजूल होगा, और तुम लश्कर के सरदार होगे। पहला काम जो तुम करोगे, वह साद का सर कलम करके मेरे पास भेजना होगा। यहीं तुम्हारी बहाली की बिस्मिल्लाह होगी।

शिमर: उठकर आदाब बजा लाता हूं।

शिमर बाहर चला जाता है और ज़ियाद मकान में आराम करने जाता हैं।


छठा दृश्य


प्रातःकाल। शाम का लश्कर। हुर और साद घोड़ों पर सवार फ़ौज का मुआयना कर रहे हैं।

हुर: अभी तक ज़ियाद ने आपके ख़त का ज़बान नहीं दिया? साद-उसके इंतज़ार में रात-भर आंखें नहीं लगीं। जब किसी की आहट मिलती थी, तो ग़ुमान होता था कि क़ासिद है। मुझे तो यकीन है कि अमीर ज़ियाद मेरी तजवीज़ मंजूर कर लेंगे।

हुर: काश ऐसा होता! अगर जंग की नौबत आई, तो फौज़ के कितने ही सिपाही लड़ने से इनकार कर देगे।

सामने से शिमर घोड़ा दौड़ाता हुआ आता है।

साद: लो, क़ासिद भी आ गया। ख़ुदा करे, अच्छी ख़बर लाया हो। अरे, यह तो शिमर है।

हुर: हां, शिमर ही है। ख़ुदा ख़ैर करे, जब यह खुद ज़ियाद के पास गया था, तो मुझे आपकी तजवीज़ के मंजूर होने से बहुत शक है।

शिमर: क़रीब आकर अस्सलामअलेक। मैं कल एक ज़रूरत से मकान चला गया। अमीर ज़ियाद को ख़बर हो गई। उसने मुझे बुलाया और आपको यह ख़त दिया।

ख़त साद को देता है। साद ख़त पढ़कर जेब में रख लेता है, और एक लंबी सांस लेता है।

साद: शिमर, मैंने समझा था, तुम सुलह की ख़बर लाते होंगे।

शिमर: आपकी समझ की ग़लती थी। आपको मालूम है कि अमीर ज़ियाद एक बार फ़ैसला करके फिर उसे नहीं बदलते। अब आपकी क्या मंशा है?

साद: मज़बूर हुक्म की तामील करूंगा।

शिमर: तो मैं, फ़ौजों को तैयार होने का हुक्म देता हूं?

साद: जैसा मुनासिब समझा।

शिमर फौज़ की तरफ़ चला जाता है।

हुर: ख़ुदा सब कुछ करें, इंसान का बातिन स्याह न बनाए।

साद: यह सब इन्हीं हजरत की कारगुजारी है। ज़ियाद मेरी तरफ़ से कभी इतने बदनुमान न थे।

हुर: मुझे तो फ़र्जन्दें रसूल से लड़ने के ख़याल ही से दहशत होती है।

साद: हुर, तुम सच कहते हो। मुझे यकीन है कि उनसे जो लड़ेगा, उसकी जगह जहन्नम में है। मगर मज़बूर हूं, ‘रै’ की परवा न करूं, तो भी घर की तरफ़ से बेफ़िक्र तो नहीं हो सकता। अफ़सोस, मैं हविस के हाथों तबाह हुआ। काश मेरा दिल इतना मजबूत होता कि ‘रै’ की निजामत पर लट्टू न हो जाता, तो आज मैं फ़र्जन्दें रसूल के मुकाबले पर न खड़ा होता। हुर, क्या इस जंग के बाद किसी तरह मगफ़िरत हो सकती?

हुर: फ़र्जन्दे-रसूल के ख़ून का दाग़ कैसे धुलेगा?

साद: हुर, मैं इतने रोजे रखूंगा कि मेरा जिस्म घुल जाये, इतनी नमाजें अदा करूंगा कि आज तक किसी ने न की होंगी। ‘रै’ को सारी आमदनी खैरात कर दूंगा। पियादा पा हज करूंगा। और रसूल पाक की क़ब्र पर बैठकर रोऊंगा, गुनहगारों की ख़ताएं मुआफ करूंगा, और एक चीटीं को भी ईजा न पहुंचाऊंगा। हाय! ज़ालिम शिमर सोचने का मौका भी नहीं देना चाहता। फौजें तैयार हो रही हैं। क़ीस, हज्जाज, शीश, अशअस अपने-अपने आदमियों को सफ़ों में खड़े करने लगे। वह लो, नक्कारे पर चोट भी पड़ गई।

हुर: मैं भी जाता हूं, अपने आदमियों को संभालूं।

आहिस्ता-आहिस्ता जाता है।

साद: ऐ ख़ुदा! बहुत बेहतर होता कि तूने मुझे शिमर की तरह स्याह बातिन बनाया होता, या हानी और क़सीर का-सा दिल दिया होता कि अपने को ग़ैर पर कुर्बान कर देता। कमज़ोर इंसान भी जानता है कि मुझे क्या करना चाहिए, और क्या नहीं कर सकता। वह ग़ुलाम से भी बदतर है, जिसका अपनी मर्जी पर कोई अधिकार नहीं। मेरे कबीलेवालों ने भी सफ़बंदी शुरू कर दी। मुझे भी अब जाकर अपनी जगह पर सबसे आगे चलना चाहिए और वही करना चाहिए, जो शिमर कराए, क्योंकि अब मैं फ़ौज़ का सरदार नहीं हूं, शिमर है।

आहिस्ता-आहिस्ता जाकर फौ़ज के सामने खड़ा हो जाता है।

शिमर: उच्च स्वर से ऐ ख़िलाफ़त को जिंदा रखने के लिए अपने तई कुरबान करने वाले। बहादुरों, ख़ुदा का नाम लेकर क़दम आगे बढ़ाओ, दुश्मन तुम्हारे सामने है। वह हमारे रसूल पाक का नवासा है, और उस रिश्ते से हम सब ताजीम से उसके आगे सिर झुकाते हैं। लेकिन जो आदमी हिंर्स का इतना बंदा है कि रसूल पाक के हुक्म का, जो उन्होंने ख़िलाफ़त को अब तक क़ायम रखने के लिए दिया था, पैरों-तले कुचलता है, और जो क़ौम की बैयत की परवा न करके अपने विरासत के हक़ के लिए ख़िलाफ़त को ख़ाक में मिला देना चाहे, वह रसूल का नवासा होते हुए भी मुसलमान नहीं है। हमारी निगाहों में रसूल के हुक्म की इज्जत उसके नवासे की इज्जत से कहीं ज्यादा है। हमारा फ़र्ज़ है कि हमने जिस ख़लीफ़ा की बैयत क़बूल की है, उसे ऐसे हमलों, से बचाएं, जो हिर्स को पूरा करने के लिए दाद के नाम पर किए जाते हैं। चलो, फ़र्ज़ के मैदान में क़दम बढ़ाओ।

नश्कारे पर चौब पड़ती है, और पूरा लश्कर हुसैन के पड़ाव की तरफ़ बढ़ता है। साद आगे क़दम बढ़ाता हुआ हुसैन के खेमे के क़रीब पहुंच जाता है।

अब्बास: (हुसैन के खेमे से निकलकर) साद! यह दग़ा! हम तुम्हारे जवाब का इंतज़ार कर रहे है, और तुम हमारे ऊपर हमला कर रहे हो? क्या यही आईने-जंग है?

साद: हज़रत, क़लाम पाक की क़सम, मैं दग़ा के इरादे से नहीं आया। ज़ियाद का ख़त अब्बास के हाथ में देकर यह देखिए, और मेरे साथ इंसाफ़ कीजिए। मैं इस वक्त नाम के लिए फ़ौज का सरदार हूं, अख्तियार शिमर के हाथों में है।

अब्बास: ख़त पढ़कर आखिर तुम दुनिया की तरफ़ झुके। याद रखो, की दरगार में शिमर नहीं, तुम खतावार समझे जाओगे।

साद: या हजरत, यह जानता हूं पर ज़ियाद के ग़ुस्से का मुकाबला नहीं कर सकता। वह बिल्ला है, मैं चूहा हूं, वह बाज है, मैं कबूतर हूं। वह एक इशारे से मेरे ख़ानदान का निशान मिटा सकता है। अपनी हिफ़ाजत की फ़िक्र ने मुझे मज़बूर कर दिया है, मेरे दीन और ईमान को फ़ना कर दिया है।

अब्बास: खुलासा यह है कि तुम हमारा मुहासिरा करना चाहते हो। ठहरो, मैं जाकर भाई साहब को इत्तिला दे दूं।

अब्बास हुसैन के खेमे की तरफ़ जाते हैं।

शिमर: साद के पास आकर क्या अब कोई दूसरी चाल चलने की सोच रहे हैं?

साद: नहीं, हजरत हुसैन को हमारी आमद और मंशा की इत्तिला देने गए हैं।

शिमर: यह मौके को हमारे हाथों से छीनने का हीला है। शायद कबीलों से इमदाद तलब करने का क़स्द कर रहे हैं। एक दिन की देर भी उन्हें मौके का बादशाह बना सकती है।

अब्बास खेमे से वापस आते हैं।

अब्बास: मैंने हजरत हुसैन को तुम्हारा पैग़ाम दिया। हज़रत को इसका बेहद सदमा है कि उनकी कोई शर्त मंजूर नहीं की गई। सुलह की इससे ज्यादा कोशिश उनके इमकान में न थी। गो हम सब जंग के लिये तैयार है, लेकिन उन्होंने एक दिन की मुहलत मांगी है कि दुआ और नमाज में गुजारे। सुबह को हमें ख़ुदा का जो हुक्म होगा, उसकी तामील करेंगे।

साद: इसका जवाब मैं अपनी फ़ौज के दूसरे सरदारों से मशविरा करके दूंगा।

अब्बास अपने खेमों की तरफ़ जाते हैं, और हुर, हज्जाज, अशअस, कीस सब साद के पास आकर खड़े हो जाते हैं।

साद: शिमर, तुम्हारी इस मामले में क्या सलाह है?

शिमर: यह उनकी हीलेबाजी है। आइंदा आप अमीर हैं, जो जी चाहे, करें।

साद: दूसरे सरदारों से मुखातिब होकर हजरत हुसैन ने एक दिन की मुहलत की दरख्वास्त की है, आप लोगों की क्या सलाह है?

शिमर: इसका आप लोग ख़याल रखिएगा कि यह मुहलत आफ़त के मीजान को पलट सकती है।

हुर: मुहलत के मंजूर करने में पसोपेश का कोई मौका नहीं।

हज्जाज: हुसैन अगर काफ़िर होते, और मुहल्लत की दरख्वास्त करते, तो भी उसको क़बूल करना लाजिम था।

क़ीस: बहुत मुमकिन है, वह कल तक आपस में सलाह करके यज़ीद की बैयत क़बूल कर ले, तो नाहक़ खूरेजी क्यों हो।

शिमर: और अगर शाम तक बनी, असद और दूसरे कबीले उनकी मदद के लिए आ जायें, तो?

शीश: हजरत हुसैन ने अभी तक किसी कबीले से इमदाद नहीं तलब की है, वरना हम इतने इतमीनान से यहां न खड़े होते।

साद: बनी और असद ही नहीं, अगर ईराक के सारे कबीलें आ जायें, तब भी हम आज उन्हें जंग के लिए मज़बूर नहीं कर सकते। यह इंसानियत के खिलाफ़ है। मेरा यही फ़ैसला है। आइंदा आप लोगों को आख्तियार है।

साद ग़ुस्से में भरा हुआ वहां से चला जाता है।

शिमर: क्या आप लोगों की यही मर्जी है कि आज जंग मुल्तवी की जाय?

हुर: यहां जितने असहाय मौजूद है, सब अपनी राएं दे चुके, अमीरे-लश्कर भी चला गया। ऐसी हालात में मुहलत के सिवा और हो ही क्या सकता है। अगर आप अपनी ज़िम्मेदारी पर जंग करना चाहते हैं, तो शौक से कीजिए।

हुर, हज्जाज बग़ैरह भी चले जाते हैं।

शिमर: दिल में कौन कहता है कि हुसैन के साथ दग़ा की गई? यहां सब-के-सब के दोस्त हैं। इस फौ़ज में रहने से कहीं यह बेहतर था कि सब के सब हुसैन की फ़ौज में होते। तब भी उनकी इतनी मदद न कर सकते। मुझे ज़रा ताज्जुब न होगा, अगर कल सब लोग हथियार रखकर हुसैन के कदमों पर गिर पड़े। ज़ियाद को इस मुहलत की भी इत्तिला तो दे ही दूं।

साद का क़ासिद मुहलत का पैग़ाम लेकर हुसैन के लश्कर की तरफ़ जाता है। शिमर अपने खेमे की तरफ़ जाता है।


सातवाँ दृश्य


समय ८ बजे रात। हुसैन एक कुर्सी पर मैदान में बैठे हुए हैं। उनके दोस्त और अजीज सब फ़र्श पर बैठे हुए हैं। शमा जल रही है।

हुसैन: शुक्र है, खुदाए-पाक का, जिसने हमें ईमान की रोशनी अता की, ताकि हम नेक को क़बूल करें, और बद से बचें। मेरे सामने इस वक्त मेरे बेटे और भतीजे, भाई और भांजे, दोस्त और रफी़क सब जमा हैं। मैं सबके लिए ख़ुदा से दुआ करता हूँ। मुझे इसका फख्र है कि उसने मुझे ऐसे सआदतमंद अजीज और ऐसे जाँ निसार दोस्त अता किए। अपनी दोस्ती का हक़ पूरी तरह अदा कर दिया, आपने साबित कर दिया कि हक़ के सामने आप जान और माल की कोई हक़ीकत नहीं समझते। इस्लाम की तारीख में आपका नाम हमेशा रोशन रहेगा। मेरा दिल ख़याल से पाश-पाश हुआ जाता है कि कल मेरे बायस वे लोग, जिन्हें जिंदा हिम्मत चाहिए, जिनका हक़ है जिंदा रहना, जिनको अभी ज़िंदगी में बहुत करना बाकी है, शहीद हो जायेंगे। मुझे सच्ची ख़ुशी होगी, अगर तुम लोग मेरे दिल का बोझ हल्का कर दोगे। मैं बड़ी ख़ुशी के हरएक को इजाजत देता हूं कि उसका जहां जी चाहे, चला जाये। मेरा किसी पर कोई हक़ नहीं है। नहीं मैं तुमसे इल्तमास करता हूं इसे क़बूल करो। तुमसे किसी को दुश्मनी नहीं हुई है, जहां जाओगे, लोग तुम्हारी इज्जत करेंगे। तुम जिंदा शहीद हो जाओगे, जो मरकर शहादत का दर्जा पाने से इज्जत की बात नहीं। दुश्मन को सिर्फ मेरे ख़ून की प्यास है, मैं ही उसके रास्ते का पत्थर हूं। अगर हक़ और इंसाफ़ को सिर्फ मेरे ख़ून से आसूदगी हो जाये, तो उसके लिए और ख़ून क्यों बहाया जाये? साद से एक शव की मुहलत मांगने में यही मेरा ख़याल था। यह देखो में यह शमा ठंडी किए देता हूं, जिसमें किसी को हिजाब न हो।

सब लोग रोने लगते हैं, और कोई अपनी जगह से नहीं हिलता।

अब्बास: या हजरत, अगर आप हमें मारकर भगाएं, तो भी हम नहीं जा सकते। ख़ुदा वह दिन न दिखाए कि हम आपसे जुदा हों। आपकी सफलता के साए में पल-भर अब हम सोच ही नहीं सकते कि आपके बग़ैर हम क्या करेंगे, कैसे रहेंगे।

अली अकबर: अब्बाजन, यह आप क्या फरमाते हैं? हम आपके कदमों पर निसार होने के लिये आए हैं। आपको यहां तनहा छोड़कर जाना तो क्या, महज उसके ख़याल से रूह को नफ़रत होती है।

हबीब: ख़ुदा की क़सम, आपको उस वक्त तक नहीं छोड़ सकते, जब तक दुश्मनों के सीने में अपनी तेज बर्छिया न चुभा लें। अगर मेरे पास तलवार भी न होती, तो मैं आपकी हिमायत पत्थरों से करता।

अब्दुल्लाह कलवी: अगर मुझे इसका यकीन हो जाये कि मैं आपकी हिमायत में जिंदा जलाया जाऊंगा और फिर जिंदा होकर जलाया जाऊंगा, और यह अमल सत्तर बार होता रहेगा, तो भी मैं आपसे जुदा नहीं हो सकता। आपके कदमों पर निसार होने से जो रुतबा हासिल होगा, वह ऐसी-ऐसी बेशुमार जिंदगियों से भी नहीं हासिल हो सकता।

जहीर: हज़रत आपने जबाने-मुबारक से ये बातें निकालकर मेरी जितनी दिलशिकनी की है, उसका काफी इजहार नहीं कर सकता। अगर हमारे दिल दुनिया की हविस से मगलूब भी हो जायें, तो हमारे किसी दूसरी तरफ़ जाने से गुरेज करेंगे। क्या आप हमें दुनिया में रूहस्याह और बेगै़रत बनाकर जिंदा रखना चाहते हैं?

अली असगर: आप तो मुझे शरीक किए बगै़र कभी कोई चीज न खाते थे, क्या जन्नत के मजे अकेले उठाइएगा? शमा जलवा दीजिए, हमें इस तरीकी में आप नज़र नहीं आते।

हुसैन: आह! काश रसूले-पाक आज जिंदा होते और देखते कि उनकी औलाद उनकी उम्मत हक़ पर कितने शौक से फ़िदा होती है। ख़ुदा से मेरी यही इल्तजा है कि इस्लाम में हक़ पर शहीद होने वालों की कभी-कमी न रहे। असगर, बेटा जाओ, तुम्हारे बाप की जान तुम पर फ़िदा हो, हम-तुम-साथ जन्नत के मेवे खायेंगे। दोस्तों, आओ, नमाज पढ लें। शायद यह हमारी आखिरी नमाज हो।

सब लोग नमाज पढ़ने लगते हैं।


आठवाँ दृश्य


प्रातःकाल हुसैन के लश्कर में जंग की तैयारियां हो रही हैं।

अब्बास: खेमे एक दूसरे से मिला दिए गए, और उनके चारों तरफ़ खंदके खोद डाली गई, उनमें लकड़ियां भर दी गई। नक्कारा बजवा दूं?

हुसैन: नहीं, अभी नहीं। मैं जंग में पहले क़दम नहीं बढ़ाना चाहता। मैं एक बार फिर सुलह की तहरीक करूंगा। अभी तक मैंने शाम के लश्कर से कोई तक़दीर नहीं की, सरदारों ही से काम निकालने की कोशिश करता रहा। अब मैं जवानों से दूबदू बातें करना चाहता हूं। कह, दो सांडनी तैयार करे।

अब्बास: जैसा इर्शाद।

बाहर जाते हैं।

हुसैन: दुआ करते हुए ऐ ख़ुदा! तू ही डूबती हुई किश्तियों को पार लगाने वाला है। मुझे तेरी ही पनाह है, तेरा ही भरोसा है, जिस रंज से दिल कमज़ोर हो, उसमें तेरी ही मदद मांगता हूं। जो आफत किसी तरह सिर से न टले, जिसमें दोस्तों से काम न निकले, जहां कोई हीला न हो, वहां तू ही मेरा मददग़ार है।

खेमे से बाहर निकलते हैं। हबीब और जहीर आपस में नेजेवाजी का अभ्यास कर रहे हैं।

हबीब: या हजरत, ख़ुदा से मेरी यही दुआ है कि नेजा साद के जिगर में चुभ जाये, और ‘रै’ की सूबेदारी का अरमान उसके ख़ून के रास्ते निकल जाये।

जहीर: उसे सूबेदारी ज़रूर मिलेगी। जहन्नम की या ‘रै’ की, इसका फ़ैसला मेरी तलवार करेगी।

हबीब: वाह! वह मेरा शिकार है, उधर निगाहें न उठाइएगा। आपके लिये मैंने शिमर को छोड़ दिया।

जहीर: बख़ुदा, वह मेरे मुकाबिले आए, तो मैं उसकी नाक काटकर छोड़ दूं। ऐसे बदनीयत आदमी के लिये जहन्नम से ज्यादा तकलीफ़ दुनिया ही में है।

अब्बास: और मेरे लिये कौन-सा शिकार तजवीज किया?

जहीर: आपके लिये ज़ियाद हाजिर है।

हुसैन: और मेरे लिये? क्या मैं ताकता ही रहूंगा?

जहीर: आपको कोई शिकार न मिलेगा।

हुसैन; मेरे साथ यह ज्यादती क्यों?

जहीर: इसलिए कि आप भी शिकारियों की जाल में आ जायेंगे, तो जन्नत की नियामतों में भी साझा बटाएंगे। आपके लिये रसूल-पाक की कुर्बत काफ़ी है। जन्नत की नियामतों में हम आपको शरीक नहीं करना चाहते।

हुसैन: मैं ज़रा साद के लश्कर से बातें करके आ जाऊं, तो इसका फ़ैसला हो।

हबीब: उन गुमराहों की फ़रमाइश करना बेकार है। उनके दिल इतने सख्त हो गए हैं कि उन पर कोई तक़दीर असर नहीं कर सकती।

हुसैन: ताहम कोशिश करना मेरा फ़र्ज़ है।

परदा बदलता है। हुसैन अपनी सांड़नी पर साद की फ़ौज के सामने खड़े हैं।

हुसैन: ऐ लोगों, कूफ़ा और शाम के दिलेर जवानों और सरदारों! मेरी बात सुनो, जल्दी न करो। मुसलमान अपने भाई की गर्दन पर तलवार चलाने में, जितनी देर करे, ऐन सवाब है। मैं उस वक्त तक खुरेजी नहीं करना चाहता, जब तक तुम्हें इतना न समझा लूं, जितना मुझ पर वाजिब है। मैं ख़ुदा और इंसान दोनों ही के नजदीक इस जंग की ज़िम्मेदारी से पाक रहना चाहता हूं, जहां भाई की तलवार भाई की गर्दन पर होगी। तुम्हें मालूम है, मैं यहां क्यों आया? क्या मैंने इराक या शाम पर फौजकसी की? मेरे अजीज़, दोस्त और अहलेबैत अगर फ़ौज कहे जा सकते हो, तो बेशक मैंने फौजकसी की। सुनो और इंसाफ़ करो, अगर तुम्हें ख़ुदा का ख़ौफ़ और ईमान का लिहाज है कि मैं यहां के झगड़ों से अलग रहकर ख़ुदा की इबादत में अपनी ज़िंदगी के बचे हुए दिन गुजारूंगा। मगर तुम्हारी ही फरियाद ने मुझे अपने गोशे से निकाला, रसूल की फरियाद सुनकर मैं कानों से उंगली न डाल सका। अगर इस हिमायत की सज़ा क़त्ल है, तो यह सिर हाजिर है, शौक से क़त्ल करो। मैं हज्जात से पूछता हूं-क्या तुमने मुझे ख़त नहीं लिखे थे?

हज्जाज: मैंने आपको कोई ख़त नहीं लिखा था।

हुसैन: क़ीस, तुम्हें भी ख़त लिखने से इंकार है?

कीस: मैंने कब आपसे फरियाद की थी?

शिमर: सरासर ग़लत है, झूठ है।

हुसैन: ख़ुदा गवाह है कि मैं अपनी ज़िंदगी में कभी झूठ नहीं बोला, लेकिन आज यह दाग भी लगा।

कीस: आप यज़ीद की बैयत क्यों नहीं कर लेते कि इस्लाम हमेशा के लिये फ़ितना और फसाद-पाक हो जाये?

हुसैन: क्या इसके सिवा मसालहत की और कोई सूरत नहीं है?

शिमर: नहीं, और कोई दूसरी सूरत नहीं है।

हुसैन: तो इस शर्त पर सुलह करना मेरे लिये गैरमुमकिन है। ख़ुदा की क़सम, मैं जलील होकर तुम्हारे सामने सिर न झुकाऊंगा, और न ख़ौफ़ मुझे यज़ीद की बैयत क़बूल करने पर मज़बूर कर सकता है। अब तुम्हें अख्तियार है। हम भी जंग के लिये तैयार हैं।

शिमर: पहला तीर चलाने का सबाब मेरा है।

हुसैन पर तीर चलाता है।

किसी तरफ़ से आवाज आती है‘‘जहन्नम में जाने का फख्र भी पहले तुझी को होगा।’’

हुसैन ऊँटनी को अपनी फ़ौज की तरफ़ फेर देते हैं। हुर अपनी फ़ौज से निकलकर आहिस्ता-आहिस्ता हुसैन के पीछे चलते हैं।

शिमर: वल्लाह, हुर, तुम्हारा इस तरह आहिस्ता-आहिस्ता अपने तई तौल-तौलकर चलना मेरे दिल में शुबहा पैदा कर रहा है। मैंने तुमको कभी लड़ाई में इस तरह काँपते हुए चलते नहीं देखा।

हुर: अपने को जन्नत और जहन्नम के लिये तौल रहा हूं, और हक़ है कि मैं जन्नत के मुकाबले में किसी चीज को नहीं समझता, चाहे कोई मार ही क्यों न डाले। घोड़े को एक ऐड लगाकर हुसैन के पास पहुंच जाते हैं ऐ फर्जन्दे रसूल! मैं भी आपके हमराह हूं। ख़ुदावंद मुझे आप पर फ़िदा करे, मैं वहीं हूं, जिसने आपको रास्ते में वापस करने की कोशिश की थी। ख़ुदा की क़सम, मुझे उम्मीद न थी कि ये लोग आपके साथ यह बर्ताव करेंगे, और सुलह की कोई शर्त न क़बूल करेंगे, वरना मैं आपको इधर आने ही न देता, जब तक आप मेरे सिर पर न आते। अब इधर से मायूस होकर आपकी ख़िदमत में हाजिर हुआ हूं कि आपकी मदद करते हुए अपने तई आपके कदमों पर निसार कर दूं। क्या आपके नजदीक मेरी तौवा क़बूल होगी?

हुसैन: ख़ुदा से मेरी दुआ है, तुम्हारी तौबा क़बूल करें।

हुर: अब मुझे मालूम हो गया कि मैं यज़ीद से अपनी बैयत वापस लेने में कोई गुनाह नहीं कह रहा हूं।

दोनों चले जाते हैं। तीरों की वर्षा होने लगती है।


नवाँ दृश्य


कूफ़ा का वक्त। कूफ़ा का एक गांव। नसीमा खजूर के बाग में ज़मीन पर बैठी हुई गाती है।

गीत

दबे हुओं को दबाती है ऐ जमीने-लहद, यह जानती है कि दम जिस्म नातवां में नहीं। क़फस में जी नहीं लगता है आह! फिर भी मेरा, यह जानता हूं कि तिनका भी आशियां में नहीं। उजाड़ दे कोई या फूंक दे उसे बिजली, यह जानता हूं कि रहना अब आशियां में नहीं। ख़ुदा अपने दिल से मेरा हाल पूछा लो सारा, मेरी जवां से मजा मेरी दास्तां में नहीं। करेंगे आज से हम जब्त, चाहे जो कुछ नहीं। यह क्या कि लब पै फुगां और असर फुगां में नहीं। ख़याल करके ख़ुदा अपनी किए को रोता हूं, तबाहियों के सिवा कुछ मेरे मकां में नहीं।

वहब का प्रवेश

नसीमा: बड़ी देर की। अकेले बैठे-बैठे जी उकता गया। कुछ उन लोगों की ख़बर मिली?

वहब: हां नसीमा, मिली। तभी तो देर हुई। तुम्हारा ख़याल सही निकला। हज़रत हुसैन के साथ है।

नसीम: क्या हज़रत-हुसैन की फौज़ आ गई?

वहब: कैसी फौज़? कुल बूढ़े, जवान और बच्चे मिलाकर ७२ आदमी हैं। दस-पांच आदमी कूफ़ा से भी आ गए हैं। कर्बला के बेपनाह मैदान में उनके खेमे पड़े हैं। ज़ालिम ज़ियाद ने बीस-पच्चीस हजार आदमियों से उन्हें घेर रखा है। न कहीं जाने देता है, न कोई बात मानता है, यहां तक कि दरिया से पानी भी नहीं लेने देता। पांच हजार जवान दरिया की हिफा़जत के लिये तैनात कर दिए हैं। शायद कल तक जंग शुरू हो जाये।

नसीमा: मुट्ठी-भर आदमियों के लिये २०-२५ हजार सिपाही! कितनी ग़जब! ऐसा ग़ुस्सा आता है, जिया को पाऊं, तो सिर कुचल दूं।

वहब: बस, उसकी यही जिद है कि यज़ीद की बैयत क़बूल करो। हजरत हुसैन कहते हैं, यह मुझसे न होगा।

नसीमा: हजरत हुसैन नबी के बेटे है, कौल पर जान देते हैं। मैं होती तो ज़ियाद को ऐसा जुल देती कि वह भी याद करता।

कहती: हां, मुझे बैयत क़बूल है। वहां से आकर बड़ी फ़ौज जमा करती, और यज़ीद के दांत खट्टे कर देती। रसूल पाक को शरआ मैं ऐसी आफ़तों के मौके के लिये कुछ रियासत रखनी चाहिए थी। तो हजरत की फौज़ में बड़ी घबराहट फैली होगी?

वहब: मुतलक नहीं नसीमा। सब लोग शहादत के शौक में मतवाले हो रहे हैं। सबसे ज्यादा तकलीफ़ पानी की है। ज़रा-ज़रा से बच्चे प्यासे तड़प रहे हैं।

नसीमा: आह ज़ालिम! तुझसे ख़ुदा समझे।

वहब: नसीमा, मुझे रुखसत करो। अब दिल नहीं मानता, मैं भी हज़रत हुसैन के कदमों पर निसार होने जाता हूं। आओ, गले मिल ले। शायद फिर मुलाकात न हो।

नसीमा: हाय वहब! क्या मुझे छोड़ जाओगे। मैं भी चलूंगी।

वहब: नहीं नसीमा, उस लू के झोंको में यह फूल मुरझा जायेगा। नसीमा को गले लगाकर फिर दिल कमज़ोर हुआ जाता है। सारी राह कंबख्त को समझाता आया था। नसीमा, तुम मुझे दुत्कार दो। ख़ुदा, तूने मुहब्बत को नाहक़ पैदा किया।

नसीमा: रोकर वहब, फूल किस काम आएगा। कौन इसको सूंघेगा, कौन इसे दिल से लगाएगा? मैं भी हजरत जैनब के क़दमों पर निसार हूंगी।

वहब: वह प्यास की शिद्दत, वह गरमी की तकलीफ़, वह हंगामे, कैसे ले जाऊं?

नसीमा: जिन तकलीफों को सैदानियां झेल सकती है, क्या मैं न झेल सकूंगी? हीले मत करो वहब, मैं तुम्हें तनहा न जाने दूंगी।

वहब: नसीमा, तुम्हें निगाहों से देखते हुए मेरे क़दम मैदान की तरफ़ न उठेंगे।

नसीमा: वहब के कंधे पर सिर रखकर प्यारे! क्यों किसी ऐसी जगह नहीं चलते, जहां एक गोशे में बैठकर इस ज़िंदगी का लुप्त उठाएं। तुम चले जाओगे, ख़ुदा न ख्वास्ता दुश्मनों को कुछ हो गया, तो मेरी जिन्दगी रोते ही गुजरेगी। क्या हमारी ज़िंदगी रोने ही के लिये है? मेरा दिल अभी दुनिया की लज्जतों का भूखा है। जन्नत की खुशियों की उम्मीद पर इस ज़िंदगी को कुर्बान नहीं करते बनता। हज़रत हुसैन की फतह तो होने से रही। पच्चीस हज़ार के सामने जैसे सौ, वैसे ही एक सौ एक।

वहब: आह नसीमा। तुमने दिल के सबसे नाजुक हिस्से पर निशाना मारा। मेरी यही दिली तमन्ना है कि हम किसी आफ़ियत के गोशे में बैठकर ज़िंदगी की बहार लूटें। पर ज़ालिम की यह बेदर्दी देखकर ख़ून में जोश आ जाता है, और दिल बेअख्तियार यही चाहता है कि चलकर हजरत हुसैन की हिमायत में शहीद हो जाऊं। जो आदमी अपनी आंखों से ज़ुल्म होते देखकर ज़ालिम का हाथ नहीं रोकता, वह भी ख़ुदा की निगाहों में ज़ालिम का शरीक है।

नसीमा: मैं अपनी आंखें तुम पर सदके करूं, मुझे अजाब व सवाब के मुखमसों में मत डालो। सोचो, क्या यह सितम नहीं है कि हमारी ज़िंदगी की बहार इतनी जल्द रुखसत हो जाये? अभी मेरे उरूसी कपड़े भी नहीं मैले हुए, हिना का रंग भी नहीं फीका पड़ा, तुम्हें मुझ पर ज़रा भी तर्स नहीं आता? क्या ये आंखें रोने के लिये बनाई गई हैं? क्या ये हाथ दिल को दबाने के लिये बनाए गए हैं? यही मेरी ज़िंदगी का अंजाम है?

वहब के गले में हाथ डाल देती है।

वहब: स्वगत ख़ुदा संभालियों, अब तेरा ही भरोसा है। यह आशिक की दिल बहलानेवाली इल्तजा नहीं मालूम का ईमान ग़ारत करने वाला तकाजा है।

साहसराय की सेना सामने से चली आ रही है।

नसीमा: अरे! यह फ़ौज कहां से आ रही है? सिपाहियों का ऐसा अनोखा लिबास तो कहीं नहीं देखा। इनके माथों पर ये लाल-लाल बेल-बूटे कैसे बने हैं? क़सम है इन आंखों की, ऐसे सजीले, कसे हसीन जवान आज तक मेरी नज़र से नहीं गुजरे।

वहब: मैं जाकर पूछता हूं, कौन लोग है। आगे बढ़कर एक सिपाही से पूछता है ऐ जवानों! तुम फरिश्ते हो या इंसान? अरब में तो हमने आदमी नहीं देखे। तुम्हारें चेहरों से जलाल बरस रहा है। इधर कहां जा रहे हो?

सिपाही: तुमने सुलतान साहसराय का नाम सुना है। हम उन्हीं के सेवक हैं, और हजरत हुसैन की सहायता करने जा रहे हैं, जो इस वक्त कर्बला के मैदान में घिरे हुए हैं। तुमने यज़ीद की बैयत ली है या नहीं?

वहब: मैं उस ज़ालिम की बैयत क्यों क़बूल करने लगा था।

सिपाही: तो आश्चर्य है कि तुम हज़रत हुसैन की फ़ौज में क्यों नहीं हो। तुम सूरत से मनचले जवान मालूम होते हो, फिर यह कायरता कैसी?

वहब: शरमाते हुए हम वहीं जा रहे हैं।

सिपाही: तो फिर आओ, साथ चले।

वहब: मेरे साथ मस्तूरात भी हैं। तुम लोग बढ़ो, हम भी आते हैं।

फ़ौज चली जाती है।

नसीमा: यह साहसराय कौन है?

वहब: यह तो नहीं कह सकता, पर इतना कह सकता हूं कि ऐसा हक़परस्त दिलेर, इंसान पर निसार होने वाला आदमी दुनिया में न होगा। वेकसों की हिमायत में कभी उसे पीछे क़दम हटाते नहीं देखा। मालूम नहीं, किस मज़हब का आदमी है, पर जिस मज़हब और जिस क़ौम में ऐसी पाक रूहें पैदा हों, वह दुनिया के लिये बरकत है।

नसीमा: इनके भी बाल बच्चे होंगे?

वहब: बहुत बड़ा ख़ानदान है। सात तो भाई भी हैं।

नसीमा: और मुसलमान न होते हुए भी ये लोग हजरत हुसैन की इमदाद के लिए जा रहे हैं?

वहब: हां, और क्या!

नसीमा: तो हमारे लिये कितनी शर्म की बात है कि हम यों पहलूतिही करें।

वहब: प्यारी नसीमा, चले चलेंगे। दो-चार दिन तो जिदंगी की बहार लूट लें।

नसीमा: नहीं वहब, एक लम्हें की भी देर न करो। ख़ुदा हमें जन्नत में फिर मिलाएगा, और अब अब्द तक ज़िंदगी की बहार लूटेंगे।

वहब: नसीमा आज और सब्र करो।

नसीमा: एक लम्हा भी नहीं। वहब, अब इम्तहान में न डालो, सांडनी लाओ, फ़ौरन चलो।

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शोध एवं शोध-पत्रों के लिए अकादमिक संदर्भ

Premchand, Munshi. "कर्बला." *Munshi Premchand Digital Archive*, 1924, https://munshipremchand.com/works/plays/karbala. Accessed 22 Sep. 2026.