Cover Image for Sangram (संग्राम) by Munshi Premchand - Play
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नाटक•1923•7 दृश्य

संग्राम

Sangram

प्रेमचंद का नाटक 'संग्राम' परंपरा और आधुनिकता के बीच टकराव की कहानी है जो पिता-पुत्र के संघर्ष के माध्यम से सामाजिक बदलाव को दर्शाता है।

दृश्य 6 / 7

छठा दृश्य

पात्र: किसान, फत्तू मियां, हलधर

स्थान : मधुबन गांव।

समय : गागुन का अंत, तीसरा पहर, गांव के लोग बैठे बातें कर रहे हैं।

एक किसान : बेगार तो सब बंद हो गई थी। अब यह दहलाई की बेगार क्यों मांगी जाती है ?

फत्तू : जमींदार की मर्जी। उसी ने अपने हुक्म से बेगार बंद की थी। वही अपने हुक्म से जारी करता है।

हलधर : यह किस बात पर चिढ़ गए ? अभी तो चार-ही-पांच दिन होते हैं, तमाशा दिखाकर कर गए हैं। हम लोगों ने उनके सेवा-सत्कार में तो कोई बात उठा नहीं रखी।

फत्तू : भाई, राजा ठाकुर हैं, उनका मिजाज बदलता रहता है। आज किसी पर खुश हो गए तो उसे निहाल कर दिया, कल नाखुश हो गए तो हाथी के पैरों तले कुचलवा दिया । मन की बात है।

हलधर : अकारन ही थोड़े किसी का मिजाज बदलता है। वह तो कहते थे, अब तुम लोग हाकिम-हुक्काम किसी को भी बेगार मत देना। जो कुछ होगा मैं देख लूंगा। कहां आज यह हुकुम निकाल दिया । जरूर कोई बात मर्जी के खिलाफ हुई है।

फत्तू : हुई होगी। कौन जाने घर ही में किसी ने कहा हो, असामी अब सेर हो गए, तुम्हें बात भी न पूछेंगे।इन्होंने कहा हो कि सेर कैसे हो जाएंगे, देखो अभी बेगार लेकर दिखा देते हैं। या कौन जाने कोई काम-काज आ पड़ा हो, अरहर भरी रखी हो, दलवा कर बेच देना चाहते हों।

कई आदमी : हां, ऐसी ही कोई बात होगी। जो हुकुम देंगे वह बजाना ही पड़ेगा, नहीं तो रहेंगे कहां!

एक किसान : और जो बेगार न दें तो क्या करें ?

फत्तू : करने की एक ही कही। नाक में दम कर दें, रहना मुसकिल हो जाए। अरे और कुछ न करें लगान की रसीद ही न दें तो उनका क्या बना लोगे ? कहां फरियाद ले जाओगे और कौन सुनेगा ? कचहरी कहां तक दौड़ोगे ? फिर वहां भी उनके सामने तुम्हारी कौन सुनेगा !

कई आदमी : आजकल मरने की छुट्टी ही नहीं है, कचहरी कौन दौड़ेगा ? खेती तैयार खड़ी है, इधर ऊख बोना है, फिर अनाज मांड़ना पड़ेगा। कचहरी के धक्के खाने से तो यही अच्छा है कि जमींदार जो कहे, वही बजाएं।

फत्तू : घर पीछे एक औरत जानी चाहिए । बुढ़ियों को छांटकर भेजा जाए।

हलधर : सबके घर बुढ़िया कहां ?

फत्तू : तो बहू-बेटियों को भेजने की सलाह मैं न दूंगा।

हलधर : वहां इसका कौन खटका है ?

फत्तू : तुम क्या जानो, सिपाही हैं, चपरासी हैं, क्या वहां सब-के-सब देवता ही बैठे हैं। पहले की बात दूसरी थी।

एक किसान : हां, यह बात ठीक है। मैं तो अम्मां को भेज दूंगा।

हलधर : मैं कहां से अम्मां लाऊँ ?

फत्तू : गांव में जितने घर हैं क्या उतनी बुढ़िया न होंगी। गिनो एक-दो-तीन, राजा की मां चार, उस टोले में पांच, पच्छिम ओर सात, मेरी तरफ नौ: कुल पच्चीस बुढ़ियां हैं।

हलधर : घर कितने होंगे ?

फत्तू : घर तो अबकी मरदुमसुमारी में तीस थे।कह दिया जाएगा, पांच घरों में कोई औरत ही नहीं है, हुकुम हो तो मर्द ही हाजिर हों।

हलधर : मेरी ओर से कौन बुढ़िया जाएगी ?

फत्तू : सलोनी काकी को भेज दो। लो वह आप ही आ गई।

सलोनी आती है।

फत्तू : अरे सलोनी काकी, तुझे जमींदार की दलहाई में जाना पड़ेगा।

सलोनी : जाय नौज, जमींदार के मुंह में लूका लगे, मैं उसका क्या चाहती हूँ कि बेगार लेगी। एक धुर जमीन भी तो नहीं है। और बेगार तो उसने बंद कर दी थी ?

फत्तू : जाना पड़ेगा, उसके गांव में रहती हो कि नहीं ?

सलोनी : गांव उसके पुरखों का नहीं है, हां नहीं तो। फतुआ, मुझे चिढ़ा मत, नहीं कुछ कह बैठूंगी।

फत्तू : जैसे गा-गाकर चक्की पीसती हो उसी तरह गा-गाकर दाल दलना। बता कौन गीत गाओगी ?

सलोनी : डाढ़ीजार, मुझे चिढ़ा मत, नहीं तो गाली दे दूंगी। मेरी गोद का खेला लौंडा मुझे चिढ़ाता है।

फत्तू : कुछ तू ही थोड़े जाएगी। गांव की सभी बुढ़ियां जाएंगी।

सलोनी : गंगा-असनान है क्या ? पहले तो बुढ़ियां छांटकर न जाती थीं।मैं उमिर-भर कभी नहीं गई। अब क्या बहुओं को पर्दा लगा है। गहने गढ़ा-गढ़ा कर तो वह पहनें, बेगार करने बुढ़ियां जाएं।

फत्तू : अबकी कुछ ऐसी ही बात आ पड़ी है। हलधर के घर कोई बुढ़िया नहीं है। उसकी घरवाली कल की बहुरिया है, जा नहीं सकती। उसकी ओर से चली जा।

सलोनी : हां, उसकी जगह पर चली जाऊँगी। बेचारी मेरी बड़ी सेवा करती है। जब जाती हूँ तो बिना सिर में तेल डाले और हाथ-पैर दबाए नहीं आने देती। लेकिन बहली जुता देगा न ?

फत्तू : बेगार करने रथ पर बैठकर जाएगी।

हलधर : नहीं काकी, मैं बहली जुता दूंगा। सबसे अच्छी बहली में तुम बैठना।

सलोनी : बेटा, तेरी बड़ी उम्मिर हो, जुग-जुग जी। बहली में ढोल-मजीरा रख देना। गाती बजाती जाऊँगी।

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शोध एवं शोध-पत्रों के लिए अकादमिक संदर्भ

Premchand, Munshi. "संग्राम." *Munshi Premchand Digital Archive*, 1923, https://munshipremchand.com/works/plays/sangram. Accessed 22 Sep. 2026.